Tuesday, 23 February 2016

मांगन मरन समान है मत कोई मांगो भीख
मांगन ते मरना भला यह सतगुरु की सीख

शशांक बंगाली ने ठाणे महाराष्ट्र से अपने अखबार एल.ए. टाइम्स के लिये Sale of Mothrhood in India शीर्षक से समाचार भेजा जिसे South California के दैनिक लास ऐंजेल्स टाइम्स के पहले और चौथे पेज में छापा जो ठाणे और आणंद (गुजरात) में हिन्दुस्तानी मातृशक्ति की गरीबी का इजहार करने वाला दृष्टांत है। उन्होंने सुशीला सुनार प्रसंग को उभार दिया। उसका विवाह 14 वर्ष की उम्र में ही हो गया था। उसे अक्षर ज्ञान भी गरीबी की मार के कारण नहीं था। वह भारतीय नव धनाढ्य बिल्डर समाज के लिये हाड़तोड़ मेहनत कर पत्थर तोड़ सरीखा अत्यंत कठिन श्रम करती थी जिसे हिन्दुस्तानी पढ़े लिखे सरकार व व्यापार चलाने वाले भद्रलोक Unskilled Labour  कहते हैं। जब वह Surrogacy चक्रव्यूह में फंसी उसे दो हिन्दुस्तानी बच्चों की जन्मदात्री जननी का सौभाग्य मिल चुका था। सरोगेसी चक्रव्यूह की ‘जातहारिणी’ किस्म की भद्र महिला ने सुशीला सुनार को Surrogate Mother की भूमिका निर्वाह करने के लिये प्रोत्साहित किया। गरीबी क्या क्या नहीं कराती, उसे अमरीकी छः हजार डालर हिन्दुस्तानी रूपये में गिनें तो लगभग चालीस हजार रूपये का धन्धा करने के लिये प्रोत्साहित किया। सुशीला और उसके पति के लिये चालीस हजार रूपये एक बड़ी रकम थी। बिल्डर महानुभावों द्वारा उसे व उसके पति को रोजाना जो मजदूरी मिलती थी वह बहुत कम होती थी। सुशीला ने अपनी बच्चेदानी किराये पर उठा दी उसे रकम मिली उससे उसने अपने दो बच्चों की शिक्षा दीक्षा के साथ साथ अपनी गृहस्थी संवारने में लगाया। जब उसने अपनी बच्चेदानी किराये पर उठाई वह 28 वर्ष की थी। शशांक बंगाली ने अपने अखबार के लिये जो मसाला भेजा है उसका सार तत्व यह है कि आर्थिक स्वावलंबिता के लिये हजारों हिन्दुस्तानी गरीब स्त्रियां सरोगेसी चक्रव्यूह में सरोगेसी के बच्चेदानी व्यापार की असलियत समझे बिना उससे जूझ रही है। यूरप और संयुक्त राज्य अमरीका के मुकाबले हिन्दुस्तान में दवा दारू और इलाज सहित सेहत ठीक रखने वाली मेडिकल व्यवस्था काफी सस्ती है। शशांक बंगाली के अपने आकलन के मुताबिक  हिन्दुस्तान की हजारों गरीब पीड़ित महिलायें सरोगेसी मातृत्व के जरिये आर्थिक स्वावलंबिता का स्वप्निल भविष्य देख रही हैं। सरोगेसी - कोख किराये पर लगाना या जवान लाभार्थी महिला का अपनी बच्चेदानी को एक या एक से अधिक बार सरोगेसी तंत्र के हवाले करने से अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव लाभार्थी युवा औरत को भुगतना होगा। उसके अलावा वे अर्धशिक्षित और अनपढ़ लोग International Fertility Centre ठाणे महाराष्ट्र तथा अन्य सुसज्जित अथवा अधकचरे Fertility Clinic के संपर्क में आते हैं। माया नगरी मुंबई भारत की वित्त धानी मानी जाती है। अपनी निजी और पारिवारिक आर्थिकी सुधारने के लिये मुंबई में भारत के कोने कोने से लोग आते हैं। महाराष्ट्र राज्य के शहरी इलाकों में बृहन्नमुंबई नगरपालिका के अलावा समूचा ठाणे जिला उल्हास नगर कल्याण सहित मुंबई व पार्श्ववर्ती नागर क्षेत्रों की आबादी निरंतर बढ़ती जारही है। इस बढ़ती हुई शहरी आबादी अथवा शहरों के झुग्गी झोंपड़े तथा स्लम इलाके गरीबी से पीड़ित लोगों के ठिकाने हैं। शशांक बंगाली अपनी रपट में लिखते हैं - Medical groups say the Industry generates the hundred of million thousands dollars a year in India but there are few reliable statistics.। इस ब्लागर को भारत के दो सुलझे हुए राजनीतिज्ञ जिन्हें भारत रत्न की उपाधि भी नवाजी गयी उनमें एक पंडित गोविन्द वल्लभ पंत और दूसरे चिदम्बरम सुबह्मण्यम थे। आजादी के बाद पहली पंचवर्षीय योजना के शुरूआती वर्ष जनवरी, फरवरी 1952 में पहला चुनाव हुआ। पंडित नेहरू ने गांवों को संवारने का काम एस.