Tuesday, 5 April 2016

मजहबी एकता का यक्ष प्रश्न ?
को धर्मः सर्व धर्माणाम् भवतः परमं मतः
धरती के तीन मजहबों में सारूप्यता निरूपण आज की पहली जरूरत 
परम पावन पोप ग्र्रेग्रेरियन XIII ने 15 अक्टूबर 1582 के दिन पश्चिम में प्रचलित जूलियन कैलेंडर में क्रिस्टोफर कैलियस कैलेंडर विश्लेषक के सुझाये गये रास्ते के अनुसार परम पावन पोप ग्रेगोरी XIII ने ईस्टर महापर्व से पहले होने वाली पूर्णमासी (हिन्दुस्तान में यह पूर्णमासी फाल्गुन पूर्णमासी के नाम से विख्यात है। इसी पूर्णमासी को होलिका दहन का उत्सव भारतवासी मनाते हैं) के पश्चात होने वाले शुक्रवार के तीसरे दिन ईस्टर का पर्व मानते आये हैं। भारत में शुक्रवार को भृगुवार भी कहा जाता है, इसे और्वयोग, और्वोपाख्यान तथा और्वोपदिष्ट मार्ग भी कहा जाता है, साथ ही शुक्राचार्य को दैत्यों (जिन्हें असुर भी कहा जाता था फारस जैसे देश में असुर को अहुर भी कहा जाता है सेमेटिक भाषाओं व सेमेटिक मजहबों में यहूदी धर्म, ख्रिस्ती धर्म तथा इस्लाम धर्म मुख्य हैं। भारत में एक मान्यता यह है कि दैत्याचार्य उशना, भार्गव, शुक्र मृत संजीवनी विद्या के परम ज्ञाता थे। उनके लिये मृत व्यक्ति को फिर से जिन्दा करना एक सामान्य कला थी। देव दैत्य युद्ध में जब दैत्य मारे जाते थे उशना शुक्राचार्य उन्हें पुनः जीवित कर दैत्य शक्ति को प्रबल बनाये रखते थे। दैत्य दानव - अदिति की बहनों दिति व दनु के कश्यप पुत्र थे। आदित्य व दैत्य दोनों मौसेरे व सौतेले भाई थे। दैत्य व दानवों में मधुर संबंध थे। अदिति के पुत्रों से दैत्य-दानव दोनों का आंकड़ा छत्तीस का था। सेमेटिक मजहबों में क्रिश्चियनटी - ख्रिस्ती धर्मावलंबी समूचे संसार में अढ़ाई अरब से ज्यादा हैं। इनके रोमन कैथोलिक चर्च के कैथोलिक मजहब के प्रमुख वैटिकन में स्थापित परम पावन पोप हैं। रोमन कैथोलिकों के अलावा ईसाई मजहब में प्रोटेस्टेंट तथा रूसी समाज के लोगों के धर्माचरण में पोप से पार्थक्य है। पोप रोमन कैथोलिक समाज के धर्मगुरू और परम पावन पापल - प्रतिष्ठित पोप हैं। इनके अनुयायी रोमन कैथोलिक कहलाते हैं। आज की दुनियां के मजहबी चौराहे में ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के बाद दूसरा स्थान इस्लाम धर्मावलंबियों का है। समूचे विश्व में इस्लाम अनुयायियों की संख्या एक अरब साठ करोड़ है। पश्चिम के लोग धरती, भूमि, पृथ्वी को Planet  कहते हैं। धरती में मजहबी गिनी जाने वाली जनसंख्या में जिन्हें दुनियां हिन्दू कहती है उनकी संख्या एक अरब के आसपास है। ख्रिस्ती व इस्लाम मजहब धर्मान्तर - Conversion पर विश्वास करने वाले समूह हैं। एक ईश्वर, अल्लाताला या GOD के उपासक हैं, उनकी मजहबी किताब भी एक ही होती है जैसे परम पावन बाइबिल तथा परम पावन कुरआन तथा वे पैगंबर Profet अथवा मजहब का मूूल स्त्रोत भी एक ही बताते हैं। आज की दुनियां जिनको हिन्दू व हिन्दू मजहब वाला कहती है उस भारतीय समाज पर मजहब की पश्चिमी, दक्षिण पश्चिमी याने ख्रिस्ती व इस्लामी व्याख्या लागू नहीं होती इसलिये हिन्दू धर्म के बजाय एक जीवन शैली है जिसमें व्याख्या करने की पूरी पूरी