मूत्रम् तु नीलवर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मतृम्
अाज नीलगाय] सुअर व बन्दरों की संरक्षा क्यों जरूरी है ?
अाज नीलगाय] सुअर व बन्दरों की संरक्षा क्यों जरूरी है ?
नीलगाय, सुअर और बन्दरों को मारने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वन एवं जलवायु बदलाव मंत्रालय के 1 दिसंबर 2015 को जारी अधिसूचना, इसी मंत्रालय के दूसरी अधिसूचना 3 फरवरी 2015 तथा 24 मई 2016 की अधिसूचना के विरूद्ध याचिका यद्यपि अधिसूचना मात्र एक वर्ष या 365 दिनों के लिये प्रभावी है। याचिकाकर्ता गौरी मौलेखी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने न्यायमूर्ति आदर्श कुमार तथा न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अवकाश पीठ के समक्ष याचिका पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया है तथा अवकाश पीठ ने इसी सप्ताह प्रसंग को सूचीबद्ध किये जाने की मांग पर विचार भी किया है। नीलगाय, बन्दर व जंगली सुअर को घातक पशु घोषित किये जाने की अधिसूचना का विरोध भी हुआ है। यह खबर 16 जून 2016 के पंजाब केसरी ने अपने समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर प्रकाशित की है। इसी अखबार के शुक्रवार 10 जून 2016 के अंक के पहले पृष्ठ पर मेनका - जावड़ेकर आमने सामने शीर्षक से खबर छपी थी। अखबार ने लिखा - बिहार में 250 से अधिक नीलगाय के मारे जाने पर प्रधानमंत्री मोदी जी के दो मंत्रालय भिड़ गये।
पंचगव्य
कानपुर गौशाला सोसाइटी के सभी गौशालाओं में ग्यारह हजार से ज्यादा गौवें हैं। यह गौशाला गंगातट पर भौति में पिछले लगभग डेढ़ सौ वर्ष से अनवरत चल रही है। कानपुर के सभी बनियों सहित माहेश्वरी बनियां का इस गौशाला से लगाव रहा है। कानपुर के उद्योगपति कर्म से उपराम लेने वाले पुरूषोत्तम तोषणीवाल से इस ब्लागर का परिचय खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के जरिये था। तीन वर्ष पहले तोषणीवाल ने इस ब्लागर को कहा - वे सालाना तीन करोड़ रूपये मूल्य का गोमूत्र बाबा रामदेव के पतंजलि अधिष्ठान को उपलब्ध करा रहे हैं। इस ब्लागर ने उन्हें निवेदन किया कि बाबा रामदेव के पंचगव्य को और सामर्थ्य देने के लिये हमें वेद मार्ग का अनुसरण करना होगा। गोमूत्रम्, गोमयम् क्षीरम् दधि सर्पि कुशोदकम् निर्दिष्टम् पंचगव्यम् च पवित्रम् कायशोधनात्। आगे पंचगव्य विधि का ब्यौरा देते हुए कहा गया है -
मूत्रम् तु नीलवर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मृतम्
पयश्च तु ताम्रवर्णायाः श्वेताया दधि संस्मृतम्
कपिलाया घृतम् ग्राह्यम् अलाभे सर्ववर्णानाम् कपिलैका प्रशस्यते।
आगे पंचगव्य के बारे में मात्रा व सटीक पंचगव्य निर्माण के लिये सताईसों नक्षत्रों के आधार पर कहा गया है -
मूत्रस्येक पलम् तदर्धम् गोमयम् क्षीरम् सप्तपलम् दद्यात
दधिः त्रिपल मुच्यते आज्यस्येक पलम् दद्यात पलंमेकम् कुशोदकम्।
सब मिला कर साढ़े तेरह पल इसे व्यावहारिक रूप देने के लिये नीलगाय का मूत्र दो पल, काली गाय का गोबर एक पल, ताम्बे के रंग वाली गाय का दूध चौदह पल, श्वेत गाय का दही छः पल, कपिला गाय का घी दो पल तथा कुशोदक दो पल। ये सब मिला कर सत्ताईस हिस्से होते हैं जो अश्विनी से लेकर रेवती तक सत्ताईस नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये गायें नीलगाय के अलावा पालतू देसी गायें हैं। जर्सी गाय तथा संकर गाय का गोबर, दूध, दही, घी आदि कारगर पंचगव्य के लिये निषिद्ध है।