के. डे को सौंपा। उत्तर प्रदेश के लिये अल्मोड़ा के गरूड़ विकास खंड सहारनपुर के देवबंद विकास खंड तथा इटावा के जसवंत नगर विकास खंड को चुना गया। पंडित पंत गरूड़ विकास खंड में एस.के. डे के संकल्पित कार्यक्रम का उद्घाटन करने पहुंचे। इस ब्लागर के हाकिम दिवंगत जोशी ने कहा गरूड़ चलो पंडित पंत के वक्तव्य को सही मायनों में क्रियान्वित करना है। पंडित पंत जो स्वयं प्रसिद्धि प्राप्त वकील भी थे उन्होंने कंपोस्ट खाद के गड्ढों की रपट तलब की। उनके पास भी आंकड़े थे। अल्मोड़ा जनपद के विकास से जुड़े लोगों ने जो आंकड़े पंडित पंत को बताये पूरे जिले में उतनी खेती बाड़ी की जमीन ही नहीं थी। जितने कंपोस्ट गड्ढे बनाने की बात बताई गयी पंडित पंत ने अफसरों व कर्मचारियों को कहा गलत आंकड़े पेश करना बंद करो इससे काम तो बनेगा नहीं पर जो विकास प्रक्रिया पंडित नेहरू चाहते हैं वह झूठे आंकड़ों से ढह जायेगी। इसके ठीक बीस वर्ष पश्चात इस ब्लागर को डाक्टर जी. रामचंद्रन ने कहा प्रगति के आंकड़ों की पुस्तक लेकर मेरे साथ मुंबई राजभवन चलो। डाक्टर सी. सुब्रह्मण्यम ने डाक्टर जी. रामचंद्रन से पूछा - डाक्टर जी. आर. यह तो बताओ तमिलनाडु के सलेम जिले में जहां पहला गांधी आश्रम चालू हुआ वहां कितने कत्ती बुनकर व दूसरे ग्रामीण उद्योग कारीगरों को रोजगार मिला जिसका ब्यौरा KVIC Annual Progress Report उपलब्ध नहीं। ये दो उदाहरण भारत के सिस्टम फेलियर के लिये पर्याप्त हैं। शशांक बंगाली ने वकील जय श्री वाड को जिन्होंने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि व्यापारिक सरोगेसी समाप्त की जाये। श्रीमती वाड का मानना है कि भारत में मातृत्व को पवित्रतम संबंध माना जाता है। रूपये पैसे लेकर मातृत्व को बाजारू व बिकाऊ बनाया जारहा है। मानसी मिश्रा के कथनानुसार सरोगेसी के चक्रव्यूह में फंसने वाली ज्यादा गरीब युवा महिलायें सामान्यतया सामान्य विधि से प्रसव करती हैं, उन्हें सरोगेसी प्रविधि की जानकारी नहीं होती। उन्हें पूरी पूरी तकनीक न तो बताई जाती है न वे महिलायें जो उन्हें सरोगेसी चक्रव्यूह में फंसाती हैं वे ही पूरी पूरी स्थिति सही सही नहीं समझतीं। यह संवादहीनता समूचे भारत में व्याप्त है। जनसंख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है डेमोक्रेटिक सरकार भी इस दिशा में कारगर उपाय नहीं अपना सकतीं क्योंकि पैसों के खेल में वोटर अपना मत उसी को देगा जो उसे आमदनी करायेगा। 
भारत के बहुसंख्यक समाज में दशावतार याने पारब्रह्म परमात्मा के दस अवतार - मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, जामदग्न्य राम, दाशरथि राम, वासुदेव श्रीकृष्ण, बुद्ध और कल्कि की कल्पना की गयी है। इन दशावतारों में नव अवतार तो संपन्न हो चुके हैं और दसवां अवतार भविष्य में होगा। भागवत महापुराण के अनुसार दसवां अवतार कल्कि अवतार - 
संभल ग्राम मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः, भवेन विष्णु यशसः कल्कि प्राहुर्भविष्यति। 
समय का ब्यौरा देते हुए भागवत का मत है - 
यथा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथातिष्य बृहस्पति एक राशौः समेष्यंति तदाभवति तत्कृतम्।
