Sunday, 3 January 2016

मिस्टर रौडरिक्स का आनंद स्वर-
दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे-अधुना नित्य स्वर भी
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 26 जनवरी 2015 के 66वें गणतंत्र दिवस समारोह के विशेष अतिथि ने अपने भाषण में ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ मूवी की प्रशंसा करते हुए हिन्दी में उद्घोष किया, उनके श्रोताओं में जिनमें ज्यादा लोग भारतवासी थे अमरीकी राष्ट्रपति की भावना को समझने में ज्यादा देर नहीं लगायी। शशांक बंगाली द्वारा लास ऐंजल्स टाइम्स के शुक्रवार 18 दिसंबर 2015 के दूसरे पन्ने में India’s 20 Year love affair शीर्षक आख्यान में ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ छपी शाश्वत प्रेम कहानी ने इस ब्लागर के ताड़गुड़ विशेषज्ञ अपने सहयोगी मिस्टर रौडरिक्स की याद ताजा कर दी। रौडरिक्स से पहली मुलाकात दहानू में हुई जहां ताड़गुड़ सलाहकार रहे गजानन नाईक की कर्मभूमि थी। बाबू राजेन्द्र प्रसाद जब पंडित नेहरू मंत्रिमंडल में केबिनेट मंत्री थे 30 जनवरी 1948 के दिन महात्मा गांधी के महाप्रयाण के पश्चात भारत सरकार ने गांधी आर्थिकी का जो पहला कदम उठाया वह गजानन नाईक को भारत सरकार का ताड़गुड़ सलाहकार नियुक्त करना था। गजानन नाईक ने ताड़गुड़ माइक्रो क्राफ्ट को एक संगठित कुटीर उद्यम बनाने में अपनी समूची जिन्दगी समर्पित कर दी तथा जो लोग आज हेल्थ केअर के लिये सरकारी बजट का ज्यादा हिस्सा आवंटित करने के लिये प्रयास करते रहते हैं उन्हें नीरा और ताड़गुड़ या खजूरी गुड़ सेवन करने से दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रही मधुमेह या डायबिटीज बीमारी से छुटकारा देने वाली नीरा या ताड़गुड़ सेवन की सलाह कम पसंद आती है। 1977 में मोरारजी रणछोड़ जी देसाई ने प्रधानमंत्री का पद संभालते ही दिल्ली में एग्रो एक्सपो का आयोजित कराया। दिल्ली के बहुत नजदीक उत्तर प्रदेश राज्य के वर्तमान बड़ौत जिले में यमुना तट में सांक्रोद नाम का एक गांव है वहां से ताड़ की छोटी बहन खजूर के पेड़ों से नीरा निकासी संकल्पित की गयी। एग्रो एक्सपो में ‘नीरा सेवन कक्ष’ निर्मित करने से प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने गांधी दर्शन कायाकल्प करने राजधानी में गांधी आर्थिकी का भव्य प्रबंधन करने का आह्वान किया। रौडरिक्स मूलतः गोवा निवासी थे उनके पूर्वज कोंकणस्थ रूद्राक्ष नेता समाज के प्रमुख हुआ करते थे। पुर्तगाली सरकार ने गोवा में बलात धर्मान्तरण की दुन्दुभि बजाई। धर्मान्तरण ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर व 1858 में महारानी विक्टोरिया द्वारा भारत को बर्तानी राज का महत्वपूर्ण हिस्सा घोषित करने का उद्घोष 1858 के प्रयाग कुंभ मेले में हुआ था। बर्तानी और अमरीकी मिशनरियां भी धर्मान्तरण कराती रहती थीं पर जितनी बेशर्मी से पुर्तगाली लोग बलात