Monday, 21 March 2016


परम पावन चौदहवें दलाई लामा जय हो, जय हो
उन्हें भारत रत्न घोषित करना भारत का राष्ट्रहित वैश्विक धर्म है।
तिब्बत और मानसखण्ड का पुनरावतरण - Re-Incarnation दैवी सम्पद का विमोक्षाय का गीता पथ है।, 
अनीश्वरवादी व विस्तारवादी चीनी शासक परम पावन दलाई लामा से त्रस्त क्यों हैं ?
 
          परम पावन दलाई लामा का शतजीवी समारोह भारत के धर्मशाला में सन 2014 में मनाया गया। भारतीय वाङमय कहता है - पश्येम् शरदः शतम्, जीवेम् शरदः शतम्, प्रव्रुवाम् शरदः शतम्, श्रणुयाम् शरदः शतम्। दीर्घ जीवन की कामना का यह वैदिक स्त्रोत है। 2014 में चौदहवें दलाई लामा उन्नासी वर्ष 6 जुलाई 2014 को पूर्ण कर अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर गये थे। भारत में रह रहे लाखों तिब्बतियों और भारत में परम पावन दलाई लामा के भक्तों व प्रशंसकों ने उनके शतजीवी होने की कामना की। 
टाइम्स अखबार का कहना है कि - The Spiritual Leader so far has no successor in sight. @ Latimes.com Chuan Tiu and Ying Zhiyang in the Times Bejing Bereau contributed to this report by Jonathan Kaiman. Report headlines China saddlesTibet with reincarnation with red tape. Tibet’s enormously influencial 80 years old spiritual leader who lives in exile in India, Tibetans consider him to be the successor in a line of leaders, who are believed to be reincarnated. He led the Himalayan Reign in 1959 after a fated uprising, Chinese authorities revile him as a ‘Seperatist’ although he claims only increased authority of the Tibetan Reign which China controls. Communist Party Officials are formerly barred from practicing religion but the Govt. has for years demanded the power to regulate the Super-National affairs of Tibetan Buddhism. In recent months they have framed their Bereaucratinization of the after life as a bul work against fraudulent, Profitee, ring monks. Yet experts say it is also part of a wide ranging effort to lighten control over the turbulent Reign. From the point of view of Bejing, the whole apparatus seems to be about about Bejing control over the appointment of the next DALAI LAMA, said Robbed Barnett, Director of the Modern Tibet Studies Programs at Columbia University. The Chinese term hotel or living Buddha refers to high ranking, religious figures in Tibetan Buddhism, but it has no true equivalent in Tibetan language. Communist Party on religion is you run Tibet having a Lama who is credible enough to be influential, who he says you should follow the Communist Party. He said they don’t have enough power to control Tibet without a Lama to handle it. At the recent meeting of the legislature held in the great hall of the people of Bejing, the countries’ most prestigious venue – THE SERA MONTASTARY about Phurbu Tsesing wearing red monks robes out lined the Govt. position speaking softly in TIBETAN while another delegate to the Lagislature translated in to Mandarin. He recited several points from the State Religion Affairs Bereau Order no. 5 a law that authorites passed in 2007 to govern Re-Incarnation. One must have recognition from the religious world and the Temple to reincarnate he said. The carv it self fromes reincarnation in terms of National security. The selection of reincarnate must preserve National Unity and sole deity of all ethnic groups and selection process can not be influenced by any group or individual out side the country it says. Dalai Lama has not said what will happen after his death. By tradition, Tibetans identity a young boy as his reincarnate but has hinted that he may not be incarnated at all or his reincarnate may live out side of Tibet. Chinese Authorities have insisted on the right to observe the reincarnation affairs raising the possibility that there may be two Dalai Lamas with competing China’s to legitimacy. Fake living Bereuocracy have been in the head lines since November when a video went viral Zhang Tielen, a Chinese born British after being ‘Ordained’ as a living Buddha at levish ceremony in Hongkong. The ceremony was host BALMA AOSE a Chinese man from south eastern Chinese Fusian Province claimed that he had been certified a living Buddha by a famous Tibetan Buddhist Monastery. The Monastry later denied it.
