REPLACING PLUTO
A PLANETARY RUN OF THE FAMILY
सुपर्ण वेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छयेतौ कृत नीणै च वृक्षे एकस्तयो खादति पिपलान्न मन्योऽनिरत्रोऽपि वलेन भूयान् अनात्मनमन्यम् च स वेद विद्वान् न्न। पिप्पलादो न तु पिप्पलादः योऽविद्यया युक् सतु नित्य वृद्धो विघामयो यः स तु नित्यमुक्तो।
A PLANETARY RUN OF THE FAMILY
सुपर्ण वेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छयेतौ कृत नीणै च वृक्षे एकस्तयो खादति पिपलान्न मन्योऽनिरत्रोऽपि वलेन भूयान् अनात्मनमन्यम् च स वेद विद्वान् न्न। पिप्पलादो न तु पिप्पलादः योऽविद्यया युक् सतु नित्य वृद्धो विघामयो यः स तु नित्यमुक्तो।
करीब 86 साल पहले पश्चिमी खगोल वैज्ञानिक संभाग ने एक तारा को ‘PLUTO’ नाम दिया कहा कि यह नव ग्रहों में नवां ग्रह है। कैलेटेक खगोलविद माइक ब्राउन का मानना है कि प्लूटो को पिछले आठ दशकों से जो महत्ता मिली थी वह छिन गयी है। खगोलशास्त्री वागियन कहते हैं सौरमंडल में एक नवें ग्रह की उपस्थिति दर्ज की गयी है। यह महाकाय नव ग्रह उन्हें लगता है बृहस्पति तथा शनि ग्रह को भी प्रभावित करने की क्षमता वाला ग्रह भी हो सकता है। सूर्य, चंद्र, उशना(शुक्र), बुध, अंगारक(मंगल), बृहस्पति, शनैश्चर इन सात ग्रहों के बारे में श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के बीसवें अध्याय में उल्लेख है - अण्डमध्यगतो सूर्येः दृयावाभूम्योयदत्ताम् सूर्याण्डगोलयो मध्ये कोट्यः स्यु पंचविंशतिः मृतेण्डः एष एतास्मिन् यदभूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेशः हिरण्यगर्भ इति यद् हिरण्याण्ड समुद्भवः सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खम् द्यौ र्मही भिदा सर्वजीव निकायानाम् सूर्य आत्मा दृगीश्वरः। ज्योतिःचक्र वाले बाईसवें अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवे स्कंध में कहा गया है - भगवत आदित्यस्य मेरूं ध्रुवम् च प्रदक्षिणेन परिक्रामतो राशिनामभिमुखम् प्रचलितम् चा प्रदक्षिणम् भगवतोप वर्णित ममुप्य वयम कथमन, भी मी महीति। अन्यत्र श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध ज्योतिःचक्र संबंधी इक्कीसवें अध्याय श्लोक संख्या ४-५-६ में वर्णित है - यदा मेष तुलयो र्वतते तदा अहोरात्राणि समानानि भवंति। याने मेष का सूर्य जिसे भारतवासी 13 या 14 अप्रेल को मनाते हैं मेष संक्रांति कहलाती है। तुला संक्रांति आमतौर पर 18 अक्टूबर को मनाई जाती है। इस दिन सूर्य तुला राशि में प्रवेश करते हैं। मेष-तुला संक्रांतियों के दिन अहोरात्र याने रात दिन बराबर होते हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय पंचांग को दोष रहित बनाने के लिये आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय पंचांग निर्धारण समिति गठित की। आचार्य जी ने परिश्रमपूर्वक आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय पंचांग National Calendar of India That is Bharat रपट पंडित नेहरू को सौंपी। सरकार ने राष्ट्रीय पंचांग निर्धारित भी किया जो प्रति वर्ष 21 मार्च से शुरू होता है। 