Students Suicide Divides India-L. A. Times, January 22, 2016
अस्पृश्यता निवारण का कारगर तरीका - गांधी मार्ग ही अपनाइये
अस्पृश्यता निवारण का कारगर तरीका - गांधी मार्ग ही अपनाइये
महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीेका से स्वदेश आये, उन्होंने साबरमती आश्रम सृजित करने से पहले 1915 में कोचरब में अपना आश्रम खोला। उन्होंने अपने सभी व्रतों में सबसे ज्यादा महत्व अस्पृश्यता निवारण को ही दिया। कोचरब आश्रम में दूधाभाई के परिवार को अपने कार्यक्रम का मुख्य हिस्सा घोषित किया। करम गति टारे नाहिं टरी- गुजरात के वैष्णव जन महात्मा गांधी के तौर तरीकों को पसंद करते, उन्हें चंदा देते पर इन वैष्णव बनिया-वामनों को अछूत दूधाभाई परिवार को कोचरब आश्रम का महत्वपूूर्ण हिस्सा बनाया जाना मंजूर नहीं था। वैष्णवों ने महात्मा गांधी को चंदा देना बंद कर दिया पर महात्मा गांधी ने हार नहीं मानी। उनकी कठिनाई को तेरापंथी जैन धर्मावलंबी सेठ अंबालाल ने बड़ी होशियारी से भांप लिया। कोचरब आश्रम पहुंच कर महात्मा गांधी को तेरह हजार रूपये की थैली सन 1915 में सौंपी। इस घटना ने गुजरात के वैष्णव समाज की आंखें खोल डाली। महात्मा गांधी का अछूतोद्धार संकल्प दूधाभाई परिवार पोषण के साथ अनवरत चलता रहा। महात्मा गांधी के रामभक्त अंतर्मन में एक द्वन्द्व चल रहा था। एक वर्ष पश्चात फरवरी 1916 में महामना मदनमोहन मालवीय ने माघ सुदी पंचमी - जिसे हिन्दुस्तान में वसंत पंचमी कहा जाता है बंगाल व कुमांऊँ के लोग इस दिन को श्री पंचमी कहते हैं - महात्मा गांधी को बनारस बुला कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय BANARAS HINDU UNIVERSITY की आधारशिला महात्मा गांधी द्वारा रखवाई। महात्मा को अपनी जिन्दगी का पहला काम ‘अस्पृश्यता निवारण’ लगता था। उन्होंने भरी सभा में महामना मदनमोहन मालवीय से कहा - बड़ील, मेरा आपसे एक सवाल है कि क्या छुआछूत मानना शास्त्र सम्मत है ? महामना ने बड़ी ईमानदारी से महात्मा गांधी को कहा - महात्मा जी छुआछूत तो मैं भी मानता हूँ पर मुझे यह पता नहीं है कि क्या छुआछूत सनातन शास्त्र सम्मत है ? मेरे विश्वविद्यालय में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ऐसे अध्यापक हैं जो छुआछूत के सनातन शास्त्र सम्मत होने या न होने का निर्णय दे सकते हैं। महात्मा गांधी ने महामना मदनमोहन मालवीय से कहा - चलिये सर्वपल्ली राधाकृष्णन के डेरे पर पहुंच कर उनसे यह सवाल करें। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन दोनों महाविभूतियों को कहा - छुआछूत तो मैं भी मानता हूँ पर यह धर्मशास्त्र सम्मत है या नहीं यह खोजने के लिये मुझे पखवाड़े भर का समय दीजिये ताकि मैं आपके सम्मुख सनातन - स्मार्त, वैष्णव, शैव, शाक्त मतों का अध्ययन व भारतीय वाङमय की उपलब्ध मान्यताओं का सटीक समीचीन अध्ययन कर आपकी समस्या का निराकरण कर सकूँगा। अधिकारपूर्वक पंद्रह दिन पश्चात सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने द्विमूर्ति महामना और महात्मा से काशी में ही कहा - छुआछूत सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं, यह दोष सनातन धर्मावलंबियों में कालांतर से ही घुसा हुआ महादोष है साथ ही इसका निवारण होना युगधर्म है। पुतलीबाई के प्यारे मोनिया में रामभक्ति मां के स्तनपान से जुड़ी थी। पुतलीबाई स्वयं परम रामभक्त होने के साथ साथ अपने पति करम चंद कबा गांधी उम्र में 22 वर्ष छोटी थी वे करम चंद कबा गांधी की चौथी पत्नी थीं। तब दीवान करम चंद कबा गांधी 42 वर्ष के थे जब उनकी चौथी शादी पुतलीबाई से हुई थी। श्रौत ज्ञान की