DELHI - CAR CRAZE CAPITAL
असौ मया हतः शत्रुः हनिष्ये चापरा नापि ईश्वरो इहंहम भोगी सिद्धोऽहम् बलवान सुखी,
आढ्योऽमि जानामि कोन्योस्ति सदृशो मया।
भगवद्गीता के दैवी-आसुरी संपत विभाग योग नाम के सोलहवें अध्याय की चौदहवें और पंद्रहवें श्लोक - आसुरी संपत की यह गाथा भारत की राजधानी दिल्ली और नेशनल कैपिटल रीजन के नाम से संबोधित दिल्ली शहर और दिल्ली के उपनगर और स्वतंत्रता प्राप्ति 1947 में दिल्ली में 276 गांव थे अब केवल 58 दस्तावेजी गांव रह गये हैं वे भी शहराती गांव हैं। लास ऐंजेल्स टाइम्स के रिपोर्टर शशांक बंगाली ने अपने अखबार के लिये दिल्ली से एक आलेख New Delhi Tries To Clear Air भेजते हुए लिखा विषम सम नंबर वाली गाड़ियों के प्लेट संबंधी गाड़ियों को सड़क में चलाने, पहले दिन विषम दूसरे दिन सम संख्या वाली प्लेट वाली गाड़ियां ही सड़क में दौड़ें यह प्रयोग स्कूल बच्चों से वायु प्रदूषण रोकने का अनुरोध कराना जहरीली हवा के जहरीले असर को नियंत्रित करने का प्रयास दिल्ली के शिक्षा मंत्री और उप मुख्यमंत्री राणा प्रताप वंशधर सिसोदिया ईमानदारी से राणा प्रताप की तरह सच्चाई बताते हैं कि उनका बालक गाड़ी में बैठ कर स्कूल जाना चाहता है। यह प्रयोग ख्रिस्ती वर्ष 2016 के पहले दो सप्ताह चलाने का भगीरथ प्रयास दिल्ली सरकार कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन - डब्ल्यु.एच.ओ. के द्वारा 2014 में यह अनुभूति की गयी कि विश्व के सोलह सौ शहरों में वैज्ञानिक समाज की राय में नयी दिल्ली अत्यंत वायु प्रदूषित शहर है। वायु प्रदूषण क्या है ? जीवात्मा (मनुष्यों सहित समूचे प्राणधारी जीव) श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर ही जीवित रहता है। स्वयं जीवात्मा - प्राणधारी में प्राण वायु के चार और संगी साथी उदान, समान, व्यान और अपान मिल कर प्राणधारी के चलने फिरने, उठने बैठने तथा सोचने व काम करने की शक्ति देते हैं। प्राणधारी तभी तक जीवित रहता है जब तक उसकी श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया सक्रिय रहती है। शशांक बंगाली लिखते हैं कि जाड़े के महीने दिल्ली के लिये ज्यादा कष्टकर हैं। उत्तर भारत में एक देहाती कहावत है - धन के पंद्रह मकर पचीसा, चिल्ला जाड़ा दिन चालीसा। पौष का महीना हिन्दुस्तानी तौर तरीकों पर धनुर्धरार्क याने सूर्य का धनु राशि में पंद्रह-सोलह दिसंबर से 13-14 जनवरी तक धनु का सूर्य कहलाता है। मकर संक्रांति आम तौर पर प्रति वर्ष 14 जनवरी को हुआ करती है पर हर चौथे साल मकर का पर्व 15 जनवरी को होता है। अबके मकर संक्रांति 15 जनवरी 2016 को मनाई जायेगी। शशांक बंगाली ने अपने अखबार लास ऐंजेल्स टाइम्स के लिये लिखा है वाहन जन्य प्रदूषण जन्य विषैला प्रभाव केवल 15 से 20 प्रतिशत तक ही होता है बाकी विषैलापन घोलने वाले अन्य कारकों को दरकिनार कर केवल वाहन प्रदूषण पर ही अपनी समूची शक्ति लगाना विवेचन योग्य विषय है। रिपोर्टर शशांक बंगाली ने पब्लिक हैल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया के अनुसंधान मनीषी भार्गव कृष्ण को उद्धृत करते हुए लिखा - लोकमत