आजादी है पर आचार के क्षेत्र में जो लोग मर्यादाओं को मानते हैं वे भारतवासी हैं। पारसी, यहूदी, ख्रिस्ती, इस्लाम, ताओ, कनफूसियस, बौद्ध, जैन व सिख धर्म के सूत्रधार व्यक्तित्त्व हैं पर भारत के सनातन धर्म के नाम से जाना जाने वाला मानव समूह - कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके को मान्यता देता है। अगर मजहबी सिद्धांत सनातन पर लागू करने का संकल्प लिया जायेगा तो भारत में जितने संप्रदाय हैं, जितनी जातियां हैं उतने मजहब हो जायेंगे। इसलिये भारत के संबंध में मजहब, आस्था, रीति अथवा Religion व्यक्तिमूलक हैं समाजमूलक नहीं। 
अध्यात्म तो पहले भी यह मानता था कि मनुष्य मात्र बंधु हैं यही बड़ा विवेक है। पुराण पुरूषोत्तम पिता प्रभु एक है। आधुनिक विज्ञान व विज्ञान संकायों ने विश्व को एक गांव सरीखा बना डाला है Modern World Village। शहर और गांव में अंतर है, गांव में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अच्छी तरह जानता है उसके गुण अवगुणों से अवगत है पर शहर में आदमी की पहचान गिनती पर निर्भर करती है। शहर भीड़तंत्र का दूसरा नाम है। शहर में मुहल्ला या गली के कुछ लोग एक दूसरे के संपर्क में रह सकते हैं पर रोज नयी होती जारही तकनीकी क्रांति ने शहरों के जीवन को मशीनमय बना डाला है। आज की पहली जरूरत यह है कि मनुष्य को मनुष्यता - मनन, चिंतन करने वाले प्राणी का उसका पुराना स्वरूप - वह स्वरूप जो मनु-शतरूपा ने सृष्टि करते समय अख्तियार किया था उस तरफ इन्सान को एक बार फिर मुखातिब किया जाये। अब हमारे चिंतन का मुख्य बिन्दु फाल्गुनी पौर्णिमा और ईस्टर के पवित्र रविवार जब ईसा मसीह पुनः जीवित हो गये थे, उस बिन्दु को लक्षित है। दैत्य या असुर संस्कृति में जिसके ‘स’ अक्षर का उच्चारण सेमेटिक भाषाओं में ‘ह’ हो जाता है अरब के लोग सिन्धु को हिन्दु और असुर को अहुर कहते हैं। भारत में लोगों की भ्रांत धारणा है कि आदित्य - याने इंद्र आदि देवता जो अदिति के पुत्र हैं वे दिति और दनु की संतानों से श्रेष्ठ हैं। वास्तव में वैदिक संस्कृति का पहला वेदभाष्यकर्त्ता राक्षस संस्कृति का कारक - विश्रवानंदन दशग्रीव रावण है। उसे रावण इसलिये कहा जाता है क्योंकि उसकी हंसी लोगों को झकझोरती थी। उसने शिव भक्ति के लिये त्रिविष्टप में मानसरोवर के समानांतर राक्षसताल अपने नहाने के लिये बनाया। त्रिविष्टप के देवता लोग नीरक्षीर विवेक के ज्ञाता राजहंस वाले मानसरोवर में स्नान कर महादेव की आराधना करते थे। रावण ने नीरक्षीर विवेक वाली मान्यता को किनारे कर डाला। महादेव की अर्चना करने से पूर्व अपने नहाने के लिये राक्षसताल निर्मित किया। रावण के अवगुण - दारचौर्य पर ध्यान मत दीजिये, रावण की जो विशेषताऐं थी उन पर अपना ध्यान लगाइये। यद्यपि भारतीय वाङमय ने रावण को खलनायक श्रेणी में रखा और हिरण्यकश्यप, वेन और रावण को दस्यु जिसे अंग्रेजी में Dacoit कहते हैं या आजकल की कानूनी दुनियां ऐसे लोगों को Criminal कहना पसंद करती है पर ऐसे लोग भी सांसारिक समाज के अंग हैं इसलिये उनकी अनदेखी करना तर्कसंगत नहीं है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अमृत मंथन वाले आठवें स्कंध के सोलहवें अध्याय के पच्चीसवें छब्बीसवें श्लोक तथा सैंतालीसवें अढ़तालीसवें श्लोक के पूर्वार्ध में कहा गया है - 
