चिंतन का पुनरावलोकन भारत की वैश्विक रणनीति हो।
हेनरिच हर्र लिखित पुस्तक (मूल लेखन जर्मन भाषा में) तिब्बत में सात साल Seven Years in Tibet की प्रस्तावना लिखते हुए परम पावन चौदहवें दलाई लामा ने 29 जनवरी 1982 को लिखा -
Prof. Henrich Herrer in one of those in the West who knows Tibet intimately. His book came at a time when there were many misconceptions about the life and culture of Tibet and most of the books available, then certainly did not help to clear away these wrong impressions.
Having been forced to come to Tibet under unfortunate circumstances, he chooses to live among our people and share their simple way of life. Thus he made many friends and is regarded with much affection.
I am happy that this book “Seven Years in Tibet” which gives a true and vivid picture of Tibet before 1959 is being reprinted when there is a renewed interest on Tibet.
हेनरी हर्र लिखित पुस्तक (तिब्बत में सात वर्ष) पुस्तक का अनुवाद जर्मनी भाषा से तिब्बती सहित 53 भाषाओं में हुआ है जिनमें से अंग्रेजी अनुवाद के दूसरे संस्करण में जिसे जर्मनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में रिचर्ड ग्रेन्स ने अनूदित किया पेन्गुईन पदनाम आई.एन.सी. न्यूयार्क द्वारा 1982 में प्रकाशित हुई। दलाई लामा ने अपने मित्र हेनरी हर्र को पहली जनवरी 1966 को आत्मीयतापूर्ण संबोधन में लिखा -
I wish you with all my heart every success at the opening of the Tibet exposition. I am sending on this occasion my personal representative in Europe Tibetan Phala my sister DshetsuenPena and my brother Lobsong Samten. You lived for seven years in Tibet and during this time you became one of us. You have three the best knowledge of our country and so are in a position to bring Tibetan Art and Culture to the Austrian people in as lively a way as possible.
I wish you with all my heart every success at the opening of the Tibet exposition. I am sending on this occasion my personal representative in Europe Tibetan Phala my sister Dshetsuen
I include in my prayers the wish that the exposition may be a complete success, Eleventh Month of the woolen serpents 22th day.
भारतीय पंचांग के अनुसार पहली जनवरी धनुर्धरार्क का 17 प्रविष्टे है। परम पावन दलाई लामा ने तिब्बती पंचांग का ग्यारहवां महीना इंगित किया है। तिब्बत के पड़ोसी तथा तिब्बत पर जबरन कब्जा जमाये रखने वाले कम्यूनिस्ट चीन से पहले में जो राजसत्ता चीन में शास्ता थी उसके अनुसार चांद्रवर्ष का माघ महीना जिसे भारत उत्तरायण-मकरार्क कहता है उसके माघ महीने की अमावस जिसे इलाहाबाद में मौनी अमावस कहा जाता है वह दिन जनवरी के उत्तरार्ध अथवा फरवरी के पूर्वार्ध में होता है। 1949 में राष्ट्रीय व सांस्कृतिक चीन का नया वर्ष 28 जनवरी 1949 को था जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने राष्ट्रवादी चीन प्रमुख चांग काई शेक को मुख्य भूमि से बहिष्कृत कर दिया। 