यह मान्यता रखता है कि व्यक्ति के निजी कार्य तथा वायुशोधन के लिये उत्तरदायिता स्वीकार करना भी बहुत मुफीद है। समस्या के निराकरण पूर्ण समाधान के लिये हर व्यक्ति को उत्तरदायी बनना होगा। एक जमाना था जब व्यक्ति के वाहन आम तौर पर पशु पक्षी भी हुआ करते थे जिससे मनुष्य समाज के संगी साथी पशु पक्षियों की देखभाल भी अपने आप हुआ करती थी। संभवतः भारत देश की विशेषता ही जीव मात्र के प्रति आत्मभाव होना था। वायु प्रदूषण के अन्य कारक तत्वों पर एक अलग पोस्ट में विचार किया जाये यहां केवल समूचे प्रदूषण के छठे या पांचवें हिस्से वाहन जन्य प्रदूषण पर ही दिल्ली सरकार अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए है। उन्होंने - दिल्ली नगर राज्य के कर्ता धर्ता और दिल्ली को जहरीली हवा में सांस लेने से बचाने के लिये पखवाड़े भर के लिये प्रतीकात्मक कार्य अपने हाथ में लिया है। दिल्ली प्रशासन ने तीन हजार अतिरिक्त बसेें सड़क में उतारी हैं। उनमें से बहुत से वाहन पब्लिक स्कूलों से उधार लिये गये हैं। जो परीक्षण दिल्ली सरकार कर रही है वह विद्यालयों में दो हफ्ते की जाड़ों की छुट्टी का लाभार्जन करना है। यातायात पुलिस के हजारों अधिकारी स्वयं सेवी व्यक्तियों तथा कैमरों की मदद से संकल्पित यातायात प्रयोग का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों पर नजर रखी जारही है। प्रयोग की अवहेलना करने वालों पर तीस डालर - हिन्दुस्तानी रूपये में 2000 हजार रूपये का अर्थदण्ड लगाया जारहा है। आयोजन में जन सहयोग भी मिल रहा है। नियम अनुपालन में तत्परता भी देखी जारही है। सरकारी अधिकारी व जन साधारण भी एक दूसरे के साथ वाहन सहभागिता के जरिये सड़क में यातायात नियंत्रण में प्रतिभागिता भी संपन्न कर रहे हैं।
स्तंभ लेखक शशांक बंगाली ने भारत की राजधानी दिल्ली को Car Crazed Capital नाम दिया है। विषम-सम संख्या का दिल्ली सरकार का नया सांख्य योग क्या मां-बेटे देवहूति कपिल के सांख्य संवाद को लाभप्रद नतीजे दिलायेगा ? देखते रहिये दिल्ली की विषैली हवा से किस तरह छुटकारा पाया जाये यह दिल्ली के लगभग पौने दो करोड़ बाशिंदों की साझी समस्या है इस समस्या के समाधान में दिल्ली के हर नागरिक को प्रतिभागी बनाये जाने से ही दिल्ली में सांस लेना सुगम हो सकेगा। अमरीकी अखबार के लिये रपट लिखने वाले महाशय ने 32 वर्षीय युवा तरूण थवानी की राय ज्ञात करते हुए लिखा अभी तो यह असुविधा ही कर रहा है पर दीर्घावधि के लिये यह परीक्षण लाभदायक भी हो सकता है। अनुमिता राय चौधरी कार्यकारी निदेशक Research and Advocacy at the centre for Science and Environment दिल्ली का एक चिंतन पोखर है। वे कहती हैं - यातायात जन्य प्रदूषण को रोकने, कम करने के लिये यह अनुकरणीय उपाय है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की घोषणा का उल्लेख करते हुए रिपोर्टर ने लिखा कि प्रदूषण रोकने के दूसरे उपाय भी किये जारहे हैं। प्रदूषण फैलाने वाले विद्युत उत्पादन पर रोक लगाने, दैत्याकार डीजल चालित वाहनों व भारवाहनों पर अस्थायी बिक्री रोक तथा टैक्सी कंपनियों को सलाह दी