21 मार्च से प्रारंभ सौर मास चैत्र, (राष्ट्रीय पंचांग का पहला महीना) 21 अप्रेल से वैशाख, 22 मई से ज्येष्ठ मास, 22 जून से आषाढ़, 23 जुलाई से श्रावण, 23 अगस्त से भाद्रपद, 23 सितंबर से आश्विन, 23 अक्टूबर से कार्त्तिक, 22 नवंबर से मार्गशीर्ष, 22 दिसंबर से पौष, 21 जनवरी से माघ तथा 20 फरवरी से राष्ट्रीय सौर वर्ष का अंतिम महीना फाल्गुन निश्चित हुआ। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार मेष व तुला संक्रांतियां क्रमशः 20-21 मार्च जब अहोरात्र तीस तीस घड़ी अर्थात बारह घंटे का दिन और बारह घंटे की रात तथा 23-24 सितंबर की मनाई जानी चाहिये थी भारत के धार्मिक ज्योतिष के चतुष्कोण सप्तनगरी काशी, नवद्वीप, कांची, श्रंगेरी, अवंती पुरी द्वारका के धर्माधीश समाज ने आचार्य नरेन्द्र देव निर्धारित संक्रांति पर्वों को नये सिरे से मनाने से इन्कार कर दिया। मकर संक्रांति, मेष संक्रांति, कर्क संक्रांति, तुला संक्रांति पूर्ववत् मनाई जाती रही हैं। उनका तर्क था ठीक है भारत के महत्वपूर्ण वैष्णव ग्रंथ भागवत महापुराण का कथन अपनी जगह सही है पर हम हिन्दुस्तानी पहले से ही सायन-निरयन पद्धति मानते आये हैं भारत सरकार अपना राष्ट्रीय कालांतरण जिसे अंग्रेजी भाषा में Calendar कहते हैं मनाती रहे भारतीय बहुसंख्यक स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त संप्रदायों सहित गंगा, गायत्री, गाय, गणपति तथा गया में श्रद्धा रखने वाले सभी जन सरकारी राष्ट्रीय पंचांग को धार्मिक मामलों में स्वीकार नहीं करेंगे, अपनी प्रथायें यथापूर्व बनाये रखेंगे। भारतवासी ओंकार सर्वत्र वर्तते पर विश्वास करने वाले समूह हैं। ओंकार की महत्ता भारत में जन्मे दूसरे धर्म - जैन, बौद्ध तथा सिख धर्म भी उसी तरह मानते हैं जिस तरह हिन्दू कहे जाने वाले भारतीय बहुसंख्यक धर्मावलंबी।
प्लूटो को अपदस्थ कर जिस नये नौवें ग्रह को खगोलशास्त्री इंगित कर रहे हैं वे कहते हैं इस नवीन नव ग्रह पर सूर्य चंद्र प्रकाश नहीं पहुंचता यह प्रकाश से परे है। उसे उन्होंने अंधकारमय बताया है।
भगवद्गीता के पुरूषोत्तम योग का छठा श्लोक परमात्मा के परमधाम का उल्लेख करते हुए व्यवस्था देता है - न तद् भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धामः परमं मम। ईश्वर का जो धाम है याने परमात्मा का मूल घर प्रकाश से परे है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसे पाश्चात्य विद्वान वैज्ञानिक खगोलशास्त्री Solar Family कह रहे हैं क्या वह ब्रह्माण्ड का पर्याय है ? भारतीय आध्यात्मिकी शक्ति यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे पर यकीन करती है। आध्यात्मिक दर्शन आस्था जिसे दुनियां मजहब या Religion नाम से पुकारती है उससे ऊँचे आसन में विद्यमान है। माइक ब्राउन व वेटिजिन जिस नये नौवें ग्रह के अस्तित्त्व की बात कर रहे हैं वह अभी खगोल अनुसंधानों की विषय वस्तु मात्र है इसलिये भारत के खगोलविदों को यह विचार करना ही चाहिये कि क्या सन् 1930 में जिस ग्रह को पाश्चात्य शोधकों ने प्लूटो संज्ञा दी वह सूर्यादि सात प्रमुख ग्रहों तथा भारतीय चिंतन पोखर के दो छाया ग्रहों क्रमशः मंगल व शनि का छाया ग्रह मान कर राहु केतु के रूप में कल्पित किया गया है। सौरमंडल शिशुमार संस्थानेन