Wednesday, 9 March 2016

यौन कदाचार आरोपी योग साधना सिखाने वाले दो गृहस्थी योग गुरु
हिंदुस्तान में आसाराम बापू व लॉस ऐंजेल्स में विक्रम चौधरी
 
          आधुनिक हिन्दुस्तान में योग मार्ग के प्रतिष्ठित साधक सन्यासी विरजानंद महाराज के प्रिय शिष्य स्वामी दयानंद सरस्वती हुए हैं जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश के जरिये भारत में वेदांती योग मार्ग को शास्त्रार्थ संपन्न कर एक नया सोपान दिया जिसे हिन्दुस्तान के लोगों ने आर्यसमाज कहा। ब्रह्म जिज्ञासा व योग जिज्ञासा के मार्ग तो बादरायण व्यास और योगाचार्य पतंजलि सुनिश्चित कर चुके थे पर ब्रह्म जिज्ञासा व योग जिज्ञासा को गुरू शिष्य परम्परा के सटीक अनुपालन के जरिये ही लाभदायी बनाया जा सकता है। बीसवीं शती के सातवें दशक में अमरीका में इलिच ईवान की डिस्कूलिंग थ्योरी ने अपने लिये जमीन तैयार की। अमरीका सहित समूची धरती में शिक्षा प्रसाद को लश्करी बना डाला है जिससे गुरू शिष्य में ज्ञान का तादात्म्य नहीं होता, इस शिक्षा को उस्तादनुमा शिक्षा कहा जा सकता है। आदि शंकर और स्वामी विवेकानंद ने अद्वैत के जरिये मानवता को निखारने की पहल अपने अहर्निश चरैवेति-चरैवेति के उपक्रम के माध्यम से संपन्न की। रामकृष्ण मिशन व चिन्मय मिशन के अलावा भक्तिवेदांत स्वामी के हरे कृष्ण मिशन ने भारत और विश्व के इतर राष्ट्रों में वेदांत और योग मार्ग का फैलाव किया। योग साधना के क्षेत्र में ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी तथा सन्यासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। योग साधना के क्षेत्र में कई गृहस्थ भी इसे अपना व्यवसाय तथा आर्थिक समृद्धि के साथ साथ अपने यौनाचार की तृप्ति की आकांक्षा का क्षेत्र निर्मित किये हुए हैं। नानकपंथी आसाराम बापू ने संत लीला साह से योग मार्ग की दीक्षा लेने का प्रयास किया। योगी लीला साह तो पूर्ण रूप से वैराग्य राग के रसिक थे। उन्होंने आसाराम बापू को योग मार्ग का रास्ता दिखाया। भक्ति तभी तरूणाई पर पहुंचती है जब उसके ज्ञान-वैराग्य नाम के दो सुत भी तरूण हों। बहुत से लोग काम, क्रोध व लोभ के त्रिविध ताप से अपने आपको अलग नहीं कर पाते। उनकी पुत्रेषणा, वित्तेषणा उन्हें पाखण्ड पथ का राही बना डालती है। आसाराम बापू के साथ यही हुआ। भरापूरा परिवार है परंतु वित्त शाठ्य ने धन की लालसा के समानांतर तरूणी लालसा ने आसाराम बापू जिसके लाखों लाख अनुयायी भारत भर में फैले हुए थे आसाराम बापू के यौन कदाचार ने स्वयं उन्हें प्रभावित तो किया ही उनके अनुयायियों को भी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ रहा है। वे स्वयं यौन कदाचार के आरोप में निरूद्ध हैं, प्रयास कर रहे हैं कि न्यायालय को उनके विरूद्ध प्रामाणिक प्रमाण न मिल पायें। भारत भर में आसाराम बापू की कहां कितनी संपदा है ? उन्होंने कौन कौन ट्रस्ट किस किस नाम से तथा किस उद्देश्य से सृजित किये हैं ? निष्पक्ष प्रतीति यह है कि आसाराम बापू का प्रभाव क्षेत्र आसेतु हिमाचल सर्वत्र व्याप्त है। राजनीति, प्रशासन तथा व्यापार में या अन्य व्यवसायों में लगे लाखों लोग उनके प्रभामंडल के अंतर्गत हैं। इस ब्लागर ने उनके पूरे साहित्य का अनुशीलन इसलिये किया कि इस ब्लागर की दिवंगता धर्मचारिणी विदुषी स्त्री भी आसाराम बापू के पाखण्ड चक्रव्यूह में फंस गयी। उन्होंने कहा मुझे आसाराम बापू के दर्शन कराओ। तब हमारा ज्येष्ठ पुत्र अहमदाबाद में नियुक्त था। इस