आगार पुतलीबाई ने करम चंद गांधी के परिवार का कायाकल्प कर डाला। महात्मा गांधी उनकी चौथी व अत्यंत प्रिय संतान थे जिन्हें मां पुतलीबाई मोनिया कहती थीं। महातमा गांधी के अछूतोद्धार संकल्प के सबसे तीव्र आलोचक बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर थे। भारतीय राजनीतिक क्षितिज में हिन्दू मुसलमान संबंधों तथा अस्पृश्यता निवारण के क्षेत्र में महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना में हिन्दू मुस्लिम मतांतर तथा अछूतोद्धार क्षेत्र गांधी-अंबेडकर विचार पोखर पर संशयग्रस्तता तथा किसी एक पक्ष का संवर्धन तथा दूसरे पक्ष को घृणित दृष्टि से देखने से स्वयं को संयमित करने की तात्कालिक आवश्यकता है। पहले अस्पृश्यता निवारण के गांधी संकल्प तथा बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर लिखित पुस्तक What Congress and Gandhi have done to Untouchables मे डाक्टर बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर को इतिहासज्ञ रामचंद्र गुह ने महात्मा गांधी का व्यक्तिगत व राजनैतिक स्तर में भी प्रतिरोधी माना है। महात्मा गांधी ने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। इस संगठन के कर्ता धर्ता लंबे अरसे तक वियोगी हरि थे। बाबा साहेब अंबेडकर का मानना है कि अछूतोद्धार अभियान में गांधी सफल नहीं थे। उन्होंने 25 वर्ष लगातार परिश्रम किया। होटलों के दरवाजे अछूतों के लिये बन्द रहे, कुओं से वे पानी नहीं ले सकते थे, मंदिरों के दरवाजे भी उनके लिये बन्द ही रहे। भारत के ज्यादा हिस्सों में विशेष तौर पर गुजरात में स्कूलों में भी अछूतों के लिये दरवाजे खुले नहीं थे। बाबा साहेब अंबेडकर सवाल करते हैं कि गांधी क्यों असफल रहे ? वे जवाब भी स्वयं ही देते हैं उन्होंने तीन कारण गिनाये। हिन्दुओं ने महात्मा गांधी के अस्पृश्यता निवारण को नहीं स्वीकारा। ऐसा क्यों हुआ ? बाबा साहेब कहते हैं - अस्पृश्यता निवारण के गांधी उपदेश को हिन्दुओं ने नकारा, बाबा साहेब इसमें हिन्दुओं को दोषी नहीं मानते। उनकी राय में दोष गांधी का है। गांधी के अस्पृश्यता निवारण अभियान को हिन्दुओं ने लेशमात्र भी महत्व नहीं दिया। महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर में पीढ़ी का अंतराल था इसलिये मतांतर होना स्वाभाविक है। बाबा साहेब अंबेडकर का लक्ष्य भी तब अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों का सामूहिक कल्याण था। महात्मा गांधी भी भारतीय समाज के अस्पृश्यता कलंक को समाप्त करने के लिये प्रयत्नशील थे। यहां पर मनोभावना का सवाल आता है। मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी में पीढ़ियों का अंतराल नहीं था। मोहम्मद अली जिन्ना महात्मा गांधी से उम्र में केवल सात वर्ष छोटे थे। दोनों की जीवन यात्रा 1848 तक ही रही। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी में कायदे आजम जिन्ना तथा बाबा साहेब अंबेडकर के लिये लेशमात्र भी घृणा नहीं थी पर जिन्ना और बाबा साहेब अंबेडकर को महात्मा गांधी की हर बात व हर कार्य प्रतिकूल लगता था। गांधी निर्वैर व्यक्तित्त्व के धनी थे जबकि महात्मा के दोनों प्रचण्ड विरोधियों को महात्मा की हर बात उल्टी लगती थी। हरिजन सेवक संघ ही को उदाहरण के स्वरूप देखिये। बाबा साहेब अंबेडकर का मानना था कि हरिजन सेवक संघ एक दिखावा मात्र था वस्तुतः यह वैचारिक प्रतिकूलता महात्मा गांधी के दोनों विरोधियों में उग्र स्तर तक पहुंची हुई अवधारणा थी। परिणाम स्वरूप बाबा साहेब अंबेडकर के परिनिर्वाण के बाद भी अस्पृश्यता को गैरकानूनी तथा अपराध श्रेणी में लाये जाने के