नीलवर्णाया गौमूत्र
नीलगाय के गोमूत्र के अलावा शेष जो गोबर दूध दही घी तथा कुशोदक हैं उन्हें निर्दिष्ट विधि से प्राप्त किया जा सकता है। नील गाय आमतौर पर फसल को रौंद देती है। नील गाय का उज्वल पक्ष उसका गोमूत्र है जो पंचगव्य का मुख्य कारक है। पंचगव्य विधिविधान पूर्वक निर्मित किया जाये तथा प्रत्येक शनिवार को नहाने से पहले पंचगव्य का मालिश किया जाये एवं दो घंटे बाद स्नान किया जाये। इस पंचगव्य का स्नान करने वाले व्यक्ति को न तो कर्क रोग व्याधि या कैंसर ग्रस्त रोगी व एच.आई.वी. का हो संत्रास सतायेगा इसलिये भारत सरकार को पंचगव्य वितरक बाबा रामदेव का ध्यानाकर्षण कर प्रभावोत्पादक पंचगव्य का निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने का अनुरोध करना चाहिये। केन्द्रीय सरकार तथा घटक राज्य सरकारें श्वेत क्रांति के लिये जरसी गौ का सहारा ले रही हैं यदि केन्द्र तथा घटक राज्य सरकारों को देसी गायों की नस्ल संरक्षा को बढ़ावा देना हो तो जरसी गाय - बीफ भोज तथा यदा कदा मैड काउ सरीखी आपदाओं से बचने के उपाय देसी गायों की नस्ल में ही मिल सकते हैं।
उत्तराखंड के हरिद्वार में नीलगाय संत्रास
उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जिले में पड़ोस के बिजनौर जिले तथा ऊधम सिंह नगर जिले में नील गायें हैं। कम से कम हरिद्वार जिले की नील गायों को बाड़ों में रख कर उनका जो गोमूत्र प्राप्त होगा उसका उपयोग बाबा रामदेव जी महाराज के अधिष्ठान द्वारा किया जा सकता है। पंचगव्य का निर्माण यथाविधि संपन्न किये जाने से कैंसर व एच आई वी के संत्रास से समाज को मुक्ति मिल सकती है। बाबा रामदेव नीलगाय के गोमूत्र सहित पंचगव्य निर्माण के लिये तैयार तो हों ताकि विश्व में उनकी यशस्विता बढ़े। उत्तराखंड के लोकनेता हरीश रावत महाशय कहते हैं कि सुअरों बन्दरों तथा हरिद्वार में नील गायों से उन्हें राहत मिले। हरिद्वार का क्षेत्रफल 2360 वर्ग किलोमीटर आबादी सवा उन्नीस लाख से ज्यादा है। आबादी का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 800 से अधिक है। आबादी का घनत्व पूरे उत्तराखंड के लिये 189 मात्र है। उत्तराखंड के लोकप्रिय नेता हरीश रावत की जन्मभूमि कुमांऊँ का वह इलाका है जिसे पाली पछांऊँ कहा जाता है। वे कहते हैं सुअर व बन्दर पहाड़ों की खेतीबाड़ी उजाड़ रहे हैं। पंडित नेहरू 27 मई 1964 के दिन देहरादून में ही दिवंगत हुए। उनका आत्मिक लगाव देहरादून से था। वे महाशय हरीश रावत की जन्मभूमि तथा कर्मभूमि कुमांऊँ के रानीखेेत इलाके से भी अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया में चौकोट से अस्कोट तक एक पूरा अध्याय दिया है। जब तक पंडित नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे उत्तर प्रदेश की बागडोर लौहपुरूष चंद्रभानु गुप्ता के हाथ थी। दोनों राजनीतिज्ञ पाली पछांऊँ को प्रिय भूमि मानते थे। तब तक कुमांऊँ में बन्दरों व सुअरों का प्रकोप लगभग शून्य था। महाशय हरीश रावत जी कृपापूर्वक पुनरावलोकन करें कि सुअरों व बन्दरों की पीड़ा का संवर्धन कहीं उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के पश्चात तो नहीं हुआ है। वे