सामूहिक धर्मान्तरण कराते थे उसकी एक बानगी मिस्टर रौडरिक्स वर्णन करते थे। बालगंगाधर तिलक ने गणपति - पारंपरिक हिन्दुस्तानी गोबर गणेश को गणेश की व्यक्तिगत व पारिवारिक आराधना उन्होंने सामाजिक प्रथा घोषित कर मूलतः महाराष्ट्र में गणपति बप्पा मोरिया का उद्घोष किया। भादों महीना जिसे सिंह संक्रांति वाला महीना भी कहा जाता है भादों शुक्ल चतुर्थी को लोग गणेश चतुर्थी के रूप में मनाते ही थे। बालगंगाधर तिलक ने बंगाल की दुर्गा पूजा की तर्ज पर गणपति पर्व गणेश चतुर्थी से शुरू कर अनन्त चतुर्दशी तक पूरे ग्यारह दिन का गणपति पर्व संचालन कर भारतीय राष्ट्रीयता को पुख्ता किया। गुजरात का नवरता गरबा तथा हिमालय में दुर्गा नवरात्र सामूहिक रूप से गांव गांव शहर दर शहर मनाये ही जाते थे। दशहरा, दिवाली, मकर संक्रांति, महाशिवरात्री, होली, गुड़ी पड़वा, रामनौमी, आषाढ़ी गुरूपूर्णिमा, श्रावणी रक्षाबंधन केवल सनातन धर्मावलंबियों के त्यौहार न रह कर राष्ट्रीय त्यौहार बन गये। मिस्टर रौडरिक्स जब तक गोवा, मुंबई, दहाणू में तैनात थे टूटी फूटी हिन्दी बोलते थे। जब उनकी तैनाती दिल्ली में हुई सांक्रोद के गांवों के खजूर के पेड़ों से नीरा निकालने खजूरी गुड़ निर्मित करने का उत्तरदायित्त्व उन्होंने संभाला। उनकी हिन्दी उत्तरोत्तर चमकती रही। सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें लखनऊ बसना पसंद आया। रौडरिक्स का मत था कि असली हिन्दुस्तान तो हिन्दी भाषी इलाका है। पंजाब पंजाबियों का, कश्मीर कश्मीरियों का, गुजरात गुजरातियों का, महाराष्ट्र मराठियों का, असम असमियों का, बंगाल बंगालियों का, ओडिशा उड़िया भाषियों का, आंध्र तेलुगु लोगों का, तमिलनाडु तमिल लोगों का, केरल मलयालियों का, कर्णाटक कन्नड़ भाषियों का। गोवा वस्तुतः पुर्तगाली राज बनने से पहले कोंकणी भाषी लोगों का क्षेत्र था। मिस्टर रौडरिक्स ने अपनी नौकरी का पहला चरण दहाणू महाराष्ट्र में रखा। नौकरी के साथ रिटायर होना एक जरूरी प्रकरण हुआ करता है। रौडरिक्स पिछली सहस्त्राब्दी के बीसवीं शती वाले अंतिम दशक में लखनऊ से मुक्त हुए। यह ब्लागर तब लखनऊ में ही रहता था। रूद्राक्ष नेता - ख्रिस्ती धर्मावलंबी होने से पूर्व कोंकणस्थ शैव था। उसने अनुभव किया कि हिन्दी भाषी हिन्दुस्तान में उसके साथ मजहब के आधार पर व्यवहार नहीं होगा। सेवानिवृत्ति के पश्चात वह नियमित रूप से इस ब्लागर से मिलता रहता था। रोजाना मिलने पर दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे का उद्गान करता रहता। यह ब्लागर न तो मूवी देखता है न ही टी.वी. सीरियल देखने का शौकीन है। अलबत्ता कुछ घनिष्ठ मित्रों ने रामानंद सागर का रामायण सीरियल व बी.आर. चोपड़ा का महाभारत सीरियल इस ब्लागर को नियमित रूप से दिखाया। इस ब्लागर की पुष्ट धारणा है कि यह समूचा संसार परमात्मा की मूवी ही है। इसे निर्विकार देखते रहो प्रतिक्रिया मत करो। अपने व्यवहार को शांत-समतापूर्ण रखो। सुख-दुख, राग-द्वेष, यश-अपयश, जय-पराजय, स्तुति-निंदा से अपने आपको अलग रखो। जो व्यवहार आपको अपने अनुकूल नहीं लगता ऐसा व्यवहार दूसरे से मत करो। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ मानते हुए अपनी जिन्दगी की नाव के खेवनहार बनो। मुंबई शहर का आलीशान सिनेमाघर मराठा मंदिर कलापूर्ण पुरानी भवितव्यता वाला सिनेमा हाल है। मुंबई के मध्यवर्ती क्षेत्र का यह अपने किस्म का अनोखा लोकप्रिय सिनेमा घर है। कुतुब पटेल दुबला पतला तेईस वर्षीय घुंघराले केश वाला नौजवान कहता है कि उसे याद ही नहीं है कि वह कितनी बार टी.वी. में दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे देख चुका है। महाराष्ट्र का पड़ौसी राज्य गुजरात जहां से छः घंटे में रेल या बस से मुंबई पहुंचा जा सकता है। मराठा मंदिर में शाहरूख खान व काजोल की यह फिल्म देखने अपने करीबी दोस्तों सहित पहुंचा। तीन घंटा निरंतर चलने वाली दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे देखने टिकट खरीद की लाईन में खड़े रहते रहते भी आनंदातिरेक से लबालब भरे रहते हैं। भारतीय सिनेमा का अपने किस्म का अनोखा बालीवुड है। कई मानों में हिन्दुुस्तानी बालीवुड जिसमें हिन्दी सिनेमा के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मलयाली, कन्नड़, उड़िया, असमी और नैपाली फिल्में भी दिखायी जाती हैं। बूटेदार पीली साड़ी पहने काजोल नायिका तथा शाहरूख खान महानायक की भूमिका में दिखते हैं। दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे यह स्त्री पुरूष प्रेम प्रसंग का एक अद्भुत दृश्य है। भारत में स्त्री पुरूष प्रेम की एक से एक जीवंत कहानियां गाई जाती हैं। महाराष्ट्र में ही एक इलाका विदर्भ कहा जाता है। यहां के राजा की उपाधि भी जनक हुआ करती थी उसी तरह जिस तरह मिथिला के राजा जनक कहलाते थे। भीष्मक की कन्या रूक्मिणी का ब्याह अपने महाराज कुमार रूक्मी की सलाह पर विदर्भ नरेश भीष्मक ने उत्तरापथ के चेदिराज शिशुपाल के साथ तय किया। शिशुपाल की बारात विदिशा से विदर्भ पहुंची। महाराज भीष्मक ने बारात की अगवानी की। उस बारात में मगध नरेश जरासंध, काशी नरेश पौण्ड्रक सहित रूक्मी के चहेते अनेकानेक राजा व राजकुमार पहुंचे थे। महाराज भीष्मक की रानी शैव्या ने महाराज भीष्मक से कहा - रूक्मिणी कृष्ण से प्यार करती है और उससे से ही शादी भी करना चाहती है। महाराज भीष्मक ने अपनी रानी को कहा - अगर रूक्मिणी कृष्ण पर रीझ गयी है, कृष्ण-रूक्मिणी का पारस्परिक प्रेम यदि अद्वितीय हो तो कृष्ण उसे अपहरण कर ले जाये। माता पिता की बात रूक्मिणी भी सुन रही थी। राजा भीष्मक ने आगे कहा - महारानी हमारे पुरोहित कुमार सरस्वती कृपा पात्र हैं। रूक्मिणी से कहो यदि उसका आकर्षण अद्भुत है तो पुरोहित कुमार के मार्फत कृष्ण को अपना प्रेम संदेश भेजे। पुरोहित कुमार को रूक्मिणी ने बुलाया और अपने मन की बात कही। पुरोहित कुमार ने द्वारका पहुंच कर रूक्मिणी के सुर में कृष्ण को रूक्मिणी का संदेश सुनाया। रूक्मिणी ने कहा -
