कमला देवी सारस्वत चट्टोपाध्याय भारतीय नारी समाज की प्रत्यक्ष नान्दीमुख मातृशक्ति है
महिला नांदीमुख मां, दादी, परदादी, नानी, परनानी, बूढ़ी परनानी को भी
छः मातृ नान्दीमुखा - डी.एन.ए. घोषित करें।
गुह महाशय फिर लेखनी चलायें।
इतिहास विज्ञ रामचंद्र गुह ने भारत के उन्नीस आधुनिक निर्माताओं में कमला देवी का उल्लेख किया। कमला देवी के माता पिता के बारे में केवल इतना लिखा कि वे वर्तमान में दक्षिण कन्नड़ नाम से जाने जारहे जिले के मंगलुरू जिले के प्रशासनिक अधिकारी थे। सारस्वत संप्रदाय के लेखक गुरूदत्त जो मूलतः पंजाबी सारस्वत ब्राह्मण थे उन्होंने दक्षिण कर्णाटक में सारस्वत ब्राह्मणों के बारे में मैसुरू - मैसूर संस्कृत शब्द माहिष्मती की तत्कालीन सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी थे। स्वयं सारस्वत होने के कारण उनकी रूचि कर्णाटक में बस गये सारस्वतात्रिपुर ब्राह्मणों के बारे में सटीक जानकारी अपने प्रकाशन में प्रस्तुत की। उनके अनुसार कमला देवी अनन्तैया धारेश्वर गिरिजा बाई की अंतिम संतान थीं। उनका जन्म 3 अप्रेल 1903 को बंगलुरू में हुआ था तब अनन्तैया धारेश्वर मंगलुरू के कलक्टर थे। कमला देवी की जननी गिरिजा बाई के बारे में इतिहासकार ने लिखा कि वे तमिल, अंग्रेजी, हिन्दी व मराठी भाषायें पढ़ लेती थीं। इतिहासकार ने लिखा कि कमला देवी जब मात्र किशोरी थीं उनका विवाह उनसे उम्र में दो वर्ष बड़े व्यक्ति के साथ होगया था। गुरूदत्त के अनुसार कमला देवी के पहले पति का नाम कृष्णराव था। विवाह के दो वर्ष पश्चात ही कृष्णराव दिवंगत होगये। कमला देवी सोलह वर्ष की उम्र में ही विधवा होगईं। क्या ही अच्छा होता इतिहास विद गुह - हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ कमला देवी के पुनर्विवाह का अथवा हरीन्द्रनाथ द्वारा एक बाल विधवा युवा ब्राह्मणी से विवाह करने की तब के युग में विस्मयकारी घटना थी। स्वयं हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय बंगाली ब्राह्मणों में भी विधवा होने के बाद स्त्री काशी या वृन्दावन जाकर वैधव्य जीवन व्यतीत करती थीं। तत्कालीन नीतिकारों के मत में कन्या जब आठ वर्ष की हो जाती कहा जाता - अष्टवर्षा भवेद् गौरी नर्ववर्षा तु रोहिणी प्राप्ते तु दशमें वर्षे अवश्यम् कुरू कन्यादानम्। आसेतु हिमाचल जहां जहां ब्राह्मणों की बसासत होती दस वर्ष होते ही कन्या ब्याह दी जाती थी। बाल विवाह रोक कानून के बावजूद भी विवाह होते थे। आज के तथाकथित आधुनिक युग में भी पश्चिमी भारत में रेणुकेया - जामदग्न्य परशुराम जयंती वैशाख महीने की शुक्ल की तृतीया - अक्खातीज जिसे संस्कृत में अक्षय तृतीया कहा जाता है। अक्षय तृतीया को सोने के आभूषणों के संग्रह के समानांतर राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब का हिन्दू समाज अक्खातीज को सामूहिक विवाह - बालविवाह सहित विवाह प्रथा चालू है। पूर्वी भारत में अगहन शुदी पंचमी जिस दिन जनकपुर में सीता-राम विवाह हुआ था पूर्वी भारत में आज भी विवाह पंचमी नाम से मशहूर अगहन शुदी पंचमी को व्यापक पैमाने में विवाह होते हैं। परशुराम स्वयं विवाहित व गृहस्थी नहीं थे पर उनका नाम पश्चिमी भारत के गृहस्थों के लिये पुण्यपर्व माना