भारत का राष्ट्रीय पंचांग - नव वर्ष 21 मार्च से मनाया जाये।
21 मार्च को रात दिन बराबर बारह घंटे के ही होते हैं।
(भारतीय शालिवाहन शक संवत् शक, हूण, कुषाण, पौण्ड्र, अंध्र तथा हरियाणा, उ.प्र. के जाटों का शक्ति स्त्रोत है। आधुनिक भारत का दर्पण शक संवत् है। जिन्हें आज एस.सी., एस.टी., ओ.बी.सी. कहा जाता है उनका भी शक्ति स्त्रोत शक संवत् ही है।)
नवसृजित राज्य उत्तराखंड का एक बड़ा भाग कुमांऊँ या कूर्मांचल के नाम से विख्यात है जिसमें एक जिला पिथौरागढ़ नाम से प्रसिद्ध है। राय पिथौरा अथवा पृथुराय गढ़ के नाम से विख्यात एक किला भी यहां है जिसे आजकल लोग गुरखों का किला कहते हैं परन्तु वस्तुतः यह किला गढ़ राय पिथौरा अथवा पृथु राय गढ़ है। पूर्व काल में इस किले से पश्चिम की ओर ब्राह्मणों के दो गांव थे जिनमें किले से लगे हुए गांव को पांडे गांव तथा बजेठी से आने वाले गधेरे का पार्श्ववर्ती गांव कुजौली कहलाता था। इस गांव के माधवानंद उप्रेती ने इलाहाबाद से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अल्मोड़ा की ऐजुकेशन कमेटी के प्रमुख सोबन सिंह जीना ने माधवानंद उप्रेती को मिडिल स्कूल बेरीनाग में अंग्रेजी का अध्यापक नियुक्त कर दिया। यह घटना सन 1944 की है। माधवानंद जी के चाचा पंडित रघुनाथ उप्रेती तब वहां हेडमास्टर थे। माधवानंद उप्रेती अपने विद्यार्थियों को लगनपूर्वक अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। विलायत के स्कूलों में गायी जाने वाली कविता का हिन्दी अनुवाद बताते हुए कहते थे -
तीस दिनों का ज्यों माह सितंबर वैसे ही अप्रेल, जून, नवंबर।
अट्ठाईस, उन्तीस फरवरी जानो, शेष महीने इकतीस के मानो।।
अंग्रेजी भाषा में यह गीत इस प्रकार गाया जाता है -
Thirty days hath September, April, June and November
Thirty One hath all the rest except for February dear which has 28 & 29 in a leap year.
गुरू माधवानंद जी उपरोक्त ब्रिटिश अंग्रेजी में गाया जाने वाला गीत भी अपने शिष्यों को सुनाया करते थे। यह घटना तब की है जब हिन्दुस्तान के लोगों की लिंग्वा फ्रांका सधुक्कड़ी हुआ करती थी। शांतिलाल त्रिवेदी की पत्नी भक्ति त्रिवेदी का कहना था कि महात्मा गांधी से निरंतर पत्र व्यवहार करने वाले शैल गांव के भवानी दत्त जोशी भक्ति से खड़ी बोली में बात नहीं करते थे। कहते थे, आप गुजराती में ही अपनी बात कहें और मैं कुमइयां में आपसे बात करूंगा। वस्तुतः जोशी हिन्दी लिखना पढ़ना तो जानते थे पर धाराप्रवाह हिन्दी बोल नहीं पाते थे। भक्ति त्रिवेदी को शुरू शुरू में जोशी जी की बात अटपटी लगती थी पर एक अर्से के बाद दोनों अपनी अपनी भाषा बोलते आनंदित महसूस होते थे। शांतिलाल त्रिवेदी ने अस्कोट के खायकरों व सिरतानों की दुःख भरी दास्तान पंडित नेहरू को भेजी थी। पंडित नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया में अस्कोट से चौकोट तक एक अध्याय में कुमांऊँ के प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक खाका खींचा था। डाक्टर लोहिया ने भी अस्कोट व चौकोट प्रसंगों पर पंडित नेहरू का ध्यानाकर्षण किया था। जब शांतिलाल त्रिवेदी अस्कोट के गांव गांव घर घर जाकर ब्यौरा एकत्र कर रहे थे डाक्टर लोहिया ने घोषित किया था कि तिब्बत का कैलास व मानसरोवर इलाका मालगुजारी अस्कोट के रजवार को मिलती थी। इसका अहसास पंडित नेहरू को भी था इसलिये उन्होंने चौदहवें दलाई लामा को भारत में रह कर अपनी सरकार संचालन की सुविधा दी थी। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को सोवियत रूस ने सन 1918 में अंगीकृत किया उससे पहले रूस भी जूलियन कैलेंडर को ही मानता था। राष्ट्रवादी व सांस्कृतिक चीन एवं चीन के लोगों की जन भाषा मंदारिन थी। मंदारिन वाङमय को नजरअन्दाज करना माओ त्से दुंग को ऐसा लगा जैसे जन भाषा त्याग करना धरती से अपना संबंध तोड़ना है इसलिये राष्ट्रवादी च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादिता पर माओ ने ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अपना कर हमला किया पर माओ और उनके पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लोग चीन के जनमानस में घर कर गये। अमृत संस्कृति को नेस्तनाबूद नहीं कर पाये। जब तक चीन की कम्यूनिस्ट सरकार में माओ और उनके अंतरंग साथियों का बोलबाला था वे जबरन तिब्बत तथा वामे दुनियां सिक्यांग पर कब्जा बनाये रहे पर दलाई लामा सांस्कृतिकता को समाप्त नहीं कर सके। परम पावन चौदहवें दलाई लामा को निस्तेज करना तो दूर रहा मुख्य चीन भूमि में क्षीर सागर के अस्तित्व तथा क्षीर सागर मंथन से प्राप्त अमृत का प्रभाव चीनी जनमानस पर यथावत बना रहा जो 8 फरवरी 2016 के दिन प्रकट रूप से सामने आगया। माओ त्से दुंग ने चीनी संस्कृति को दुत्कारा, ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अपना कर चीन को परम पावन पोप के ऐंजिकल मुहिम से जोड़ डाला जब कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने शक संवत को राष्ट्रीय पंचांग का सूत्रधार घोषित करते हुए 21 मार्च के दिन को भारत राष्ट्र का नया वर्ष, नये वर्ष का पहला दिन घोषित कर डाला। आचार्य नरेन्द्र देव ने गहन अध्ययन व परिश्रमपूर्वक श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवे स्कंध में वर्णित भुवनकोशानुवर्णन, जंबू द्वीप वर्णन, समुद्र वर्ष सन्निवेश परिमाण लक्षण, ज्योतिःचक्र वर्णन, शिशुमार संस्था वर्णन, स्वर्ग मर्यादा निरूपण, भू विवर विधुे वर्णन, सात अध्यायों में ब्रह्माण्ड विश्लेषण संपन्न किया है। भारत में शक संवत् से पहले विक्रम संवत् चालू था। आज भी भारत के कई हिस्सों में विक्रम संवत् ही प्रभावी है। गुजरात में विक्रम संवत् का पहला दिन बालि प्रतिपदा या गोवर्धन प्रतिपदा को माना जाता है जबकि शेष भारत में विक्रम संवत् का पहला दिन महाराष्ट्र में गुडि पड़वा, द्रविड़ देश में युगादि अथवा उगादि, गंगा-जमुना मैदान में संवत्सर पड़वा तथा सिंध के लोग चैती चांद के रूप में संवत्सर पड़वा मनाते हैं। भारतीय आध्यात्मिक वाङमय के अनुसार संवत्सर पड़वा सृष्टि सहित कल्पादि का प्रारंभ दिन है। बारह राशियों में मीन राशि बारहवीं राशि है। अमांत - वत्सरी - पूर्ण वत्सरी अमावस के अगले दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को संवत्सर पड़वा मनाया जाता है। उत्तर भारत चांद्रमास को पूर्णिमांत मान कर चलता है जबकि दक्षिण भारत का चांद्रमास व चांद्रवर्ष को अमांत मानता है। जो अमांत पर्व आसेतु हिमाचल भारत में सर्वत्र मनाये जाते हैं उनमें इलाहाबाद जिले में मनायी जाने वाली मौनी अमावस, पूर्ण वत्सरी अमावस, चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस, जेठ के महीने की अमावस, उत्तर भारत में वट सावित्री अमावस के तौर पर मनायी जाती है जब कि दक्षिण भारत में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट सावित्री पूर्णिमा कहा जाता है। भादो की अमावस समूचे देश में कुशोत्पाटनी अमावस कही जाती है। आश्विन महीने की अमावस को महालया पितृ विसर्जन अमावस्या कहा जाता है जबकि कार्तिक अमावस्या दीपावली-महालक्ष्मी अमावस्या मानी जाती है। उत्तर भारत में पूर्णिमांत चांद्र मास मनाये जाने व दक्षिण में अमांत चांद्रमास मनाये जाने में कालातंर परिवर्तन यह होता है कि चैती अमावस को दक्षिण में फाल्गुनी अमावस, वैशाखी अमावस को चैती अमावस, जेठ की अमावस को वैशाख अमावस, आषाढ़ अमावस को जेठ अमावस, सावन की अमावस को आषाढी़ अमावस, भाद्र की अमावस को श्रावणी अमावस तथा महालया अमावस को भाद्र अमावस, दीपावली को आश्विन अमावस, अगहन अमावस को कार्तिक अमावस, पौषी अमावस को अगहनी अमावस, माघी अमावस याने मौनी अमावस को पौषी अमावस तथा फाल्गुनी अमावस को माघी अमावस व चैती अमावस या पूर्ण वत्सरी अमावस को फाल्गुनी अमावस कहा जाता है। मेष संक्रांति को तमिलनाडु वर्ष का प्रथम दिवस मानता है। कर्णाटक, केरल तथा आंध्र में भी मेष संक्रांति वर्ष का पहला दिन है। सौर वर्ष मेष संक्रांति को शुरू होता है। पंजाब में इसे वैशाखी, असम में बिहू तथा कुमांऊँ में विषु नाम से जाना जाता है। मेष और तुला संक्रांति को दिन व रात बराबर होते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण ने ज्योतिःचक्र में उद्गान किया -
यदा मेष तुलयो वर्तते तदा अहोरात्राणि समानानि भवंति, यदा वृषभादिषु पंचसु च राशिषु चरति तदा अहोरात्राणि वर्धन्ते हृसति च मासि मास्यकेका घटिका रात्रिषु यदा वृश्चिका दिषु पंचसु वर्तते तदा अहोरात्राणि विपर्ययाणि भवंति।
आचार्य नरेन्द्र देव ने जो संस्तुति की उसके अनुसार 21 मार्च को मेष संक्रांति तथा 23 सितंबर को तुला संक्रांति मनायी जानी चाहिये क्योंकि इन दोनों दिन रात दिन बराबर होते हैं। भारत सरकार ने जो राष्ट्रीय पंचांग निर्धारण किया है उसके अनुसार 21 मार्च को राष्ट्रीय चैत्र मास का पहला दिन, राष्ट्रीय संवत् का नया साल घोषित किया है जबकि 21 मार्च को मेष संक्रांति घोषित किया जाना चाहिये था इसलिये राष्ट्रीय पंचांग को प्रभावशाली बनाये जाने के लिये भारत सरकार को विभिन्न विश्वविद्यालयों के लोक भाषा विभागों, लोक मान्यताओं तथा ज्योतिषीय व खगोल शास्त्र के अनुसार भारत की संविधान सम्मत लोकभाषाओं के प्रतिष्ठित विद्वानों को आहूत कर लोकमान्यताओं, परम्पराओं का अध्ययन कर लोकभाषाओं को उनकी प्रतिष्ठा बरकरार रखते हुए राष्ट्रीय पंचांग में जो विसंगतियां रह गयी हैं उनका निराकरण करने देश के विभिन्न पंचांग निर्माताओं की मान्यताओं को स्वीकार करते हुए उनसे अनुरोध किया जाना चाहिये कि 1. काशी 2. नवद्वीप 3. अवंति 4. पुरी 5. कांचि 6. श्रंगेरी 7. द्वारका 8. पुणे स्थित भाडारकर शोध संस्थान 9. कुरूक्षेत्र 10. कश्मीर 11. हिमाचल 12. केदार खंड गढ़वाल 13. मानस खंड कुमांऊँ 14. सप्त शैल तिरूपति 15. जैन 16. बौद्ध 17. सिख 18. रामकृष्ण मिशन 19. वाराणसी विद्वत् परिषद सभी संबंधित समूहों का परामर्श लिया जाकर राष्ट्रीय पंचांग को दोष रहित कालांतरण (Calander) का स्वरूप दिया जाना चाहिये।