Sunday, 8 May 2016

बिहार के नये क्षत्रप नितीश बाबू

और उनकी आर.एस.एसविरोधी मुहिम में राजनीतिक दल भा..पा. के खिलाफ मौजूदा विरोधियों को एकजुट करना

बिहार के दोहरे सुप्रीमो-क्षत्रप नितीश बाबू की नई मुहिम भाजपा रा.स्व.संघ से लोहा लेने की रणनीति कांग्रेस-नेतृत्व में साम्यवादी-सहकार तथा भाजपा-इतर राजनीतिक चिंतन पोखरों को एकजुट करने का आह्वान हिमालय से टकराने का उपक्रम है। नितीश बाबू की वर्तमान छवि को व्यावहारिक वास्तविकि से समझने की जरूरत है। नितीश बाबू पारिवारिक-राजकरण अद्वितीय सुप्रीमो पिछड़ों के मसीहा लालू प्रसाद यादव की तरह बाबू जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति के उत्पाद हैं। लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक पिटारे में बिहार के तीस फीसदी से कुछ अधिक यादव-मुस्लिम संप्रदायों का समुच्चय है। मंडल आयोग संस्तुतियों के उद्भट लाभार्थी बाबू लालू प्रसाद यादव ही हैं। बाबू राजेन्द्र प्रसाद जब पंडित नेहरू मंत्रिमंडल के प्रतिष्ठित सदस्य थे और संविधान परिषद् अध्यक्षता हेतु सुनिश्चित हुए, उन्होंने महात्मा गांधी की दिवंगति 30 जनवरी 1948 के पश्चात जो पहला प्रशासनिक निर्णय लिया वह गजानन नाईक को भारत सरकार का ताड़गुड़ सलाहकार नियुक्त करना था। महात्मा गांधी की नशामुक्त भारत में ताड़ी जो ताड़ व खजूरों के पेड़ों से आसेतु हिमाचल खींची जाती थी, ताड़ी के बजाय ताजे ताड़ रस को अद्वितीय पेय-नीरा बनाने का श्रेय गजानन नाईक को ही जाता है जिन्होंने ताड़ी खींचने वाले लोगों में ताड़ी की लत को छुड़वा कर ताड़ उद्यमिता का श्रीगणेश वार्धा में कार्यरत गांधी सेवा संघ के तत्वावधान में प्रारंभ किया था। 1948 से 1953 तक पांच वर्षों में गजानन नाईक ने ताड़ उद्यमिता को शीर्ष स्तर तक पहुंचाया। 1953 में भारत सरकार ने अ.भा. ग्रामोद्योग मंडल का गठन वैकुंठ ल. मेहता की सदारत में किया। भारत में टैक्सटाइल उद्यमिता के एक प्रमुख स्तंभ प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया को भारत सरकार ने अ.भा.खा.ग्रा.मंडल का सदस्य सचिव नियुक्त किया। प्राणलाल कापड़िया खादी व ग्रामोद्योगों के लिये समर्पित कपड़ा मिल मालिक थे, उनमें सेठ अंबालाल की दीदी अनुसूया बेन का मजूर महाजन समुच्चय स्वीकार्य था। गुलजारी लाल नंदा मजूर महाजन संगठन के दूसरे महत्वपूर्ण सूत्रधार थे। कपड़ा मिल मालिकों व हथकरघा उद्यमिता के समर्थकों में प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया अद्वितीय व्यक्तित्त्व थे। सेठ अंबालाल की तरह कापड़िया भी तेरापंथी जैन थे। जीवन के उत्तरार्ध में वे अवधूत भेष में अपरिग्रह के उपासक बने। जब तक वैकुंठ ल. मेहता व प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया अ.भा.खा.ग्रा.मंडल व के.वी.आई. से जुड़े रहे, भारत सरकार के ताड़गुड़ सलाहकार रहे गजानन नाईक की तूती बोलती थी। ताड़गुड़ उद्यमिता के उत्पाद खादी ग्रामोद्योग आयोग की उपलब्धि थे तथा करोड़ों रूपये मूल्य के ताड़ उत्पाद निर्यात हुआ करते थे। 