ब्लागर ने अपनी धर्मचारिणी पत्नी को कहा कि आसाराम बापू का दीदार पाने के लिये कम से कम ग्यारह हजार रूपये का नजराना दो तब वे आपकी ओर एक दृष्टिपात करेंगे। यह ब्लागर पेंशन तो पाता ही था आज भी पारहा है। अपनी पत्नी को आसाराम बापू का दीदार कराने उनके मोटेला आश्रम गांधी नगर अहमदाबाद के बीच पहुंच कर ग्यारह हजार रूपये का नजराना देने को तैयार था। हमारे बेटे ने मोटेला आश्रम में होरही गड़बड़ियों व भक्तों की मृत्यु संबंधी गुजराती, हिन्दी व अंग्रेजी के अखबारों की खबर सुनाई। आसाराम बापू की करनी का विवरण सुन कर इस ब्लागर ने आसाराम भक्त अपनी पत्नी से यह पूछा कि क्या उन्हें अभी भी आसाराम बापू पर श्रद्धा है ? कुछ लोगों को जो विवेकशील थे, मोटेला आश्रम में होरही घटनाओं से आसाराम बापू से उतने अनुरक्त नहीं रहे बदलाव आया किन्तु सही सही बदलाव तो तब आया जब शाहजहांपुर की मूल निवासी भक्त पर आसाराम बापू के कामबाण चले। पाखंड का भी समय होता है पाखंडी एक निश्चित समय तक लोगों पर अपने पाखंड से लोगों पर अपना प्रभाव बनाये रखने में समर्थ होता है। समय परिवर्तनशील है पाखंड की पोल तो खुलने ही वाली है। आसाराम बापू का पाखंड खुल गया पर उन्हें दण्डित किया जा सकेगा अभी तो यह संशयग्रस्तता से भरा हुआ है। वास्तव में पाखंडी धर्मगुरू से ज्यादा वे लोग जो पाखंड के चक्रव्यूह में स्वार्थवश फंसते हैं वे ज्यादा उत्तरदायी हैं। पाखंड एक ऐसा सर्वव्यापी दोष है जो अपना क्षेत्र विस्तार करने के साथ साथ बनावटी कृत्रिम प्रभामंडल भी निर्मित कर लेता है। दुनियां में चापलूसों व चुगलखोरों जिन्हें पिशुन भी कहा जाता है उनकी एक भरीपूरी जमात है। चापलूसी पाखंड का विस्तार करती है जब चापलूसी का बाजार गर्म होता है पिशुन समाज भी बीच में आकर पाखंड की मर्यादा भंग कर पाखंडी व्यक्ति व उसके अनुयायियों प्रशंसकों के बारे में खुसफुसाहट होने लगती है। पाखंड जब अति को पार कर जाता है उसकी खिलाफत यहां तक बढ़ती जिस तरह हरिद्रोही दैत्यराज हिरण्यकश्यप के दुराचार को शांत करने के लिये नृसिंहावतार हुआ। जब हिरण्यकश्यप अपने बेटे को मारने पर उतारू हुआ नृसिंहावतार से हिरण्यकश्यप का वध कर डाला। हिरण्यकश्यप की कहानी इतिहास में दुहराई जाती रही है। अब दक्षिण कैलिफोर्निया योग गुरू विक्रम चौधरी प्रकरण पर प्रकाश डालते हैं।
          आसाराम बापू की तरह विक्रम चौधरी भी गृहस्थ हैं पर योग गुरूचर्या भी करते हैं। कोलकाता में वे उस वर्ष जन्मे जब भारत आजाद होरहा था। 1971 वे कैलिफोर्निया आगये। गवाही, प्रति गवाही विक्रम चौधरी से प्रश्नों के उत्तर में यह प्रतीति हुई कि विक्रम चौधरी चालीस आलीशान आरामदेह गाड़ियों का काफिला भी रखते हैं। आराम देनी वाली ऐसी गाड़ियों की सूची में राल्स रायस, फेरिस, वेेंडले किस्म की लग्जरी गाड़ियां भी हैं। चौधरी ने कहा कि वे गाड़ियां स्कूलों को उपलब्ध कराते हैं पर कैलिफोर्निया के गवर्नर की महिला प्रवक्ता ने विक्रम चौधरी के दावे को नहीं माना और उनके कथन की अदालत ने भी पुष्टि नहीं की। विक्रम चौधरी को अमरीकी डालर 9,24,500 वकील जाफना वाडना को क्षतिपूर्ति के तौर पर भुगतान करने का आदेश अदालत ने जारी किया। पिछले वर्ष चौधरी ने कापीराइट कानूनों के तहत संयुक्त राज्य अमरीका की सार्जेंट कोर्ट अपीली अदालत ने चौधरी को योग प्रशिक्षण प्रविधि को कानून की अवज्ञा घोषित किया था। 
