Saturday, 12 March 2016

इलाहाबादी मौनी अमावस का अमांत महापर्व
चीन का कायाकल्प कर भारत की अमृत विद्या का राही बना चुका है
उत्तिष्ठ] जाग्रत्] प्राप्य वरान्निबोधयत्
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया अमृत मश्नुते - क्षीर सागरो जयते।
प्राक्, प्राचीन, अर्वाचीन CHINA  तथा चीन की मुख्य भूमि स्थित क्षीर सागर अस्तित्व का तात्कालिक सिंहावलोकन सांस्कृतिक चीन का युगधर्म है। भारत के महत्वपूर्ण तीर्थ नगर इलाहाबादी मौनी अमावस के त्रिवेणी संगम स्नान मुहूर्त्त ने दुनियां के दो विशाल जनसंख्या वाले देशों में एक नयी जाग्रति, एक नयी स्फूर्ति तथा वांछित लक्ष्य साधन का एक अद्वितीय, अद्भुत लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। आधुनिक विश्व के सर्वाधिक जन समाज द्वारा अद्वितीय वाणी विलास वाली मंदारिन वाङमय ने यह प्रमाणित कर दिया है कि सांस्कृतिक तथा राष्ट्रबोधी चीन का सामाजिक शक्तिपात भारतीय नगर गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम इलाहाबाद से ही होता है जहां हर वर्ष माघ के महीने की मौनी अमावस के अमांत पर्व को चीन के लोग निरंतर चीन के नये साल का पहला दिन साल मुबारक मना रहे हैं। चीन के अनीश्वरवादी शास्ता अपने आपको Athiest  संज्ञा देने वाले चीन का वर्तमान शासक वर्ग समय की सही पहचान करने के लिये ग्रेग्रेरियन कैलेंडर जिसकी जड़ें ख्रिस्ती मतावलंबी समाज में ख्रिस्ती कैलेंडर के बारहवें महीने की पच्चीसवीं तारीख CHRISTMAS के महत्वपूर्ण दिन से विस्तारवादी चीनी शासक वर्ग ने जोड़ डाली है। ख्रिस्ती मजहब के हिन्दुस्तान पहुंचने में पश्चिमी घर के सीरियन क्रिश्चियनों में विशेष स्थान है। भारत के दूरदराज के गांव क्रिसमस को बड़ा दिन कह कर पुकारते हैं। चीन की मुख्य भूमि का शास्ता वर्ग पीपुल्स लिबरेशन आर्मी सरकारी तौर पर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक सरकारी नया साल जनवरी महीने की पहली तारीख को मनाता है। मौनी अमावस माघ बदी अमावस मंदारिन वाङमय का साल का पहला दिन है। मुख्य चीन भूमि के देहाती लोग सिंगापुर, हांगकांग, ताइवान तथा कोरिया के देश मौनी अमावस को चीन का नया साल मानते हैं। मंदारिन वाङमय के अनुसार मौनी अमावस का अमांत पर्व सांस्कृतिक चीन का शक्ति स्त्रोत इलाहाबाद वाली मौनी अमावस है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का भाग्योदय हुआ कि उनके शासन काल में चीन की अवाम जनता ने यह मान लिया कि चीन का सौर-चांद्र शक्ति स्त्रोत इलाहाबाद वाली मौनी अमावस का महापर्व है। चीन को सांस्कृतिक शक्ति देने वाली सामर्थ्य भी इसी मौनी अमावस में ही है जो इस वर्ष 8 फरवरी 2016 के दिन अमांत पर्व में संपन्न हुई। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू व्यक्तिगत रूप से तिब्बत का स्वतंत्र व पृथक अस्तित्व मानते थे। माओ के चीन की बढ़़ती हुई ताकत ने पंडित नेहरू को समझौतावादी बना डाला। तब भी इलाहाबाद में मौनी अमावस मनती थी, गंगा नहान भी होता था पर चीन के लोगों की नये साल की परिपाटी उस वेग से आगे नहीं बढ़ पायी। आजादी के बाद विस्तारवादी चीन के साथ सरोकार होने के 67 वर्ष पश्चात मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 को संपन्न हुई जब चीन व हिन्द के सांस्कृतिक व राष्ट्रीय ऊर्जा का चांद्र पर्व मौनी अमावस के अमांत मुहूर्त में नृत्य कर रहा है। चीन के मंदारिन भाषी लोगों को संदेश देरहा है कि उन्हें नयी ज्योति इलाहाबाद से ही मिली है। चीन के वे लोग जो अरूणाचल, लेह-लद्दाख, गिलगित सरीखे इलाकों को चीन का सार्वभौम हिस्सा बताते थकते नहीं थे, दुनियां के नये मुल्क पाकिस्तान जिसका इतिहास मात्र पौने सात दशक पुराना है उसका अपना इतिहास है ही नहीं जो चीन पाक गठजोड़ को बढ़ावा देरहा था व लगातार कहता जारहा था कि चीन तहेदिल व दिमाग से पाक समर्थक है। चीन का वह सपना भरभरा कर ढह गया। वह आइन्दा पाक को बढ़ावा देकर आगे से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहता क्योंकि चीन अब जान चुका है कि उसका सभ्यता का मूल स्त्रोत हिन्द के शहर इलाहाबाद का मौनी अमावस का अमांत पर्व ही है। सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी चीन का नया साल 28 जनवरी 1949 के दिन मौनी अमावस के अमांत पर्व में था। राष्ट्रीय चीन ने अपना नया साल मौनी अमावस 28 जनवरी 1949 को भी पूर्ववत मनाया पर तब चीन की मुख्य भूमि में माओवाद प्रभावी होने के कारण वह समारोह प्रकट रूप से सामने नहीं आ पाया। ठीक दस वर्ष पश्चात जब परम पावन दलाई लामा ने भारत प्रवेश किया तब मौनी अमावस का अमांत पर्व 7 फरवरी 1959 के दिन था। ये दोनों दिन सांस्कृतिक व राष्ट्रीय चीन के नये वर्ष के पहले दिन थे। दोनों बार देहाती चीन व मंदारिन भाषी चीनियों ने अपना नया साल समारोहपूर्वक मनाया था पर इन दोनों महत्वपूर्ण राष्ट्रीय दिवस याने चीन का नया साल Athiest चीनी शास्ता समाज ने लेशमात्र भी महत्व नहीं दिया पर जब 8 फरवरी 2016 के दिन मौनी अमावस का अमांत पर्व वाला दिन चीन के लोगों ने उत्साहपूर्वक मनाया, नये साल के पहले दिन को मौनी अमावस का अमांत पर्व घोषित किया। यही चीन के मंदारिन भाषी चीनियों का नये साल का पहला दिन मौनी अमावस का अमांत पर्व है जिसे 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 85,116 वर्ष से निरन्तर मनाया जारहा है। अब चीन के राष्ट्रीय वर्ग की यह पहचान खुल कर सामने आगयी है। चीन का जन जन मन से यह स्वीकार कर चुका है कि क्षीर सागर का केन्द्र बिन्दु चीन की मुख्य भूमि ही थी जहां अमृत उत्पादन हुआ और चीन के लोगों ने अमृत आनंद लिया तथा भारत की मौनी अमावस के अमांत पर्व को चीन के उत्कर्ष का मूल स्त्रोत स्वीकार किया तथा चीन के उत्थान का मुख्य कारक अमृत को मानते हुए हिन्द की रीति नीति का अनुसरण किया तथा चीन के लिये अद्भुत नया आदर्श प्रस्तुत कर डाला। विस्तारवादी मानसिकता वाले चीनी शास्ता समाज ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को अपना राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित करने के बावजूद निरीश्वरवादी चीन की सत्ता मंडली अमृत मंथन को नकारने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। मंदारिन वाङमय इस विशिष्ट उपलब्धि का जीता जागता उदाहरण है। निरीश्वरवादी चीन ने जब सिकियांग व तिब्बत पर जबरन