1959 में जब दलाई लामा तिब्बत से पलायन कर भारत आये तब चीन का राष्ट्रीय नया वर्ष का पहला दिन 7 फरवरी 1959 को था। मौन अमावस के दिन ही हर बारहवें वर्ष कुंभ मेला लगता है। प्रति वर्ष मौनी अमावस को ही इलाहाबाद में गंगा नहान का तीसरा व महत्वपूर्ण मुहूर्त अमांत पर्व होता है। यही अमांत पर्व चीन का सांस्कृतिक व राष्ट्रीय नया साल का पहला दिन है। इस वर्ष यह पर्व 8 फरवरी 2016 के दिन सोमवती अमावस तथा इलाहाबादी मौनी अमावस को त्रिवेणी स्नान पर्व के अवसर पर चीन के लोगों ने उत्साहपूर्वक मनाया। चीन के वर्तमान सत्ताधिष्ठान ने चीन के नये साल के पहले दिन का विरोध नहीं किया केवल यही कहा कि चीन सरकारी मामलों के लिये ग्रेग्रेरियन कैलेंडर 1949 से लगातार मानता आया है पर देहाती चीन तथा मंदारिन भाषी चीन के लोगों की राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचाने की ताकत अनीश्वरवादी चीन का सत्ताधिष्ठान खो चुका है।
यह संयोग की बात है कि परम पावन दलाई लामा और उनके उस्ताद हेररिक हर्र दोनों का जन्मदिन 6 जुलाई है। दलाई लामा भारतीय पंचांग के अनुसार स्कंद षष्ठी - देवताओं के सेनापति स्कंद स्वामी का जन्मदिन जिसे कुमार षष्ठी भी कहा जाता है बंगाल के लोग उसे कर्दम षष्ठी कहते है, कर्दम - मनु शतरूपा के जामाता देवहूति के पति सांख्याचार्य कपिल के पिता तथा मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, ख्याति, भृगु, वशिष्ठ तथा अथर्व के श्वसुर थे। चौदहवें दलाई लामा के ध्यानधारणा के मूल में देव सेनापति स्कंद स्वामी अथवा कुमार स्वामी का अंश है जबकि चौदहवें दलाई लामा के उस्ताद हेनरिक हर्र का जन्मदिन 6 जुलाई 1912 को हुआ, उस दिन शीतलाष्टमी अथवा कालाष्टमी थी। आषाढ़ कृष्ण पक्ष था। सौरमास के अनुसार दोनों का जन्म 22 आषाढ़ ठहरता हैैैै। यदि 1912 में अधिकमास रहा होता तो वर्ष 366 दिन का होता। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार उस वर्ष 364 दिन का वर्ष था। प्रोफेसर हेनरिक हर्र के लिये परम पावन दलाई लामा ने प्रोफेसर शब्द का प्रयोग किया है। भारत में महात्मा गांधी प्राध्यापक समाज को आचार्य कहते थे। उनके महत्वूपर्ण आचार्य में आचार्य कृपलानी, आचार्य काका कालेलकर, आचार्य विनोबा भावे तथा आचार्य नरेन्ददेव ने अपने अपने कार्यक्षेत्र में विशेष सफलता अर्जित की। हेनरिक हर्र ने अपनी पुस्तक में परम पावन दलाई लामा के उस्ताद होने की बात कही है। वे अपने ग्रंथ के पंद्रहवें अध्याय में Tutor to Dalai Lama में अभिव्यक्त करते हैं कि यूरोप की विभिन्न शैलियों तथा प्रोजेक्टों को सही सही तरीके से उनके पुर्जे अलग अलग करना तथा स्वयं बिना किसी मदद के पुनः कार्य करने के योग्य बनाने को हेनरिक हर्र ने Reassembling कहा है जिसे परम पावन दलाई लामा स्वयं पुनर्योजित Reassemble कर लेते थे। तेरहवें दलाई लामा के समय से सर चार्ल्स वेल से परम पावन तेरहवें दलाई लामा की मैत्री से हेनरिक हर्र अवगत हो चुके थे। सर चार्ल्स वेल तिब्बत की स्वतंत्रता के परम पक्षधर थे। वे सिक्किम, तिब्बत और भूटान के लिये राजनीतिक संपर्क सूत्र थे। तेरहवें दलाई लामा और सर चार्ल्स वेल के मध्य मैत्री सूत्रपात सर चार्ल्स वेल की विशेषता थी। हेनरिक हर्र की राय में सर चार्ल्स वेल की पहले यूरोपीय श्वेतांग महाप्रभु थे जिन्होंने दलाई लामा संस्था पर विशेष अध्ययन किया था।