जारही है कि वे प्राकृतिक गैस से वाहन चलाने के बारे में तात्कालिक कार्यवाही करें। रिपोर्टर का यह भी कहना है कि इन उपायों का विश्व के दूसरे शहरों में मिलाजुला असर हुआ है। रिपोर्टर ने यह भी कहा कि बत्तीस वर्ष पहले लास ऐंजेल्स में ग्रीष्म ओलंपिक 1984 के अनुभवों को याद करते हुए ओलंपिक खेलों के उन दो सप्ताहों की याद आज भी ताजा कर रहे हैं। यातायात, प्रकाश और वाहन चालन सरल हुआ पर शीघ्र ही पुरानी हालतें लौट गयीं। प्रदूषण मुक्त शहर बनायेंगे नया साल (2016) मनायेंगे यह नारा यह आह्वान कर्णप्रिय जरूर है पर दिल्ली शहर और उसके इर्दगिर्द के छोटे शहरों और गांवों में आज जिस कठिनाई का सामना दिल्ली वाले कर रहे हैं उसे राजनीतिक मुहावरेबाजी से नहीं साधा जा सकता। योगेन्द्र यादव जो शुरूआती दर्मियान में अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाले आ.आ.पा. के चिंतन पोखर थे उन्होंने 2014 के लोकसभा निर्वाचन से पहले साफ साफ कह दिया था भारत का तत्कालीन लोकमत नरेन्द्र मोदी के अनुकूल है। नरेन्द्र मोदी विजय श्री हासिल कर सकते हैं भले ही उनके (योगेन्द्र यादव जैसे लोग) नरेन्द्र मोदी का नख शिख विरोध ढोल बजा बजा कर करते रहें। उन्हें क्षीण आशा थी कि आ.आ.पा. समूचे भारत में अगर 100 लोकसभा सीटें जीत गयी तो आ.आ.पा. भारतीय राजनीतिक क्षितिज में अंगद के पांव जमा सकती है। उनका यह मत स्वयं उन्होंने ही ध्वस्त कर डाला वे मानने लगे कि अरविन्द केजरीवाल भारतीय राजनीतिक बारहखड़ी सही सही नहीं पढ़ पारहे हैं। उन्हें उदाहरण के लिये भी फ्रांस का नैपोलियन बोनापार्ट ही मिला। राजनीतिक वाग युद्ध के लिये उन्हें कोई दूसरा प्रमाण नजर नहीं आ पाया। वे दिल्ली की राज्य सरकार वैसे ही चला रहे हैं जैसे दूसरे क्षत्रप अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग अलाप रहे हैं। दिल्ली की जो समस्या है उसका समाधान साझा विचार में है। केन्द्र सरकार के साथ छत्तीस का आंकड़ा खड़ा कर दिल्ली का दुरूस्त चाल करना टेढ़ी खीर है।
हिन्दुस्तान की ज्यादातर राजनीतिक चिंतन पोखरों में क्षत्रपवाद हावी है। अंग्रेजी अखबार नवीस इस क्षत्रप राजनेता वर्ग को सुप्रीमो कहते हैं। अ.भा. कांग्रेस सहित ज्यादातर राजनीतिक समूह एक व्यक्ति के इर्दगिर्द नृत्य कर रहे हैं चाहे वह पश्चिम बंग की लोक नेत्री ममता बनर्जी हो, उड़ीसा के लोकनेता नवीन पटनायक हों, बिहार की राजनीतिक ताकत लालू प्रसाद यादव हों, उत्तर प्रदेश के दो सुप्रीमो मायावती या मुलायम सिंह यादव ही क्यों न हों, तमिलनाडु के दोनों सुप्रीमो कालग्नार करूणानिधि अथवा जयललिता ही क्यों न हो, भारत के प्रधानमंत्री रहे देवगौड़ा महाराष्ट्र शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, कश्मीर के हाल ही दिवंगत मुख्यमंत्री मुफ्ती सईद, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, आंध्रप्रदेश व तेलंगाना के सुप्रीमोत्रयी चाहे वो चंद्रबाबू नायडू हों, चाहे तेलंगाना के के.