जाता है। यह भारत का सांस्कृतिक समाज वाला इतिहास है। कमला देवी का पूरा वैयक्तिक इतिहास भारत की महिला शक्ति संवर्धन के लिये गुह महाशय जो जब वे आधुनिक भारत निर्माताओं की अगली श्रंखला सृजित करेंगे उनसे अनुरोध है कि वे कमला देवी के पितृकुल - अनन्तैया धारेश्वर जो कमला देवी के जन्म के समय मंगलुरू के कलक्टर थे उनके बारे में उनकी पत्नी गिरिजा बाई जिसने हिम्मत कर अपनी बाल विधवा ब्राह्मणी कन्या को पढ़ाया लिखाया। जब कमला देवी ने हरीन्द्रनाथ से प्रेम विवाह किया श्रीमती गिरिजा बाई अपनी छोटी सी बिटिया को पुनर्विवाह के लिये - विधवा विवाह के लिये प्रोत्साहित किया यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है। पंडित नेहरू अपनी इकलौती कन्या इंदिरा को प्रियदर्शिनी कहा करते थे। पंडित नेहरू की पत्नी कमला नेहरू ने मृत्यु के प्राप्त होते समय अपने पति पंडित जवाहर लाल नेहरू से आश्वासन लिया कि वे इदिरा को फिरोज से शादी करने देंगे। पंडित नेहरू के करीबी हितैषी हृदयनाथ कुंजरू ने कहा था - जवाहर लाल जिस तरह महात्मा गांधी ने विजयलक्ष्मी को मुसलमान से शादी करने से रोका वही उपाय तुम भी करो पर पंडित नेहरू ने दिवंगता पत्नी को जो वचन दिया था उसका निर्वाह किया। फिरोज से इंदिरा की शादी 1942 में संपन्न हुई तब इंदिरा पच्चीस वर्ष की थीं। मां की मृत्यु के समय इंदिरा मात्र 17 वर्ष की थीं। इंदिरा अपने को इंदिरा नेहरू गांधी कहती थीं। कमला देवी चट्टोपाध्याय जिनके माता पिता सारस्वत थे क्यों न इतिहासविद उन्हें कमला देवी सारस्वत चट्टोपाध्याय के रूप में इतिहास में गिनती कराते।
महर्षि वेदव्यास कृत श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के छठे अध्याय के 7वें श्लोक के अनुसार भारत के जैन धर्म मानने वाले लोग ऋषि-मेरूदेवी पुत्र ऋषभ को चौबीस तीर्थंकरों में पहला तीर्थंकर मानते हैं। ऋषभ के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था। ऋषभ के बारे में कहा गया है - भगवतः ऋषभस्य योगमाया वासनया देह इमाम् जगतीमाभिमाना भासेन संक्रममाणः। कौंक, बैंक, कुटकान दक्षिण कर्णाटक देशान् यद्ऋच्छयोपगतः कुटका वली भंजनः आस्यकृतास्यक बल उन्माद इव मुक्त मूर्धनोऽसंवीत् एव विचचार। दक्षिण कर्णाटक का इलाका विविधर्माें की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। गुरूदत्त ने स्वयं सारस्वत होने के कारण सारस्वत ब्राह्मणों में रूचिकर लेखन किया परंतु कन्नड़ भाषा में दक्षिण कन्नड़ के विविध सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक तत्वों की समीक्षा करनी आवश्यक है। दक्षिण कन्नड़ जिसे भागवत पुराण ने दक्षिण कर्णाटक देश संज्ञा दी वहां ब्राह्मण धर्म व जैन धर्म का समानांतर विकास हुआ। जैन धर्मावलंबियों का एक ग्रन्थ नेमिनाउ चरित पालि भाषा में है। नेमिनाथ योगेश्वर वासुदेव कृष्ण के समकालीन थे। कृष्ण काव्य में नेमिनाथ की कोई आलोचना प्रत्यालोचना नहीं हुई पर नेमिनाउ चरित में वासुदेव कृष्ण के सामाजिक स्वत्व को महाभारत में वर्णित शिशुपाल वध प्रकरण की तरह लिया गया है। भारत में जैन धर्मावलंबी बहुसंख्यक नहीं आस्था, मजहब की दृष्टि से अल्प संख्यकों में आगणित होते हैं। दक्षिण कर्णाटक में भरत के भाई