फाल्गुनास्या मलेपक्षे द्वादशाहम् पयोव्रतः अर्चभेद रज्जिकास्यात् भक्त्यारमया चितः।
सिमीवाल्याम् मृदालिप्य स्नायात क्रोड विदीर्णया एवं रवहरहः कूर्याद् द्वादशाहम् पयोव्रतः हरेराराधनम् हानेम् अर्हणम् द्विजतर्पणम् प्रतिपद् दिन आरम्भ - यावत् शुक्ल त्रयोदशी
फाल्गुन के महीने मेें ही नृसिंह ने हरिद्रोही हिरण्यकश्यप का वध किया था। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन जिसका नाम सिंहिंका या होलिका था उसकी गोद में जिसे बिठाया वह जल जाये, प्रह्लाद को मारने के सारे उपाय विफल होगये तो राजा हिरण्यकश्यप ने अपनी भगिनी - सिंहिंका या होलिका (राहु की माता) की गोद में प्रह्लाद को बैठाया, प्रह्लाद का बाल बांका नहीं हुआ, होलिका जल गई उसी उपलक्ष्य में भारत के लोग प्रति वर्ष फाल्गुन पौर्णमासी को ‘होलिका दहन’ करते हैं। ईस्वी सन 2016 में होलिका दहन पर्व 23 मार्च को था। ख्रिस्ती धर्मावलंबन में ईस्टर का रविवार (जब ईसा मसीह फिर जिन्दा होगये वह पौर्णमासी के पश्चात पहले रविवार - Easter Sunday अब की पौर्णमासी के (23 मार्च 2016 के पौर्णमासी के दिन को गिनते हुए पांचवें दिन संपन्न हुआ। इसलिये यह देखने की बात है कि भारत के लोग प्रति चौथे वर्ष 366 दिन का वर्ष मानते हैं, इस बार शक संवत जो भारत का राष्ट्रीय संवत है - शक संवत 2072 मार्च 2016 की बीसवीं तारीख को समाप्त हुआ। अगले दिन 21 मार्च 2016 को 2073 संवत शुरू हुआ जो 20 मार्च 2017 तक प्रभावी रहेगा 21 मार्च 2017 के दिन शक संवत 2074 होगा। इस वर्ष फाल्गुन पूनम के पांचवें दिन ईस्टर का रविवार 27.3.2016 को संपन्न हुआ जबकि सन् 2017 में ईस्टर का रविवार फाल्गुन पूनम 12 मार्च 2017 के पश्चात पड़ने वाले रविवार अर्थात याने 19 मार्च 2017 को संपन्न होगा। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर प्रति चौथे वर्ष ‘लीप ईयर’ मानता है। लीप ईयर में फरवरी 29 दिन की होती है जैसे 2016 सन में फरवरी का महीना 29 दिन वाला था। यह संयोग की बात है कि शक संवत 1937 में अधिमास या मलमास होने के कारण पहला महीना वैशाख 31 दिन, जेठ 31 दिन, आषाढ़ 32 दिन, श्रावण 31 दिन, भाद्रपद 31 दिन, आश्विन 31 दिन, कार्तिक 31 दिन, मार्गशीर्ष 29 दिन, पौष 30 दिन, माघ 29 दिन, फाल्गुन 30 दिन, चैत्र 30 दिन कुल 366 दिन का वर्ष था। क्योंकि शक संवत 2072 में चांद्रमास के हिसाब से बारह नहीं तेरह महीने थे और 17 जून 2015 से लेकर 16 जुलाई 2015 तक अधिमास (याने चांद्रमास का तेरहवां महीना था) प्रति चौथे वर्ष में अधिमास हुआ करता है जब वर्ष के दिनों की संख्या 366 हुआ करती है। भारतीय पंचांग के अनुसार हर उन्नीसवें वर्ष में वार, तिथि, योग, करण व नक्षत्र समान होते हैं।