तिब्बत शब्द संस्कृत वाङमय के त्रिविष्टप शब्द का प्राकृत अथवा तद्भव रूप है। कश्यप ऋषि, कश्यप आश्रम के समीपवर्ती सागर जिसे पश्चिम के लोग Caspian Sea कश्यप सागर कहते हैं यूरोप और एशिया के मध्य भाग में स्थित है। कश्यप-अदिति संततियों का क्षेत्र त्रिविष्टप अथवा त्रिदश कहलाता था जिनके प्रमुख व्याक्तित्त्व शक्र, इंद्र, पुरन्दर, देवराज, मघवन तथा सहस्त्राक्ष संज्ञाओं से जाने जाते थे। अदिति पुत्रों की आदित्यधानी के अलावा दिति-कश्यप संतानों में प्रमुख व्यक्तित्त्व हिरण्यकश्यप का था जिसका भाई हिरण्याक्ष था। हिरण्यकश्यप ने अपनी दैत्यधानी भारत के गंगा बेसिन नगर हरिद्रोही (वर्तमान में यह जगह हरदोई कही जाती है) सुनिश्चित की। भारत में राजसंस्था प्रारंभकर्ता हिरण्यकश्यप था जिसका क्षीरसागर में शयन करने वाले महाविष्णु से बद्ध वैर था। महाविष्णु ने वाराहावतार के रूप में हिरण्यकश्यप के सहोदर जुड़वां अनुज हिरण्याक्ष का वध कर डाला था जिससे हिरण्यकश्यप अत्यंत कुपित था और उसने अपने राज्य में डुगडुगी पिटवा रखी थी कि कोई भी व्यक्ति गौपालन न करे एवं गौशाला भी न रखी जायें। याज्ञिक लोग यज्ञ न करने पायें, उन्हें यज्ञ करने से रोका जाये व यज्ञशालायें जला दी जायें। दैत्यराज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद महाविष्णु की नवधा भक्ति करने वाला व्यक्तित्त्व था। प्रह्लाद की नवधा भक्ति हिरण्यकश्यप को स्वीकार्य नहीं थी इसलिये दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तय कर लिया कि वह अपने पुत्र प्रह्लाद का वध कर देगा। ‘कर्म गति टारे नाहिं टरे’ हिरण्यकश्यप ने मनुष्य अथवा जानवर द्वारा न मारे जा सकने का वरदान अर्जित किया था, यह भी आश्वस्ति प्राप्त की थी कि उसकी मृत्यु न घर के अन्दर हो न बाहर, न दिन में हो न रात में। नवधा भक्ति करने वाले प्रह्लाद की रक्षा के लिये महाविष्णु ने नृसिंह के रूप में राजमहल के फाटक के खम्भे में न दिन में न रात में याने संध्याकाल में दैत्यराज हिरण्यकश्यप का वध कर डाला। दिति व दनु के पुत्रों में मौसेरे व सौतेले भाई होने के बावजूद एक ऐसा संबंध था जिसे श्रीकृष्ण ने अपने संगी साथी उद्धव के बारे में कहा - त्वं मे भृत्यः सुहृद सखाः। दनु के पुत्रों में शुंभ निशुंभ, नमुचि, त्रिपुर, वृषपर्वा, मय आदि प्रतापी तथा बलवान व्यक्तित्त्व थे। दिति नंदनों ने कश्यप सागर से दक्षिण पूर्व की ओर रूख किया। दनु पुत्रों में मायावी मय वास्तुविद थे जिन्होंने पार्थ अर्जुन के द्वारा उनकी शरीर रक्षा करने के उपलक्ष्य में इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर का राजप्रासाद निर्मित किया जहां युधिष्ठिर का महत्वपूर्ण राजसूय यज्ञ संपन्न हुआ। वैदिक सभ्यता के दो महत्वपूर्ण अंगों दैवी संपत् व आसुरी संपत् के तीन महत्वपूर्ण देश क्रमशः त्रिविष्टप वर्तमान तिब्बत दैवी संपत्, वर्तमान रसिया या रूस जिसका संस्कृत वाङमय नाम ऋषि देश है जहां की भाषा Old Russian Language में नब्बे प्रतिशत शब्द वैदिक तथा लौकिक संस्कृत से हैं, उसी प्रकार जर्मनी जिसका संस्कृत उच्चारण शर्मणि है वहां की पुरानी जर्मन भाषा में शब्दशक्ति का नब्बे प्रतिशत अंश भारतीय वाङमय पूर्ण है। जर्मनी में जन्मे मैक्समूलर ने बिना भारत आये इग्लैंड के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के माध्यम से ऋग्वेद का प्रकाशन कराया तथा अपना भारतीय वाङमय नाम मोक्षः मूलः तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को संस्कृत शब्द अक्षपत्तन इंगित किया। यूरप में भारत सभ्यता, भारत ज्ञान जिसे अंग्रेजी भाषाविद् Indology कहते हैं यूरप का चमकीला नक्षत्र है जिसने यूरप को भारतीय ज्ञान से अवगत कराया तथा विश्व में भारतीय वैदिक संस्कृति का नवीन स्त्रोत उपलब्ध कराया। एक पुराने ब्लाग में इस ब्लागर ने इंगित किया कि परम पावन चौदहवें