भगवतो वासुदेवस्य योगधारणया मनुवर्णयन्ति, यस्य पुच्छाग्रे अवाक् शिरसः कुण्डली भूत देहस्य धु्रवउपकल्पितस्तस्यलांगूले प्रजापतिः अग्निः इन्द्रः धर्मः इति पुच्छ मूले धाता विधाता च कट्याम् सप्तर्षयः। तस्य दक्षिणावर्त कुण्डलीभूत शरीरस्य यात्युददगमानि दक्षिणपार्श्वे नक्षत्राण्युप कल्पयन्ति दक्षिणायनसि तु सव्ये यथा शिशुमारस्य कुण्डलीयोग सन्निविशेस्य पार्श्वयो रूपयोरप्यवयवा सम संख्या भवन्ति पृष्ठे त्वजवीथी आकाशगंगा चोदरतः। श्रीमद्भागवत महापुराण ने ब्रह्माण्ड, अंतरिक्ष, सौरमंडल सहित सभी मुख्य सात ग्रहों सहित दो छाया ग्रहों का उल्लेख किया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पंचांग विभाग द्वारा अपने गणितीय आकलन में प्लूटो सहित पाश्चात्य खगोलविदों द्वारा Solar Family में बृहस्पति तथा शनि के समानांतर यूरेनस व नेपच्यून नामक दो ग्रहों का प्रलंयकारी गैसों का खजाना माना है। उनकी सम्मति में गैसों के ये आगार भयावह स्थितियां भी उपस्थित कर सकते हैं। भारतीय वाङमय के चिंतन पोखर में ध्रुवतारा व ध्रुवतारा के पार्श्ववर्ती सप्तर्षियों का उल्लेख है। जरूरत इस बात की मालूम पड़ती है कि पाश्चात्य खगोलविदों व भारतीय खगोलशास्त्रियों में कारगर संवाद स्थापित किया जाये। पाश्चात्य खगोलविदों ने अपने पूर्वजों द्वारा पौने नौ दशाब्दी पूर्व इंगित प्लूटो नाम से जाने जाने वाले ग्रह को ग्रहमंडल का हिस्सा मानने से इन्कार कर दिया है। यूरेनस व नेपच्यून के बारे में उनकी अवधारणा को भारतीय संदर्भ में परखे जाने की तात्कालिक जरूरत प्रतीत होती है। ध्रुव सहित सप्तर्षि मंडल के जो चमकदार नक्षत्र हैं उन्हीं की पहचान पहले तय की जाये। पिण्ड, ब्रह्माण्ड, सौरमंडल तथा अंतरिक्ष संबंधी ज्ञात तथा संशयात्मक स्थिति वाले प्रभापुंज पर बहस जारी रखी जाये। यूरप का ज्ञात इतिहास तथा यूरप की ज्ञानशलाका वैटिकन के मार्गदर्शन में संचालित होती है। वैटिकन सहित ख्रिस्ती मतावलंबी मान्यता में सेंट जान द्वारा ईश पुत्र जेसस का बपतिस्मा याने पवित्र जलाभिषेक पर वार्ता के द्वार खुलें तो भारत के कथन - औषधम् जाह्नवी तोयम् वैद्यो नारायणो हरिः वह जिसे नारायण कहते हैं वह प्राणपुंज संचालक तत्त्व है। पाश्चात्य विद्वान यह मान कर चल रहे हैं कि जो महाकाय नौवां ग्रह उनकी शोध परिधि में आया है वहां तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच पाता अभी उसकी पूरी पूरी परिकल्पना विचार पोखर का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं बन पायी हैं। इन स्थितियों में खगोलविद स्वयं निश्चित मत नहीं बना पाये हैं। देखने की बात यह है कि व्यापक ईशतत्त्व को खगोलविद अपनी मजहबी चिंतन धारा से जोड़ कर न देखें। इस सृष्टि में मनुष्यों के अलावा तिर्यक (पशु पक्षी), सरीसृप (रेंगने वाले अन्य जीव), कीट पतंग, जलचर तथा स्थावर (वनस्पति तथा पाषाण) का भी अस्तित्व है। मुनष्यों के अलावा इन योनियों का भी कर्त्ता धर्त्ता ईश्वर या ईश्वर सरीखी कोई सत्ता है। जरा विचार कीजिये जिस तरह मनुष्य विचरण कर रहा है अनियंत्रित आचरण कर रहा है यदि सभी मनुष्येतर जीव भी मनुष्य की भांति बोलने लगें आचरण करने लगें तब दुनियां कैसे चलेगी ?