1963 के पश्चात जब खादी ग्रामोद्योग आयोग की सदारत सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस अध्यक्ष रहे उछंगराय नवलकिशोर ढेबर खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष तैनात हुए, अपने नौ वर्ष के कार्यकाल में गजानन नाईक से विरोध मोल लिया। गजानन नाईक की कार्य स्वतंत्रता ढेबर भाई ने रोक डाली। फलता फूलता ताड़ उद्योग लड़खड़़ा गया। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद बिहार में ताड़ी समस्या को समझते थे। उन्होंने ताड़गुड़ खजूरी गुड़ तथा नीरा उद्यमिता के लिये गजानन नाईक का ध्यानाकर्षण किया था। बिहार में भी नीरा, ताड़गुड़, खजूरी गुड़ तथा ताड़ पत्ता उद्यमिता बढ़ी ताड़ी प्रकोप कम हुआ परंतु 1963 के पश्चात सब कुछ उलट गया। एक जमाना था जब बिहार का खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम दूसरे क्रम में था पहला स्थान उत्तर प्रदेश का था। आज इन दोनों राज्यों में खादी ग्रामोद्योग उद्यमिता लुप्त प्रायः है। 2005 में जब बाबू नितीश कुमार ने बिहार की बागडोर संभाली उन्होंने खादी ग्रामोद्योगों पर ध्यान देकर बिहार खादी ग्रामोद्योग मंडल की कमान बाबू जयप्रकाश शिष्य को सौंपी। शायद राजनीतिक कारणों से बाबू नितीश कुमार बिहार के कुटीर उद्योगो, ग्रामोद्योगों तथा हथकरघा पर ज्यादा ध्यान न दे पाये हों और कुटीर-उद्यमिता योगक्षेम देखने वाले राजनीतिक दृष्टि से तैनात कर्ताधर्ता अपना, अपने परिकजन समूह सहित अनुयायियों के हित साधन में ‘माइक्रो क्राफ्ट’ नाम से जाने जाते रहे उद्यमियों की न्यूनतम जरूरतें या तो भूल गये या राजनीतिक ऊहापोह में कुटीर व ग्रामीण उद्यमिता की मौलिक जरूरतें समझ ही नहीं पाये जिससे बिहार की कुटीर व ग्रामीण उद्यमिता शौचालय कार्यक्रम की तरह केवल कागजी उपक्रम बन गया और गांवों की महिला समाज को सरकारी उद्घोषों के बावजूद खुले में शौच के संत्रास से बिहार सरकार मुक्त नहीं कर पायी।
नितीश बाबू ने एक अच्छा शानदार काम किया, राज्य में शराब बन्दी कराई। शराब बन्दी को कारगर रूप से चलाने के लिये ऐसे लोग जिन्हें शराब पिये बिना जिन्दा रहना कठिन है उन लोगों की पहचान बहुत जरूरी है क्योंकि आज भारत भर में शराब संत्रास इतना बढ़ गया है कि शराब बन्दी को करीने से लागू करने के लिये ऐसे लोगों को चिह्नित करना पड़ेगा जो शराब के बिना जिन्दा नहीं रह सकते इसलिये बिहार के आबकारी विभाग को ऐसे लोगों को जिन्हें जिन्दा रहने के लिये शराब जरूरी है उन्हें निर्दिष्ट करें कि जो व्यक्ति मदिरा सेवन के बिना जीवित रहना कठिन मानते हैं वे यदि आवेदन करें तो उनका डाक्टरी परीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि शराब सेवन प्रार्थी का जीवन का आवश्यक कृत्य है बिना मदिरा सेवन प्रार्थी जीवित नहीं रह सकता। ऐसे लोगों को निर्धारित मात्रा में जिन्दा रहने के लिये मदिरा आपूर्ति का रोडमैप तैयार किया जाना चाहिये। बिहार में यदि नितीश बाबू की कल्पना की नशाबंदी कारगर हुई तो बिहार के गांवों की तस्वीर बदलने में बिहार की महिला श्रम शक्ति बिहार में खुले मैदान में शौच करने के संत्रास से मुक्ति पाने का रास्ता भी इसलिये खोज सकती है कि बिहार की नौकरशाही में एक ऐसी भावना भरी जा सकती है कि बिहार भारत के समृद्ध