चीन की कम्यूनिस्ट सरकार यह तो मान रही है कि लामाओं को नियंत्रित करने के लिये उसे दलाई लामा की पद्धति के अनुकूल चलने पर ही तिब्बत पर उसका राजनीतिक और आध्यात्मिक नियंत्रण कायम रखा जा सकता है। एशिया और यूरप के तीन भूभाग जिन्हें दुनियां तिब्बत (संस्कृत वाङमय में त्रिविष्टप), रूस (संस्कृत वाङमय में ऋषि देश) और जर्मनी (संस्कृत वाङमय में शर्मणि) का सीधा संबंधा कश्यप और उनकी पत्नियों का मातृप्रधान कुटुंब आधारित है। मध्य एशिया में कैस्पियन सी (जो भारतीय वाङमय में कश्यप सागर के नाम से जाना जाता है) कश्यप की पहली पत्नी अदिति के पुत्र इन्द्र और दूसरे आदित्य, दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष तथा दनु के पुत्र शुंभ, निशुंभ, मय, नमुचि क्रमशः दैत्य और दानव कहलाते थे। दिति और दनु में बहनों का भाव तीव्र था पर अदिति के पुत्रों से दिति का मनोवैज्ञानिक मानसिक विरोध था। यूरप में जर्मनी ऋषि देश की सभ्यता कश्यप के बाहुबली पुत्रों दैत्यराज हिरण्यकश्यप व उसके जुड़वां भाई हिरण्याक्ष तथा दनु के प्रतापी पुत्रों में शुंभ, निशुंभ, मय, नमुचि, त्रिशिर आदि बाहुबली तथा बहुविध योग्यताओं से भरेपूरे दानव परम्परा का अपना विशेष अस्तित्व था। अदिति के पुत्रों में विश्वकर्मा, दनु के पुत्रों में मय दोनों ही उद्भट वास्तुकार थे। त्रिविष्टप पर आदित्यों का अधिकार था जब कि ऋषि देश व शर्मणि पर वैदिक वाङमय के विशेषज्ञ दानवों का आधिपत्य था। शर्मणि याने आधुनिक जर्मनी तथा ऋषि देश आधुनिक रूस या रसिया दैत्य-दानव संस्कृति के वाहक थे जिन पर पूरा पूरा वैदिक समाज का व्यवस्था का प्रभावशाली असर था। ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी रूस और जर्मनी के गिरजाघरों में प्रार्थना का तौर तरीका पूरी तरह सामवेद आधारित अब तक बना हुआ है। तिब्बत पूर्णतया वैदिक संस्कृति का वाहक बना रहा जहां भारत के दशावतार वाद अथवा चौबीस अवतार वाद के साथ साथ ग्राम देवता, कुल देवता, इष्ट देवी, इष्ट देवता का चमत्कार करने वाले अवतार वाद को जब स्वामी विवेकानंद ने चिड़ियाखान के योगिनी आश्रम में सुना, योगिनी आश्रम में स्वामी जी अपने दलबल के साथ ठहरे हुए थे। उनके साथ सधुक्कड़ी जानने वाले दो फक्कड़ भी बेरीनाग से साथ होगये थे। इनके नाम क्रमशः जयवल्लभ व गंगावल्लभ थे। जयवल्लभ खड़ताल बजा कर ब्रह्मानंद के भजन गाया करते थे। गंगावल्लभ उम्र में उनसे छोटे थे पर वंशीवादक थे व वंशी की धुन पर हरिभजन करते थे। स्वामी जी ने सधुक्कड़़ी में जयवल्लभ से पूछा कमतोली में क्या होरहा है ? जयवल्लभ ने उन्हें बताया स्वामी जी वहां दैवी शक्ति का डंगरिया में अवतरण होरहा है। कुमांऊँ में तिब्बत की तरह अवतरणवाद जिसे चीन के लोग Re-Incarnation कह रहे हैं तथा परम पावन चौदहवें दलाई लामा के प्रभामंडल से राजनीतिक रूप से पीड़ित हैं उन्हें परम पावन दलाई लामा के व्यक्तित्त्व से राजनीतिक पीड़ा होरही है। 