दलाई लामा मार्च 1959 से निरंतर भारत भूमि में ध्यान-मार्ग तपस्या में व्यस्त हैं। मानव मात्र के धर्म (आत्म कर्त्तव्य) के चार चरणों में पहला चरण ध्यान पथ है, जिसे भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर को बताया था कि धर्म ही मनुष्य मात्र की विशेषता है और मनुष्य मात्र धर्म का ध्यान मार्ग ही सर्वोच्च मानव धर्मिता है। ध्यान करने वाला व्यक्ति पुरूष हो या स्त्री किसी भी नस्ल का, किसी भी जाति का, दुनियां के प्रचलित आस्था वर्ग Religion Group का हो अपने आपको आचार्य चार्वाक की तरह ईश्वर हीन सत्ता का सूत्र ही क्यों न समझता हो याने अपने आपको या समूह के व्यक्तियों को Athiest ही क्यों न कहता हो, ध्यान धर्म प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। ध्यान धर्म ही ऐसा समुच्चय है जिसमें संशय तथा स्यातवाद के लिये कोई स्थान नहीं है। परम पावन चौदहवें दलाई लामा इसी ध्यान धर्म के अग्रेचर हैं। चीन के लोग परम पावन दलाई लामा से त्रस्त हैं। अनीश्वरवादी होने के बावजूद अपनी नौकरशाही के उपयोग के लिये Chinese Law of Incarnation पुनरावतरण वाद मनुष्य द्वारा बनाये गये फर्जी कानून से संचालित नहीं हो सकता इसलिये यही मानना पड़ेगा कि चीन तिब्बत पर जबर्दस्ती कब्जा बनाये रखने के लिये प्रचण्ड राजनीतिक पाखंड का मार्ग अपना रहा है। हेनरिच हर्र ने यूरप के लोगों को तिब्बत की ध्यान धर्म धारणा से जोड़ा है। तिब्बत में जो सांस्कृतिक व राजनीतिक अनाचार पिछले पौने सात दशक से निरंतर चालू है उसकी पोल खुल चुकी है। मंदारिन भाषी बहुसंख्यक चीनी समाज अपने सांस्कृतिक नव वर्ष इलाहाबादी मौनी अमावस की तरफ अग्रसर हुआ है। उसने इस वर्ष चीन का नया साल 8 फरवरी 2016 के दिन धूमधाम से मनाया। अपने शासकों को बता दिया कि ‘जननी जन्मभूमि गरीयसी’ चीन के लोगों की जिजीविषा है। चीन के लोगों को अपना नया साल मनाने से निरीश्वरवादी चीनी शास्ता समाज रोक नहीं सका। यह स्पष्ट है कि तिब्बत पर चीन की बनावटी पकड़ कमजोर होगई है। चीन का जनसामान्य यह मानता है कि भारत के इलाहाबाद नगर से उसका चोली दामन सरीखा नाता है। इलाहाबाद में माघी अमावस को मौनी अमावस भी कहा जाता हैै। लोकमान्यता यह है कि मौनी अमावस के दिन ही अमांत पर्व में देव दानव संघर्ष में अमृत कलश से बूंदें गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम त्रिवेणी के जल व जमीन में गिरीं। यही वह मुहूर्त्त है जब अमावस्या समाप्ति पर होती है। प्रयाग का मुख्य स्नान पर्व यही समय है। लोकमान्यता तथा मौजूदा China या चीन नाम से पुकारे जाने वाले भू भौगोलिक देश में ही क्षीर सागर भी था जिसके मंथन से धन्वंतरि महाराज अमृत कलश लिये एक महत्वपूर्ण रत्न के रूप में क्षीरसागर मंथन से मिले थे। महाविष्णु का उद्देश्य भी अदिति की संतति को शक्तिमंत बनाना था। तब सफलता, कर्मठता एवं ज्ञान के क्षेत्र में अदिति के पुत्रों आदित्यों से दिति और दनु के पुत्र बहुत आगे थे। अदिति को यह स्थिति ऊहापोह पूर्ण प्रतीत होती थी इसलिये उसने कश्यप ऋषि के परामर्श से फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पड़वा से लेकर त्रयोदशी पर्यन्त व्रत किया था। उसे महाविष्णु ने वामनावतार लेकर कृतकृत्य किया था। कोई भी लड़ाई केवल कोरे युद्ध से जीती नहीं भी जा सकती। इसके दो उदाहरण - देव दानव युद्ध और मगधनरेश जरासंध से युद्ध भिक्षा है। कृष्ण ने जरासंध से कहा - हमें युद्ध भिक्षा दो। नर्मदा के तट पर भी वामन ने तीन कदम जमीन की ही भीख मांगी थी इसलिये भीख को एक मामूली आचरण मानना विवेकसंगत नहीं है। इस चराचर जगत में हरेक घटना का अपना महत्व है।
