Sunday, 6 March 2016

कामायनी का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद ही
दलित-गैर दलित का तात्कालिक हल है
मनु-शतरूपा आपको पुकार रहे हैं तथा कह रहे हैं-
मानव धर्माचरण करो

जयशंकर प्रसाद की कामायनी काव्य रचना आज हिन्दुस्तान के लिये अत्यंत सामयिक तथा मनु और शतरूपा के गृहस्थ को व्याख्यायित करने वाली काव्य साधना कामायनी का महत्व इसलिये बढ़ गया है क्योंकि भारत में दलित-गैर दलित खाई नित्य चौड़ी होती जारही है। वर्तमान मानवों में सृष्टि का स्त्रोत मनु शतरूपा का दाम्पत्य जीवन है। मनु शतरूपा की तीन कन्यायें आकूति, देवहूति और प्रसूति थीं। उन्होंने आकूति का विवाह रूचि से तथा प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से किया। देवहूति उनकी मध्यमा कन्या थी। वे देवहूति को लेकर कर्दम ऋषि के पास गये। उन्होंने कर्दम ऋषि से कहा - महर्षि कर्दम, हम अपनी मध्यमा कन्या देवहूति का विवाह आपसे संपन्न करने की लालसा लेकर आपके पास आये हैं। कर्दम ऋषि ने मनु शतरूपा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। देवहूति को कर्दम से जो नौ कन्यायें जन्मीं उनमें कला का विवाह मरीचि से, अनुसूया का विवाह अत्रि से, श्रद्धा का विवाह अंगिरा से, हवि का विवाह पुलत्स्य से, गति का विवाह पुलह से, क्रिया का विवाह कृतु से, ख्याति का विवाह भृगु से, अरून्धति का विवाह वशिष्ठ से तथा शांति का विवाह अथर्व से संपन्न किया। मनु शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत उत्तानपाद थे। आज जो तात्कालिक आवश्यकता यह प्रतीत होती है कि भारत का वर्तमान दलित चिंतन पोखर मनुवाद तथा ब्राह्मणवाद को दलित उत्कर्ष का सबसे बड़ा रोड़ा मानता है, ब्राह्मणवाद संबंधी उनके तर्क में प्रत्यक्ष व प्रच्छन्न दोनों व्यावहारिकी वास्तविकतायें अस्तित्व में हैं पर मनुवाद संबंधी दलित चिंतन पोखर पूर्णतः काल्पनिक तथा अनस्तित्व धारी विरोधाभास प्रतीत होता है। यदि भारत के वे लोग जिन्हें स्वराज्य से पहले अस्पृश्यता Untouchable कहा व माना जाता रहा उनके संबंध में अस्पृश्यता निवारण संबंधी महात्मा गांधी का रास्ता तथा भारत के तत्कालीन अस्पृश्य कहे जाने वाले समाज के सर्वोच्च हितचिंतक बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर की चिंतनधारा महात्मा गांधी से कुछ भिन्न थी पर दोनों उन्नीसवीं शती के प्रमुख व्यक्तित्त्वों का उद्देश्य अस्पृश्य कहे जाने वाले समाज का उत्कर्ष ही था। उद्देश्य एक सरीखा ही था परंतु रास्ते व सोच विचार के तरीके भिन्न भिन्न थे। महात्मा गांधी वैष्णव बनिया थे, गुजरात में वैष्णव समाज व जैन धर्मावलंबी ‘अहिंसा परमोधर्मः’ को अपना लक्ष्य मानने वाले दो वर्ण थे। बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर की मान्यता थी कि महात्मा गांधी के हरिजन उद्धार को गुजरात का वैष्णव समाज ही नहीं मानता था। उन्होंने अपने निष्कर्ष के पक्ष में अनेक उदाहरण दिये। महात्मा गांधी ने भी स्वयं स्वीकार किया कि गुजरात के वैष्णव, वामन, बनिया उनके अछूतोद्धार को दिल से नहीं मानते थे। दूधाभाई प्रकरण ने वैष्णव समाज को उद्विग्न किया पर महात्मा गांधी ने हार नहीं मानी। उन्होंने सनातन धर्मशास्त्र का मत ज्ञात करने के लिये एक सौ वर्ष पहले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना महोत्सव पर यह सवाल महामना मदनमोहन मालवीय के संज्ञान में प्रस्तुत किया। महामना ने ईमानदारी से कबूल किया कि वे भी परम्परा से छुआछूत मानते आये हैं। उन्हें यह ज्ञात नहीं कि क्या छुआछूत मानना सनातन शास्त्र सम्मत है ? महामना ने महात्मा गांधी से निवेदन किया कि आपके प्रश्न का सही सही निराकरण प्रवक्ता सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृष्णन ही कर सकते हैं क्योंकि वे