1949 से चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर रखा है। वह तिब्बत को Autonomus Tibet Region कह कर पुकारता है। प्रकारांतर से चीन का कम्यूनिस्ट शासन यह स्वीकार करता है कि तिब्बत चीन की मुख्य भूमि का एक हिस्सा न होकर एक स्वायत्तशासी क्षेत्र है। पुनर्जन्म तथा अवतार अवधारणा भारतीय संस्कृति का मूल अंग है। हम भारतीय लोग आदि शंकर को भगवान शंकर का अवतार मान कर चलते हैं। आदि शंकर ने ईश्वर तत्व की नयी व्याख्या वेदांत और अद्वैत सिद्धांत के जरिये की। उन्होंने अपने अद्वैतवाद के जरिये भारत में बौद्ध धर्म के बढ़ाव को रोक डाला पर एक समझौता भी किया। बुद्ध को भगवान विष्णु के दश अवतारों में नौवां अवतार प्रतिष्ठित कर डाला। स्मार्त पथ को एक नयी दिशा दे डाली। शंकराचार्य के पश्चात अद्वैत मार्ग का सटीक विश्लेषण करते हुए स्वामी विवेकानंद ने धर्म की धारा को वेगवती बना डाला। तिब्बत में पुनरावतार पद्धति का श्रीगणेश दलाई लामा संस्कृति ने शुरू किया। वर्तमान दलाई लामा चौदहवें पुनरावतार हैं। चूंकि विस्तारवादी कम्यूनिस्ट चीन यह तो स्वीकारता है कि उसे इलाहाबाद में हर साल मनाई जाने वाली मौनी अमावस अमांत पर्व सांस्कृतिक मंदारिन वाङमय और च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन अवधारणा का मनोवैज्ञानिक जुड़ाव भारत में क्षीर सागर कल्पना लोक की जाग्रत मनोज्ञता से जुड़ा हुआ बिन्दु है। मंदारिन वाङमय यह मानता है कि क्षीर सागर का अस्तित्व मुख्य चीन भूमि के अन्दर ही था। मुख्य चीनी भूमि में तिब्बत व वामे दुनियां नाम से पुकारे जाने वाले सिक्यांग जहां मुसलमान ज्यादा हैं ये दोनों इलाके चीन की मुख्य भूमि के हिस्से कभी नहीं थे। आज भी तिब्बतियों की सांस्कृतिक व आस्था मूल धारा स्वयं को चीन से जुड़ा हुआ न मान कर त्रिदश, त्रिविष्टप तथा इन्द्रादि आदित्य वर्ग का केन्द्र बिन्दु मानती है और तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रसार से पूर्व जो दैवी संपदा का क्षेत्र था, हिमालय के उत्तर का यह भू भाग मेरू, सुमेरू का क्षेत्र कहा जाता रहा है। तिब्बत में ही आदिदेव महादेव का मूल स्थान कैलास पर्वत है। नन्दीश्वर के परम भक्त विश्रवानंदन दशग्रीव रावण ने सबसे पहले वेदों का भाष्य लिखा। वेदों के भाष्य के समानांतर रावण-संहिता ज्योतिष शास्त्र का महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो आज भी तिब्बती लिपि व संस्कृत भाषा में उपलब्ध है। तिब्बत की सांस्कृतिक चेतना का मूलाधार ‘जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ’ के साथ साथ बुद्ध धर्म पथ के महायान, वज्रयान व हीनयान संप्रदायों में से किस संप्रदाय से जुड़ा है यह बुद्ध धर्म के गहन आध्यात्मिक अनुसंधान का विषय है। भारत में सनातन धर्म के नाम से पहचान रखने वाले धर्म के समानांतर जैन धर्म व बौद्ध धर्म का भी प्रसार हुआ। सनातन, जैन व बौद्ध धर्मोें की धार्मिक शल्य क्रिया सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर संपन्न किया। उन्होंने धार्मिक पाखंड की पोल खोल डाली। सनातनी, जैन, बौद्ध, ख्रिस्ती तथा इस्लाम धर्मावलंबी स्वामी जी के तर्कों से प्रभावित हुए पर स्वामी दयानंद सरस्वती का मूर्तिपूजक विरोध भारत में अपनी गहरी जड़ें नहीं जमा पाया। प्रकाशवीर शास्त्री के बाद आर्यसमाज का कोई ऐसा अद्भुत वक्ता भारत में नहीं रहा जो आर्यसमाज की पताका फहराता रहता। सनातन मूर्ति पूजा पुनः प्रतिष्ठित होगयी। स्वामी दयानंद का आर्यसमाज इतिहास के गहरे गर्त में डुबकियां लेने लग गया। आर्यसमाज ने स्वराज्य के आंदोलन को बढ़ावा दिया पर अपना अस्तित्व बनाये रखने में आर्यसमाज लगभग एक शताब्दी के पश्चात लुप्त होने के कगार पर पहुंच गया। दशावतार बोध, महाविष्णु के चौबीस अवतारों की संकल्पना के समानांतर मानस खंड, केदार खंड, जलंधर खंड व कश्मीर खंड के हिमालयी क्षेत्र के समानांतर तिब्बत में पुनरावतार Re-Incarnation की एक सतत प्रक्रिया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था - यज्ञानाम् जप यज्ञोस्मि स्थावराणाम् हिमालयः। यह बात तो कुरूक्षेत्र में हुई थी पर द्वारका में श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा - घिष्णुयानाम् अस्मिऽहम् मेरूः गहनानाम् हिमालयः। इसलिये हिमालय की गहनता, हिमालय की विशेषता हिमालय में ईश्वर तत्व की विशेष भूमिका में पुनरावतारवाद का विशेष महत्व है जिसे चीन के लोग जो वहां शास्ता हैं कह रहे हैं - Re-Incarnation of Dalai Lama चीन के कम्यूनिस्ट शासकों ने यह मान लिया है कि वे लामा संस्कृति - दलाई लामा अवतरणवाद को समाप्त करने की स्थिति में नहीं हैं। तरीके खोज रहे हैं कि किस तरह दलाई लामा संस्कृति पर चीन की केन्द्रीय सत्ता की पकड़ मजबूत की जाये पर सांस्कृतिक चीन की माघी अमावस के अमांत पर्व को लगभग एक अरब पिचानवे करोड़ वर्षों से अपना नया साल मानता आरहा है। उसे रोक पाना कम्यूनिस्ट नौकरशाही के लिये असंभव होगया है। यह ठीक ठीक पता नहीं कि चीन में अपने आपको Athiest  मानने वाले लोगों की सही सही संख्या क्या है। यदि चीन का सामान्य जन सांस्कृतिक चीन च्यांग काई शेक के राष्ट्रवादी चीन विचार पोखर का समर्थक बना रहा, माओ-चाऊ ऐन लाई के वर्तमान उत्तराधिकारी चीन के नये साल के उत्सव को रोक नहीं पाये। मंदारिन भाषी सामान्य चीनी जनसमाज इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत महापर्व को ही अपना नया साल मानता रहा। भारत को यह सोचना पड़ेगा कि चीन के जनसामान्य की नये साल वाली भूमिका का भारत स्वागत करे, इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे को मौनी अमावस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा घोषित कर इलाहाबाद को भारत का अद्वितीय स्मार्ट सिटी घोषित करे। प्रसन्नता की बात यह है कि आषाढ़ महीने के शुक्लपक्ष की दूज को पुरी के रथयात्रा क्षेत्र को भारत का पहला स्मार्ट सिटी घोषित किया गया। इलाहाबाद को भारत का दूसरा महत्वपूर्ण स्मार्ट सिटी घोषित कर डेढ़ अरब मंदारिन भाषियों को अपना नया साल इलाहाबाद में अंतर्राष्ट्रीय महत्व के साथ मनाने का सुअवसर दिया जाये। 