अब हमें अपने मूल विषय तिब्बत की सार्वभौम स्वतंत्रता की तरफ बढ़ना है। हेनरिच हर्र की कृति -Seven Years in Tibet पर ब्राडविट ने एक मोशन पिक्चर मूवी निर्मित की है। हम पहले इंगित कर चुके हैं कि मूल जर्मन पुस्तक का अंग्रेजी व तिब्बती सहित तिरेपन भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध है। संभवतः मंदारिन, रूसी सहित यूरप की सभी भाषाओं में पुस्तक अनूदित है। मूवी भी यूरप की सभी भाषाओं में अब उपलब्ध है। तिब्बत और भारत के बीच हिमालय खड़ा है। अभी यह ब्लागर यह पता नहीं लगा पाया है कि क्या भारत की संविधान अनूसूचित सभी 22 भाषाओं में से किसी भाषा में तिब्बत में सात साल नामक पुस्तक अनूदित हुई है। क्या तिरेपन भाषाओं में नैपाली और भूटानी भाषाओं में भी पुस्तक उपलब्ध है। लेह लद्दाख, कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम व अरूणाचल से तिब्बत की सीमा मिलती है। भारत में भी एक लाख से ज्यादा तिब्बती हैं इसलिये Seven Years in Tibet का भाषांतरण भारतीय भाषाओं में यथा कश्मीरी, डोंगरी, हिन्दी, नैपाली में उपलब्ध कराया जाना चाहिये। तिब्बत भारत का पड़ोसी राष्ट्र है जिसकी स्वतंत्रता के परम पक्षधर सर रिचर्ड वेल थे जो तिब्बत, भूटान व सिक्किम के लिये राजनीतिक संपर्क कर्ता बर्तानी शासक थे जिन्होंने परम पावन तेरहवें दलाई लामा को प्रभावित किया तथा पश्चिम को यह जानकारी दी कि Dalai Lama Incarnation Process तिब्बत के लिये कितना महत्वपूर्ण विषय है। डाक्टर राममनोहर लोहिया सरीखे भारतीय विदेश नीति के ज्ञाता और व्याख्याता की यह पुष्ट मान्यता थी कि दक्षिणी तिब्बत तकलाकोट, दरकोट, मानसरोवर, राक्षसताल तथा कैलास पर्वत के पार्श्ववर्ती क्षेत्र की मालगुजारी अस्कोट के रजवार के मार्फत भारतीय खजाना - तब सबट्रेजरी पिथौरागढ़ में जमा होती थी। डाक्टर लोहिया ने यह प्रसंग पंडित नेहरू के संज्ञान में भी प्रस्तुत किया था। आज के युग का ज्वलंत यक्ष प्रश्न कम्यूनिस्ट चीन द्वारा सन 2006-07 में Re-Incarnation जो मूलतः अवतारवाद धारणा का एक उपांग है भारत के हिमालयी राज्यों में Incarnation, Re-Incarnation अवधारणा कोई नया मामला नहीं है। स्वामी विवेकानंद का ईश्वर बोध कोलकाता स्थित कालीबाड़ी के अलावा कुमांऊँ के कोसी के तट पर स्थित काकड़ीघाट शिवालय जहां उन्होंने रात बिताई तथा अगले दिन अल्मोड़ा की चढ़ाई पर चढ़ते समय उन्हें प्यास लगी। मुसलमान फकीर ने उनकी पिपासा शांत की। अल्मोड़ा से आगे जब वे कैलास मानसरोवर की ओर बढ़ रहे थे उनको बेरीनाग नामक स्थान में सधुक्कड़ी जानने वाले ब्रह्मानन्दी जयवल्लभ तथा वंशीवादक गंगावल्लभ मिले। जयवल्लभ खड़ताल बजा कर ब्रह्मानन्दी भजन गाया करते सारे हिन्दुस्तान के तीर्थों की यात्रा संपन्न किये हुए यती थे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को भजन सुनाया तत्पश्चात स्वामी जी के साथ दोनों भजनानंदी हो लिये। उन्होंने रात्रि निवास चिड़ियाखान के योगिनी आश्रम में किया। कमतोली नामक गांव में जागर लगा था। जगरिया गारहा था भगरिये भाग देते जारहे थे डंगरिया अंगारे खाता जारहा था पर उसके हाथ मुंह नहीं जल रहे थे। डंगरिया में स्थानिक देवता का अंशकालिक अवतरण पर्व था। इस घटना को देख स्वामी विवेकानंद में ईश्वर के अस्तित्व की आस्था बलवती हुई। सर रिचर्ड वेल ने