भारतीय पंचांग गवेषणा का उज्ज्वल पक्ष यह है कि इस देश में चांद्रमास व सौरमास के समानांतर चांद्रवर्ष व सौरवर्ष में चांद्रमास 29 अहोरात्र के साथ साथ चंद्रमा के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण में प्रति माह कुछ घड़ियां (साठ घटी का एक अहोरात्र होता है। घंटों के हिसाब से उसे 24 घंटों में बांटा गया है। एक घंटे में अढ़ाई घड़ी याने 2 घड़ी 30 पला माने जाते हैं।) घट बढ़ जाया करती हैं। वर्ष भर में यह अंतर 10 दिन से कुछ ज्यादा घड़ियां रहता है। भारत में भारत का ज्योतिष जगत प्रत्येक चौथे वर्ष अधि मास या मल मास नाम से शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की गणना करते हुए दो संक्रांतियों के बीच में अमावस्या न आवे तो उसे मल मास या अधि मास कहा जाता है। इस्लाम धर्मावलंबी समाज का पहला महीना मुहर्रम कहा जाता है। सन 2015 में मुहर्रम का पहला दिन, इस्लामी वर्ष का पहला दिन 15 अक्टूबर 2015 को था तथा हिजरी सन् 1437 दो अक्टूबर 2016 तक रहेगा। 3 अक्टूबर 2016 के दिन हिजरी सन् 1438 का पहला दिन याने नया साल मुबारक मनाया जायेगा। भारतीय पंचांग निर्धारण की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक उन्नीस वर्ष में तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण समान होते हैं। भारत में आजादी के पश्चात देश में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार को नया रूप मिला है। भारत के लोग बर्तानी अंग्रेजी व अमरीकी अंग्रेजी की पारंगति तो चाहते हैं पर भारतीयों की अंग्रेजी देसी भाषाओं के उच्चारण से जुड़ी हुई है। हिन्दी भाषी जो अंग्रेजी बोलते हैं उसे भाषाविद लोग हिंगलिश कहते हैं। इसी तरह देश की विभिन्न भाषाओं व लिपियों के बावजूद अंग्रेजी के प्रति आकर्षण दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है। अंग्रेजी भाषा में भाषायी निपुणता भाषा की सही सही समझ बूझ एक विषय है जिस पर आज हमारा ध्यान कम है। कोेशिश यह है कि हम लोग नब्बे दिनों में अंग्रेजी बोलने में दक्ष हो जायें। भारत की तात्कालिक जरूरत भाषायी सामंजस्य की है। देसी भाषाओं में लिपियों के पार्थक्य के बावजूद कौन कौन समानतायें हैं, भाषाविदों को भारतीय भाषाओं को एक दूसरे का पूरक बनाने की जरूरत है।
भारत पर बर्तानी राज से पहले इस्लामी सल्तनतों का राज रहा। सिंध में सिंध के लोगों ने अरबी लिपि को अपना कर सिंधी भाषा अरबी में लिखी जाने लगी। यह क्रम लगभग भारत विभाजन पर्यन्त यथापूर्व चलता रहा। सिंध से भारत आये सिंधी भाषी हिन्दू धर्मावलंबियों व नानकपंथियों ने देवनागरी लिपि अपनायी। अब भारत के सिंधी भाषी जहां कहीं भी रहते हैं अपनी भाषा के लिये नागरी का प्रयोग करते हैं। सिंधी एक जीवंत भाषा है। सूरत में मुगल सल्तनत के फरमान से ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार शुरू होने पर कंपनी बहादुर के हुक्मरान ने रोमन लिपि में उर्दू लिखना शुरू किया। बर्तानी शासन कंपनी बहादुर के शासन के साथ साथ गिना जाये तो भारत में लगभग 200 वर्ष तक रहा। बर्तानी शासन ने उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में थाना व जिला स्तर पर फारसी लिपि वाली उर्दू भाषा को ही महत्ता दी। हर जिले में जिला मजिस्ट्रेट का तात्कालिक सूचना उपलब्ध कराने के लिये इंगलिश आफिस हुआ करता था। यह क्रम भारत विभाजन तक चलता रहा। बहुत से ऐतिहासिक विवेचनकर्ता व्यक्तियों