          स्वामी दयानंद सरस्वती सन्यास मार्गी थे। वे अपने तर्क से प्रत्येक धार्मिक व आध्यात्मिक प्रक्रिया पर बहस करते। अपने प्रतिद्वन्दी के विचारों को तार्किक मीमांसा के जरिये खण्डन करते। योग मार्ग में अत्यंत निपुण स्वामी विरजानंद महाराज के यह शिष्य स्वामी दयानंद से एक बार एक अखबार नवीस ने सवाल किया कि आप अपना ब्रह्मचर्य कैसे निर्वाह करते हैं ? कोई स्त्री यदि आपसे प्रार्थना करे कि आप उससे रमण करें तो आप क्या करेंगे ? स्वामी दयानंद ने उस अखबार नवीस को कहा - अगर कोई माता मेरे सरीखे बेटे से रमण करना चाहे तो मैं उनकी इच्छापूर्ति करूँगा पर अखबार नवीस यह भी ध्यान रखो कि मैं सन्यासी हूँ। कोई माता बहन मुझसे ऐसा प्रस्ताव करे वह स्थिति मैं आने ही नहीं दूँगा। योगमार्ग, ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा सन्यास पथ है गृहस्थ धर्म नहीं। भारत में स्वामी दयानंद सरस्वती सरीखे योगियों की संख्या एक अरब सत्ताईस करोड़ की जनसंख्या में एक करोड़ से ज्यादा है। योग मार्ग व गुरू शिष्य के बीच एक सेतु है गुरू अपने योग्य शिष्य को योगमार्ग का सटीक दिशा बोध कराता है। आसाराम बापू और विक्रम चौधरी सरीखे अनेक गृहस्थ योग को व्यापार बनाने पर उतर आये हैं। उसी का नतीजा है कि आसाराम बापू व विक्रम चौधरी अंततोगत्वा कानून के घेरे में घिर ही गये। पश्चिम में और भारत के उन लोगों में जो पाश्चात्य जीवन शैली से प्रभावित हैं वे प्राइवेसी याने निजता की बात करते हैं। सही योगाभ्यासी अपने शिष्य को योग अभ्यास कराते समय आगाह करता है तथा मर्यादित जीवन का मार्ग बताता है। योग में क्या क्या प्रतिवेध हैं यह गोपनीय तरीके से समझाता है। योग न तो क्रिकेट का खेल है योग में पाश्चात्य Permissive Society स्वीकार्य पथ नहीं है। जो स्त्री पुरूष गृहस्थ हैं और पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनके लिये योग के वे तरीके जिनको वे संपन्न कर सकते है, सामाजिक मर्यादाओं का पालन करते हुए प्राणायाम का सीमित मार्ग तो गृहस्थी अपना सकता है पर जब तक योगाभ्यासी निरंतर प्रयास कर अपनी कुंडलिनी जाग्रत नहीं कर लेता उसे गृहस्थी में रह कर योगपथ में चलना तकलीफें भी दे सकता है। योग न विज्ञापनीय है न व्यावसायिक कृत्य। कैलिफोर्निया में कोलकाता के दो योगमार्गी पहुंचे। पहले थे 69 वर्षीय भक्तिवेदांत स्वामी जिन्होंने समूचे संसार में कृष्ण चेतना जाग्रत की एवं श्रीमद्भगवदगीता व श्रीमद्भागवत महापुराण इन दो ग्रंथों का अमरीकी अंग्रेजी के जरिये भक्ति प्रवाह किया। भक्तिवेदांत स्वामी भी सन्यासी होने के पहले सद् गृहस्थ थे पर कृष्ण भक्ति से जुड़ने पर वे पूरी तरह कृष्णार्पित होगये। विक्रम चौधरी चौबीस वर्ष की उम्र में लास ऐंजिल्स आये। उन्होंने सिनेमाबाजी की तरह स्टूडियो बनाया और योग प्रशिक्षण देने लगे। भक्तिवेदांत स्वामी के प्रदर्शक गुरू तो चैतन्य महाप्रभु थे पर योग पथ की दीक्षा विक्रम चौधरी ने किस योगी से ली ? अदालत में चल रहे मुकदमे में यह बात सामने नहीं आयी। इतना ही स्पष्ट हुआ कि वे एक योग ट्रेनिंग स्टूडियो का संचालन करते हैं। लोग योग और व्यायाम को जोड़ कर देखते हैं व्यायाम कीजिये पर योगाभ्यास करने से पहले योग दीक्षा गुरू से लीजिये। सच्चा गुरू गृहस्थी को योग दीक्षा नहीं देगा, उदाहरण विठ्ठल का है जिसने काशी पहुंच कर स्वामी रामानंद को कहा कि वह ब्राह्मण है तथा सन्यास लेना चाहता है। स्वामी जी ने पूछा कि क्या विवाहित हो ? विठ्ठल ने अपने आपको अविवाहित ब्रह्मचारी बताया। ज्योंही स्वामी रामानंद को सच्चाई रूक्मिणी के बयान से पता चली उन्होंने विठ्ठल को फिर से गृहस्थ बना डाला। विठ्ठल के दूसरे पुत्र संत ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता का मराठी संस्करण तैयार किया। ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्र का प्रिय ग्रंथ है। लोग ज्ञानेश्वरी पाठ करते हैं। 