एस. राव हों अथवा राजेश्वर रेड्डी के पुत्र ही क्यों न हों ये सभी अपनी अपनी राजनीतिक जमात के स्थायी सुप्रीमो हैं। शरद पवार, रामविलास पासवान भी लंबे अरसे से राजनीतिक सुप्रीमो नुमा ढांचा खड़ा किये हुए हैं पर इन दोनों का चिंतन पोखर समझौता वादी प्रतीत होता है। राजनीतिक क्षितिज में शरद यादव, नितीश कुमार भी क्षत्रप कहे जा सकते हैं पर इन दोनों की क्षत्रप क्षमता उतनी वेगवती नहीं जितनी लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, तीन पीढ़ियों से कश्मीर घाटी पर अपना सिक्का जमाये हुए अब्दुल्ला खानदान, वैचारिक दृष्टि से किसी सिद्धांत पर अपनी गाड़ी चलाने वाले राजनीतिक समूह केवल दक्षिणपंथी कही जाने वाली भा.ज.पा. तथा वामपंथ का अनुसरण करने वाले साम्यवादी विचारधारा वाले राजनीतिक समूह परंतु वामपंथी विचार वीथि में नया खून नहीं आ पारहा है। नेतृत्व कई दशकों से उन्हीं के हाथ है जो उम्र के साठ पार कर चुके हैं। कई कई तो वृद्ध भी हैं पर नेतृत्व पताका फहराने में ही आनंदित होते जारहे हैं। राजनीतिक वानप्रस्थ अथवा राजनीतिक सन्यास का रास्ता नहीं अपना पारहे हैं। माकूल सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दर्शन मार्ग श्रेयष्कर है या देशभक्ति अथवा राष्टभक्ति। विश्व में अपना राजनीतिक अस्तित्व कायम रखने के लिये चाणक्य के विचार को अपनाना ही होगा -
त्यजेत् एकम् कुलस्वार्थे, ग्रामार्थे एक कुलम् त्यजेत्।
त्यजेत् ग्राम जनपदस्वार्थे अथवा राष्ट्रार्थे आत्मार्थे पृथ्वी त्यजेत्।
यहां त्याग की महिमा गाई गई है। त्याग करने से ही निरन्तर शांति व श्रेय मिल सकता है। भारत का 1947 से पहले के एक सहस्त्राब्दी वाला पूरा पूरा कालखंड - अरबों, पठानों, मंगोलों, मुगलों व अंग्रेजों द्वारा भारत को पराधीन रखने का इतिहासाख्यान है। संयुक्त राज्य अमरीका पिछले 240 वर्षों से अपनी संघ शक्ति निरन्तर बढ़ाता जारहा है आज विश्व का इकला राष्ट्र राज्य है जो अपने आपको लोकतंत्र का वाहक मानता है तथा समृद्धि की बात भी करता है। गेल हालान्द ने एक रपट तैयार की है जिसमें यह कहा गया है कि संयुक्त राज्य अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में 1,16,000 बेघर लोग हैं। हालीवुड सिटी लास ऐंजेल्स के मेयर एरिक गारसेटी का कहना है कि बेघर लोगों के कष्ट दूर करने उन्हें रहने को घर मिले चौमुहानी पहुंच की तत्काल जरूरत है। लास ऐंजेल्स के बेघर लोगों को घर दिलाने के लिये कैलिफोर्निया राज्य सरकार ने दस हजार से चौदह हजार घर निर्मित करने हेतु दो अरब डालर स्टेट सीनेट ने प्रस्तावित किये हैं। भारतीय नजरिये से मकान बनाने की यह राशि 132 अरब रूपये होगी। बेघर और निराश्रित लोगों को छत मिले यह प्रयास उस नगर में किया जारहा है जो न्यूयार्क, वाशिंगटन और शिकागो के स्तर का महत्वपूर्ण अमरीकी नगर है जहां हालीवुड सिने संसार भी है साथ ही भारतीय परमहंस योगानंद महाराज की तपोभूमि भी है। कैलिफोर्निया के पूर्ववर्ती सीनेट प्रमुख मिस्टर टेन गोलस्टिन वर्ग ने वर्तमान सीनेट प्रमुख केविन डे लेअन के साथ प्रेस कानफ्रेंस में कहा - वे अत्यंत उदासीन और निरूत्साहित हैं कि बेघर लोगों के प्रति वांछित सहानुभूति का अभाव है। दिल्ली की सरकार ब्राजील, मैक्सिको, पेईचिंग तथा पेरिस शहरों