श्वो भाविनि त्वभजितेन्दुवहने विदर्भान् गुप्त समेत्व पृतना पतिभिः परीतः।
निर्मथ्य चैद्य मगधेन्द्र बलम् प्रसह्य माम् राक्षसेन् विधिनोद्वह वीर्यशुल्काम्।।
पुरोहित कुमार के मुख से रूक्मिणी की वाणी में कृष्ण ने सुना। राक्षस विवाह के रूप में मेरा अपहरण कर शिशुपाल भार्या होने से मुझे बचाओ। फिल्म समीक्षक राजीव मासंद को उद्धृत करते हुए शशांक बंगाली आगे व्यक्त करते हैं कि दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे को सूत्र रूप में डीडीएलजे के बारे में नटसाजा राठौड़ फिल्म स्कूल लंदन के विद्यार्थी अपनी परास्नातक उपाधि परियोजना में डीडीएलजे पर एक डाकुमेंटरी निर्देशन कर रहे हैं। सोच यह है कि दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे में जो प्रेमाकर्षण है वह एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति सरीखा अद्भुत प्रसंग है। शाहरूख खान और काजोल की पहली वाली सात फिल्में, खान अब पचास साला प्रौढ़ और काजोल ने अपना फिल्म कैरियर का रास्ता बदल मां की ममता का रास्ता अपनाया अपने दो बच्चों का भविष्य निर्माण करने लगी। डीडीएलजे फिल्म अकेली हिन्दुस्तानी फिल्म है जिसने 440 लाख डालर हिन्दुस्तानी रूपये में पौने तीन अरब रूपये से ज्यादा अर्जित कर लिये हैं। हरीश दर्जी एक मानक स्तर के दर्जी हैं। खूबसूरत कमीज पहले कहते हैं कि मराठा मंदिर पहुंच कर हफ्ते में एक बार दुकान बढ़ा कर फिल्म देखने जाते हैं। दरजी का मान्यता है कि मुंबई का मराठा मंदिर पहुंच कर सिनेमा देखने मितव्ययिता का कम खर्ची का ऐसा रास्ता है जिसमें मुंबई का गरीब आदमी भी मनोरंजन का आनंद लेता है। हिन्दुस्तान में प्रेम की अनेक दास्तानें हैं। भड़ोच - भृगु कच्छ में वामन को तीन कदम भूमि की भीख देने वाले राजा बलि का बेटा बाणासुर शोणितपुर असम का नरेश था। उसकी बेटी राजकुमारी ऊषा ने सपने में कृष्ण के पोते कामदेव के अवतार प्रद्युम्न के बेटे को स्वप्न रति में देखा। वह अनिरूद्ध पर मोहित ही नहीं हुई अनिरूद्ध को पाने के लिये उसने अपने पिता राजा बाणासुर के अमात्य प्रधान कुंभाण्ड कुमारी चित्रलेखा को अपना सपना सुनाया। चित्रलेखा योगमार्ग दीक्षिता युवती थी। उसे अपनी योग्यता प्रदर्शन करने का सुनहरा अवसर हाथ आगया। चित्रलेखा ने राजकुमारी ऊषा को अपनी चित्र निर्माण काबलियत से कृष्ण, प्रद्युम्न व अनिरूद्ध के चित्र बना कर दिखाये। श्यामल अनिरूद्ध के चित्र जिसे आज की भाषा में फोटो कहा जा सकता है अनिरूद्ध के चित्र को देख कर ऊषा ने सहेली अमात्य पुत्री चित्रलेखा से कहा - सखी यही वह युवा है जिसने मेरा मन हर लिया है। इसी से मेरी स्वप्न रति हुई। तुम योगिनी हो क्या अपने सहेली को अनिरूद्ध को शोणितपुर मेरे महल में लाकर मुझे कृतकृत्य कर दो। चित्रलेखा ने अपने योगबल से अनिरूद्ध