ग्रेग्रेरियन XIII कैलेंडर में 15 अक्टूबर 1582 के पश्चात जब पश्चिम के देशों ने कैलेंडर को अंगीकृत किया पिछले चार सौ चौंतीस वर्ष में Leap Year गणना में व्यवधान आया है। सन 2000 में ग्रेग्रेरियन XIII कैलेंडर के मुताबिक 3 दिनों का फर्क पड़ गया है। ये तीन दिन वैटिकन तथा ख्रिस्ती धर्माचार्य किस तरह व्यवस्थित करते हैं यह देखने का विषय है। भारत में भी ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज की अच्छी खासी संख्या है। बपतिस्मा संपन्न ईसाई समाज के अलावा जिनका बपतिस्मा नहीं हुआ है पर उनकी मजहबी आस्था परम पावन बाइबिल में बढ़ती जारही है ऐसे लोग भी भारत में बहुत बड़ी संख्या में विद्यमान हैं। सन् 1816 में थियोसोफिकल सोसाइटी आफ इंडिया की सूत्रधार सुश्री एनी बेसेंट अल्मोड़ा आई थीं। उनके समक्ष कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे ने एक ज्वलंत प्रश्न रखा। तारा दत्त पंत नाम का एक युवक रामजे हाईस्कूल का विद्यार्थी तथा पहले बैच का हाईस्कूल पास छात्र था। जाति बहिष्कृत होने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। तब एनी बेसेंट के साथ महामना मदनमोहन मालवीय भी अल्मोड़ा पधारे थे। बदरी दत्त पांडे चाहते थे कि तारा दत्त पंत ईसाई नहीं है इसका फैसला एनी बेसेंट करें। एनी बेसेंट ने अपना मत व्यक्त किया कि जिस व्यक्ति का बपतिस्मा नहीं हुआ उसे क्रिश्चियन नहीं कहा जा सकता। इस सारे प्रसंग में एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि तारा दत्त पंत के सपिंड कुल के महामहोपाध्याय पंडित नित्यानंद शास्त्री तब काशी विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष थे। बदरी दत्त पांडे - तारा दत्त पंत की पत्नी के ईसाई होने के बावजूद महामना मदनमोहन मालवीय व काशी विद्वत् परिषद् से यह निर्णय चाहते थे कि तारा दत्त पंत अपने माता पिता का श्राद्ध संपन्न करने का पात्र है। यदि वह ईसाई धर्मपत्नी होने के बावजूद स्वयं पाकी रहे, विधिपूर्वक अपने माता पिता का एकोदिष्ट तथा पार्वण श्राद्ध संपन्न करता रहे। विद्वत् परिषद् का निर्णय भी तारा दत्त पंत के श्राद्धाधिकार के अनुकूल था। तारा दत्त पंत के पुत्र अल्मोड़ा के आर्कबिशप डैनियल पंत ने इस ब्लागर को सुनाया। इस ब्लागर ने पूरी पूरी जानकारी कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे जी से भी ज्ञात की। डैनियल पंत की पुत्री का विवाह मेरठ के लियाकत अली खां से संपन्न हुआ था जो पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री थे। डैनियल पंत स्वयं अल्मोड़ा के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। इस घटना का उदाहरण इसलिये दिया गया है कि भारत में विभिन्न धर्मावलंबियों में सामाजिक सरोकार अपनी परम्परायें कायम रखे और विभिन्न धर्मों में जो गूढ़ तत्व हैं उन पर मजहबी सारूप्यता तथा आस्था का सम्मान करते हुए आचार्य विनोबा भावे का धर्मदर्शन अनुकरणीय है वे कहते हैं - श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापि हि। स्वधर्म में श्रद्धा रखो परधर्म का सम्मान करो - अनिन्दा मार्ग का अनुसरण करो। आज मजहबी संसार में अपना मजहब मानते हुए दूसरे मजहबों के लिये भी श्रद्धा रखना वैश्विक ग्राम - GLOBAL VILLAGE  की पहली जरूरत है।
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