पश्चिम को तेरहवें दलाई लामा संबंधी हकीकतें बयान कीं। दशावतार मत्स्य, वाराह, कूर्म, नृसिंह, वामन, रेणुकेय जामदग्न्य राम, दाशरथि राम, देवकी-वसुदेव नंदन योगेश्वर श्रीकृष्ण, लिच्छिवि खस गणतंत्र के मुखिया शाक्य नंदन गौतम तथा भविष्य में संभल पत्तन मुख्य के पुत्र कल्कि अवतार चर्चा भारतीय आध्यात्मिक साहित्य का अंग है। दशावतार के अलावा महाविष्णु के शेष चौदह अवतार विवरण भी पौराणिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अंग्रेजी और यूरप की अन्य भाषाओं तथा यूरोपीय संस्कृति को पुनर्जन्म, जन्मजन्मान्तर की श्रंखला पुनरावतार आंशिक पुनरावतार पर अपने मजहबी दृष्टिकोण के कारण अंचभा होता है। 1960 में डाक्टर संपूर्णानंद ने उत्तराखंड डिवीजन सृजित कर उत्तरकाशी, चमोली तथा पिथौरागढ़ के तीन सीमावर्ती जिलों को सृजित किया। पिथौरागढ़ जिले के प्रथम जिलाधिकारी जीवन चंद्र पांडे अल्मोड़ा के प्रख्यात वकील के पुत्र थे। यह परिवार पंडित नेहरू के संपर्क में रहता था। पंडित नेहरू ने जीवन चंद्र पांडे और स्वतंत्रता सेनानी लीलाधर शर्मा पर्वतीय को कहा - कुमांऊँ की सांस्कृतिक झांकी 26 जनवरी 1962 को दिखाओ। चौकोड़ी के पास तमक्यूड़ा के ढोली परिवार ने अपने छोलिया नृत्य से पंडित नेहरू को अपनी ओर आकर्षित किया। लीलाधर शर्मा पंडित नेहरू के साथ जेल रहे थे। पंडित नेहरू उनकी योग्यता से परिचित थे, उन्होंने उनसे कहा कि ढोली धनीराम को कहो कि वह ढोल मेरे गले में डाले तथा मेरे सिर पर पगड़ी बांधे। पंडित नेहरू ने ढोल बजाया तथा छोलिया नृत्यकार के नृत्य की भूरि भूरि प्रशंसा की। आज के युग में चीन ने Re-Incarnation पर एक कानूनी बहस नौकरशाही के मार्फत Re-Incarnation को अमली जामा देने के लिये शुरू की है। आवश्यकता इस बात की लगती है कि भारत सरकार हिमालयी राज्यों की सरकारों का ध्यानाकर्षण परम पावन दलाई लामा Re-Incarnation Theory के समानांतर कुमांऊँ, गढ़वाल व हिमाचल के गांवों में गाये जाने वाले जागर के गीत जो आमतौर पर रामायण तथा महाभारत कथाओं पर आश्रित हैं गांवों के जगरिया, भंगरिया तथा डंगरिया एवं विशेष शैली से ढोल वादन कर डंगरिया में स्थानीय देवता का अंशकालिक अवतरण, विभिन्न देवी देवताओं के मंदिरों में संपन्न होने वाले नवरात्र महोत्सव जो असल में गुजरात की गरबा शैली के नौरता नृत्य हैं, भारतीय सांस्कृतिक मंत्रालय के मार्फत अवतारवाद, पुनरावतार शैली जिसे चीन Re-Incarnation कह रहा है उस पर गहराई वाला अध्ययन किया जाये। उत्तराखंड का सांस्कृतिक निदेशालय उस परंपरा का भी निर्वाह नहीं कर पारहा है जो उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते समय उ.प्र. शासन करता था। इस ब्लागर ने ब्राडपिट की मोशन पिक्चर मूवी जो कि तिब्बत में सात साल पर आधारित है कैलिफोर्निया में देखी। पहली जरूरत यह मालूम होती है कि जम्मू कश्मीर, विशेष तौर पर डोंगरी भाषी जम्मू निवासी तथा कश्मीरी पंडितों की आस्था, हिमाचल तथा उत्तराखंड के लोगों द्वारा विभिन्न मंदिरों में उत्सव, नौरते, जागर भगवद्गीता के अनुसार ‘यजन्ते सात्विका देवान् यक्ष रक्षांसि राजसा प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना’। जम्मू, कश्मीरी पंडित, हिमाचल के लोगों, गढ़वाल व कुमांऊँ में यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत तथा पिशाच पूजा करने वाले लोगों की आस्था पर विशेष अध्ययन करने के लिये भारत सरकार Himalayan Worship Enquiry Commission का गठन कर तिब्बत