कब्जा किया पर तिब्बत व सिकियांग की लोक सत्ता पर चीन का विस्तारवादी शास्ता समाज प्रभावी नहीं हो पाया। उसने छलबल के जरिये तिब्बत को जबर्दस्ती अपना स्वायत्त शासी Autonomus Tibbet Region कहा पर तिब्बत पर बलात अपना कब्जा बनाये रखा। भारत की आजादी के बाद माओ त्से दुंग व चाऊ ऐन लाई ने भारत पर दबाव डाला कि वह तिब्बत को चीन का अंग स्वीकार करे। तिब्बत व चीन की अलग अलग सभ्यतायें हैं, संस्कृति तथा राष्ट्रीयता भी अलग अलग है। मंदारिन वाङमय यह स्वीकार करता है कि भारत चिंतन धारा का क्षीर सागर चीनी सभ्यता की मूल अवधारणा है। पंडित नेहरू ने सन 1949 में तिब्बत को चीन का हिस्सा माना। उस वर्ष भी मौनी अमावस का अमांत पर्व 28 जनवरी 1949 को ही था। वही दिन था जब सांस्कृतिक व राष्ट्रीय संकल्प वाले चीन ने अपना नया साल मौनी अमावस वाले ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार 28 जनवरी 1949 को ही मनाया था। चीन के मूल निवासी जिन पर कोई मुलम्मा नहीं चढ़ा है जो पूर्णतः सांस्कृतिक तथा मंदारिन भाषायी राष्ट्र पर्व मानते हैं उनके लिये मौनी अमावस पर्व जीवन पर्व है। चीन के लोग अपना नया साल इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व में एक अरब पिचानवे करोड़ अठावन लाख पिचासी हजार एक सौ सोलह साल से निरन्तर मनाते आरहे हैं। जब परम पावन चौदहवें दलाई लामा तिब्बत की तपोभूमि को त्याग कर भारत में पिछले सत्तावन वर्ष से निरन्तर तपश्चर्या में लगे हैं। जब वे भारत आये उस वर्ष मौनी अमावस 7 फरवरी 1959 को थी। निरीश्वरवादी चीनी शास्ता जो अपने आपको Athiest कहते हैं उन्होंने चीन की राजसत्ता की डोर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर से जोड़ कर विस्तारवादी चीन का सरकारी कैलेंडर जनवरी महीने की पहली तारीख को मान लिया है पर सांस्कृतिक व राष्ट्रीय तथा मंदारिन भाषायी चीन के लोग माओ-चाऊ ऐन लाई के इस फैसले को नकार चुके हैं। उन्होंने 8 फरवरी 2016 के दिन चीन का नया साल सोत्साह मनाया है। विस्तारवादी चीनी शास्ता यह समझ चुके हैं कि वे चीन के नववर्ष दिवस इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व को अब ज्यादा समय के लिये रोकने की स्थिति में नहीं हैं इसलिये उन्होंने अबकी मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 के अमांत पर्व - चीन के नये साल के पहले दिन का विरोध छोड़ दिया है। यही सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय चीन व मंदारिन भाषायी वाङमय का विजय पर्व है। समय ही सबसे बलवान होता है। चीन के बहुसंख्यक समाज ने चीनी शासकों को सांस्कृतिक घुड़की के जरिये बता दिया है कि समूचे चीनी लोगों का योगक्षेम चीन की मुख्य भूमि में लगभग 2 अरब वर्ष से अस्तित्व में रहे क्षीर सागर के अमृृत मंथन ने चीन को नयी प्रेरणा दी है कि चीन का योगक्षेम भारत के इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व से जुड़ा हुआ है। डेढ़ अरब मंदारिन बोलने वाले चीनी समाज ने अपने शासकों को बता दिया है कि उनका नया साल पहली जनवरी को नहीं पर जब सूर्य मकर राशि में विचरण करते हैं मौनी अमावस्या के अमांत पर्व का महत्वपूर्ण मुहूर्त्त ही चीन की शक्ति है। पिछले सतसठ सालों में चीनी सरकार पर देहाती चीन, सिंगापुर, ताइवान तथा कोरिया सहित मुख्य चीन के भूभाग में रहने वाले लोगों ने नैतिक संकेत देकर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार को चेता दिया है जिसका व्यापक प्रभाव श्रीलंका के चीन समर्थकों, नैपाल के कम्यूनिस्टों तथा पाकिस्तान को भरमाते रहने वाले चीन की पाक नीति पर भी पड़ना स्वाभाविक है। जाट आंदोलन वस्तुतः समय पर आक्रामक रूख अपनाने वाला आरक्षण अनुरोधी मुहिम है। जाट समाज तो हिन्दू जाट, सिख जाट तथा मुस्लिम जाट इन तीन फिरकों में बंटा है उसके बावजूद भी जाट संस्कृति का अपना महत्व है। हरियाणा व उत्तर प्रदेश में कहीं कहीं मुस्लिम जाट हैं पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का मुस्लिम जाट - पहले जाट है बाद में मुसलमान है। जाट आंदोलन से भारत व पाकिस्तान में जाट समाज में एक नयी चेतना आगयी है। कम्यूनिस्ट चीन की पकड़ दिन ब दिन कमजोर होती जारही है। नैपाल का कम्यूनिस्ट भी ज्यादा दिन तक चीन के सहारे नहीं रह सकता। इसलिये भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व ने नयी चेतना तथा नयी ताकत उपलब्ध करा दी है। वे भारत के पड़ोसी देशों में चीन सहित श्रीलंका, पास्तिान तथा नैपाल में कूटनीतिक राजनीति को एकदम नया चेहरा देने की शक्ति अर्जित कर चुके हैं। उनके भारतीय राजनीतिक समाज के द्वारा विरोध करना प्रधानमंत्री को नयी सौर ऊर्जा देरहा है। 
यह बदलाव क्यों और कैसे आया और क्षीर सागर मंथन पर्व ने जिस तेजी के साथ चीन के पारम्परिक समाज को हिन्दुस्तान के साथ जोड़ा वह एक अद्भुत रहस्य है। इस रहस्य के पीछे प्रधामंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की निस्वार्थ राजनीतिक क्षमता ने भारतीय नेतृत्व को एक नया पैगाम दिया है। जब नेतृत्व निर्वैर होता है तब विपक्षी के साथ भी शिष्टाचार का निर्वाह करता है और तभी अजातशत्रु राजनीति का उद्भव हुआ करता है। भारत की पिछले एक हजार वर्ष की राजनीतिक विपदाओं ने समय समय पर ऐसे नेतृत्व को उभार दिया है जिसका लक्ष्य सत्य, अहिंसा पर आधारित था। मजहब, आस्था व भारत के लोग जिसे धर्म कहते हैं वह मूलतः व्यक्तिमूलक है। जब जब धर्म, कर्त्तव्य, आस्था व मजहब को समूह से जोड़ा जाता है उसमें विसंगतियां उत्पन्न होना स्वाभाविक है। मजहबों, आस्था समूहों और मजहब को सामूहिकता का आवरण पहनाने से पड़ोसी मजहब, पड़ोसी आस्था तथा पड़ोस की सामूहिकता से संघर्ष होना स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया है। इसलिये जो शासक मजहब, आस्था तथा सामूहिकता के प्रति निरपेक्ष भाव रखेगा वही समाज के शासन तंत्र को सही दिशा दे सकता है। नरेन्द्र मोदी के नेतृृत्व ने सबका साथ-सबका विकास का जो गुरूमंत्र उच्चार किया है उससे विभिन्न मजहबी समूहों में वैचारिक आपसदारी व समझदारी का रास्ता प्रशस्त होता है। भारत में आज सुप्रीमो शैली वाला राजनीतिक रणनीति का बोलबाला है। भारत का अंग्रेजीदां मैकोलाइट भद्रलोक जिनमें फ्रांस के नैपोलियन बोनापार्ट की राजनीतिक उदाहरण देने वाले आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो महाशय अरविन्द केजरीवाल भी सम्मिलित हैं ये सभी एक क्षत्रप सत्ता वाले राजनीतिक रणनीतिकारी को उनकी अपनी राजनीतिक चेतना को समकालीन जरूरत में ढालने के लिये कौटिल्य का अर्थशास्त्र नयी व्याख्या चाहता है। कौटिल्य ने अनुभव किया था कि तत्कालीन गणतंत्र वादी राजसत्तायें पारम्परिक द्वेष से पीड़ित हैं इसलिये उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में राजतंत्र का श्रीगणेश किया। महाभारत के शांति पर्व तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का आज की डेमोक्रेटिक व्यवस्था में भी कारगर हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दलों अथवा पारिवारिक राजनीति करने वालों क्षत्रपों को अपने समर्थकों को एकजुट रखना पड़ता है इसलिये यह तात्कालिक रूप से जरूरी है कि राजनीतिक सुप्रीमो समूह को उनके स्वहित, क्षत्रप राजनीतिक हित के लिये स्वयं अथवा उनके मंत्रणादाताओं को कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म-युधिष्ठिर संवाद को क्षत्रपों की स्वभाषा में समझाने की जरूरत है ताकि भारतीय राजनीति पटरी पर आ सके। नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व यह संपन्न कर सकता है क्योंकि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मानवोचित राष्ट्रीय शक्ति संपात है। वैयक्तिक रागद्वेष को उनकी सोच में कहीं कोई जगह नहीं है। ऐसा नेतृत्व देश को कभी कभी मिल पाता है। भारत का यह राजनीतिक सौभाग्य है कि दिल्ली के तख्त की डोर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हाथों में है। वह प्रत्युपन्न मति व आशुवक्ता भी हैं। क्षत्रप वृत्ति उनमें लेशमात्र भी नहीं है। विरोधी विचारधारा से संवाद करने की क्षमता के वे धनी व्यक्तित्त्व है। इसलिये चीन का नया साल - मौनी अमावस का अमांत पर्व उन्हें एक नया राष्ट्र लक्ष्य उपलब्ध करा रहा है। देखते रहिये वे किस फुर्ती से काम करते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री की स्फूर्ति के मौजूदा दो महत्वपूर्ण बिन्दु परम पावन चौदहवें दलाई लामा की भारत तपस्या तथा भारत भूमि को बौद्धावतार से जोड़ने वाले आदि शंकराचार्य के महत्वपूर्ण निष्कर्ष का लाभार्जन भारत व चीन दोनों एशियाई देशों के लिये एक नया मोड़ ला चुका है। परम पावन दलाई लामा को भारत यथाशीघ्र भारत रत्न घोषित करने का संकल्प ले और तिब्बत की भारत स्थित प्रवासी सांगे सरकार को तत्काल राजनीतिक व कूटनीतिक मान्यता देकर तिब्बत की स्वतंत्रता की वैश्विक आवश्यकता को संपूर्त करे। चीन का निरीश्वरवादी शास्ता समाज मान चुका है कि वह अब निस्तेज है। चीन का नया साल जिस उत्साह से सोमवती अमावस्या 8 फरवरी 2016 के दिन मनाया गया मौनी अमावस के महत्वपूर्ण मुहूर्त का लाभ चीन भारत के साथ साथ विस्तारवादी चीन के Autonomus Tibbet Region को दिला कर भारत अपने पड़ोसी देशों के लिये भी नये राजनीतिक रणनीति का मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का नेतृत्व भारत व चीन दोनों विशाल जनसंख्या वाले दो एशियाई राष्ट्रों के उज्जवल भविष्य का वाहक है।  
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