को, रूक्मिणी के सुरक्षित-सुसज्जित-राजमहल द्वारका से भारत के पूर्व में स्थित बाणासुर धानी शोणितपुर में राजकुमारी ऊषा के महल में उपस्थित कर दिया। ऊषा की मन्नत पूरी होगयी। ऊषा अनिरूद्ध की प्रेमकहानी अद्भुत प्रेमकथा है। अब हम महात्मा गांधी की नीरा आर्थिकी की बात करते हैं। ताजे ताड़रस का महत्व अमृत सरीखा है। गजानन नाईक ने महात्मा गांधी को नीरा याने ताड़रस की यह अद्भुत रहस्यमयी बात सुनाई। ताड़ खजूर के पेड़ तो भारत में यत्र तत्र सर्वत्र हैं। समुद्र के नजदीक ताड़ वृक्ष ज्यादा ऊँचे होते हैं। उत्तर भारत में खजूर के पेड़ ताड़ के बराबर ऊँचे नहीं हैं पर ताड़ रस और खजूर रस एक सा गुण वाला है। ताड़ी खजूर या ताड़ रस जब गर्मी के कारण खमीर बन जाता है वही मादक नशा ताड़ी कहलाता है। वाल्मीकि रामायण में अड़सठ सर्ग वाला सुन्दरकाण्ड का पैंतीसवां सर्ग जिसमें नब्बे श्लोक हैं नर-वानर मैत्री प्रसंग उद्गान करता है। शाहरूख खान और काजोल की जोड़ी और उनकी फिल्म दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे के प्रशंसक उत्सुकतापूर्वक इस इंतजार में हैं कि बीस वर्ष पुरानी प्रेमगाथा गाने वाली फिल्म के नायक नायिका शाहरूख खान और काजोल राजीव मासंद की सम्मति में एक अनुभव देने वाला प्रणय पथ वाला नया नया लगने वाला विस्मयकारी परिदृश्य भी अवलोकित करा सकते हैं। शाहरूख खान अब प्रौढ़ावस्था से अति प्रौढ़ अनुभवों के व्यक्तित्त्व वाले अभिनेता हैं। काजोल पर मार्कण्डेय ऋषि की यह उक्ति प्रभावोत्पादक एक कन्या, कैशोरी, युवती, यति, अप्रौढ़ा और प्रौढ़ा ये छः स्थितियां लागू होती हैं। प्रौढ़ा और जननी एवं मां की ममतामयी अनुभूति उपलब्धि से संभवतः काजोल शाहरूख खान के साथ नायिका के नूतन आवरण में प्रशंसकों और फिल्म दर्शकों में पीतांवरा की नयी उमंग देंगी। शाहरूख काजोल का नया मिलन राधाकृष्ण के एक दूसरे के प्रति आकर्षण प्रत्याकर्षण की भारतीय सर्व स्यार्ति हरण करने वाली नारायणी बन कर नूतन लोक मंगलायतन भी उजागर कर सकती है। देखते रहिये यह जोड़ी बीस वर्ष पुरानी दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे के प्रेम पर्व को नयी ऊँचाई भी दे सकती है। नीरा और ताड़ गुड़ बनाने वाले रौडरिक्स का बार बार दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे इस ब्लागर को उस सरस व्यक्ति की याद ताजा करा रहा है जो हर रोज मिलते ही दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे भारत की भाषायी और लोकमान्यता के अनुसार दिल वाले का तात्पर्य - सहृदय, करूण, सक्षम मनोबल तथा सहानुभूति रखने वाला व्यक्ति होने के साथ साथ इतना उत्साही और साहसी है जो दुल्हनियां को पिता के घर से पति के घर पहुंचने पर हिन्दुस्तान के देहाती लोग नव वधू को दुल्हन, दुल्हिणी कह कर पुकारते हैं। कन्या विवाह होते ही पिता माता के आश्रय से अपने पति, पति के पिता श्वसुर माता सास के साहचर्य में संयुक्त