राज्यों की पंगत का राही बन सकता है। बिहार की धरती के लाल बिन्देश्वर पाठक ने सुलभ शौचालय कार्यक्रम को सफल बनाया है। बिहार के राजनेता उन्हें आमंत्रित करें, बिहार की महिल शक्ति अपने प्रतिनिधियों को बिहार विधानसभा तथा लोकसभा में भेजते समय उनसे प्रतिज्ञा करायें कि वे अपनी विधायक विकास निधि या सांसद विकास निधि का 30 प्रतिशत शौचालय निर्माण में निवेशित करायेंगे तथा अपने जनप्रतिनिधियों से यह वादा करायेंगे कि यदि सांसद-विधायक विकास निधि का 50 प्रतिशत वे ग्रामीण महिला शौचालय संवर्धन में खर्च न करा पाये तो उनके मतदाताओं को अधिकार होगा कि जनप्रतिनिधित्व के उत्तरदायित्व से वे त्यागी हो जायेंगे। नितीश बाबू मद्य निषेध व निर्मल ग्राम संबंधी संकल्प यदि सांसद व विधायक संपूर्त न कर पाये नौकरशाही उनके मार्ग में कांटे बिछाती रही तो जो बात सुश्री सुधा वर्गीज कहती आरही हैं बिहार की पारम्परिक विचार पोखर वाली महिला शक्ति संपात राजकर्ताओं के प्रति घोर अविश्वास का वातावरण निर्मित कर विषम परिस्थितियां भी सृजित कर सकती हैं इसलिये यदि बाबू नितीश कुमार को अपनी ऊर्जा को बिहार की महिला श्रम शक्ति तथा स्वच्छ एवं निर्मल ग्राम से विरत कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा के उत्कर्ष को रोकने में व्यय करते हैं उन्हें बिहार की लोकसत्ता शायद ही क्षमादान दे।
नितीश बाबू को बारह राजपरिवारों के सुप्रीमो हितों तथा परिजन हितों की भी समीक्षा करनी जरूरी होगी। इन राजपरिवारों कालग्नार करूणानिधि राजघराना, महरूम शेख अब्दुल्ला, उनके बेटे फारूख अब्दुल्ला तथा शेख पौत्र उमर अब्दुल्ला सहित कश्मीर की जमीनी समस्या तथा जम्मू तथा लेह लद्दाख के राजनीतिक हालात भी देखने होंगे। डाक्टर फारूख अब्दुल्ला ने एक महत्वपूर्ण बिन्दु पर चर्चा करते हुए संकेत दिया कि राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता। उनकी बात में कौटिल्य का अर्थशास्त्रीय राजधर्म का गूढ़ तत्व है। वे कांग्रेस की नेतृत्व की बात करते हैं पर वर्तमान में कांग्रेस इंदिरा राजीव सोनिया राहुल चतुर्मूर्ति का राजघराना है। इंदिरा और राजीव के ‘बलिदानों’ को सोनिया गांधी भुनाना चाहती हैं। सर ह्यूम द्वारा स्थापित कांग्रेस में ऐनी बेसेन्ट से जवाहर लाल नेहरू तक 1924 में बेलगांव कांग्रेस में महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी सहित अनेक भारतीय महापुरूषों ने सक्षम नेतृत्व दिया था। स्वराजिस्ट मोतीलाल नेहरू की राजनीति से हट कर जवाहरलाल नेहरू ने 26 जनवरी 1930 को रावी के तट पर पूर्ण स्वराज का बिगुल बजाया था। तब की भारतीय राजनीति में पंडित नेहरू ने महात्मा गांधी का नेतृत्व स्वीकारा था तथा कांग्रेस को जन जन का राजनीतिक मंच बनाने में महात्मा गांधी की मुहिम को आगे बढ़ाया था। गांधी की कांग्रेस पंडित नेहरू के जीवनकाल तक ही एक समर्थ राजनीतिक सत्ता रही। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को दुत्कार कर परिवार राज्य का श्रीगणेश किया। महाराष्ट्र का राजपरिवार बाल ठाकरे जीवनपर्यन्त राजा बनाने वाल शक्तिस्त्रोत था। बाल ठाकरे की दिवंगत होने राज ठाकरे की मेढ़ी महाराष्ट्र निर्माण सेना तथा उद्धव नीत शिवसेना में वह कुवत नहीं रही जो बाल ठाकरे में थी। फिर भी ठाकरे राजघराना अंगद का पांव जमाये हुए है। बीजू पटनायक नवीन पटनायक राजपरिवार उत्कल में अपनी स्थिति मजबूत किये है। यह एक यक्ष प्रश्न है कि क्या नवीन पटनायक नितीश बाबू की आर.एस.एस. व भा.ज.पा. विरोधी मुहिम में कांग्रेस-कम्यूनिस्ट युति का साथ देंगे ? प्रकाश सिंह बादल - सुखबीर बादल राजघराना ने अभी भाजपा से नाता नहीं तोड़ा है यह भी परखने वाला प्रसंग है कि क्या अकाली-राजनीति कांग्रेस नेतृत्व को स्वीकारेगी ? 
जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री अपने महरूम अब्बाजान मुफ्ती सईद के पदचिह्नों पर चल रही हैं। उनकी सरकार में भाजपा भी सम्मिलित है। सईद साहब की विरासत तथा उनकी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ा रहीं महबूबा मुफ्ती क्या कांग्रेस सदारत को स्वीकारेंगी ? पिछड़ा वर्ग के पहले अंशकालिक प्रधानमंत्री पद के लाभग्राही देवगौड़ा-कुमार स्वामी राजपरिवार संभवतः भाजपा व कांग्रेस से बराबर दूरी बनाये रखने का संकल्पकर्ता नेतृत्व है। मुलायम सिंह-अखिलेश यादव राजघराना - समाजवादी राजतंत्र कल्पना करता है। डाक्टर लोेहिया को अपना आराध्य मानता है परन्तु सैफई-समारोह यह जाहिर करते हैं कि मुलायम सिंह-अखिलेश यादव राजघराना - अगर कांग्रेस के साथ जाता है तो गुरू शिष्या प्रयोजन वाली आत्म स्मारक निर्मात्री दलित नेता मायावती और मुलायम सिंह में से एक ही तो कांग्रेस की तरफ मुखातिब होगा। वहीं गुरू शिष्या पंरपरा वाली जयललिता उस ओर कदम नहीं बढ़ायेगी जिस ओर द्रविड़ कड़गम नेता राजपरिवार कालग्नार करूणानिधि जायेंगे अभी तो प्रकट तौर पर करूणानिधि कांग्रेस के साथ हैं जयललिता उस ओर नजर नहीं दौड़ायेंगी। लालू प्रसाद यादव राजघराना - दाम्पत्य राज का प्रतीक है। वह हवा पहचानता है उसका दुुश्मन बीजेपी है पर कांग्रेस के साथ तथा नितीश कुमार जी को कब तक बिहार की बागडोर संभालते रहने का संकल्प लेगा। लालू प्रसाद यादव का मुख्य लक्ष्य आत्म राजपरिवार संवर्धन है। वे बिहार की नब्ज पहचानते हैं पर उनका वोट फीसद तिहाई बिहार से कम है। एन.टी. रामाराव चंद्रबाबू नायडू ससुर-दामाद राजपरिवार कांग्रेस के साथ जायेगा यह संदेहास्पद लगता है। नवोदित तैलंगाना राव राजपरिवार का ऊंट किस करवट बैठेगा यह देखते रहना है ? पश्चिम बंग की इकला चलो लोकनेत्री ममता बनर्जी - कांग्रेस कम्यूनिस्ट युति का साथ क्यों देगी ? क्षत्रप शैली के नये सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल महाशय की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है परंतु केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव तथा वकील प्रशांत भूषण को आ.आ.