यहां पर दशावतारों में वाराह अवतार का ही उल्लेख किया जारहा है। वाराह अवतार में जातहारिणी (नव जातक शिशु चुराने वाली) प्रसूति कर्म में लिप्त महिला को वाराह पुराण जातहारिणी कहता हैै। ये महिलायें प्रसूता महिलाओं को प्रसव कराने में दक्ष होती हैं। जिस जातहारिणी का जिक्र वाराह पुराण में किया गया है ताजा प्रसूत शिशु को लेकर दूसरी प्रसविनी स्त्री को सौंप कर उसका बच्चा ले भागना जातहारिणी का नित्य नैमित्तिक कर्म होता है। इस सारे प्रसंग में जातहारिणी नवजात शिशु का मांस भी खा जाती है। पौराणिक कथानक यह बयान फर्टीलिटी क्लिनिक इस बच्चेदानी किराये पर लगाने केे व्यापार में बिचौलिये की भूमिका निर्वाह करने वाला पुरूष अथवा स्त्री को भी अच्छी खासी रकम मिल जाती है। बच्चेदानी किराये पर लेकर संतति लाभ में इस धंधे से जुड़े फर्टिलिटी क्लिनिक पंद्रह से बीस हजार अमरीकी डालर का सौदा होता है। इस रकम का भारतीय मूल्य वर्तमान दरों के अनुसार दस लाख से चौदह लाख रूपये होता है जो संयुक्त राज्य अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में सरोगेसी संतति लाभ के लिये लगने वाली रकम का दशमांश मात्र है। इसका मतलब यह है कि कैलिफोर्निया में सरोगेसी संतति लाभ में एक लाख पचास हजार डालर से दो लाख डालर तक खर्च करना पड़ता है। शशांक बंगाली ने अपनी अखबार नवीसी रपट में लिखा है कि भारत सरकार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। एक सरोगेसी संतति लाभ में अपनी बच्चेदानी को किराये पर देने वाली जवान औरत को लाखों रूपये वाले इस व्यापार में ज्यादा से ज्यादा नकद पचास हजार रूपये तक मिल पाता है। उसके नौ महीने के रहने व भोजन खर्च को भी जोड़ा जाये हिन्दुस्तानी भोजन स्तर से रहने व भोजन खर्च में माहवारी पांच से सात हजार रूपये भी मान लें सरोगेट मां बनने वाली औरत कुल मिला कर एक लाख रूपयों से ही लाभान्वित होती है बाकी दस लाख रूपये धंधा चलाने वाले हजम कर जाते हैं। देश में व्याप्त गरीबी और महिलाओं में गरीबी की मार ज्यादा कष्टकर होती है। देश के हर राज्य में गुजरात को छोड़ कर एक बहुत बड़ी समस्या नशेड़ियों की है। नशे की सौदागरी से हजारों परिवार बर्बाद हो चुके हैं। भारत सरकार शशांक बंगाली के अनुसार व्यापारिक सरोगेसी पर अंकुश लगाना चाहती है। इस धंधे में लगे लोग Communal को Voluntary बनाने और निस्संतान लोगों को संतति लाभ का पुण्य कार्य साबित करने में देर नहीं लगायेंगे। देश में लाखों एन.जी.ओ. कार्यरत हैं जो यूरप अमरीकी देशों से धर्म प्रचार और शिक्षा प्रसार के साथ साथ स्वास्थ्य संवर्धन के लिये विदेशी अनुदान लेते हैं पर ज्यादातर एन.जी.ओ. लक्ष्य साधन के बजाय प्राप्त धन का उपयोग राष्ट्र विरोधी कामों में लगाते हैं। 1860 का सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट ऐसे एन.जी.ओ. संगठनों को संबल देता है। भारत की पहली जरूरत तो एन.जी.ओ. पंजीयन कानून को आज की राष्ट्रीय जरूरत के मुताबिक ढालने की है। सरोगेसी पर नया कानून तैयार करना भी उतना सरल नहीं है इसलिये Easy Money  के इस सरोगेसी याने मातृत्व को बेचने या मातृत्व को किराये पर उठाने के प्रसंग पर लोकमत ज्ञात करना अत्यंत आवश्यक है। भारत सरकार और राज्य सरकारों को सबसे पहले फर्टिलिटी क्लिनिक कहां कहां हैं ? उनकी संख्या क्या है ? फर्टिलिटी क्लिनिक सेवा उपलब्ध करने में किसी दम्पत्ति को कितना खर्च करना पड़ता है ? क्या प्राइवेट अस्पतालों फर्टिलिटी