में ‘विषम-सम सांख्ययोग’ से वायु प्रदूषण श्वास लेने में आरही बाधाओं को निर्मूल करना चाहती है, यदि उनका उपक्रम शत प्रतिशत सफल भी रहा तो भी केवल पंद्रह से बीस प्रतिशत तक ही तो विषैली हवा पर रोक लग सकती है। दिल्ली के बेघर, झुग्गी झोंपड़ी-स्लम में रहने वाले तथा जिन्हें अंग्रेजी भाषा में ैजतममज क्ूमससमत तथा चीथड़े चुनने वाले बच्चे कहा जाता है, दिल्ली में कितने लोग बेघर हैं, बेघर होने के कारण वे दिल्ली के प्रदूषण में बढ़त कराते हैं क्या ऐसे लोगों के लिये रहने की सुविधा के बारे में दिल्ली सरकार उनके लिये कुछ सोच रही है। उनको दिल्ली को रहने लायक शहर का दर्जा दिलाने के लिये भारत सरकार संघ राज्य घटक सरकारों तथा विभिन्न राज्यों से लोकसभा - राज्यसभा सदस्यता अर्जित महानुभावों का भी सहयोग मांगना चाहिये। राजनीतिक चालबाजी, हाराकेरी और एक दूसरे के प्रति अपशब्द कहने, वाणी पर नियंत्रण न लगाने से सुप्रीमो-क्षत्रप शैली की राजनीति से समस्या बढ़ेगी ही इसलिये मिल बैठ कर दिल्ली को रहने लायक, श्वास लेने योग्य शहर बनाने के लिये सब का सहयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिये। दिल्ली को सुधारने का जिम्मा आ.आ.पा. सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल महाशय ने लोकमत से अर्जित किया है इसलिये पहली जिम्मेदारी उनकी ही बनती है। लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा के सभी लोकप्रतिनिधियों से जो लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा सत्रों के दौरान दिल्ली में रहते हैं अपनी सांसद निधि, विधायक निधि का छठा हिस्सा दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ी, स्लम, बेघर लोगों के लिये रैन बसेरे तथा नंगे भूखे अपनी जिन्दगी बिता रहे असहाय लोगों का सहारा बनने आगे आयें। सरकार के समानांतर आस्थागत दातव्यता तथा परोपकार की भावना की बढ़त अपने पास पड़ौस के गरीब लोगों के लिये सहानुभूति वाली महाविभूति का वातावरण राजनीतिक होहल्लेबाजी के समानांतर चलाई जाये। राजनीतिक लोग यह संकल्प लें कि वे परूष वचन, वाग बाण पर आत्मनियंत्रण करेंगे। सामाजिक तथा सार्वजनिक हित के कार्यों में राजनीतिक ऊहापोह कम से कम तब तक तो नहीं ही करेंगे जब तक दिल्ली सांस लेने योग्य शहर का आकार न ग्रहण कर ले।
तुलसीदास ने एक जबर्दस्त सच्चाई का उद्गान करते हुए कहा - सुर नर मुनि सब की यह रीति स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती। दिल्ली में रहने वाले राज करने वाले महानुभावो कृपा कर अपने सही स्वार्थ को पहचानो। भारत की जनता जनार्दन ने दिल्ली भेज कर आपको राजसुख दिया है उस जनता की भी सुनो। आपके निर्वाचन क्षेत्र के कई संपन्न-विपन्न नंगे-भूखे तथा बेरोजगार लोग दिल्ली की सड़कों में घूम रहे हैं उन्हें पहचानो। अगर वे स्लम, झुग्गी झोंपड़ी में रहते हैं निराश्रित और असहाय हैं तो उनकी सही सही संख्या ज्ञात कर उनके योगक्षेम के लिये सुलभ शौचालय कार्यक्रम के प्रमुख बिन्देश्वर पाठक का स्मरण करो। दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ी व स्लम एरिया में