परिवारों में एक पूर्णतया नवीन वातावरण में प्रवेश करते दुल्हन - दुल्हनियां - दुल्हिणी कहलाती है। जिस व्यक्ति के साथ उसने सात फेरे लगा कर सप्तपदी संपन्न की वह जीवनसाथी दम्पत्ति है। ससुर सास के लिये स्नुषा - पतोहू ननद देवरों के लिये भाभी तथा जेठ जेठानी के लिये भ्रात् वधू देवरानी, पुत्रवती पुत्रीवती होने के पश्चात संतान के लिये माता का पद प्राप्त करती है। घर गृहस्थी संचालन मातृ शक्ति का ही अधिकार कोई कुटंब तभी तक कुटंब रहता है जब तक उसमें स्त्री शक्ति की सामर्थ्य बलवती हो। यही कारण है कि स्त्री विवाह होने के पश्चात भार्या भी कहलाती है। शशांक बंगाली के आलेख ने इस ब्लागर की रौडरिक्स स्मृति ताजा कर दी। सेवानिवृत्ति के पश्चात यह ब्लागर छब्बीस वर्षों से यत्र तत्र घूम रहा है पर साथी रौडरिक्स ने इस ब्लागर को कहा - उसकी मौत पर उसके बच्चों का ध्यान रखें। श्रीमती रौडरिक्स अपने पति से पहले दिवंगत होगयीं। इस ब्लागर ने रौडरिक्स को ढाड़स बंधाया, वह बीमार हुआ तथा सेवानिवृत्ति के चार पांच वर्ष ही जीवित रहा। उसकी अविवाहिता कन्या को परिवार पेंशन दिलाई, उसके इकलौते पुत्र का योगक्षेम देखते रहना तब तक इस ब्लागर का स्वधर्म था जब तक लखनऊ में रहना हुआ। दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे का नित्य पारायण करने वाले रौडरिक्स यद्यपि मजहबी आस्था के नजरिये से ख्रिस्ती धर्मावलंबी था। राम सागर मिश्रा नगर में एक प्रोस्टेंट गिरजा-प्रार्थना घर भी बन गया था। जब तक रौडरिक्स जीवित रहे हर रविवार को गिरजाघर जाने से पहले इस ब्लागर को मिलते। यह ब्लागर रौडरिक्स के साथ गिरजाघर तक जाता। रौडरिक्स प्रार्थना में सम्मिलित होकर अपने घर लौटते समय फिर इस ब्लागर को मिलकर दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे बोल कर अपने निवास स्थान के लिये निकल पड़ते।
रौडरिक्स बताते थे कि वे नौकरी की तलाश में गोआ से मुंबई आये। तब गोआ पुर्तगाली शासन के अन्दर था। नौकरी के लिये घूम रहा था। भारत सरकार के ताड़गुड़ सलाहकार गजानन नाईक रौडरिक्स की भेंट होगयी। गजानन नाईक ऐसे युवकों की खोज में थे जो ताड़गुड़ कार्यक्रम में उन्हें सहयोग दे सकें। रौडरिक्स अपनी मातृभाषा कोंकणी के अलावा पुर्तगाली भाषा व अंग्रेजी भी अच्छी तरह जानते थे। पहली मुलाकात में गजानन नाईक ने रौडरिक्स को ताड़गुड़ अधिष्ठान दहानू महाराष्ट्र में मौखिक नियुक्ति दे दी। गजानन नाईक महात्मा गांधी के मद्य निषेध कार्यक्रम को संबल देने वाले मनीषी थे। सारे भारत में जहां जहां ताड़ व खजूर के पेड़ थे वहां ताड़ी पीना एक सामाजिक अनिवार्यता होगयी थी। ताड़ी खींचने वाले लोगों को तमिल, तेलुगु भाषी इलाकों में नाडार कहा जाता था। महात्मा गांधी ने गजानन नाईक को कहा - क्या ताड़ी पीने को कम किया जा सकता है ? गजानन नाईक ने महात्मा गांधी के समक्ष ताड़ी पर रोक लगाने का एक कारगर तरीका ईजाद कर डाला। उन्होंने महात्मा