पा. से दूध की मक्खी की तरह लांछित किया। अन्ना हजारे भी शायद ही अरविन्द केजरीवाल महाशय की राजनीति को सराहें देखते रहिये। नितीश बाबू का भाजपा रास्वसंघ क्या आकार लेता है। नितीश बाबू को आज जो गौरव मिला है इसके पीछे अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवानी की समवेत राजनीति थी। भाजपा की ही मदद से नितीश बाबू को बिहार में सन 2005 से लगातार राज करने का सुअवसर मिला। भाजपा की बदौलत केन्द्रीय रेलमंत्री के तौर पर अपनी मेढ़ें मजबूत कर पाये। अभी वे लौहपुरूष बिहार के पहले सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सहायता से बिहार के भाग्यविधाता हैं। लालू प्रसाद जी किसी भी दिन उनकी सरकार को गिरा कर अपने सुपुत्र को राजसिंहासन में आसीन कर सकते हैं। इसलिये नितीश बाबू को अपने व्यक्तिगत इतिहास का पुनरावलोकन व पुनर्वाचन करने के पश्चात ही आर एस एस व भाजपा से लड़ने की अगुआई करनी चाहिये, कहीं टांय टांय फिस न हो जाये। 
नितीश बाबू जिस राजनीतिक मंच से बिहार में राज कर रहे हैं उसके मुखिया शरद यादव महाशय की जन्म व कर्म भूमि मधुवनी बिहार आने से पहले मध्यप्रदेश का वह इलाका था जहां भरत-जड़भरत ने धूनी जमाई थी। भरत के कारण ही भारत नाम से विख्यात भूमि का जबलपुर इलाका अनेक नजरियों से महत्वपूर्ण होने के साथ साथ भारत का मध्यवर्ती क्षेत्र है जिसकी जड़ें प्राचेतस वाल्मीकि आश्रम ब्रह्मावर्त-बिठूर में थीं। हिन्दुस्तान की पारंपरिक पौराणिक गाथा के अनुसार ब्रह्मावर्त या बिठूर ऋषभ देव के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण होगया है। ऋषभ को जैनी हिन्दुस्तानी पहला तीर्थंकर मानते हैं। सनातन धर्मावलंबी समाज की सोच है कि ऋषभ महाविष्णु के चौबीस अवतारों में से एक थे। बिठूर ही जम्बूद्वीप का मूल देश होने के कारण भारत के इतिहास, भारत के वर्तमान तथा भावी भारत का केन्द्र बिन्दु है। यहीं से भरत जबलपुर की तरफ अग्रसर हुए थे जहां के रहने वाले शरद यादव हैं जिन्होंने भारत के मौजूदा मध्यप्रदेश में समाजवादी चिंतनधारा को निरंतर प्रवाहशील बनाये रखा। शरद यादव जार्ज फर्नांडीस व मधु लिमये की तरह बिहार के लिये बाहरी थे - बिहारी नहीं। नितीश बाबू ने बिहार के लोगों की आत्मा को जाग्रत करने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को बाहरी कह कर लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव के शक्ति संपात ने उन्हें बिहार विधानसभा में इकहत्तर सीटें जितवा भी दीं पर वे रहे लालू प्रसाद जी के राजद से पीछे ही। लालू प्रसाद जी ने कहा था कि वे प्रधानमंत्री का विरोध करते रहेंगे, नितीश बाबू बिहार का राजतंत्र चलायेंगे। अब यह महसूस होता है कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के राजद विधायकों, राजद मंत्रिमंडलीय सदस्यों से बाबू नितीश कुमार का तालमेल नहीं बैठ पारहा है इसलिये उन्होंने नया उद्घोष किया कि कांग्रेस-समाजवादी युति से कांग्रेस के नेतृत्च में भाजपा की बहुमत सरकार का सामना करने का संकल्प कर लिया। बाबू नितीश कुमार ने जो रास्ता पकड़ा है उसमें उनका सहयोग करने वाले कौन से राजघराने आगे आयेंगे। जयललिता तथा मायावती गुरू शिष्या परंपरा के साथ साथ राजनीतिक रणनीति व विकास को नया मंत्र देने वाले बीजू पटनायक के यशस्वी पुत्र नवीन पटनायक क्या बाबू नितीश कुमार का साथ देंगे ? अंततोगत्वा भाजपा के विरोध में नितीश बाबू किन किन सुप्रीमो को क्षेत्रीय क्षत्रप से कांग्रेस-कम्यूनिस्ट युति वाले भाजपा विरोधी मुहिम से जोड़ पायेंगे