पश्चात भी भारत में अस्पृश्यता के उदाहरण यत्र तत्र नजर आते जाते हैं। महात्मा गांधी अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों को हरिजन कहते थे। व्यक्तिगत रूप से महात्मा गांधी के उग्रतम विरोधी होने के बावजूद बाबा साहेब अंबेडकर ने हरिजन शब्द के प्रति उग्र बेरूखी व्यवहार स्वयं नहीं किया अपने कथनों में हरिजन शब्द का प्रयोग यत्र तत्र किया। उत्तर बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर काल में हरिजन शब्द के बजाय पूर्वकाल में अस्पृश्य कहे जाने वाले व अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों के लिये एक नया शब्द दलित प्रयोग में आने लगा। स्वातंत्र्योत्तर पिछले सात दशकों में एक वर्ष कम अवधि में दलित-गैर दलित वैचारिक तंतु ने भारत को Divided House सा बना डाला है इसलिये केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद के शोधार्थी छात्र रोहित बेमुला की आत्मघाती घटना ने दलित छात्रों का यह कथन कि उनके साथ पंक्तिभेद होरहा है उनके साथ होने वाला व्यवहार भारतीय उच्चतम शिक्षण संस्थाओं के साथ साथ भारतीय संविधान के लागू होने के पश्चात भी दलितों को आत्मग्लानि कदम कदम पर सहनी पड़ रही है वह उतनी ही उग्र है जितनी संयुक्त राज्य अमरीका में श्वेत-गौरांग महाप्रभुओं में नस्लभेद की प्रवृत्ति दास प्रथा समाप्ति के डेढ़ सौ वर्ष पश्चात भी जीवित है और अपनी गौरांग महाप्रभुत्व भावना समय समय पर उजागर करती रहती है। भारत में कानूनी तौर पर अस्पृश्यता आचरण अपराध श्रेणी में इंगित है पर दलितों के साथ शैक्षिक पंक्तिभेद के अलावा मंदिरों में दलित प्रवेश सहित दलित अनादरण को रोकने के लिये सर्वाधिक कारगर उपाय डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की राय को कानूनी जामा पहनाना है।
एक महत्वपूर्ण बिन्दु राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक समारोह मे महात्मा गांधी ने 1934 में स्वयं अनुभव किया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में छुआछूत का भेदभाव नहीं है। महात्मा ने इस घटना की भूरि भूरि प्रशंसा की। बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर की यह मान्यता थी कि अस्पृश्यता निवारण वाला उपक्रम कांग्रेस और महात्मा गांधी का दिखावा और ढकोसला मात्र है इसलिये वह समय आगया है जब भारत सरकार को यह संकल्प लेना चाहिये कि छुआछूत मानना, छुआछूत आधारित घृणा फैलाना सनातन धर्म की सभी शाखा प्रशाखाओं यथा - वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त सहित सभी सनातन संप्रदायों के धर्मशास्त्रों के अनुसार शास्त्र सम्मत नहीं है। तात्कालिक राष्ट्रीय जरूरत तो यह है कि भारतीय संसद के दोनों सदन भारत के राष्ट्रपति महोदय से यह अनुरोध करें कि छुआछूत, मंदिर प्रवेश, शैक्षिक संस्थाओं सहित समूचे शासन तंत्र में दलित अपमान, उन्हें अपने बराबर न मानना शास्त्र सम्मत नहीं है। यह घोषणा करने के लिये भारतीय शीर्षस्थ न्यायालय को यह अनुरोध किया जाये कि मौजूदा सरकार देश में मनुष्य मात्र समान हैं यह भावना उद्दीप्त करने के लिये पंथ निरपेक्षता को सटीक तरीके से अपनाने के लिये छुआछूत, मंदिर प्रवेश, धर्मान्तरण भारत के धार्मिक बहुसंख्यक समाज की शास्त्र सम्मत व्यवस्था नहीं है इस पर पक्ष विपक्ष के तर्क सुन कर अपना फैसला सुनाये। सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले के क्रियान्वयन के लिये संघ सरकार, राज्यों की घटक सरकारें, जिला सरकार, क्षेत्र पंचायत, नगर पंचायत आदि सभी नगर निगमों व ग्राम पंचायतों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय क्रियान्वयन के लिये सरकारी-गैर सरकारी साझा कानून सम्मत OMBUDSMAN अंबुद समान संगठन सृजित किये जायें ताकि निर्णय की अवहेलना करने वाले व्यक्तियों अथवा व्यक्ति समूहों को अवहेलना करने से रोका जाये। हैदराबाद स्थित केन्द्रीय विश्वविद्यालय में घटित दलित छात्र आत्मघात की घटना ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जोड़ कर देखा जारहा है। विद्यार्थी परिषद मूलतः राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की एक आनुषांगिक शाखा है इसलिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित सभी संबद्ध संगठनों को विचार करने का समय आगया है। उन्हें देखना ही चाहिये कि दलित अवहेलना के घृणा व्यापार को बढ़ने से रोका जाये इसलिये भारतीय समाज को दलित, सवर्ण, आदिवासी, पिछड़े, अत्यंत पिछड़े व महादलित संज्ञाओं में बांटे जाने वाले समाज में एक दूसरे से घृणा व प्रति घृणा के साथ साथ अवहेलनात्मक व्यवहार पर कारगर रोक लगाने के लिये भारतीय चिंतन पोखर ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ जो व्यवहार आपको अपने साथ किये जाने पर अनुचित लगता है वैसा व्यवहार अपने सामने वाले से करने से अपने आपको रोकें आत्मसंयम करें। शशांक बंगाली व एम.एन. पार्थ ने लास ऐंजेल्स टाइम्स के लिये भेजे अपने स्तंभ में हैदराबाद स्थित केन्द्रीय विश्वविद्यालय में घटित घटना के अलावा आई.आई.टी. पवई मुंबई, टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज मुंबई सहित अनेक विश्वविद्यालयों में दलितों के साथ होरहे अमानवीय व्यवहार का उल्लेख किया है। आम तौर पर दलित समाज से आये हुए विद्यार्थी भारतीय भाषाओं के जरिये अपनी पढ़ाई करके जब ऊँचे संस्थानों में पहुंचते हैं उन्हें अंग्रेजी अच्छी न आने के कारण भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आत्महत्या करने वाले छात्र रोहित वेमुला के जो कि पी.एच.डी. द्वितीय वर्ष का छात्र था बी.जे.पी. छात्र संगठन के दबाव पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद ने रोहित वेमुला के साथी छात्र की माहवारी छात्रवृत्ति की रकम रूपये 27,000 का भुगतान रोक दिया। यह छात्रवृत्ति ही उस दलित छात्र का सहारा थी। विश्वविद्यालय ने प्रशासनिक देरी को कारण बताया पर छात्र तो पीड़ित ही रहा। कंछा एक दलित लेखक हैं और ऐक्टिविस्ट भी उनका कहना है कि दलितों से व्यापक पैमाने पर पंक्तिभेद होरहा है। उनकी राय में कई तथा कशिर ऊँची जात वाले भारतीय दलित समाज के परिश्रमी अध्येताओं को सह नहीं पारहे हैं। विश्वविद्यालयों में राजनैतिक लोगों की नियुक्ति ही समस्या का मूल है। कंछन दलाह कहते हैं कि अप्पाराव जो विश्वविद्यालय उपकुलपति हैं वे राजनीति करते हैं शिक्षा नीति नहीं।
केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद में घटी घटनानुक्रमणिका ने दूसरे राजनीतिक व्यक्तित्त्वों के साथ साथ कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हैदराबाद पहुंचे। ये दोनों भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने भी बयान दिया। बयान देने वालों का निशाना सोलहवीं लोकसभा के नेता तथा भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर निशाना लगाया। राहुल गांधी और नितीश कुमार तो प्रधानमंत्री पद के प्रच्छन्न दावेदार हैं। उन्हें भाग्य के घड़े के फूटने का इंतजार है पर दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भारत के प्रधानमंत्री पद को पाने के लिये नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध काशी में चुनाव लड़ा। स्वयं तो नहीं जीते पर लोकसभा में आआपा के चार