सनातन धर्मशास्त्र के पारंगत विद्वान हैं। महात्मा को आशा की एक किरण दिखी उनकी अपनी मान्यता थी कि छुआछूत सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं हो सकती परंतु वे जीवंत प्रमाण चाहते थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उनकी शंका का समाधान करते हुए कहा कि छुआछूत तो परम्परा से मैं भी मानता आरहा हूँ परंतु यह सनातन धर्मशास्त्र सम्मत विधान नहीं है। कालांतर में सनातन धर्म में घुस आया महादोष है। सनातन धर्म के बारे में बाबा साहेब अंबेडकर की अपनी मान्यतायें थीं। वे सनातन धर्म को मजहब मानने के बजाय भारतीय जातियों का रहस्यवादी समुच्चय मानते थे। धर्मशास्त्र की व्याख्या में उनकी आस्था नहीं जमती थी पर वे इतना तो मानते ही थे कि भारत के पारम्परिक समाज की जातिवादी व्यवस्था से छुटकारा इस्लाम या ख्रिस्ती धर्म परिवर्तन से संभव नहीं है। उन्हें महात्मा गांधी का हरिजन सेवक संघनुमा कार्यक्रम भी दिखावा मात्र लगता था पर जो स्थितियां भारत में हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य को लेकर उभर रही थीं बाबा साहेब अंबेडकर ने महात्मा गांधी के प्रस्ताव जिसे ‘पूना पैक्ट’ कहा जाता है वह स्वीकार किया। बर्तानी हुकूमत तो चाहती थी कि भारत अनेक टुकड़ों में बंट जाये। मुसलमानों को उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रीयता का तोहफा दिया। वे सिखों व अस्पृश्यों के लिये भी स्वायत्तता देकर हिन्दुस्तान छोड़ने से पहले उसके टुकड़े टुकड़े करना चाहते थे। बाबा साहेब अंबेडकर ने बर्तानिया की इस चाल को समझा और हिन्दुस्तानियों को हिन्दुओं का देश, इस्लाम धर्मावलंबियों को इस्लाम देश, सिखों के लिये सिखों का देश तथा अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों के लिये पार्थक्य नीति का समर्थन नहीं किया। महात्मा गांधी के प्रस्ताव को आंशिक तौर पर स्वीकार कर जिस मध्यम मार्ग का अनुसरण किया उत्तर गांधी व उत्तर अंबेडकर युग में दलित व गैर दलित समाजों की जो आपसी खाई चौड़ी होती जारही है क्या उस खाई को पाटने के उपाय आज की पहली सामाजिक आवश्यकता है ? डाक्टर राधाकृष्णन एक सुलझे हुए विद्वान होने के समानांतर चाण्क्य सरीखे आन्वीक्षिकी विद थे। अंग्रेजी भाषा में ऐसे व्यक्तित्त्व को Statesman कहा जाता है। आन्वीक्षिकीविद षडविधा राजनीतिक राजनीतिज्ञ दीर्घकालीन रणनीति का प्रणेता होता है। तात्कालिक राजनीतिक हित-अहित का पूर्वाकलन कर लेता है इसलिये आज के भारत की पहली जरूरत तथाकथित मनुवाद पर कुतर्क के बजाय बोधगम्य तर्क पथ अपनाये जाने के लिये जयशंकर प्रसाद रचित कामायनी के पुनर्वाचन की पहली जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी काशी से लोकसभा के सदस्यताधारक व्यक्तित्त्च हैं। काशी में ही जयशंकर प्रसाद ने कामायनी रचना की। भारत के दलित विचारक, दलित साहित्यिक तथा दलित राजनीति करने वाले महानुभावों को मनु शतरूपा गृहस्थ की स्थिति को सटीक समझने के लिये कामायनी का पारायण करना चाहिये। जो लोग काव्य के निहितार्थ को हृदयंगम करने में कठिनाई महसूस करते हैं उन्हें कामायनी-साहित्य मीमांसा समझने की प्रेरणा देनी चाहिये। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अपने भाषा विभाग के मार्फत जिस तरह शंकराचार्य ने विष्णु सहस्त्रनाम की मीमांसा की आज कामायनी काव्य के सुबोध व सुगम मीमांसा की जरूरत है ताकि दलित चिंतकों सहित दलितों का विरोध करने वाले दलित विरोध की आग को निरंतर भड़काते रहने वाले व्यक्ति भी मनु शतरूपा सन्तति का आख्यान पढ़ें। मनुष्य व पशु शब्दों की व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि ‘मनुते इति मनुष्यः’ अर्थात मनन करके कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले व्यक्ति को मनुष्य