तथा अंततोगत्वा नेतृत्व नेतृत्व तो व्यक्ति करता है राजनीतिक दल तो जन समुच्चय मात्र है। एनडीटीवी अपने मसालेदार मीडिया के मार्फत कह रहे हैं कि - मैं नितीश कुमार - बिहारी नेता हूँ। बिहार से बाहरी लोकनेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की नेतृत्व शक्ति तथा धाराप्रवाह हिन्दी में बोलने की उनकी क्षमता का सामना केवल कांग्रेस कर सकती है क्योंकि संभवतः नितीश बाबू की राय में बिहारी नेतृत्व में वह कूवत नहीं है कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का सामना कर सके इसलिये उन्होंने रोमन लिपि लिखा हिन्दी भाषण पढ़ कर पिछले सत्रह अठारह दिनों से कांग्रेस पार्टी को नेतृत्व दे रही हैं। उन्होंने कांग्रेस नेता के रूप में सन 2004 से 2014 तक प्रतिनिधि प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह के मार्फत भारत पर राज तो किया पर जिम्मेवारी से भागती रहीं। क्या वे 43 सहयोगी लोकसभा सांसदों के सहयोग से बाबू नितीश कुमार के सपने को साकार कर पायेंगी ? एक मां की हैसियत से उनकी मनोकामना अपने इकलौते बेटे राहुल गांधी को हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होकर आत्मसंतोष प्राप्त करना है। पी. चिदंबरम सहित कांग्रेस के जो काबिल नेता हैं उन पर सोनिया जी विश्वास नहीं करतीं इसलिये सशक्त विरोधी दल लोकतंत्र की पहली आवश्यकता है कि विरोध करने वाले रणनीतिकारों में बिन्दुवार विचार होना चाहिये। इस समय लोकसभा में अ.भा. दलों के रूप में केवल सत्तारूढ़ भाजपा ही सामर्थ्यवान है। प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस विरोध पक्ष के नेता का पद बाजाप्ता पाने के लिये लोकसभा सदस्य संख्या का दशांश तक भी नहीं पहुंच पायी। उसे 44 सीटों पर ही अटकना पड़ गया। शेष दल जिनमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जयललिता का अन्ना डीएमके, शिवसेना आदि सभी गैर भाजपाई दल वे भाजपा के सहयोगी हों या विरोधी सभी 40 का आंकड़ा पार नहीं कर पाये। भाजपा से संविद करने वाले राजनीतिक दलों सहित भाजपा के विरोधी राजनीतिक दलों की सदस्य संख्या दो सौ साठ से ऊपर है। उन राजनीतिक दलों में भी एक दूसरे की टांग खींचने का उपक्रम चलता रहता है। पंडित नेहरू की कांग्रेस के साथ कांग्रेस नेतृत्व पंडित नेहरू से उनके राजनीतिक विरोधी बाबू जयप्रकाश नारायण, डाक्टर राममनोहर लोहिया, आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी से पंडित नेहरू के दीर्घकालीन राजनीतिक संबंध थे। वे नेहरू जी के व्यक्तिगत शत्रुतापूर्ण विरोधी नहीं थे। इंदिरा राज के बाद हर विरोधी को भीषण शत्रु का दर्जा दिया गया, मनोमालिन्य बढ़ा। अटल बिहारी वाजपेयी की वक्तृत्वता के पंडित नेहरू प्रशंसक थे। अटल बिहारी भी पंडित नेहरू का समादर करते थे। महात्मा गांधी अनर्गल आलोचक उनके समकालीन गुजराती भाषी शिया मुसलमान कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना थे। जिन्ना का गांधी विरोध इकतरफा था। गांधी के मानस मेें जिन्ना के लिये कोई दुर्भावना या द्वेष नहीं था। क्या नितीश बाबू जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का