रहने वाले चीथड़े बीनने वाले लोगों में कुछ लोग आपके निर्वाचन क्षेत्र के मूल निवासी हों दिल्ली आगये हों तो उनका योगक्षेम देखिये। दिल्ली शहर का इंतजाम अरविन्द केजरीवाल महाशय कर रहे हैं उन्हें अनुरोध कीजिये कि दिल्ली के बेघर लोगों का डाटा तैयार कर बेघर लोग भारत के किस किस हिस्से से दिल्ली आये हैं यह भी पता लगाया जाये। आपको भारत सरकार सालाना सांसद विकास निधि आवंटित करती ही होगी उसका दस प्रतिशत आप दिल्ली के लिये खर्च करें। दिल्ली को रहने लायक शहर बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करें। दिल्ली का इतिहास पांच हजार वर्ष पुराना खाण्डव वन दाह, शक्रप्रस्थ अथवा इन्द्रप्रस्थ का निर्माण देवता लोगों के वास्तुकार विश्वकर्मा थे। असुरों-दैत्यों के प्रतापी वास्तुकार मय दानव थे। भारत के वास्तु कला व इंजीनियरिंग से जुड़े लोग प्रति वर्ष 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती उत्साह पूर्वक मनाते हैं वास्तुकार मय दानव जयंती कोई नहीं मनाता। जब कृष्ण-अर्जुन खाण्डव दाह करा रहे थे उस वन में ही मय दानव रहता था। अर्जुन ने मय दानव की जिन्दगी बचाई उसे जलने नहीं दिया आग की लपटों से बाहर निकाल लिया। मय इस उपकार का बदला देना चाहता था। उसने अर्जुन से कहा - पार्थ आपने मुझे खाण्डव वन में जलने से बचाया है मैं कृतज्ञ हूँ। आपने मुझ पर जो उपकार किया है उसका निष्क्रय देना मैं अपना स्वधर्म मानता हूँ। अर्जुन ने मय से कहा - दानव श्रेष्ठ मय, कृपया योगेश्वर कृष्ण से वार्ता करो। मय कृष्ण के पास पहुँचा। कृष्ण ने सोच विचार कर मय से कहा - महाबली मय राजा युधिष्ठिर के चैत्य सभागृह का निर्माण करो। अपनी अद्भुत वास्तु योग्यता से राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के सभागार का निर्माण करो। इसी सभा भवन में जो वर्तमान में पाण्डवों का किला नाम से जाना जाता है दिल्ली का पहला दरबार लगा था जिसमें राजसूय यज्ञ के दौरान चेदिराज शिशुपाल ने राजसूय यज्ञ के अधिष्ठाता योगेश्वर कृष्ण को बनाये जाने का तीव्र विरोध करते हुए कृष्ण निंदा का पुलिंदा बयान कर डाला। शिशुपाल व कृष्ण मौसेरे भाई थे। कृष्ण ने अपनी मौसी को आश्वस्त किया था कि वे शिशुपाल के 100 अपराध तक माफ कर देंगे पर अपशब्द बोलना शिशुपाल ने छोड़ा नहीं परिणामस्वरूप कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध कर दिया। युधिष्ठिर के इन्द्रप्रस्थ के राजसूय यज्ञ के चार हजार वर्ष के अंतराल में पृथ्वीराज चौहान की दिल्ली ने अपना अस्तित्व प्रमाणित किया। यद्यपि पृथ्वीराज चौहान भारत की अन्दरूनी राजनीतिक शत्रुता के कारण गजनी से हार गये पर पृथ्वीराज की वीरगाथा का वर्णन चन्दबरदाई ने करते हुए गीत गाया - चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान। इस्लामी सल्तनत भारत के विभिन्न हिस्सों में मुगल सल्तनत सहित लगभग एक हजार वर्ष कारगर रही। ईस्ट इंडिया कंपनी व बर्तानी ताज की हुकूमत उन्नीसवीं व बीसवीं शताब्दी में भारत पर शासन करती रही। कोलकाता से बर्तानी राज दरबार दिल्ली आगया। बर्तानी सत्ता का अंत भारत विभाजन से हुआ जिसने