में सात साल पुस्तक में जो आख्यान Re-Incarnation तथा Re-Incarnate के Short period Re-Incarnation सरीखे विषयों पर डाक्यूमेंटरी फिल्म तैयार की जाये तथा हेरनिच हर्र की पुस्तक तिब्बत में सात साल का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किये जाने का संकल्प भी लिया जाये ताकि तिब्बत की वास्तविकी भारतवासियों को ज्ञात हो। आज के आधुनिक भारत को तिब्बत जिसे भारतवासी त्रिविष्टप कहते रहे हैं उसके मौजूदा दुःखदर्द को समझने के लिये सांस्कृतिक भारतीय वाङमय का सहारा लेना अत्यंत जरूरी है। तिब्बत को यूरप और अंग्रेजी के चश्मे से देखने के बजाय त्रिविष्टप के ध्यान धर्म से समझने की तात्कालिक जरूरत है जिसका पहला पाठ ही अवतारवाद व पुनरावतरण एवं चौरासी लाख योनियों में जीवधारी के भ्रमण का तत्व निहित है। पाश्चात्य नजरिया इसे Incarnation, Re-Incarnation Theory से जांचता है। वस्तुतः पश्चिम के लोग पुनर्जन्म में विश्वास ही नहीं करते हैं। उनके मजहब में पुनर्जन्म के लिये कोई चिंतन पोखर नहीं है इसलिये जो भारतवासी अवतारवाद यथा महाविष्णु के दशावतार या चौबीस अवतार पुनर्जन्मवाद - आदि शंकर को भारतवासी भगवान शंकर का अवतार मानते हैं। भारत के अंग्रेजी विद् विद्वान कहते हैं कि शंकराचार्य ईसा की आठवीं शताब्दी में हुए पर सर्वपल्ली सर राधाकृष्णन सरीखे भारतीय विद्वान यह मानते हैं कि जिस तरह आदि शंकर ने निरीश्वरवादी गौतम बुद्ध को महाविष्णु का नवां अवतार स्थापित किया वे वस्तुतः ईसा व मोहम्मद के अवतरण के पश्चात अवतरित हुए होते तो आदि शंकर ईसा मसीह व मोहम्मद साहेब को भी महाविष्णु का अवतार घोषित कर देते। वस्तुतः आदि शंकर का जन्म ईसा से चार सौ वर्ष पूर्व हुआ था जब भारत में बौद्ध धर्म की पताका फहरा रही थी। आदि शंकर ने महावीर स्वामी तथा गौतम बुद्ध को ईश्वर का ही अंशावतार माना। इसलिये जो भारतीय मानते हैं कि आदि शंकर का जन्म वैशाख सुदी पंचमी श्रीकृष्ण संवत् (हनुमान प्रसाद पोद्दार का मानना है कि इस समय श्रीकृष्ण संवत् 5242 है) आदि शंकर श्रीकृष्ण संवत् 3726 में वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी को जन्मे। तैलुगु विद्वान प्रोफेसर राव ने अपने तर्कों से आदि शंकर का जन्म ईसा से 400 वर्ष पूर्व निश्चित किया है। जबकि मैकोलाइट भारतीय अंग्रेजी भद्रलोक की मान्यता है कि आदि शंकर आठवीं सदी में हुए। गनीमत इतनी है कि मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक शंकराचार्य के अस्तित्व को नकारता नहीं है। इसलिये ऐसे महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गीता रहस्य लेखक बाल गंगाधर तिलक, डाक्टर संपूर्णानंद तथा भगवान सिंह के मत तथा मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक इतिहासकारों के बीच कारगर संवाद कायम किया जाये। सांस्कृतिक भारत तथा मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक भारत के बीच एक क्रमिक संवाद की तात्कालिक आवश्यकता है। अभी भारत में विचार पोखरों के दो समूह हैं एक समूह प्रखर हिन्दुत्व विरोधी है दूसरा प्रखर हिन्दुत्व समर्थक। इन दोनों विचार पोखरों के बीच मध्यमार्ग का निर्धारण करने के लिये भारत को विनोबा के जीवन दर्शन विनोबा के इतिहास दर्शन तथा विनोबा का वह चिंतन कि पहले उन बिन्दुओं पर बहस हो जिनमें वैचारिक उग्रतापूर्ण विरोधाभास नहीं है। सहमति के बिन्दुओं पर पहुंचने के लिये आधुनिक भारत को इतिहास के विगत एक हजार वर्षों के बारे में तटस्थ होकर विचार करना पड़ेगा। सबको साथ लेकर चलने की दृष्टि रखने वाले - सबका साथ तथा सबका विकास का प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की सोच भारत को Soft State से Strong Smart State में तब्दील कर सकती है।