पुनरावलोकन कर भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाने का भी उपक्रम करेंगे ? उन्हें बिहार की राजनीति से दिल्ली की राजनीति आकर्षित कर रही है पर उनका राजनीतिक भूतकाल अत्यंत संदिग्ध है। बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है कि क्या कांग्रेस के दमदार नेता नितीश कुमार का यकीन कर पायेंगे ? क्या स्वयं कांग्रेस संरक्षिका श्रीमती सोनिया गांधी व उनके सुपुत्र राहुल गांधी यह हिम्मत जुटा पायेंगे कि साम्यवादियों, नितीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, एम. करूणानिधि, फारूख अब्दुल्ला तथा शरद पवार को अपनी ओर बनाये रख पायेंगे ? साथ ही आग और पानी सरीखा वैर पालने वाले मायावती बनाम मुलायम, जयललिता बनाम एम. करूणानिधि के बीच पुल निर्माण का काम नितीश बाबू कर पायेंगे ? कहीं नितीश बाबू को घर व घाट दोनों जगहों से मुक्त करने की कामना करने वाले लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव बिहार से नितीश बाबू की मेढ़ी को दिल्ली में झोंकने के लिये नया शंखनाद तो नहीं कर रहे ? लालू प्रसाद यादव के 80 विधायक कहीं यह मंत्रणा तो नहीं कर रहे कि मुख्यमंत्री राजद का हो क्योंकि राजद महागठबंधन का सबसे बड़ा दल है ? बाबू नितीश कुमार को अपने कदम फूंक फूंक कर बढ़ाने होंगे। अगर उन्हें भाजपा के सांसद व सिने संसार से जुडे़ व्यक्तित्त्व का खुला समर्थन मिला तो बाबू नितीश कुमार कहां तक पहुंच पायेंगे, यह कालचक्र ही सुनिश्चित करेगा। जो भी हो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो आगामी 12 अक्टूबर को विजयादशमी 2024 के दिन शताब्दी पूर्ण समारोह विजयादशमी 2025 तक निरंतर एक वर्ष पर्यन्त करेगा, उसे अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षिक, बौद्धिक तथा लोकोपकारी कृत्यों का इतिहास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित महानुभावों व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आलोचकों का ज्ञान वर्धन करने के लिये तैयारी करनी चाहिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघ संचालक श्रीमन् मोहन भागवत महाशय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शतपूर्ति से पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सौ वर्ष का सजीव इतिहास पूर्ण यथातथ्य निरूपण करना चाहिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों तथा कार्यक्रमों से असहमति रखने वाले इतिहासकारों व विचारकों का भी आह्वान करना चाहिये और सरकारी स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का सामर्थ्यवान, अंबुदसमान संगठन है उसमें हिम्मतपूर्वक ‘निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय’ अपने निंदकों की विचारधारा पर भी मनन कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों के इतिहास को आने वाली पीढ़ियों के ज्ञानवर्धन के लिये भारत की हर भाषा व हर लिपि में उपलब्ध कराने का भगीरथ प्रयास कर भारतीय राष्ट्रवादिता पर विश्वव्यापी बहस शुरू करनी चाहिये। 
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

No comments:

Post a Comment