गांधी से कहा - अगर ताड़ रस ताजा ताजा पिया जाये तो अमृततुल्य है। उसमें खमीर चढ़ने पर ही वह नशा करने वाली ताड़ी में बदल जाता है। महात्मा गांधी ने गजानन नाईक के प्रस्ताव को स्वीकार किया और नीरा की मुहिम चलायी। ताड़ रस को उबाल कर ताड़ गुड़ बनाने का कुटीर उद्यम चालू किया। देखते ही देखते मुंबई सहित शहरी इलाकों और सड़कों के किनारे बसे गांवों में नीरा और ताड़गुड़ लोकप्रिय होगये। गजानन नाईक ने अकेले दम पर 1948 से 1957 तक गांधी आर्थिकी का पहला पड़ाव - ताड़ वृक्षों से नीरा निकालना, धूप तेज होने और नीरा में खमीर चढ़ने से पहले नीरा सेवन का अभ्यास कराना। ज्यों ज्यों ताड़ रस निकासी का काम बढ़ता गया और ताड़ी सेवन पर कानूनी नहीं गांधी नैतिकी रोक लगी ताड़ गुड़ व खजूरी गुड़ का निर्माण का कार्य फैलता गया। ताड़गुड़ उद्यम की खाद्य पदार्थ के रूप में निर्मिति के साथ साथ ताड़ के पत्ता, ताड़ की छाल व ताड़ वृक्षों के तनों का उपयोग भी माइक्रो क्राफ्ट के रूप में किया जाने लगा। जब भारत सरकार ने 1953 में अखिल भारत खादी ग्रामोद्योग मंडल का गठन किया गजानन नाईक ताड़गुड़ सलाहकार के समानांतर अखिल भारत खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के प्रभावशाली सदस्य के रूप में बोर्ड के सदर वैकुंठ लल्लूभाई मेहता के प्रतिष्ठित सहयोगी थे क्योंकि वैकुंठ ल. मेहता हाकिमी करने के बजाय माइक्रो क्राफ्ट का संवर्धन कारीगर स्तर में संपन्न करने के पक्षधर थे। उन्होंने आसेतु हिमाचल में हर जगह जहां जहां खजूर के पेड़ थे खजूरी गुड़ बनाने का काम शुरू कराया। भारत सरकार छोटे छोटे उद्यमों के जरिये देश की देहाती तथा दस्तकारी उद्यमिता को एक मानक पहचान देना चाहती है इसलिये स्वयं सहायता समूहों कारीगरों के समूहों के स्वयं सहायता समूह संगठित करने के साथ साथ एम.एस.एम.ई. मंत्रालय और खादी ग्रामोद्योग आयोग के जरिये परंपरागत ग्रामीण उद्योगों को पुनर्जीवित कराना युग की पहली जरूरत है। दहानू की ताड़गुड़ उद्योगशाला वैकुंठ ल. मेहता के खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष पद से 31.3.1963 के पश्चात खादी ग्रामोद्योग आयोग में अधिनायकवाद तथा नौकरशाही का बोलबाला होगया। वैकुंठ ल. मेहता हर खादी ग्रामोद्योग कार्यकर्ता से स्वयं बात करते, प्रगति का अहवाल स्वयं एकत्र करते, गांवों की उद्यमिता के प्रति सतर्कतापूर्वक प्रयत्नशील लोगों का उत्साह बढ़ाते थे। उनके खादी आयोग से अलग होने तथा 1964 में पंडित नेहरू के निधन के पश्चात हिन्दुस्तानी गांवों की आर्थिक उन्नति रूक गयी। नौकरशाही और अर्थशास्त्र के पुस्तकीय सिद्धांतों पर गरीबी रेखा का निर्धारण शुरू होने लगा। महात्मा गांधी का जो संकल्प दरिद्रनारायण के उत्थान का था वह धरा रह गया, नतीजा सामने है। भारत के गांवों में यत्र तत्र सर्वत्र भीषण गरीबी की मार का नजारा है।
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