क्लिनिकों का कोई पंजीयन शुल्क राज्य सरकार नगर पालिका क्षेत्र या ग्राम पंचायत क्षेत्र तथा केन्द्र सरकार जिस किसी महकमे से संबद्ध है क्या सारे व्यापार में विनियोजित धन व्यक्ति, फर्म अथवा कारपोरेट किस्म का है ? निर्धन महिलाओं के लिये सरोगेसी छप्पर फाड़ कर मिला धन है। इस पर कानूनी रोक से ज्यादा नैतिक अंकुश और मातृत्व मर्यादायें ज्यादा कारगर उपाय हो सकते हैं। फिर किसी भी जवान औरत को अगर सरोगेसी लाभ दो तीन बार भी मिल गया उसका पति नशेड़ी नहीं हुआ तो सुशीला सुनार की तरह उसकी गृहस्थी मेें निखार आ सकता है पर ज्यादातर मामलों में धोखाधड़ी की संभावना ज्यादा बलवती लगती है इसलिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को Make in India कार्यक्रम को ज्यादा तरजीह देनी चाहिये। गांवों में रहने वाली मातायें बहनें अगर एक सौ दिन चर्खा चला कर स्किल्ड लेबर पेटे रोजगार गारंटी से जोड़ी जायें और गांधी आर्थिकी को और मजबूत किया जाये तो उसका नैतिक असर ज्यादा व्यापक होगा इसलिये चर्खे पर कातना, हाथ बुनाई करना, बुनकरों को करघे में बुनाई की मजदूरी रोजगार गारंटी से जोड़ना निर्धन परिवारों का सहारा हो सकती है। अगर गांवों, कस्बों तथा शहरों की महिला श्रम शक्ति को Make in India मुहिम से जोड़ कर रोजगार गारंटी का हिस्सा बनाया गया तो सरोगेसी पद्धति से अपनी बच्चेदानी को किराये पर उठाने की जहमत हर औरत पसंद नहीं करेगी। गांवों, कस्बों तथा शहरों की औरतों को जब रोजगार गारंटी कानून का लाभार्थी बनाये जाने का ईमानदारी पूर्वक संकल्प किया जाये तो सरोगेसी की तरफ भारत की मां बहनें नहीं झुकेंगी इसलिये अपना मातृत्व बेच कर, अपनी बच्चेदानी किराये पर उठा कर जो लाभार्जन होगा वह भीख मांगने सरीखा कर्म है इसलिये बच्चेदानी की रक्षा करें वह स्त्रीत्व व मातृत्व की प्रतीक है। देश की महिला डाक्टरों का भी फर्ज है कि वे बच्चेदानी निकालने के प्रकरण पर नैतिक रोक का मंत्रोच्चार करें। ऐसा देखने में आरहा है कि बहुत सी मां बहनों की बच्चेदानी निकालने की घटनायें बढ़ रही हैं। बच्चेदानी किराये पर लगाने सरीखा ही नैतिक अपराध बच्चेदानी निकालना भी है। स्त्रीत्व-मातृत्व की संरक्षा के लिये महिला शक्ति को ही आगे आना होगा ताकि बच्चेदानी संबंधी सभी प्रकरणों में नैतिक अंकुश के उपाय किये जायें। बात अधूरी रह जायेगी अगर यह ब्लागर अपने साथ घटी बच्चेदानी चर्चा का उल्लेख नहीं करे। तब यह ब्लागर 44 वर्ष का था पत्नी 39 वर्ष की थी। लेडी इरविन अस्पताल की अधीक्षिका डा. सुुशीला तिवारी से इस ब्लागर की पत्नी ने परामर्श चाहा। डाक्टर तिवारी ने बच्चेदानी निकालने की बात बताई तो इस ब्लागर की पत्नी ने डा. तिवारी से कहा - अपने पति से चर्चा कर बताऊँगी। जब इस ब्लागर को बात मालूम हुई ब्लागर ने कहा - तुम्हारे पांच बच्चे हैं। देवकी का आठवां बच्चा पारब्रह्म परमात्मा का अवतार था। संयम सबसे बड़ा रास्ता है संयम से न रहा जाये, होने वाली संतान को आने से रोकना सृष्टि की अवहेलना है। बच्चादानी औरत का स्त्री धर्म का भूषण है। उसे हटाना, निकालना अथवा किराये पर उठाना अक्षम्य मानवीय अपराध है। आबादी बढ़ने से रोकने के इतर उपाय किये जा सकते हैं पर जिस जीवात्मा को धरती पर आने से रोका जायेगा, आत्माओं का वह पुंज एक न एक दिन विश्व विध्वंसकारी हो सकता है इसलिये मर्यादाओं का उल्लंघन न होने पाये इसके लिये हर संभव उपाय प्रयोग में लाये जाने चाहिये। 
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