दलाई लामा पूर्व बाल्यनाम ल्हामो त्थाण्डुप है। जब उन्हें दलाई लामा का अवतार Re-Incarnate घोषित किया गया तेरहवें दलाई लामा थुपटेन ग्यात्सो के पुनरावतार के रूप में त्साहो थुण्डप को नया नाम तेंजिन ग्यात्सो दिया गया। इनके माता पिता दिकिन्सेरिन चोंक्योंगत्सेरिन जन्मस्थान तक्सेर क्विंछि जन्मदिन ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार 6 जुलाई 1935 है। तिब्बत या त्रिविष्टप मूलतः आदित्यों और आदिदेव महादेव उनकी अर्धांगिनी पार्वती तथा पार्वती परमेश्वर पुत्र स्कंद स्वामी के जन्मदिन आषाढ़ शुक्ल षष्ठी जिसे त्रिविष्टप और भारत में स्कंद जयंती और कुमार जयंती के रूप में मनाया जाता है। स्कंद स्वामी देव सेना के सेनानायक थे। नवजात बालक जो अपने माता पिता की सोलह जन्मी संतानों में सात में एक थी उनकी बड़ी दीदी व दो भाई थे संतान था, तिब्बती बौद्ध समाज की मान्यता व आस्था के अनुसार चौदहवें दलाई लामा हैं। हिमालयी भारत के वर्तमान उत्तराखंड जो मूलतः मानस खंड व केदार खंड है उसके पश्चिम में जलन्धर खंड व कश्मीर खंड है इन चार हिमालयी खंडों में दशावतार तथा चौबीस अवतारों के समानांतर स्थान देवता, ग्राम देवता, ईष्ट देवता, कुल देवता व कुल देवी अधिष्ठान हैं। मौजूदा निरीश्वरवादी चीनी कम्यूनिस्ट शासन मजहब को नकारता है पर मंदारिन भाषा भाषी डेढ़ अरब लोगों में Athiest लोगों की संख्या कुछ ही हजारों व्यक्तियों तक सीमित प्रतीत होती है। जिस नक्षत्र में चौदहवें दलाई लामा का जन्म हुआ उत्तरा फाल्गुनी व पूर्वा फाल्गुनी के बीच का समय था। सूर्य मिथुन राशि में थे तथा चंद्रमा सिंहस्थ थे। कौल व करण वरीयान योग में दलाई लामा जन्मे। उन्हें दलाई लामा के पुनरावतार - Re-Incarnate  के रूप में 22 फरवरी 1940 को चिह्नित किया गया। उस दिन माघ महीने की पूनम थी व भगवान भाष्कर कुंभ राशि में विचरण कर रहे थे। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन 15 नवंबर 1950 को उन्हें दलाई लामा के पद पर समारोहपूर्वक प्रतिष्ठित किया गया। 8 फरवरी 2016 के दिन मौनी अमावस थी। इलाहाबाद जिले में मौनी अमावस का अमांत पर्व क्षीर सागर मंथन - क्षीर सागर से निकले चौदह रत्न श्री, रंभा, विष, वारूणी, अमिय, शंख, गजराज, धनु, धन्वंतरि, धेनु, तरू, चंद्रमणि अरू वाजि प्राप्त होने से है। क्षीर सागर मंथन की मंत्रणा पुरन्दर इंद्र को महाविष्णु ने दी। यह कहा कि त्रिविष्टप में आदित्य लोगों को अपने मौसेरे व सौतेले भाइयों दैत्य-दानव समाज से संविद कर अमृत उत्पाद करना चाहिये। महाविष्णु ने जो सलाह पुरन्दर इंद्र को दी वह दैत्यराज बलि को भी मनपसंद आई। संविद होकर क्षीर सागर मंथन हुआ अमृत के लिये। अमृत कलश की छीना झपटी में अमृत बूंदें प्रयागराज के गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम त्रिवेणी में गिरीं। त्रिवेणी के अलावा क्रमशः हरिद्वार, उज्जयिनी व नासिक में भी धरती पर गिरी थीं। इन तीनों जगहों पर भी बारह वर्षीय कुंभ का आयोजन होता रहा है। क्षीर सागर मंथन जन्य अमृत उत्पादन पर्व ने चीन की मुख्य भूमि में अवस्थित क्षीर सागर कल्पना को सटीक प्रस्तुत किया गया। चीन के लोग अमृत बूंदें धरती पर गिरने के पूर्व अपना नया वर्ष मनाते हैं। करोड़ों वर्षों से यह परम्परा निरंतर चलती आरही है। चीन का निरीश्वरवादी समाज Athiest समाज पिछले पौने सात दशक से मौनी अमावस के अमांत पर्व की उपेक्षा कर रहा था। उसकी सोच थी कि उसका तिब्बत पर जबरन कब्जा दुनियां मान लेगी। वह तिब्बत की सभ्यता, संस्कृति को तहस नहस करने पर उतारू था पर समय की बलिहारी है जो सोवियत रूस के पतन के केवल 25 वर्षों के अंतराल में चीन में जाग्रति आयी है। 