दिल्ली की काया बदल डाली। पंजाब बाशिंदों के वे जो भारतीय मूल धर्म के मानने वाले थे उनका रेला आगया और दिल्ली की सूरत बदल गयी। स्थानीय लोगों के बजाय दिल्ली में पंजाब व सीमा प्रांत से आये हुए शरणार्थी दिल्ली के वासी बन गये। भारत की आजादी के पिछले साठ पैंसठ वर्षों में देश के कोने कोने से दिल्ली आने वाले लोगों का तांता बढ़ता रहा। वस्तुतः दिल्ली अब विशाल भारत का लघु भारत है। भारत के साढ़े छः लाख गांवों से हर गांव का व्यक्ति दिल्ली में मिल जायेगा इसलिये दिल्ली अब बहु भाषी, बहु धर्मावलंबी व बहु सांस्कृतिक आस्थान है। जिन जिन समस्याओं का सामना भारत के सुदूरस्थ क्षेत्र कर रहे हैं वे सभी दिल्ली में भी विद्यमान हैं इसलिये दिल्ली की बहुविध समस्याओं वाले सरोकारों का निर्णायक पथ खोजना फेडरल तरीका अपनाना ही समीचीन है। एक अच्छी बात यह हुई कि पंडित नेहरू की योजना प्रियता उनके निधन के पश्चात लगभग निष्क्रिय होगई। योजना आयोग में वह शक्तिस्त्रोत नहीं रहा जो पंडित नेहरू ने संकल्पित किया था। पंडित नेहरू राज्यों के मुख्यमंत्रियों से निरन्तर संवाद रखने वाले सुविज्ञ विचारक तथा लोकतंत्र के वाहक थे। उनके निधन के पश्चात राज्य के क्षत्रपों में धीरे धीरे शक्ति संपात होता गया। इंदिरा गांधी ने पंडित नेहरू के पश्चात दो कालखण्डों में लगभग पंद्रह वर्ष भारत का शासन चलाया पर वे लोकतंत्री के बजाय एकतंत्री नेतृत्व थीं। सत्ता के सारे सूत्र उनके व उनके किचन कैबिनेट में समा गये थे। देश जीहुजूरी वाला राष्ट्र बन गया। क्षत्रप व सुप्रीमो राजनेताओं का उदय होता गया। साझा सरकारों का जमाना आगया पूरे सोलह वर्ष साझा सरकारें चलीं। साझा सरकार संचालन पहले छः वर्ष अटल बिहारी वाजपेयी पूरी दक्षता से संपन्न किये। कालांतरी दस वर्ष प्रतिनिधि प्रधानमंत्री के तौर पर आर्थिकी विद्वान डाक्टर मनमोहन सिंह ने सरकार का नेतृृत्व किया पर वे स्वयं नेता नहीं थे। उनकी सत्ता की डोर श्रीमती सोनिया गांधी के हाथों में थी। सोलह वर्ष कहें या पच्चीस वर्ष के अंतराल में एक दलीय बहुमत वाली सरकार नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ हुई। मई 2016 में यह सरकार दो वर्ष पूरे करेगी। राजनीतिक समस्याओं के अलावा सिस्टम फेलियर का भी दिल्ली सहित समूचे भारत को सहना पड़ रहा है। बर्तानी राज का जिला स्तरीय शासन प्रबंध में दरारें पड़ गई हैं। राज्यों के क्षत्रप लोग जात बिरादरी राज प्रथा चलाना चाहते हैं पर उन्होंने चाणक्य का अर्थशास्त्र और महाभारत का शांति पर्व पढ़ा नहीं है। वे स्वहित साधन करना चाहते हैं पर केवल जातीय अथवा सांप्रदायिक राजनीतिक बारहखड़ी के जरिये उनकी राजनीतिक तथा प्रशासनिक गाड़ी पटरी से उतरती जारही है। विलोम स्थितियों में क्या सही सही तरीका है यह उन्हेें सूझ नहीं रहा है। राजपरिवारों व क्षत्रपों को मंत्रणा देने वाले सलाहकार भी ज्यादातर राजनीतिक चक्रव्यूह भेदन का महामंत्र नहीं जानते हैं इसलिये जो राजनीतिक व नौकरशाही अफरातफरी का बोलबाला होगया है उससे कैसे निबटा जाये यही यक्ष प्रश्न मुंह बाये खड़ा है। मैक्सिको, पेइचिंग तथा पेरिस शहरों