Monday, 7 March 2016

राष्ट्रवाद के मौलिक विशेषज्ञ बेनडिक्ट ऐंडर्सन(1936-2015) और
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुरोधा महात्मा गांधी का गुरुमंत्र

जिल लेओवी ने दक्षिण पूर्व एशिया अध्येता बेनडिक्ट ऐंडर्सन जो मूलतः ऐंग्लो आयरिश थे, का निधनाख्यान जिसे अंग्रेजी में Obitury कहा जाता है, दिसंबर 13 सन 2015 के दिन हिन्देसिया के मलांग नगर में उन्नासी वर्ष की उम्र में दिवंगत हुए। बेनडिक्ट ऐंडर्सन का बचपन लोस गाटोस व कैलिफ में बीता। उन्होंने अपनी कुशल विद्वत्ता की गुणवत्ता और हिन्देसिया में सुहर्तो की इंडोनेसियाई शासन शैली के कूट आलोचक के रूप में ख्याति अर्जित की। उनकी पहचान का मूल स्त्रोत उनकी 1983 में लिखी पुस्तक Imagined Communities : Reflections on the origin & spread of Nationalism है। यह ग्रंथ राष्ट्रवाद की उपज और राष्ट्रवादिता विस्तार की प्रतीक है। पुस्तक के प्रकाशन के तीन दशक पश्चात भी यह राष्ट्रवाद प्रबोधनकार ग्रंथ समीक्षकों की राय में आयरलैंड, रूस, सीरिया, नाइजीरिया तथा इस्लामिक स्टेट के राष्ट्रधर्म  का खुलासा करता है। सुहर्तो के भयानक त्रासद सत्ता लोलुपता में कम से कम पांच लाख लोेगों के मारे जाने वाले हिंसक अभियान ने ऐनडर्सन के दिल और दिमाग दोनों को मथ डाला। सुहर्तो तीन दशकों तक इंडोनेसिया के लोकमत को रौंदता रहा। सन 1998 में सुहर्तो इंडोनेसिया के सत्ताधिष्ठान से निष्कासित होगये। सुहर्तो से पहले इंडोनेसिया के शासक सुकर्गो थे जो भारतीय प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की विश्व राजनीति में तटस्थता के महान पक्षधर थे। इंडोनेसिया के लोग मजहबी तौर पर इस्लाम धर्मावलंबी थे पर उनके नाम इंडोनेसिया में इस्लाम के आगमन से पहले भारत धर्मिता वाले सुकर्ण(सुन्दर कान वाला), सुहृत्(महान लोकहितकारी मित्र) सरीखे हुआ करते थे। श्रीकृष्ण कहा करते थे - उद्धव तुम मेरे सुहृत सखा और भृत्य हो। त्वम् मे सुहृत् सखा भृत्यः। पर सुहर्तो के राज्यारोहण के सारे प्रकरण सुहृत शब्द की मर्यादाओं के प्रतिकूल थे। हिन्दी वैयाकरण किशोरी दास वाजपेयी भारत के इस्लाम धर्मावलंबियों को मशविरा देते थे - तुलसीदास का आदर्श अपनाओ मांग के खाओ और मजीद पर जाकर सोेओ। वे यह भी कहते थे कि इस्लाम और्व स्थान है, और्व योग है तथा और्वोपदिष्ट मार्ग अपनाइये। अरब नाम के देश का मूल संस्कृत नाम और्व है जिसे उशना भार्गव शुक्राचार्य ने प्रतापी तथा परम्पराओं को मानक मानने वाले दिति-दनु के बेटों पोतों का राज्य कहा जाता है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को वैयाकरण किशोरी दास वाजपेयी का मशविरा था कि अल्लाबक्श के बजाय अपना नाम ईश्वरी प्रसाद रखने, आफताब हुसैन के बजाय अपना नाम सूर्य प्रकाश रखने इससे हिन्दुस्तान में जिस तरह जैन, बौद्ध व सिख अपने अपने धर्म को मानते हैं, बहुसंख्यक सनातन धर्मावलंबी समाज आप लोगों की सबसे ज्यादा जनसंख्या इंडोनेसिया में है। मुसलमान आबादी वाला दूसरा बड़ा देश भारत है। हिन्दू-मुस्लिम साहचर्य भारत को दुनियां के समृद्ध व विकसित देशों की पंगत में खड़ा कर सकता है। स्तंभकार जिम लेओवी अपने पाठकों से पूछते हैं - रोज सुबह अखबार पढ़ते हो पर क्या तुम्हें यह मालूम है यह अखबार तुम्हें क्या संदेश देरहा है ? चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी कृष्ण भक्ति के देदीप्यमान नक्षत्र अपने जीवन के उत्तरार्ध में बुढ़ापे की अगवानी करने संयुक्त राज्य अमरीका गये। उन्होंने श्रीमद्भगवदगीता व श्रीमद्भागवत महापुराण को ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ गीता के संदेश अर्जुन के सवाल तथा कृष्ण के जवाब गीता के अठारह अध्यायों सात सौ श्लोकों की कृष्णानुरक्त व्याख्या अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत कर कृष्णानुरक्ति को विश्व के कोने कोने में फैला डाला। वैटिकन और मक्का शरीफ में एक खुदा, एक पुस्तक तथा एक पैगंबर का - ‘एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ के अद्वैत वेदांत को स्वामी विवेकानंद के पश्चात नयी ऊँचाई दी। यूरोपीय राष्ट्रवाद अमरीकी राष्ट्र राज्य वाला राष्ट्रवाद का अल्लाह ताला की रचना, ईश्वर की निर्गुण भक्ति अपनी जिन्दगी को अल्लाह के कामों के लिये अर्पित करने वाला आस्थामूलक राष्ट्रवाद सहित राष्ट्रवाद के सभी पहलुओं पर सोच पोखर की भूमिका निर्वाह करने वाले बैनडिक्ट ऐंडर्सन ने राष्ट्रवाद के उग्रधर्मी आकार जर्मनी में हर हिटलर के फासी राष्ट्रवाद यूरप के देशों का भाषायी राष्ट्रवाद के समानांतर नस्ल, मजहब और वाणियों की विविधता के बावजूद बेनडिक्ट ऐंडर्सन ने इंडोनेसियाई राष्ट्रवाद की नींव लोकतांत्रिक आधार पर मजबूत करने का जो व्रत लिया, इंडोनेसिया में उन्हें राष्ट्रवादिता के मार्ग में जो उपलब्धियां हुईं उस बारे में डेविड विणत का मत है कि राष्ट्रवाद के उत्कर्ष में इंडोनेसिया का लोकमत ऐंडर्सन को सम्मान देता है। जियोफेरि टैविन्सन उकला का इतिहास प्राचार्य की राय में जो ऐंडर्सन के पट्ट शिष्य रह चुके थे, उनका मानना है कि यदि आप ऐंडर्सन को सुनें उनकी वार्ता थाइलैंड जिसे हम हिन्दुस्तानी श्याम कहते हैं कुंग फू का गुरू शिष्य परम्परा वाला प्रभाव है। बेनडिक्ट गोर्मन ऐंडर्सन सन 1936 में कुनमिंग चीन में जन्मे। वे ऐंग्लो आयरिश चीनी मारटाइम कस्टम के कर्मचारी पिता तथा अंग्रेज मां के चहेते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लोस गोटस में बस गये ईटन नामक स्थान में इन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय स्नातक वर्ग के लिये छात्रवृत्ति भी मिली। वर्ष 1958 में जब वे 22 वर्ष के युवा थे कार्नेल गये। उनकी भगिनी मेलिनि यह सूचना दी। ऐंडर्सन पहले पहल इंडोनेसिया 1904 में गये तब इंडोनेसिया का शासन सुकर्णो संभालते थे जिनके भारतीय प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से उनके स्नेहिल मधुर संबंध भी थे। जिल लेओवी ने सुकर्णो - पंडित नेहरू तटस्थ वैदेशिक नीति पर अपनी कलम नहीं चलायी। 
राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक बेनडिक्ट ऐंडर्सन के जन्म 1936 से सत्ताईस अठाईस वर्ष पहले दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास के दर्मियान मोहनदास करमचंद गांधी ने इंडियन ओपीनियन साप्ताहिक अखबार के जरिये बीस अध्याय वाला एक संवाद शैली वैसी ही संवाद निष्ठा जिस पर कुरूक्षेत्र के रणांगण में गीता का संवाद महाभारत युद्ध के प्रारंभ दिन अगहन सुदी एकादशी को संपन्न हुआ था। मोहनदास करमचंद गांधी सत्य-अहिंसा मार्ग के अनुयायी थे। वे जब विलायत में थे भारत के कुछ नौजवान चाहते थे कि हिन्दुस्तान की आजादी के लिये हिंसक मार्ग अपनाकर जल्दी आजादी पाना श्रेयस्कर है। वे लोग मोहनदास करमचंद गांधी से भी मिले। मोहनदास करमचंद गांधी ने ध्यानपूर्वक नौजवानों को सुना और केवल इतना ही कहा - हिंसा का रास्ता सही रास्ता नहीं है। मोहनदास गांधी की मां रामभक्त थीं और अपने सबसे छोटे बेटे को बहुत चाहती थीं। वे उन्हें मोनिया कह कर पुकारती थीं। मां पुतलीबाई और पिता करमचंद कबा गांधी की उम्र में 22 वर्ष का फर्क था। पुतलीबाई दीवान करमचंद कबा गांधी की चौथी पत्नी थीं। उन्होंने दीवान करमचंद कबा गांधी की गृहस्थी बड़ी होशियारी से संभाली थी। राम नाम में अनन्य आस्था रखने वाली मां पुतलीबाई की सबसे छोटी संतान मोनिया भारतीय राष्ट्र की महान धरोहर है। उन्होंने भारत के गांवों को ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारत में व्यापार से पहले की स्वावलंबी ग्राम रिपब्लिक का संकल्प लिया था। यही संकल्प उनके इंडियन ओपीनियन के जरिये हिन्द स्वराज का कथ्य है। हिन्द स्वराज महात्मा गांधी ने अपनी मातृभाषा गुजराती में लिपिबद्ध किया। इस लघु ग्रंथ में 20 अध्याय हैं। यह ग्रंथ कृष्णार्जुन संवाद शैली पर अधिपति और वाचक का संवाद है। भारत में राष्ट्र शब्द अंग्रेजी के Nation शब्द के लिये प्रयुक्त होता है। राष्ट्रवाद दुनियां को यूरप की देन है या सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कस्बा राढ़ तथा ग्रियर्सन ने भारत में 276 वाणियों की उपस्थिति मानी। डा. ग्रियर्सन का मत था कि यदि तुलसीदास सरीखा स्वान्तः सुखाय रामगाथा लिखने वाला कवि यूरप में होता तो तुलसीदास का स्थान अंग्रेजी साहित्य के महान कवि व नाट्यकार शेक्सपियर से ऊँचा स्थान उन्हें मिलता। भारत के सांस्कृतिक राष्ट्र बोध का पहला अनुभव पश्चिमी संसार को महात्मा गांधी के जरिये मिला। भारत क्यों सांस्कृतिक राष्ट्र है ? इसका जवाब भारत के प्रयाग में गंगा-यमुना-सरस्वती(अदृश्य) के संगम में हर बारहवें वर्ष कुंभ मेला लगता है। इस कुंभ के लिये कोई ऐसा संगठन ही नहीं है जो इसका आयोजन करता है। भारत के लोकमानस में प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में होने वाले बारह वर्षीय कुंभ में भारत के कोने कोने से लोग एकत्रित होते हैं। कुंभ स्नान कर अपने अपने गांव व शहरों को लौट जाते हैं। अमरनाथ, कैलास, वैष्णोेदेवी, केदारनाथ, सोमनाथ, बदरीनाथ, गंगा सागर, पुष्कर, गया, वृन्दावन, कुरूक्षेत्र, हरिद्वार, अयोध्या, काशी, कांची, द्वारका, जगन्नाथपुरी, कामाख्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट, कन्याकुमारी, रामेश्वर, तिरूपति, गोकर्ण, श्रंगेरी आदि हजारों ऐसे तीथस्थान हैं जहां भारत के लोग उस जमाने से आते जाते रहे हैं जब