महाबली की विशाल प्रस्तर मूर्ति है। महर्षि वेदव्यास यह मानते हैं कि ऋषभ जो नाभि-मेरूदेवी के पुत्र थे ब्रह्मावर्त आजकल जिसे बिठूर कहते हैं ब्रह्मावर्त को मूल देश का मुख्य स्थान माना जाता रहा है। ऋषभ का जीवनादर्श आकर्षक था भारत के जैन धर्मावलंबी उन्हें जैन धर्म का पहला तीर्थंकर मान कर चलते हैं पर जिन लोगों को वैदिक व्यवस्था ज्यादा रूचिकर लगती है वे ऋषभ को व्यवहार कुशल अपरिग्रही राजा मानते हैं। जब ऋषभ देव ने अवधूत वेश में ब्रह्मावर्त से प्रव्रजन किया उनका शरीर ही परिग्रह था। उन्होंने राज्याधिकार अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को सौंपा। बादरायण मान्यता के अनुसार इस भूखंड का नाम भरत के कारण ही भारत है। भरत शब्द के शाब्दिक माने ही भरस्व भरण पोषण करो होेता है। रामचंद्र गुह सरीखे सलीकेवार इति वृत्तांत प्रस्तुत करने वाले महानुभावों को यह चिंतन मनन करना चाहिये क्या वे भारत के इतिहास तत्त्व को दुनियां के लोगों में प्रचारित करना ही अपना कर्तव्य मानते हैं या भारत के इतिहास को भारत की जनता जो भारतीय वाणियां बोलती है उसके ज्ञानवर्धन के लिये भी सहेजना चाहिये। कमला देवी चट्टोपाध्याय के पिता अनन्तैया धारेश्वर मंगलुरू के कलक्टर थे जब उनके घर कमला देवी का जन्म 3 अप्रेल 1903 को हुआ। धारेश्वर महाशय की धर्मपत्नी गिरिजा बाई के बहुभाषा ज्ञान को इतिहासविद ने स्वीकार किया। इस घटना को घटे सौ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं। तब बाल विवाह एक सामान्य लोक परंपरा थी। विधवा विवाह का स्थापित रिवाज नहीं था। कम से कम उस समाज में तो विधवा विवाह अस्वीकार्य था जो अपने आपको ब्राह्मण कहते थे। लड़की का विवाह दस से बारह तेरह वर्ष की उम्र तक संपन्न करना एक सामान्य सामाजिक व्यवस्था थी। गिरिजा बाई ने अपनी आखिरी संतान कमला देवी जो मात्र सोलह वर्ष की उम्र में बाल विधवा हो चुकी थीं उसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। जब कमला देवी ने हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय से विवाह संपन्न किया बंग व कर्णाटक दोनो इलाकों में ब्राह्मण बहुल कट्टरधर्मी थे। विधवा विवाह एक नया उपक्रम था जिसमें हरीन्द्रनाथ के परिजनों व कमला देवी की मां गिरिजा बाई व पिता अनन्तैया धारेश्वर ने समाज में व्याप्त विधवा उत्पीड़न को समाप्त करने का भगीरथ प्रयास किया। संभव है रामचंद्र गुह महाशय का चिंतन पोखर उन्हें प्रेरित करे कि जिस तरह प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत के पचास निर्माताओं की घोषणा की उनकी जीवनियां प्रकाशित की गयीं। रामचंद्र गुह जो ऐतिहासिक व्यक्तित्त्व का उभारने में दक्ष हैं संभव है 1947 से पूर्व के आधुनिक भारत के निर्माताओं में कुछ महानुभावों को जोड़ना पसंद करें। जहां तक महिला शक्ति का सवाल है रानी लक्ष्मीबाई, महादेवी वर्मा, मां आनंदीमयी और इंदिरा गांधी सरीखी महिलाओं के साथ साथ कमला देवी सारस्वत चट्टोपाध्याय के साथ साथ हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय भगिनी सरोजिनी नायडू को आधुनिक भारत निर्माताओं की पंगत में खड़ा करने का शिव संकल्प लें।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment