राष्ट्रीय चीन का नया साल - मौनी अमावस जय हो, जय हो
अमांत पर्व वाली मौनी अमावस की जय, जय, हो।
अमांत पर्व वाली मौनी अमावस की जय, जय, हो।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी विरोध का झंडा थामे हुए हर उस हिन्दुस्तानी को जो क्षण भर के लिये भी उन्हें भारत भाग्य-विधाता के ऊँचे आसन पर आरूढ़ देखना पसंद नहीं करता, उन सभी को गहरी निराशा होगी जब वे यह पता लगाने निकलेंगे कि चीन किस तरह भारतीय इलाहाबादी मौनी अमावस का वशवर्त्ती हो गया है। चीन की डेढ़ अरब जनता ने तहे दिल से स्वीकार कर लिया है कि चीन के भावी उत्कर्ष की कुंजी इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व में निहित है। चीन देर से ही सही पिछली मौनी अमावस जो 8 फरवरी 2013 को संपन्न हुई उसने दुनियां को मंदारिन वाङमय का पैगाम सुना डाला कि चीन के उत्थान, चीन के भविष्य की सभी मन्नतें मौनी अमावस को संपन्न होती हैं। हिन्दुस्तान के साथ साथ चल कर ही चीन दुनियां में अपने अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का डंका भारत के मार्फत ही बजा सकता है। वास्तविक चीन जहां के जन जन मंदारिन वाङमय से स्वयं को शक्ति प्राप्त करने वाला समाज घोषित करते हैं भारत ही उस ताकतवर चीन की शक्ति का मूल स्त्रोत है। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का विरोध करने वाले महानुभावों को पांच श्रेणियों में गिनाया जा सकता है। पहला वह विरोधी तबका जिसकी गहरी जड़ें बिहार के लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव के अनन्य भक्त और समर्थक समूह बिहार की समूची जनसंख्या का लगभग तीसरा हिस्सा है। परिवारवाद जिनका स्वधर्म, लक्ष्य और राजनीतिक रणनीति का प्रमुख तत्व है। नितीश बाबू का मोदी विरोध लाक्षणिक है। बिहारी-बाहरी उद्बोधन में वह ताकत नहीं है जो लालू प्रसाद यादव की नखशिख विरोध प्रक्रिया में सुप्रीमो शैली का प्रदर्शन करती है। ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, एम. करूणानिधि, जे.जयललिता, देवगौड़ा, उद्धव ठाकरे, कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उनके पुत्र कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल, समाजवादी नेतृत्व मुलायम सिंह यादव, दलित नेतृत्व मायावती, अकाली नेतृत्व प्रकाश सिंह बादल, जम्मू कश्मीर के दोनों शिखर महबूबा मुफ्ती तथा फारूख उमर अब्दुल्ला पिता पुत्र जोड़ी ये सब मिल कर भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का बाल भी बांका नहीं कर सकते क्योंकि इनके विरोध में वह सौर ऊर्जा नहीं जिससे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी निरंतर संबल पारहे हैं। क्षत्रप राजनीति पुरोधाओं में तेलंगाना प्रकाश स्तंभ के.एस. राव, राजशेखर रेड्डी की राजनीतिक धरोहर के पहरूवा उनके पुत्र जगमोहन, तेलुगुदेशम चिंतन शिखर चंद्रबाबू नायडू सहित क्षत्रप सुप्रीमो राजनीति निर्धारण में व्यस्त हैं परंतु मौनी अमावस त्रिवेणी संगम अमांत स्नान मुहूर्त्त ने दुनियां के दो विशालकाय जनसमूहों वाले राष्ट्र राज्यों में एक अमृतमयी नव क्रांति, नव स्फूर्ति तथा दुनियां के डेढ़ अरब से ज्यादा मंदारिन भाषियोें पर और एक अरब सत्ताईस करोड़ हिन्दुस्तानियों याने कुल मिला कर वैश्विक जनसंख्या के पौने तीन अरब लोगों को अमृतमय बनाने का उपक्रम कर डाला है। चीन की सांस्कृतिक तथा राष्ट्रबोधी विवेक ने इलाहाबादी मौनी अमावस संकल्प को वैश्विक ऊर्जा का सौर ऊर्जा सूत्र बना डाला है।