तीर्थयात्रा पैदल हुआ करती थी। यही भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता है। महात्मा गांधी ने अपनी पहली रचना हिन्द स्वराज में राष्ट्रीयता के इसी तत्व को उजागर किया है। भारत का संविधान अंग्रेजी सहित बाईस भारतीय भाषाओं को भाषायी संवैधानिकता उपलब्ध कराता है। भारत में नागरी लिपि सहित भारतीय भाषाओं में फारसी, पंजाबी, गुरूमुखी, गुजराती, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती ये बारह लिपियां प्रयोग की जाती हैं। फारसी लिपि के अलावा भारतीय मूल की लिपियों में स्वर व्यंजन तथा अक्षर उच्चाण एक सरीखा है। आज भारत के भद्रलोक की मान्यता है कि देश के बारह प्रतिशत लोग अंग्रेजी भाषा व रोमन लिपि से अवगत हैं। देश की जनसंख्या का आठवां मात्र अंग्रेजी के संपर्क व सान्निध्य में है। शेष 88 प्रतिशत भारतीय जनता जो लोग निरीक्षर नहीं हैं वे अपनी अपनी भाषा व लिपि का प्रयोग करते हैं। इसलिये भारत के अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों का मानना है कि अंग्रेजी भाषा भारत की लिंगुआ फ्रांका है जबकि 1931 तक जब मैसूर के महाराज जय चामराज वाडिया ने कैलास यात्रा संपन्न की तब तक सधुक्कड़ी को भारत की लिंगुआ फ्रांका माना जाता था। विवेकानंद और महात्मा गांधी के भारत के गांवों में घूमते वक्त सभी जगह लिंगुआ फ्रांका के रूप में सधुक्कड़ी  जानने वाले व्यक्तियों से संपर्क रखा। सधुक्कड़ी के सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता संत कबीर हैं जिन्होंने अपना समूचा साहित्य सधुक्कड़ी में ही प्रस्तुत किया। हिन्दुस्तान में एक प्रचलित शब्द साधु है, साधु वह है जो घूमता रहता है। साधुओं की श्रेणी में फकीरों के अलावा व्यापार के लिये एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने वाले व्यक्तियों को भी साधु ही कहा जाता है। साधुओं के लिये रात्रि विश्राम के लिये धर्मशालायें तथा साधुओं में जो लोग स्वयं पाकी नहीं होते उनके लिये सस्ते भोजन का इंतजाम, साधु समाज की एक बड़ी विशेषता यह होती थी कि पास-पड़ोस जहां तक नजर जाती है कोई व्यक्ति भूखा प्यासा न रहे हरेक को भोजन मिले। फकीरों में ज्यादा लोग कांचन मुक्ति का मार्ग अपनाते थे पर व्यापारी व अन्य लोग जो तीर्थाटन के लिये निकलते थे वे भोजन निष्क्रय भुगतान करते थे। पानी बेचना व भोजन का व्यापार करना नीति युक्त नहीं माना जाता था। इसलिये कमखर्ची व मितव्ययता के जरिये देशाटन, तीर्थाटन हुआ करता था। मोहनदास करमचंद गांधी अपने भारत भ्रमण कार्यक्रम में बिहार भ्रमण के दौरान वैद्यनाथ धाम पहुंचे। उन्हें वैद्यनाथ धाम के पंडों ने सप्रमाण बताया कि उनके पिता दादा भी तीर्थयात्रा में वैद्यनाथ धाम में आये थे। पंडों ने महात्मा गांधी को उनके पिता दादा के हस्ताक्षर भी पंडा बही में दिखाये। पंडों से महात्मा के संवाद में भारत के तीर्थों में पंडों की यजमान बहियां देखने पर पंडों के ऐतिहासिक महत्व के प्रति जागरूकता हुई। पंडों ने महात्मा गांधी से दक्षिणा देने और बही में हस्ताक्षरी करने का भी अनुरोध किया। पंडों का तर्क था महात्मा जी आप गृहस्थ रहे हैं