का मानना है कि हिन्दुस्तान का विभाजन उत्तर प्रदेश के उर्दू भाषी शहराती मुसलमानों, मुंबई के मुसलमानों का समर्थन मिलने के कारण बहुत से मूलतः गुजराती भाषी शिया मुसलमान मोहम्मद अली जिन्ना ने बर्तानी सरकार की मदद भारत के उर्दू भाषी मुसलमानों की प्रेरणा से उपलब्ध किया। मोहम्मद अली जिन्ना को भारत के विभाजन समर्थक इस्लाम धर्मावलंबी - कायदे आजम कहा करते थे। मोहम्मद अली जिन्ना एक अच्छे वकील भी थे। उनके मन में यह बात घर कर गयी थी कि हिन्द का मुसलमान वामन-बनिया चाकरी नहीं करेगा। भारत विभाजन हुए आगामी 14.08.2016 को 69 वर्ष हो जायेंगे। इंदिरा गांधी की तत्परता से पूर्व पाकिस्तान चौथाई शताब्दी तक पाकिस्तान नहीं रह पाया। बांग्ला भाषी इस्लामी नेतृत्व ने पाकिस्तान के विरूद्ध बगावत कर डाली। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक दक्षता से पाकिस्तान तोड़ डाला। सिंध, सीमा प्रांत, बलूचिस्तान व पंजाब में किसी भी प्रांत की लोकभाषा उर्दू नहीं है पर पाकिस्तान उ.प्र. के हिन्दुस्तानी मुसलमानों की मादरे जबान उर्दू को पाकिस्तान की राजभाषा घोषित किये हुए है। यह भाषायी बवंडर फूटने ही वाला है। बलूच, पख्तून, सिंधी व पंजाबी मुसलमान अपनी अपनी मादरे जबान का सहारा आने वाले 5-6 वर्ष में लेने ही वाले हैं। भारत ने अपना राष्ट्रीय वर्ष शक संवत् घोषित किया है। लोक जाग्रति आने ही वाली है। भारत का हिन्दू जाट, सिख जाट तथा भारत व पाकिस्तान में मुसलमान जाट चेतना जाग्रत होरही है। वे पहले जाट बाद में सिख, हिन्दू या मुसलमान हैं। जाटों ने भारत में आर्यसमाज की यशो पताका फहराई। स्वाधीनता की लड़ाई में जाट आर्यसमाजी अग्रणी थे। अब वे शक संवत् के प्रवक्ता हैं। उनमें जो नयी चेतना जाग रही है वह भारत विभाजन को निष्क्रिय करने की अद्भुत शक्ति रखती है। भगवद्गीता में मनुष्य- कर्त्तव्य पथ का विश्लेषण योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अपने संवाद में व्यक्त किया। विश्व के कई प्रतिष्ठित विद्वान भगवद्गीता को हिन्दू क्लासिक संज्ञा देते हैं जबकि भगवद्गीता का संवाद मानव मात्र के व्यापक हित का मार्ग है। साथ ही मनुष्य जीवन कर्मानुबंधन है जिसे पाश्चात्य तरीके में हम Bondage Karma अथवा कर्मविपाक भी कह सकते हैं। चीन के उद्धारकर्ता माओ त्से दुंग और भारतीय लोक नेता पंडित नेहरू समकालीन विश्व नेतृत्व के प्रतीक थे। पंडित नेहरू की नेतृत्व शक्ति संपात के पीछे महात्मा गांधी की स्थितप्रज्ञता थी जबकि माओ का लक्ष्य पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जरिये चीन की राष्ट्रवादिता को ध्वस्त कर कम्यूनिस्ट विचारधारा में आधिपत्य स्थापित करना था। पोप ग्रेग्रेरियन XIII ने जूलियन कैलेंडर में संशोधन कर उसे ईस्टर से जोड़ने का उपक्रम किया। जो नया कैलेंडर अक्टूबर 1582 में प्रचलन में आया उसे परम पावन पोप के नाम पर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर कहा गया। माओ यू.एस.एस.