चीन तथा हिन्दुस्तान के बीच तिब्बत का पठार जहां के रहने वाले ज्यादातर लोग बौद्ध धर्मावलंबी हीनयान संप्रदाय के लोग हैं। तिब्बती बौद्ध मतावलंबियों में परम पावन दलाई लामा की आस्था मूल स्वरूप तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार शुरूआती दिनों से लगातार चलता आरहा आस्था पक्ष है। चीन में च्यांग काई शेक की राष्ट्रीय सरकार के पतन और चीन की मुख्य भूमि में कम्यूनिस्ट विचारधारा का नेतृत्व माओ त्से तुंग के नेतृत्व में उभरा। राष्ट्रवादी च्यांग काई शेक को पलायन कर ताइवान जाना पड़ा। यद्यपि यू.एस.एस.आर. की तरह चीन का कम्यूनिस्ट अभियान कार्ल मार्क्स की रीति नीति का अनुसरण करता था पर रूस और चीन के कम्यूनिस्ट अभियान में स्थानीय स्थितियों की अनुकूलता व प्रतिकूलता भी मुंह बांये खड़ी थी। माओ ने चीन के पीपुल्स लिबरेशन अभियान को अपनी मर्जी से चलाया। मौनी अमावस अमांत पर्व वाला जीवंत प्रसंग तिरोेहित कर सकना निरीश्वरवादी सांसारिक सुखभोग तथाा कम्यूनिस्ट विस्तारवादी मानसिकता पारम्परिक चीन की सामाजिक राष्ट्रीयता को नेस्तनाबूद नहीं कर पायी। समुद्र मंथन जन्य अमृत रस संबंधी जिज्ञासा यथापूर्व बनी रही जिससे चीन की मुख्य भूमि का देहाती समाज अपने पूर्वजों द्वारा भारत से अपने जुड़ाव को त्याग नहीं सका। अमृत मंथन प्रसंग देहाती चीनियों और मंदारिन वाङमय में अपनी जीवंतता बनाये रख सका। अमांत पर्व, मौनी अमावस्या के दिन चीन का नया साल तो लाखों वर्षों से मनाया जारहा था। चीन के लोग विश्वास की उस भीति पर खड़े थे जहां क्षीर सागर मंथन का प्रसंग उभर कर सामने आया। चीन के लोगों में यह मान्यता घर कर गयी थी कि चीन का सामाजिक हित संवर्धन भारत के इलाहाबाद शहर से जुड़ा है जहां क्षीर सागर मंथन के उपरांत मौनी अमावस की अमांत बेला का सूत्रपात हुआ। चीन की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता ने यह बात खुले दिल दिमाग से शुरू कर दी कि चीन का मुख्य भू भाग जिसे चीनी वर्तमान शासक स्वयं को ।Athiest निरीश्वरवादर मानते हैं परंतु जब चीन की मुख्य भूमि में क्षीर सागर का अस्तित्व चीन के लोगों को मालूम हुआ तो उन्होंने अमृत कलश और समूचे चीन के अमृतमय होने की कल्पना का श्रीगणेश कर डाला और यह स्वीकारोक्ति करने में विलंब नहीं लगाया कि चीन को महत्वपूर्ण विश्व राष्ट्र के स्तर में प्रस्तुत करने का श्रेय भारतीय संस्कृति को ही जाता है। चीन के लोगों ने क्षीर सागर मंथन तथा अमृतोत्पादन ने हिन्दुस्तान और चीन की नजदीकियों को विस्तार देने वाला महत्वपूर्ण अमांत बेला का श्रीगणेश कर डाला। चीन के मंदारिन भाषी समाज ने खुले दिल से स्वीकार कर लिया कि उनके उत्कर्ष का मूल मौनी अमावस का अमांत पर्व है जिसने वैश्विक पटल पर अमृत मंथन के जरिये एक नयी हिन्दुस्तानी चीनी सभ्यता का उत्कर्ष किया तथा चीन के लोगों के मन में यह बात बैठ गयी कि उनके उत्थान में सूत्रधार इलाहाबाद की मौनी अमावस का अमांत पर्व ही है। आइये आज के हिन्दुस्तान के हालात का भी जायजा लिया जाये। अमरीकी चिंतन पोखर मानता है कि आज का भारत दलित-गैर दलित समाज विभाजन से पीड़ित समाज है जिसमें मानवोचित सौहार्द के बजाय ऐसे विभाजक तत्वों का प्राबल्य है जो समाज को जोड़ते नहीं वरन तोड़ते हैं और आज का भारत India Divided समाज समझा जारहा है। महात्मा गांधी ने हिन्दुस्तान को अस्पृश्यता निवारण करने वाला मूलमंत्र सुझाया। वे हिन्दुस्तानी जो अपने आपको संस्कारवान कहते थकते नहीं उन्हें ही पहल करनी है। समाज को टुकड़ों टुकड़ों में बंटने से रोकना है तो उन लोगों के लिये सहृदय सामाजिकता का रास्ता अपनाना ही होगा जिन्हें कम से कम एक हजार वर्षों से निरंतर पीड़ित रहना पड़ रहा है। कानून हिन्द में छुआछूत गैर कानूनी तथा अपराध स्तर का कृत्य माना गया है पर आसेतु हिमाचल आजादी से पहले जो लोग अस्पृश्य माने जाते थे उनकी अस्पृश्यता समाप्ति का पर्व भारत के उन लोगों ने दिल से नहीं अपनाया है जो अपने आपको सवर्ण Caste Hindu कहते हैं। इसलिये छुआछूत, मंदिर प्रवेश सरीखे महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्न का तात्कालिक समाधान नितांत आवश्यक प्रक्रिया है। सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी के सवाल कि क्या छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? उसका समाधान करते हुए कहा था - छुआछूत सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं, यह महापाखंड समाज में घुसा हुआ महादोष है जिसका निराकरण तत्काल होना चाहिये। कानून बन जाने के पश्चात भी भारत के लोग छुआछूत का आचरण कर रहे हैं इसलिये तत्काल छुआछूत के महादोष का निवारण करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सटीक विचार विमर्श कर छुआछूत शास्त्र सम्मत नहीं है इसलिये छुआछूत मानने और दलित भेदभाव बरतने वाले प्रसंग सहित मंदिर प्रवेश सरीखे यक्ष प्रश्नों का तात्कालिक समाधान युग धर्म है, युग की पुकार है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी महोदय को इस महत्वपूर्ण सरोकार का समाधान खोजना ही पड़ेगा। चीन की सर्वसामान्य जनता ने यह फैसला कर लिया है कि भारतवर्ष के इलाहाबाद शहर में मौनी अमावस के रूप में मनाये जाने वाली अमांत-गंगा नहान प्रक्रिया को चीनी सभ्यता का मुख्य स्तंभ घोषित कर डाला है। चीनी सांस्कृतिक राष्ट्रवादिता ने यह घोषणा कर डाली है कि मौनी अमावस उनका राष्ट्र पर्व है। क्षीर सागर मंथन तो करोड़ों वर्ष पहले संपन्न हुआ पर पहली बार फरवरी महीने की आठवीं तारीख के दिन मौनी अमावस पर्व था। संयोग की बात थी कि उस दिन सोमवती अमावस्या भी थी। सोने में सुगंध का पर्व था। चीनी सरकार कह रही थी कि वे चीन का सरकारी साल पहली जनवरी को मानते हैं पर देहाती चीनी अपने अमृत युग पर्व को त्यागने के लिये तैयार नहीं था। Athiest लोगों को भी यह बात माननी पड़ी कि चीन का राष्ट्रीय पर्व - नया साल मौनी अमावस का अमांत पर्व ही है। निरीश्वरवादी चीनी गणराज्य ने देहाती चीनी मान्यता का सम्मान किया नतीजा सामने है दुनियां भर के मंदारिन वाङमय के जरिये जन जन के मन तक चीन का नया साल खुल कर सामने आगया। मौनी अमावस तो भारत में तब भी मनायी जाती थी जब पंडित नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे, उन्हें तिब्बत के साथ अन्याय स्वीकार नहीं था। तब कम्यूनिस्ट चीन इतना उग्र था कि चीन का राष्ट्रीय नव वर्ष उन्हें स्वीकार्य नहीं था वरना जो राजनीतिक वैश्विक लाभार्जन भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को 8 फरवरी 2016 को उपलब्ध हुआ वह प्रधानमंत्री के भाग्य में नया सितारा जोड़ने वाला पर्व है। मंदारिन भाषी चीनी समाज जिसकी जनसंख्या डेढ़ अरब से ज्यादा है और हिन्दुस्तान की जनता जिसकी जनसंख्या एक अरब सत्ताईस करोड़ है यह जन समाज मिल कर हिन्द-चीन की नयी मैत्री के नये साल का प्रतीक है। आज पहल भारत के हाथ में है। चीन और हिन्दुस्तान की पौने तीन अरब जनता हाथ में हाथ मिला कर मौनी अमावस का मौन व्रत लेकर घोषणा कर रही है कि चीन जाग चुका है और उसका वैश्विक अस्तित्व भारत के साथ जुड़ा हुआ मसला है। चीन का नया साल नये साल का पहला दिन 8 फरवरी 2016 को संपन्न होगया। चीन और भारत में संपन्न यह नया साल विश्व को नयी चेतना देरहा है। चीनी समाज मंदारिन भाषा के जरिये विश्व को यह बता चुका है कि चीन का योगक्षेम भारत और मौनी अमावस के साथ जुड़ा हुआ महापर्व है। भारत के वैज्ञानिक रोमशिला निर्धारित गुरूत्वाकर्षण तथा ब्रह्माण्ड में जो कुछ है वह पिण्ड में भी विद्यमान है। कृष्ण ने अपने गुरू सांदीपनि को गुरू दक्षिणा में गुरूरानी द्वारा वांछित गुरूपुत्र को जीवित करा कर गुरूदक्षिणा का जो उपक्रम उज्जयिनी में संपन्न किया वह भारत की जीव जगत व्यवस्था का प्रतीक है। अध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान का तात्कालिक समन्वय युग की पुकार है। नरेन्द्र मोदी के अद्वितीय नेतृत्व में भारत का श्रेय नित्य बढ़ता रहेगा। चीन भारत का अनुसरण कर तिब्बत को उसकी स्वतंत्र चेतना उपलब्ध कराये यही आज का चीनी युग-धर्म है। क्षीर सागर मंथन प्रकरण को जोहते रहिये चीन को दुनियां में भारत का पहला मित्र उद्बोध करते रहिये यही आज का युगधर्म है। यही आज की वैश्विक मानवीय उपलब्धि का पुण्य पर्व है।
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