अस्सी साला बन्दोबस्त के गौचर पनघट के हकहकूक तथा कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़़वाल के नौ हजार गांवों में जो बन्दोबस्त सन 1880 में पूर्ण हुआ उसकी संस्तुतियां रपटें फिर खोल कर देखें। उन्हें सुअर व बन्दर प्रकोप की असलियत ज्ञात करने में सहूलियत होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात गढ़वाल व कुमांऊँ के छः जिले जो तिब्बत तथा नैपाल सीमा से जुड़े हैं उनकी दिशा दशा में पलायन का प्रभाव पड़ा है। आज की तात्कालिक जरूरत यह है कि कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़़वाल के 9000 गांवों में से कितने गांव निर्जन होगये हैं तथा वे वर्तमान के किन जिलों में हैं इसे राष्ट्रीय हित की दृष्टि से देखा जाये न कि राजनीतिक दलों के राजनैतिक पैंतरों से। कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़़वाल के पूर्णतः पर्वतीय गांवों के लिये दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न तैलफाट व सैलफाट वाला प्रकरण है। उत्तराखंड सरकार तैलफाट व सैलफाट गांवों की जमीन मिट्टी पत्थर वनस्पति व स्थायी तौर पर तैलफाट या सैलफाट के गांवों में या जो गांव अब कस्बों में बदल गये हैं उनके लिये कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़़वाल राष्ट्रीय प्रयोगशाला स्थापित करने के लिये भारत सरकार से अनुरोध किया जाये।
प्राणिमात्र की जीव संरक्षा तथा वन्यजीव संरक्षा
श्रीमती मेनका गांधी भारत के उन लोगों में अग्रणी हैं जो जीव हिंसा एवं वन्य पशु हिंसा सहित सभी प्रकार की हिंसाओं से बचने के उपाय खोजती रहती हैं। बिहार के अढ़ाई सौ या तीन सौ नील गायों को बिहार सरकार द्वारा मार गिराये जाने के प्रसंग को उन्होंने पूरी ताकत से उठाया है। पर्यावरण तथा वन मंत्री जावड़ेकर ने नील गायों को मारे जाने का समर्थन किया। जब दो मंत्रालयों का विचार भेद सामने आया है तो माननीय प्रधानमंत्री महोदय का नील गाय बन्दर व सुअरों को मार गिराये जाने के प्रसंग पर तत्काल विचार किया जाना भारत देश के राष्ट्रीय हित में है। नील गाय का गोमूत्र अत्यंत हितकारी है। राजस्थान सरकार भी मानती है कि नील गायें खेती को चौपट कर रही हैं। यही सोच बाबू नितीश कुमार महाशय की भी रही होगी जिन्होंने नील गायों को मारने का काम अपने हाथों में लिया है। जहां नील गायें ज्यादा हैं वहां नील गायों के लिये बाड़ों का प्रबन्ध किया जाना राष्ट्रीय हित में है। नील गाय का गोमूत्र अत्यंत हितकारी है उसके प्रयोग के लिये प्रधानमंत्री जी को संबंधित मंत्रालयों को साथ ही छत्तीसों घटक राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में जहां जहां नील गाय संत्रास व्याप्त है गहन विचार विमर्श करना चाहिये ताकि गो वंश का समुचित संरक्षण हो सके। नील गाय का गोमूत्र को भारतीय सेवा संरक्षा का महत्वपूर्ण अंग घोषित करने के लिये नील गाय बाड़े नील गाय गोमूत्र तथा नील गाय के गोबर की विशेषतायें तात्कालिक अध्ययन का विषय है। इसलिये मेनका गांधी की पशु संरक्षा, वनस्पति संरक्षा संबंधित मुद्दों को भारतीय संघ के घटक राज्यों की सरकारों के संज्ञान में लाया जाना भारत की राष्ट्रीय आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं व वनस्पति एवं पशु पक्षी संबंधी जो पारपंरिक आलेख या कहावतें हैं उन पर भी विचार किया जाना चाहिये। घाघ व घाघनी का संवाद -