वैज्ञानिक मतावलंबिता में एक नया सूत्र उग गया है। यदि जिस नये ग्रह के बारे में उन्हें प्रतीकात्मक पता चला है वह वास्तविकता में उतरा तो आज की दुनियां का क्या होगा ? उनकी परिशंका में एक नया बीज उग रहा है वे कहते हैं क्या कोई नयी दुनियां तो परिज्ञान में नहीं आरही है ? कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन को कहा था - मेरा घर वहां है जहां सूर्य, चंद्रमा व तारों का उजाला भी नहीं पहुंचता। ईश्वर की जो सृष्टि है उसमें क्या एकाधिक सूर्य, एकाधिक पृृथ्वी और दूसरे ग्रह तारे भी हैं ? देखते जाइये नये संसार की वास्तविकता से भी आपका वास्ता पड़ सकता है। आज हम सौरमंडल के वर्तमान सूर्य के वृत्त में रह रहे हैं यदि खगोलविद माइक ब्राउन ने जिन उपलब्धियों की चर्चा की है और उन्हें संभावना लगती है कि नया नवां ग्रह जिसे वे Pluto No. - 9 कह रहे हैं उसका पूरा दीदार शोधकों के सामने आगया तो उनके अनुसार ब्रह्माण्ड में एक नयी जाग्रत क्रांति का अवतरण होगा। इसलिये पहला सवाल यह है कि प्लूटो की विदाई तथा ग्रह मंडल में पारिवारिकता में नये उद्गम के साथ साथ भारत के खगोलविदों को ध्रुव और सप्तर्षि मंडल के चमकीले तारों में किन्हें बृहस्पति व शनि के समानांतर नेपच्यून और यूरेनस धु्रव तारा व सप्तर्षियों में किन किन को गिना जाये ? उनके भारतीय नाम इन्द्र वरूण आदि क्यों न दिये जायें। एक महत्वपूर्ण आवश्यकता यह लगती है कि अमरीकी वैज्ञानिक नासा से अनुरोध करें कि भरत मुनि रचित ध्वन्यालोक जो भारत भूमि में उपलब्ध नहीं रह गया है क्या ध्वन्यालोक का कथ्य जो अंतरिक्ष में उसी तरह विद्यमान है जिस तरह कृष्णार्जुन संवाद। ध्वन्यालोक अभिव्यक्ति हो जाने पर नटराज का महाताण्डव नृत्य व नृत्यावसान में नटराज के डमरू का नौ और पांच बार बजना। इस घटना का वैज्ञानिक विश्लेषण आज के संसार को वाणी की यथार्थता उपलब्ध करा सकता है। नवें ग्रह संबंधी सिलसिलेवार जानकारियां हासिल करने के लिये ब्रह्माण्ड में कितने सूर्य हैं ? कितनी पृथ्वियां तथा कितने अन्य नवग्रह हैं इसका सटीक पता लगाने के लिये पाश्चात्य वैज्ञानिकों को Holy Bible की रोमन अवधारणा से आगे बढ़ना होगा। सूर्य सहित सभी नौ ग्रहों के सामूहिक तेज को सटीक समझने के लिये दुनियां के हर इलाके में व्याप्त धारणाओं का अनुशीलन भी करना होगा। विनोबा भावे का यह कहना कि यह सारा ब्रह्माण्ड ईश्वरमय है। भागवत कहता है -
सर्वतः सारमादद्यात पुष्पेभ्यः इव षटपदः तथा कायेन वाचा मनसेन्द्रियेर्वा बुदध््यात्मना वा नु सृतस्वभावात् करोति यत् यत् सकलम्् परस्मै नारायणेति समर्थयेता। खं वायुमग्निम् सलिलम् महीम् च ज्योतीषि सत्वानि दिशोदु्रमादीन् सरित् समुद्राश्च हरे शरीरम् यत्किंच भूतम् प्रणमेदन्यः।
वैज्ञानिक खगोलशास्त्रियों को इस समूचे ब्रह्माण्ड को ही ईश्वर समझ कर अपना लक्ष्य खोजना होगा। भारत के प्रधानमंत्री महोदय ने हाल ही में काशी से दिल्ली - दिल्ली से काशी के लिये महामना ऐक्सप्रेस का श्रीगणेश किया है। फरवरी 2016 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शताब्दी समारोह आगामी वसंत पंचमी को होगा। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पिछले नब्बे वर्षों से विश्व पंचांग का प्रकाशन करता आरहा है। Caltech Astronomer माइक ब्राउन ने Pluto No.-9 की पहचान दुनियां को बताई है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के Astrology Department के समानांतर Astronomy Based On Indology को समृद्ध करने की घोषणा की जाये। ज्योतिष के समानांतर खगोल विधा को भी भारतीय संदर्भ में संवर्धित करने का निर्णय लिया जाये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित भारतीय पुराणों व पंचम वेद महाभारत में खगोलशास्त्र संबंधी जो भी संकेत उपलब्ध हैं उन पर 1930 में पाश्चात्य खगोलशास्त्रियों ने प्लूटो को महत्वपूर्ण ग्रह बताया। अब वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि 1930 की खोज में कुछ खोट था। भारत के खगोलविद महानुभाव इस प्रसंग पर नये विचार पोखर का सृजन करने का संकल्प लें। उन्हें भारत के आशुवक्ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी काशी में नूतन दिग्दर्शन के सूत्र सुझा सकते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शताब्दी समारोह Astronomy व Astrology के तालमेल का सूत्रधार बन सकता है। कृपापूर्वक भागवत महापुराण के ज्योतिचक्र शिशुमार संस्था वर्णन का अनुशीलन करें। हिन्दू विश्वविद्यालय का शताब्दी पर्व - तुलसीदास की याद ताजा करायेगा।
अवसि देखिय देखन जोगू
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