कहा जाता है। मनुष्य दो हाथ, दो पैर व वाणी वाला व्यक्तित्त्व है। उसमें चिंतनशीलता है। दूसरी ओर चौपाया पशु है उसका नाम ही पशु इसलिये है कि ‘पश्यते प्रतिक्रियते इति पशुःदेखने पर प्रतिक्रिया करने वाला चौपाया पशु है इसलिये मनुष्य की मनन करने की क्षमता का आदर कीजिये उसे मनुवाद की काल्पनिक शत्रुता का आधार मत बनाइये। हिन्दुस्तान के दलित साहित्यकारों, दलित हितचिंतकों को उन्हें जो मनुष्यता मिली है जिस मानवीय दृष्टिकोण से वे विचार विमर्श करते हैं इसलिये मनुवाद के काल्पनिक शत्रु भाव का त्याग करें। भारत के तथाकथित दलित समाज का एकमात्र शत्रु ब्राह्मणवाद है। दलित चिंतको! ब्राह्मणवाद से निकलने का संकल्प लें। यह ध्यान में रहे कि ब्राह्मणवाद को मिटाने के लिये सबसे पहले जैन धर्म ने अपनी मुहिम चलायी। जैन धर्मावलंबी अपना आदि तीर्थंकर ऋषभ देव को मानते हैं। उनके चौबीस तीर्थंकरों में महावीर स्वामी चौबीसवें तीर्थंकर हैं। जैन धर्म ब्राह्मण धर्म को परास्त नहीं कर पाया क्योंकि दोनों में आचार प्रधानता थी। ब्राह्मण धर्म झुकाना जानता है और जरूरत पड़ने पर स्वयं भी झुकता है। आज जिसे दुनियां हिन्दू धर्म कहती है वह वास्तविकता में ब्राह्मण धर्म है। भारत तथा विश्व में जो व्यक्ति अपने आपको हिन्दू धर्मावलंबी कहता है वह वस्तुतः ब्राह्मण धर्मानुयायी है। जैन धर्म के पश्चात दूसरा वेद विरोधी धर्म बौद्ध धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को ब्राह्मण धर्म ने दशावतार श्रेणी में नवें अवतार का स्थान दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा - चातुर्वण्य मया सृष्टम् गुणकर्म विभागशः। महात्मा गांधी भारत में अकेले राजनेता थे जिन्होंने ऊर्ध्वबाहु होकर घोषणा की कि वे वर्णव्यवस्था व वर्णाश्रम व्यवस्था पर आस्था रखते हैं। महात्मा गांधी द्वारा वर्णाश्रम व्यवस्था के लिये की गयी उनकी घोषणा को बाबा साहेब अंबेडकर सहित महात्मा के कटु और तीक्ष्ण आलोचकों को एक सुनहरा अवसर उपलब्ध कराया पर गांधी आरोप श्रंखलाओं से प्रभावित होने वाले व्यक्तित्त्व नहीं थे। महात्मा गांधी मानते थे कि ब्राह्मण धर्मावलंबी व्यक्ति ही भारत के गरीब समुदाय को स्वयं गरीबी ओढ़ कर गरीबी और दरिद्रता के अभिशाप से छुटकारा दिलाने वाला अगुआ बन सकता है। भगवद्गीता में वर्णों के कर्म विभाग की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं - शम, दम, शौचम्, क्षांतिः आर्जव, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य - वेद व ईश्वर के अस्तित्व को मानना ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म बताया। उन्होंने ब्राह्मणों के लिये जिन आठ कर्मों को संपन्न करने का मार्ग सुनिश्चित किया वह व्यक्तित्त्व को संस्कारवान बनाने के गुरूमंत्र हैं। आज भारत में तुलसीदास रचित रामचरित मानस जो मूलतः अवधी भाषा में लिखा गया आसेतु हिमाचल तुलसी का रामचरित मानस भारतीयों को प्रभावित करता है। रामचरित मानस से भारत के वे दलित भी प्रभावित हैं जिन्होंने पाश्चात्य भाषा अंग्रेजी के जरिये अपना ज्ञान स्त्रोत संपन्न नहीं कर सका है। तुलसी के रामचरित मानस ने भारत के उस मानव समाज को प्रेरित किया जो संस्कृत भाषा नहीं जानता था अपितुु प्राकृत अथवा तद्भव भाषा का सहारा लिया करता था। रामचरित मानस के दोहा-चौपाई आपको भारतीयों के द्वारा गाई जाती रही सुनने में आती है। भारतीय समाज के लिये रामचरित मानस प्राणवायु है।
बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर ने अपना कुल गोत्र नाम अंबेडकर अपनाया। महाराष्ट्र में अंबेडकर कुल गोत्र नाम ब्राह्मण समुदाय द्वारा प्रयुक्त होता है। ब्राह्मणवाद तथा महात्मा गांधी के हरिजन सेवावाद का बाबा साहेब ने नख-शिख आकण्ठ विरोध किया पर शैक्षिक पथ में जो मार्गदर्शन अपने गुरूजनों से उपलब्ध हुआ उस मनोवृत्ति को उन्होंने तिलांजलि नहीं दी। तमिलनाडु के वैष्णव-शैव मतावलंबी ब्राह्मण समूह अय्यंगर व अय्यर ब्राह्मणवादी विग्रह का उन्होंने गहरा अध्ययन किया। महाराष्ट्र उनकी कर्मभूमि थी, मराठी उनकी मातृभाषा थी। मराठी ब्राह्मणवाद को बाबा साहेब ने नजदीक से अग्नि परीक्षण किया पर उन्हें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक चिंतन पोखर धारा से सैद्धान्तिक विरोध नहीं था। आज की तात्कालिक जरूरत भारत के बहुसंख्यक लोगों के मजहबी धर्मशास्त्र की संवैधिक और कानूनी व्याख्या की आवश्यकता है। पहली जरूरत यह महसूस होती है कि दलित समाज को यह विश्वास दिलाया जाये कि अस्पृश्यता या छुआछूत मानना यदि शास्त्र सम्मत नहीं है जैसा सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को कहा। छुआछूत मानना, छुआछूत मानसिकता के कारण भारतीय समाज के वर्तमान में सप्तमांश पर लालू प्रसाद यादव का मत सुना जाये तो आज भारत में दलित जनसंख्या कुल आबादी का सातवां हिस्सा नहीं, भारत की कुल आबादी का कम से कम तीसरा हिस्सा लालू प्रसाद यादव की सम्मति में दलित है। कोई हर्ज नहीं यदि बिहार के राजनीतिक सार्वभौम व्यक्तित्त्व के धनी लालू प्रसाद जी का आकलन सटीक भी हो सकता है। घृणा व विद्वेष की क्रोधाग्नि को बढ़ाया न जाये इसके लिये 1. अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है इस गांधी धारणा का कानूनी निर्णय देश की दलित - गैर दलित चौड़ी होरही खाई को पाटने के लिये यह पहली आवश्यकता है कि अस्पृश्यता का स्थायी निवारण तभी संभव है जब यह परख लिया जाये कि अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत नहीं है। 2. दलित मंदिर प्रवेश भी शास्त्र सम्मत नहीं है क्योंकि धर्मशास्त्रानुसार ईश्वरत्व, देवत्व का आह्वान किया जाता रहा है। मूर्ति पूजा के सबसे बड़े आलोचक स्वामी दयानंद सरस्वती देवता के आवाहन, देवता में प्राण संचारण, आवाहन-विसर्जन प्रक्रिया को ज्यादा तार्किक मानते थे। जब मूर्ति पूजा ही भारत की मूल शास्त्र सम्मत अवधारणा नहीं है, मूर्ति पूजा कालांतरीय व्यवहार है इसलिये छुआछूत निवारण और दलित मंदिर प्रवेश सरीखे विषय पर तार्किक चर्चा और इन दोनों बिन्दुओं पर भारत के पांचों शंकराचार्यों का मत सुप्रीम कोर्ट पूरा करे। देश के जो लोग छुआछूत मानने के पक्षधर हैं उनकी बात भी सुनी जाये। यदि उनके पास छुआछूत मानने के शास्त्रोक्त प्रमाण हों तो उन पर बहस की जाये। सभी पक्षों को सुनने उनके तर्कों की पड़ताल करने तथा धर्मशास्त्र में छुआछूत, मंदिर प्रवेश तथा धर्मान्तरण के बारे में शास्त्र सम्मत उदाहरण न मिले, भारत की सर्वोच्च अदालत को प्रश्नगत विषय में अपना विवेकसम्मत निर्णय देने की प्रार्थना की जाये ताकि जिन्हें दुनियां हिन्दू धर्मावलंबी मानती है उन्हें हिन्दू बताती है इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का खुला चेहरा सामने आये इसलिये मनुवाद को जिस किसी भी दलित मनीषी ने बांह उठा कर उद्घोष किया कि मनुवाद दलित उत्कर्ष का पहला रोड़ा है संभव है वह दलित मनीषी अब धरती पर नहीं रह गये हों पर उनकी गाथा गाने वाले दलित विचारकों को विचार करना ही चाहिये कि वे भी मनुष्य हैं इसलिये मनु शतरूपा गृहस्थ की जो छीछालेदर वे करते आरहे हैं उस पर पुनर्विचार करें। अपनी मनुष्यता का त्याग न कर दलित विरोधी हिन्दुस्तानियों से लोहा लेने का इतर रास्ता अपनायें। दलित विरोध करने वाले गैर दलित जो अपने आपको ऊँचा प्रमाणित करने का कोई भी अवसर नहीं खोते उन्हें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा ‘मानव मात्र बंधु हैं’ यही बड़ा विवेक है। पुराण पुरूषोत्तम पिता प्रभु एक हैं इसका पुनर्वाचन करें।
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