          भारत में दो हाथ, दो पैर तथा वाणी का प्रयोग करने वाले समूहों को देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस व किन्नर इन छः वर्गों में बांट कर देखा जाता है। देव, दानव, दैत्य अपनी विरासत को संजो कर रखते हैं। गंधर्व, यक्ष, राक्षस व किन्नरों को दूसरी व तीसरी श्रेणी में रखा जाता है। गंधर्व व यक्ष उपदेव भी कहलाते हैं। इसका उदाहरण अफगानिस्तान है। इस्लाम प्रसार से पहले अफगान भूमि को उपगंधर्व भूमि के नाम से उपगंधर्व स्थान भी कहा जाता था। आर्यन अथवा ईरान इस्लाम उदय के पहले असुर(दैत्य भूमि) माना जाता था। जरूरत इस बात की है कि पारसीक धर्मावलंबियों पर गहन अध्ययन किया जाये। पारसीक धर्मावलंबियों की संख्या अब केवल हजारों में ही है वह भी हिन्दुस्तान में। संयुक्त राष्ट्र महासंघ ने महात्मा गांधी की जन्मतिथि 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर मनाने का संकल्प लिया है। आज जो इस्लामिस्ट जिहाद की बढ़त होरही है सीरिया में स्थिति नियंत्रण में नहीं आरही है इसलिये विश्व के सभी धर्मगुरूओं - विश्व के दो बड़े मजहबों इसाइयत और इस्लाम धर्मावलंबी समूह जिनकी संख्या दुनियां में सबसे ज्यादा है जो दोनों मजहब संगठित मजहब भी हैं इसाइयत व इस्लाम धर्म के विचार पोखर से संयुक्त राष्ट्र संघ विचार विमर्श करे। सभी मुख्य मुख्य धर्माें तथा वे लोग जो मजहब को अफीम मानते हैं अपने को निरीश्वरवादी अथवा अथीस्ट कहते हैं उनके विचार पोखर को भी विश्व में धार्मिक मतान्धता पर अंकुश लगाने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ का सहयोग करना चाहिये। योग और अध्यात्म इन दोनों मार्गों का अनुसरण तभी ज्यादा सटीक तरीके से संभव है जब अहिंसा की तरह मजहबी सामंजस्यता का मार्ग प्रशस्त हो। विक्रम चौधरी ने योग प्रशिक्षण के लिये जो रास्ता अपनाया यदि वे गृहस्थ के बजाय सन्यास मार्ग में चलते तो उन्हें अपने योग शिष्यों को यौन कदाचार का हर्जाना नहीं देना पड़ता व प्रतिष्ठा भी बनी रहती। इसलिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ योग मार्ग का रास्ता अपनाने वाले विचार पोखर को यह सलाह दे कि योग गुरू को तभी योग गुरू माना जायेगा जब वह गृहस्थ धर्म का अनुपालन करने के बजाय या तो आजन्म ब्रह्मचारी रहे या अगर गृहस्थी हो तो वानप्रस्थ-सन्यास मार्ग का अनुसरण करने पर ही योग गुरू का आसन ग्रहण करे। योग गुरू योग मंत्रणा देने वाले व्यक्ति पुरूष और स्त्री हो सकते हैं पर उन्हें सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा करनी होगी कि वे गृहस्थ नहीं हैं। दूसरी ओर एक सवाल और उठता है कि पाखंड पथ का अनुसरण कर बहुत से लोग ब्रह्मचांडाल अथवा ब्रह्मराक्षस पथ का अनुगमन करते हैं यह घोर राक्षसी प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति सृष्टि के प्रारंभ से ही चलती आरही है उसे मर्यादित करने के रास्ते सोचे जा सकते हैं पर ब्रह्मराक्षस मार्ग को एकदम से समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि यह मानव स्वभाव का ही हिस्सा है। 
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