में यातायात प्रयोगों का अंधानुकरण शायद ज्यादा लाभप्रद न भी हो इसलिये दिल्ली की समस्याओं के समाधान के लिये भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाये रखने के बजाय अरविन्द केजरीवाल को आम सहमति वाले राजनीतिक शांतिपाठ का वरण करना होगा। वे जब योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण सरीखे सटीक राजनीति दांवपेचों के व्यावहारिकी व वास्तविकी पर सत्ता की दौड़ में धावक न बनने वाले सलाहकारों की मंत्रणा लेंगे तभी वे दिल्ली के लोगों को उन्होंने जो वादे कर मत पाये हैं सरकार गठित की है उसके सटीक नतीजों का लाभार्जन कर पायेंगे। दिल्ली का यातायात प्रदूषण ही नहीं स्लम, झुग्गी झोंपड़ी जनित प्रूदषण, बहुमंजिली इमारतों में एयर कंडीशनर जनित प्रदूषण, जगह जगह डीजल जेनरेटरों द्वारा फैलाया जारहा प्रदूषण, कचरा जलाया जाने वाला प्रदूषण, स्थान स्थान पर बिल्डरों द्वारा बहुमंजिली इमारतों आवास गृहों के निर्माण में सीमेंट और रेते वगैरह द्वारा किया जारहा वायु प्रदूषण, शहर में भीमकाय वाहनों द्वारा किया जारहा प्रदूषण दिल्ली शहर को चारों तरफ से घेर चुके हैं इसलिये आम सहमति राज्यों के मुख्यमंत्रियों उनके दलों के सांसदों को विश्वास में लेकर ही अरविन्द केजरीवाल दिल्ली का पारिस्थितिक-पर्यावरणीय कायाकल्प कर सकते हैं। उन्हें नीति आयोग के चीफ ऐक्जीक्यूटिव अपने नामराशि पनगरिया महाशय को भी विश्वास में लेना होगा। पनगरिया महाशय राजनीतिज्ञ नहीं विशेषज्ञ हैं उनके मार्फत भारत राष्ट्र के घटक राज्य क्षत्रपों के जरिये व्यापक लोकमत के द्वारा ‘कार क्रेज कैपिटल’ नई दिल्ली का कायाकल्प किया जा सकता है बशर्त्ते अरविन्द केजरीवाल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का बात बात पर विरोध करना, वाणी पर संयम रखने वाले, विरोधी से भी संयत व्यवहार करने वाले, उच्च कोटि की याददाश्त रखने वाले नरेन्द्र मोदी से घृणा रहित व्यवहार करने की कला सीखें। मोदी व केजरीवाल अथवा मोदी व राहुल गांधी वैसा ही पीढ़ी अंतराल (Generation-Gap) है जैसा महात्मा गांधी और भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर में था। महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर दोनों - हरिजन या दलित उन्हें आप जो भी नाम देना चाहें उनका उत्कर्ष करना चाहते थे। लक्ष्य दोनों का एक था पर तरीके अलग अलग थे। महात्मा गांधी का व्यवहार सदा सर्वदा अपने तीव्र विरोधियों के लिये - मोहम्मद अली जिन्ना व बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के लिये घृणा रहित आत्मीयता का प्रतीक था पर दूसरी ओर से महात्मा पर कटाक्ष ही होते रहते थे। यह घटनाक्रम पिछली शताब्दी का है। पांच पीढ़ियां बीत चुकी हैं अरविन्द केजरीवाल व राहुल गांधी हिन्दुस्तान की राजनीतिक सत्ता के करीब तभी पहुंच सकते हैं जब वे राजनीतिक मंत्रदृष्टा का शांति पाठ करें तभी वे दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा का मार्ग अपने लिये आज नहीं बीस पच्चीस वर्ष पश्चात प्रशस्त कर पायेंगे।
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