तिब्बत कालचक्रान्तर जिसे अंग्रेजी भाषा में Calander कहा जाता है भारतीय साठ संवत्सर कश्यप-अदिति आदित्यों में, आदित्यों के देवगुरू बृहस्पति तथा मेष संक्रांति जो आमतौर पर रात दिन का बराबर का होने के कारण तब ग्रेग्रेरियन XIII कैलेंडर के मुताबिक प्रतिवर्ष ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के चौथे महीने की तेरहवीं तारीख को पड़ती पर जब चांद्र वर्ष हर चौथे वर्ष तेरह चांद्र मास वाला होता मेष संक्रांति 14 अप्रेल को पड़ती तथा कालचक्रसरण के भारतीय प्रतिमान के अनुसार जब जब मेष संक्रांति पर्व 14 अप्रेल को होता सौर वर्ष 366 दिन का होता। ग्रेग्रेरियन कैलेंडर 366 दिन वाले वर्ष जिसे ईस्वी सन में चार का भाग देने से भाग शेष शून्य रहता है उसे 29 दिन वाली फरवरी सहित लीप ईयर कहते हैं। लीप ईयर में ग्रेग्रेरियन कैलेंडर का हर चौथा साल 366 दिन का होता है शेष पूर्व वही अथवा परवर्ती वर्ष 365 दिन वाले होते हैं। मंगोलियायी चंगेज खां जिसने चीन पर आक्रमण किया चीन, तिब्बत, सिकियांग, सिक्किम तथा भूटान पर मंगोलियायी प्रभाव छोड़ा। तिब्बत मूलतः भारतीय कालचक्र का अनुसरण करने वाला देश है परन्तु चीन तथा मंगोलियायी प्रभाव भी तिब्बत पर है। चीनी नया वर्ष भारत में मनाई जाने वाली मौनी अमावस माघ बदी अमावस के अमांत पर्व को नये साल का पहला दिन मानता है। तिब्बत भी कालचक्रान्तर के अनुसार माघ की अमावस जिसे इलाहाबाद में मौनी अमावस कहा जाता है मौनी अमावस के अमांत पर्व को तिब्बती पंचांग का नववर्ष का पहला दिन मानता है। भारत के माघ को तिब्बत न्यू फाल्गुन का ब्लो, चैत्र को नगदा, वैशाख को सागा, ज्येष्ठ को नान, आषाढ़ को चुस्त्येद, श्रावण को द्रोमिक, भाद्र को त्रम, आश्विन को स्थष्कर, कार्तिक को मिन्दुग, मार्गशीर्ष को श्यो, पौष को उपल नाम से पुकारता है। चीन की तरह तिब्बती मास अमांत पर्व पर शुरू होता है। मंगोलियन होरजला कालचक्रान्तरण पद्धति भी तिब्बत स्वीकारता है। इस प्रकार तिब्बत में मेष संक्रांति से शुरू होने वाला भारत आधारित साठ संवत्सर वाला पंचांग वर्ष के अलावा चीन के द्वारा मनाये जाने वाले मौनी अमावस अमांत पर्व से शुरू होने वाला वर्ष तथा आंशिक रूप में मंगोलियायी होरजला भी प्रयुक्त होता है। बृहस्पति, साठ संवत्सर तथा मेष संक्रांति से शुरू वर्ष के कारण यह मानने में सटीक तार्किकता है कि तिब्बत अर्थात त्रिविष्टप की संस्कृति पर भारतीय प्रभाव हैै। क्षीर सागर मंथन तथा क्षीर सागर में महाविष्णु के सहस्त्र फण शेषनाग में शयन तिब्बती तथा चीनी समाज Wood Snake, Fire Snake, Earth Snake, Mattle Snake तथा Water Snake सर्पाधारित पांच श्रेणियों में विभक्त किया है इसलिये तिब्बती संस्कृति विषुवत संक्रांति 13 या 14 अप्रेल साठों संवत्सर, देवगुरू बृहस्पति का महत्व के साथ क्षीर सागर मंथन जन्य अमांत पर्व व मंगोलियन होरजला का अद्भुत संगम है। तिब्बत को सटीक समझने के लिये आधुनिक भारत को Seven Years in Tibet का भारतीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध कराना चाहिये तथा तिब्बत संबंधी मूवी को भारतीय भाषाओं में भी डब कराने का संकल्प किया जाना चाहिये।
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