8 फरवरी 2016 के दिन माघी अमावस जिसे इलाहाबादी लोग मौनी अमावस के अमांत पर्व के रूप में लगभग 2 अरब वर्षों से लगातार मनाते आरहे हैं। अमांत पर्व - मौनी अमावस के दिन चीन के लोग जाग गये। उन्होंने समारोहपूर्वक अपना नया साल मनाया। विस्तारवादी जबरन कब्जा बनाये रखने वाले Athiest समाज के लोगों ने भी मान लिया कि अवतारवाद, पुनरावतारवाद व दलाई लामा संस्कृति को वे नष्ट नहीं कर सकते हैं। इसलिये उन्होंने यह कहने के बावजूद कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को अपना राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित कर चुकी है पर मंदारिन वाङमय को नकारने की हिम्मत चीन का Athiest शासक वर्ग खो चुका था। उसने सांस्कृतिक चीन व राष्ट्रवादी चीन का नया साल मनने दिया। यही अमांत मौनी अमावस का महापर्व चीनी कम्यूनिस्ट सरकार की गले की फांस बन गयी। उसने मान लिया कि क्षीर सागर मंथन प्रकरण को और ज्यादा समय तक रोका नहीं जा सकता। इलाहाबादी मौनी अमावस चीन के नये साल का पहला महत्वपूर्ण पर्व है। इसलिये भारत के लिये वह समय आगया है कि वह चीन की सांस्कृतिक सभ्यता व भारत की मौनी अमावस का अमांत पर्व से चीन के सांस्कृतिक व राष्ट्रीय योग के पर्व को पहचाने। तत्काल चीन के अनधिकृत कब्जे के कारण तिब्बत की भारत में कार्यरत लांब सांब सांगेय सरकार को स्वयं राजनीतिक व कूटनीतिक मान्यता देते हुए यूरप व अमरीका के उन देशों को भी प्रेरित करे कि तिब्बत की धर्मशाला में पिछले 57 वर्षों से कार्यरत सरकार को मान्यता देकर तिब्बत की स्वतंत्रता का उद्घोष करें। रूस की पुतिन सरकार भी भारत के आग्रह को स्वीकार कर अपनी भगिनी संस्कृति के वाहक तिब्ब्त को उसका न्यायपथ संवर्धित करने में सहायक हो सकती है क्योंकि कश्यप सागर के तटवर्ती कश्य संस्कृति वाले समाज अब भी वैदिक अवधारणा का अनुसरण करते आरहे हैं। भारत को चाहिये कि वह परम पावन चौदहवें दलाई लामा का सम्मान उन्हें भारत रत्न की उपाधि सौंप कर तुलसी के मंत्र का जाप करे। तुलसी ने रामचरित गाथा प्रारंभ करते समय कहा था - वन्दऊँ संत असंतन चरना। 
दलाई लामा की जीवन यात्रा के इक्यासी शरद अस्सी वसंत वे पार कर चुके हैं। उन्होंने जीवन में उतार चढ़़ाव देखने के साथ साथ तपश्चर्या का नया मानक स्थापित किया है। दलाई लामा को शांतिदूत के रूप में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। आज दुनियां की पहली जरूरत यह है कि विस्तारवादी चीन को यह राजनीतिक गुरूमंत्र दिया जाये कि मंदारिन भाषायी जगत का चीन का मध्य भाग क्षीर सागर है जिसे सांस्कृतिक चीन व राष्ट्रीय चीन तहेदिल से मान चुका है। जरूरत इस बात की है कि चीन के Athiest समाज को मंत्रणा दी जाये कि वह मंदारिन भावभंगिमा को अंगीकार कर चीन का वास्तविक हित साधन संपन्न करे।
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