सांसद होगये। अरविन्द केजरीवाल महाशय ने दत्तात्रेय बंगारू अथवा स्मृृति इरानी के खिलाफ ज्यादा न बोल कर सीधा हमला प्रधानमंत्री पर किया। बाबा साहेब भारत रत्न डाक्टर भीमराव रामराव अंबेडकर जब महात्मा गांधी का विरोध करते थे उनके पास तर्कों का तरकस था पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के वर्तमान विरोधकर्त्ता बाबू नितीश कुमार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल महाशय के पास केवल हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी को पाने की लालसा है। उनकी अपनी निजी व पार्टी मर्यादाओं के अलावा कब क्या कहना ठीक है इसका विवेक संवर्धन होना अभी शेष है। बाबू नितीश कुमार ने अपने निर्माता जार्ज फर्नांडीज तथा जदयू नेता शरद यादव को बाहरी नहीं कहा पर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को बाहरी कह कर बिहार बनाम बाहरी वाला नारा बुलंद किया। वे अपने सहयोगी प्रशांत किशोर को बिहार में केबिनेट मंत्री का दर्जा देकर अहसान का निष्क्रय दे चुके हैं। प्रशांत किशोर भी बाहरी ही हैं बिहारी नहीं। इसी राजनीतिक ऊहापोह से छुटकारा पाने के लिये आज भारत की पहली जरूरत कौटिल्य अर्थशास्त्र का पारायण करने की है। अमरीकी राजनीति वेत्ता हेनरी किसिंजर ने अपनी ताजा रचना WORLD WAR जिसे वाल्टर इसाक्सन ने टाइम्स मैगजीन में DAZZLING & INSTRUCTIVE A MAGISTRIAL NEW BOOK कहा, इस पुस्तक को भारतीय संदर्भ में विश्वायतन कहा जा सकता है। भगवद्गीता को हेनरी किसिंजर HINDU CLASSIC कहते हैं पर वस्तुतः भगवद्गीता केवल हिन्दू क्लासिक ही नहीं ‘सुपनिषत्सु ब्रह्म विद्यायां योगशास्त्रे’ श्री कृष्णार्जुन संवाद है। यह मानव धर्म की सर्वोच्च कृति है। हां कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजधर्म का निदर्शन करने वाला 6000 श्लोक वाला अद्भुत ग्रंथ है जो आज की दुनियां की राजनीतिक अवधारणा को पुनः पटरी में लाने की क्षमता रखने वाला शब्द संचय है। भारत में आज जो दलित-गैर दलित विभाजन दिख रहा है इसका भी समाधान कृष्णार्जुन संवाद में उपलब्ध है। कौटिल्य के पौने छः सौ सूत्र तथा अर्थशास्त्र भारत ही नहीं विश्व में व्याप्त विसंगतियों का समाधान कारक मार्ग दिखाने की क्षमता रखने वाला ग्रंथ है। इसलिये अब्राहम लिंकन के शब्दों में DIVIDED HOUSE प्रवृत्ति पर एक दूसरे के विचार शांतिपूर्वक सुनने की जरूरत है। भारत के जो लोग अपने को सवर्ण हिन्दू कहते हैं वे भी जन्मना जायते शूद्रः ही हैं वे संस्कारी पुरूष तो हुए ही नहीं इसलिये अपने आपको दलितों से श्रेष्ठ मानने का जो अहंकार पाला जारहा है उसका त्याग करने की पहली जरूरत है। आज हिन्दुस्तान जिन विविध परस्पर विरोधी बातों, विकारों तथा मनःस्थितियों से घिरा हुआ है उसका निराकरण केवल गांधी विचार की विनोबा भाष्य शैली से ही संभव है। विनोबा के तर्क को भारतवासियों को समझना होगा, आपस में मिल बैठ कर एक दूसरे की बात सुननी होगी। जो चुभते हुए सवाल हैं उन पर शांतचित्त हो बहस करनी होगी तभी हम भारतवासी लोकतांत्रिक तरीके से एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए आन्वीक्षिकी मध्यमार्ग का रास्ता अपना कर वैचारिक आवागमन को एक टिकाऊ मंच दे सकते हैं। ऐसा मंच तैयार करने के लिये घृणा का परित्याग करना पहली शर्त्त है। आइये देश के दलित, महादलित, पिछड़े, अति पिछड़े समूहों में संवाद कायम करें। मनुष्य मात्र बंधु हैं यही बड़ा विवेक है। उस विवेक मार्ग को अपनायें ताकि भारत राष्ट्र की भावी पीढ़ियां श्रेयस मार्ग का अनुसरण कर सकेें।
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