आर. की प्रगति से प्रभावित थे। सोवियत रूस ने अपने देश में प्रचलित जूलियन कैलेंडर के बदले ग्रेग्रेरियन कैलेंडर 336 वर्ष पश्चात अपनाया। माओ ने ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ का अनुकरण किया। माओ का ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अपनाने में प्रत्यक्ष उद्देश्य च्यांग काई शेक के विरोध में रहना दूसरा अपने नियंता सोवियत रूस का अनुकरण करना था जबकि भारत के जन नेता पंडित नेहरू ने भारतीय राष्ट्रीय पंचांग शक संवत् को ज्यादा राष्ट्र हित साधक माना। माओ व पंडित नेहरू में यही दृष्टिभेद था। नेहरू भारतीय राष्ट्रीयता के गांधी विचार पोखर थे जबकि माओ का लक्ष्य विस्तारवादी व एकतंत्रवादी था। इसलिये पंडित नेहरू की कल्पना का राष्ट्रीय पंचांग जो 21 मार्च को भारतीय दृष्टि का साल का पहला दिन मानता है। नेहरू निर्धारित सारे फैसले भारत सरकार की फाइलों में दबे पड़े हैं। लोग विश्वव्यापी ग्रेग्रेरियन कैलेंडर से चिपक गये हैं इसलिये राष्ट्रीय पंचांग को गांधी ड्योढ़ी शताब्दी वर्ष 2019 तक भारतीय राष्ट्र का साल का पहला दिन 21 मार्च को व्यवहार में लाने की एक मुहिम चलानी होगी। इस में जो व्यवधान व बाधकतायें मुंह बांये खड़ी हैं उनका समाधान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महाशय को यथाशीघ्र संपन्न करना होगा। सरकारी तौर पर यह घोषित करना तात्कालिक राष्ट्रधर्म है कि मेष संक्रांति प्रति वर्ष 13 अप्रेल के बजाय 21 मार्च को ही मनाई जायेगी। भारत के आस्थामूलक धर्म मानने वाले बहुसंख्यक हिन्दुस्तानियों ने आचार्य नरेन्द्र देव की सही संस्तुति को नकार डाला। समाज चिंतनधारा को बदलने में समय लगता है इसलिये सबसे पहली जरूरत 21 मार्च को शक संवत् का पहला दिन मानना शुरू किया जाना चाहिये व उसे सरकारी मेष संक्रांति कहा जाना चाहिये। मेषादि मीन पर्यन्त द्वादश राशियां हैं। जहां तक युगारंभ, युगादि, उगादि, गुडि पड़वा, चैती चांद व संवत्सर प्रतिपदा की सांस्कृतिकता का चांद्र पर्वीय महोत्सव है भारत की जनता उसे यथापूर्व मनाती रहेगी परंतु भारतीय सौर मास भारतीय आर्थिक वर्ष घोषित कर पहली अप्रेल के बजाय 21 मार्च, याने मेष संक्रांति को वित्तीय, न्यायिक सौरमान मानते हुए भारतीय संसद में वित्त मंत्री महाशय द्वारा बजट संशोधित राष्ट्रीय पंचांग जिसे वर्तमान में राष्ट्रीय फाल्गुन मास की कुंभ संक्रांति माना जाता है उसे बारह महीनों में अंतिम महीना, मीनार्क - चैत्र मासारंभ घोषित कर प्रति वर्ष बजट वर्तमान में 20 फरवरी को फाल्गुन माह की संक्रांति मानते हुए वर्तमान 1 फाल्गुन तथा प्रस्तावित संशोधनीय पंचांग मास चैत्र संक्रांति के पहले दिन 20 फरवरी को प्रस्तुत किया जाना संकल्पित किया जाये ताकि 21 मार्च याने राष्ट्रीय शक संवत् की मेष संक्रांति के दिन से तथा सौरमान वर्ष, वित्त वर्ष तथा राजव्यवस्था वर्षारंभ शुरू हो।
राष्ट्रीय पंचांग तथा भारत के विभिन्न राज्यों सांस्कृतिक तथा आस्थाप्रधान परिपाटियों का, समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा अपनायी गयी सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को मानकीकृत करने के लिये विभिन्न राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों, आस्थामूलक संगठनों तथा भाषायी संस्थानों को परामर्श से आधुनिक भारत के राष्ट्रीय पंचांग को स्थायित्व दिलाने का मुहूर्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुनिश्चित करना होगा। प्रथम प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने शासनकाल में विश्वास में लेकर उनके परामर्श से ही राष्ट्रीय महत्व की परम्पराओं को सुनिश्चित करना युग की पुकार है। नरेन्द्र मोदी महाशय में वह