साधु सन्यासियों व फकीरों को हम भोजन कराते हैं उनसे तीर्थयात्रा दक्षिणा नहीं लेते केवल वे ही लोग जो गृहस्थ हैं अकेले या सपत्नीक तीर्थयात्रा करने आते हैं उनसे ही दक्षिणा ली जाती है। तीर्थयात्री अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देता है। कोई निष्ठावान पंडा अपने यजमान तीर्थयात्री से दुर्व्यवहार नहीं करता। यात्रियों के ठहरने व भोजन प्रबंध के लिये पंडा लोग अपनी अपनी हवेली के निकट आवास व भोजन की व्यवस्था करते हैं। यह तीर्थाटन भी है देशाटन भी है। आदमी का आमदनी कम हो या ज्यादा तीर्थयात्रा में ‘वित्त शाठ्य’ वर्जित है। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया में पंडों के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक राष्ट्र भारत की निरन्तरता को संबल दिया है। सबसे बड़ी बात महात्मा गांधी को यह प्रतीति हुई कि तीर्थों के पंडे अपने यजमानों से उनकी स्वभाषा में ही बतियाते हैं। पंडों और यजमानों में एक सजग सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता का उद्भव होता है। आधुनिकता, तीर्थाटन को पर्यटन से जोड़ कर पर्यटन प्रेमियों को तीर्थ में यात्रियों की संख्या में वृद्धि होना, बढ़ी हुई तीर्थयात्रियों की संख्या से ऐसी स्थितियां भी उपस्थित होती हैं जैसी प्रयाग के 1954 के कुंभ मेले में मौनी अमावस के शाही स्नान के वक्त आपाधापी अनियंत्रित भीड़ के कारण हुई। ऐतिहासिक प्रमाण ऐसे भी हैं जब विक्रमादित्य सरीखे सम्राट, हर्षवर्धन सरीखे दानी राजा तीर्थायात्रा में निकलते पर तीर्थ में एक सामान्य तीर्थयात्री की भांति व्यवहार करते। तीर्थाटन व पर्यटन को एक घालमेल के रूप में देखने वाले लोग जब लोकतांत्रिक सत्ताधीश भी सामान्य नागरिक की तरह तीर्थस्थान का पुण्य निर्धारित मुहूर्त्त में ही अर्जित करना चाहता हैै साथ ही लोकसत्ता में उसे प्राप्त विशेषाधिकार का उपयोग भी अपनी निजी व आस्थामूलक मान्यताओं के आकांक्षित लाभों का लोभ संवरण नहीं कर पाता अपने स्नान के लिये सामान्य स्नानार्थियों के मानवाधिकार का हनन करता है वही राजनीतिक पंक्तिभेद है। भारत के शासक लोग चाहे वे राजनीतिक नेता हों अथवा नौकरशाह यदि वे बहुसंख्यक धर्मावलंबी हैं उन्हें स्वयं को राजकाज के साथ भारतीय संविधान में जिस पंथनिरपेक्षता अथवा धर्मनिरपेक्षता या फिर कर्त्तव्य निरपेक्षता उसे चाहे जो भी नाम दें। पश्चिमी सभ्यता में सेकुलरिज्म से तात्पर्य राजकाज व समाजकाज में चर्च का हस्तक्षेप न होना है पर हिन्दुस्तान में सेकुलरिज्म का व्यावहारिक स्वरूप अत्यंत विद्रूप प्रतीत होता है। यहां पर सेकुलरिज्म पर आस्था रखने वाले लोग आमतौर पर हिन्दुस्तानी बहुसंख्य समाज की आस्था पर अप्रत्याशित आघात करना मानते हैं। उनकी नजर में भारत का आस्थामूलक बहुसंख्यक समूह Communal संप्रदायवादी हैै। वे मजहब को राजनीति से जुड़ा मानने वाले अल्पसंख्यकों के मत बटोरने के लिये सेकुलरिज्म का बाना ओढ़ते हैं। उनकी इस चाल को भारतीय अल्पसंख्यक समाज मुख्यतया भारत विभाजन के पश्चात भारत में रह गया इस्लाम धर्मावलंबी समूह जिनकी जनसंख्या भारत में विश्व के