कूवत है जो पंडित नेहरू में विद्यमान थी। पंडित नेहरू को विभाजन जन्य विसंगतियों को पटरी पर बैठाने में ज्यादा समय लगाना पड़ा। उन्हें अपने राजनैतिक दल का समर्थन था। आंतरिक मतभेदों के बावजूद पंडित नेहरू सबको साथ लेकर चलने वाले नेता थे। वह खूबी वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में भी विद्यमान है। पंडित नेहरू धाराप्रवाह हिन्दी भाषण कर्ताओं के प्रशंसक थे। वे स्वयं अंग्रेजी में सोचते तब हिन्दी में बतियाते थे। उन्होंने सदा सर्वदा डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया तथा अटल बिहारी वाजपेयी की हिन्दी भाषण कला को सराहा। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी स्वयं उत्कृष्ट हिन्दी आशुवक्ता तथा अपनी बात को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करने वाले वाक्य विशारद हैं। उनसे भारत के जन जन को व्यापक राष्ट्र हित के समानांतर व्यापक जनहित तथा दुर्बल, दलित, विकलांग तथा गरीबी से पीड़ित लोगों के लिये उनके मन में निश्चित ठौर है। वे सहानुभूति रखने वाले महाविभूति भी हैं। राजनीतिक मैदान में धावक बनने के इच्छुक लोग नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से प्रेरणा ले सकते हैं। अब ग्रेग्रेरियन XIII जो परम पावन पोप पदासीन व्यक्तित्त्व थे उन्होंने ग्रेग्रेरियन कैलेंडर का प्रारंभ 15 अक्टूबर 1582 को किया। यूरप के राष्ट्र राज्यों में फ्रांस, नीदरलैंड, डच रिपब्लिकन में ही अंगीकृत कर लिया था। बर्तानिया ने सन् 1752 में, स्काटलैंड ने सन् 1752 में, डेनमार्क ने सन् 1700 में, रोमन साम्राज्य ने सन् 1700 में, स्वीडन ने सन् 1753 में अंगीकृत किया। सोवियत रूस ने सन् 1917 की रूसी क्रांति के पश्चात अगले साल 1908 में ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अपनाया। चीन यद्यपि मूलतः ईसाई धर्मावलंबी नहीं है उसने कम्यूनिस्ट शासन शुरू कर सबसे पहले काम ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को चीन का सरकारी कैलेंडर घोषित करना था जबकि चीन के समाज द्वारा अमृतमय कैलेंडर लंबे अर्से से मनाया जारहा था और चीन का नया साल इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व का प्रतीक था। कम्यूनिस्ट चीन ने चीनी सभ्यता, चीनी संस्कृति तथा चीनी राष्ट्रधर्मिता पर अपने पारंपरिक चीनी कैलेंडर को त्याग कर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को अपनाना चीन के कम्यूनिस्ट शासन की महान भूल थी जिसका खामियाजा कम्यूनिस्ट चीन को देर सवेर भुगतना ही होगा। परम पावन ग्रेगोरी XIII के सम्मान में चार सौ सैंतीस वर्ष पहले जो कैलेंडर चलन में आया उसमें ईस्टर पर्व से समन्वय बैठाने तथा पिछले चार सौ वर्ष में तीन लीप दिवस सन् 2000 तक निर्मित कर डाले हैं। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को इन तीन लीप दिवसों का समायोजन करना परम पावन पोप तथा ख्रिस्ती धर्मावलंबियों की पहली जरूरत है। भारत का राष्ट्रीय पंचांग शक संवत् 1938 21 मार्च 2016 को शुरू होगा। कैलेंडर शब्द संस्कृत भाषा के कालांतर शब्द का यूरोपीय शब्द है इसलिये विश्व बंधुत्व, विश्व मानवता, वैश्विक शिष्टाचार सुनिश्चित करने के लिये वैटिकन समाज को INDOLOGY की ओर मुखातिब होना वैश्विक आवश्यकता है।
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