इस्लाम धर्मावलंबी एक अरब साठ करोड़ मुसलमानों में इंडोनेसिया के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत के विभाजन के पश्चात मौजूदा पाकिस्तान व बांग्लादेश में जितने इस्लाम धर्मावलंबी हैं उससे ज्यादा इस्लाम धर्मावलंबी भारत भूमि में रहते हैं। भारत में इस्लामी सल्तनत के जमाने में भी मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, रहीम और कबीर सरीखे राम-कृष्ण भक्ति में आस्था रखने वाले अनेक मुसलमान हुए हैं। इसलिये हिन्दू मुस्लिम सौमनस्य स्थापित कर भारत के मुसलमानों का योगक्षेम सुनिश्चित करने में भारत के बहुसंख्यक आस्था वाले समूह को महात्मा गांधी द्वारा अपनाये गये रास्ते पर चलने पर ही भारत समर्थ, सशक्त, स्मार्ट तथा मनुष्य मात्र की बंधुता - विश्व मानवता का वह आदर्श पुनः स्थापित कर सकता है जिसे अयोध्या नरेश राजा रामचन्द्र, इन्द्रप्रस्थ के प्रथम भूमिपाल राजा युधिष्ठिर, मगध नरेश सम्राट अशोक, मुगल सल्तनत के पृृथ्वीपाल शंहशाह अकबर द्वारा बरते गये राजधर्म का अनुपालन करने के लिये देश के निर्वाचित राजनेताओं को दस्युधर्मी बनने से रोकना होगा। समग्र राजधर्म अपनाना होगा। आज विश्व में राष्ट्रवाद के दो प्रतीक हैं। पहला प्रतीक है भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिसका राजा, शासक, सम्राट, बादशाह कौन है ? यह महत्वपूर्ण नहीं है राज करने वाले आयेंगे और जायेंगे इतिहास के पन्नों में समा जायेंगे पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शंखनाद घर घर, गांव गांव, शहर दर शहर के मुहल्लों व गलियों में अपनी उपस्थिति पताका फहराता रहेगा। दूसरी ओर राष्ट्र राज्य की राष्ट्रीयता का संवर्धन है जिसमें सरकार बदलने में व्यावहारिकी बदलाव आना राजनीतिक अनिवार्यता है। बेनेडिक्ट ऐंडर्सन ने इसी राष्ट्र राज्य, राष्ट्रीयता अथवा Nation-State, Nationalism का उद्गान किया है। हिटलर, मुसोलिनी के फासीवाद अथवा वर्तमान समय में I.S.I.S. इस्लामिक स्टेट का जो जिहादी आचार है जो बन्दूक शक्ति-बन्दूक सत्ता ऐसे लोगों को अपना निशाना बना रही है जो उनके विरूद्ध किसी भी प्रकार का युद्ध मार्ग नहीं अपना रहे हैं। त्राहि-त्राहि करने वाले जिहादी विचार तंत्र पर केवल बंदूक की सरकारी मशीनरी के जरिये रूकावट नहीं लग सकती। इसके लिये हर मजहब के उच्च आध्यात्मिक पक्ष को संत विनोबा की शैली में ही समझने का प्रयास करना होगा। पहले उन बिन्दुओं पर संवाद स्थापित करना होगा जिनमें मतैक्य की संभावना है। मतांतर के सवालों को गांधी अहिंसा-सत्याग्रह के रास्ते से शनैः शनैः शांति स्थापना के मार्ग में बढ़ाना होगा। राष्ट्रधर्म, राष्ट्रीयता बोध में भी दो या दो से अधिक राष्ट्रों में टकराहट के जो बिन्दु सामने आयें उन्हें आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति की वैदेशिक कूटनीति से जोड़ कर देखना होगा। भारत में शांति पाठ का मंत्र विश्व शांति का मूल मंत्र बनाया जा सकता है बशर्ते अहिंसा या Non-Violence पर विभिन्न राष्ट्रवादी ताकतें कारगर संवाद शुरू कर सकें।
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