शुक्रवार की बादरी रहे शनीचर छाय, कहे घाघ सुन घाघनी बिन बरसे नहिं जाय।
ज्योंही सुप्रीम कोर्ट द्वारा विचाराधीन याचिका पर अदालत की राय व्यक्त की जाती है यदि न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल तथा एल. नागेश्वर राव की की अवकाश पीठ राष्ट्रीय महत्व के इस प्रसंग को प्रमुख न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ को विचारार्थ न भेज कर तात्कालिक निर्णय देती है तो केन्द्र सरकार को इसे वाजिब महत्व देते हुए पंचगव्य प्रसंग को राष्ट्रीय स्वास्थ्य का कारक सूत्र घोषित करने हेतु विचार करना चाहिये।
इस ब्लागर ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री महाशय के संज्ञान में नील गाय के गोमूत्र सहित पंचगव्य निर्माण प्रकरण उनके विचारार्थ प्रस्तुत किया। मध्य प्रदेश सरकार ने पंचगव्य के विषय में नील गाय गोमूत्र सहित कृष्णा गौ गोबर ताम्रवर्णी गौ दुग्ध श्वेताया दधि कपिलाया आज्य तथा कुशोदक मिला कर पंचगव्य निर्माण की दिशा में क्या कोई प्रयास किया ? इसका कोई विवरण न अखबारों में छपा न मध्य प्रदेश सरकार ने ही इस ब्लागर को कभी बताया कि उनका क्या मत है ? इसलिये पंचगव्य के प्रसंग में बाबा रामदेव ने जो उपलब्धियां प्राप्त की हैं उन्हें अथातो योग जिज्ञासा के समानांतर निर्धारित विधि से यदि गांव गांव में पंचगव्य तथा पंचामृत निर्माण के लिये गौ पालकों का सहयोग लेना गौ पालकों को आजीविका भी मिले श्वेत क्रांति तथा पंचगव्य एवं पंचामृत दो अलग अलग विषय हैं। पंचगव्य तथा पंचामृत निर्माण विधि जरसी गाय, संकर गाय के दूध दही घी गोबर तथा गोमूत्र से संबंधित प्रसंग नहीं हैं। मैड काउ का जलवा तो लोग देख चुके हैं। भारत में भी लोग अपने विरोधियों के विरोध की आग में घी डालने का उपक्रम कर रहे हैं जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण बीफ भोज और महिषासुर स्तुति है। पंचगव्य तथा पंचामृत संबंधी प्रसंग व्यक्ति नर हो या नारी के व्यक्तिगत स्वास्थ्य लाभ और अपने कृत्य के लिये कृत संकल्प लेना है। परस्पर विरोधी आचरणों से राजनीतिक ऊहापोह को जन्म मिलता है। समस्या का समाधान नहीं निकलता इसलिये पंचगव्य व पंचामृत ये दोनों विषय व्यक्ति के अपने जीवन स्वास्थ्य व मानसिकता के अंग हैं। पंचगव्य व पंचामृत तथा गांव के सामूहिक शौचालयों सहित पारिवारिक शौचालयों को निर्मल तथा स्वच्छ ग्राम निर्धारित करने के लिये गांव के साझा गोबर गैस संयत्र से व्यक्तिगत पारिवारिक व सामूहिक शौचालयों को जोड़ कर गांव की ऊर्जा शक्ति विस्तार का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। भारत में सुलभ शौचालय कार्यक्रम के अग्रणी बिन्देश्वर पाठक का क्रियात्मक सहयोग बिन्देश्वर बाबू के गृहराज्य बिहार के अलावा भारत के सभी राज्यों के मतदाताओं को राष्ट्रीय ग्राम स्वच्छता अभियान को गांव गांव बनाने के लिये विधायकों सांसदों से अपनी विधायक निधि का 50 प्रतिशत शौचालयों के वास्ते उपलब्ध कराने का वादा लेना चाहिये। मतदाताओं का नैतिक दबाव जब लोकप्रतिनिधियों पर पड़ेगा राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान को गति मिलेगी। इसलिये भी पंचगव्य अभियान तथा पंचामृत अभियान जहां व्यक्ति को बलिष्ठ तथा आधिव्याधि से मुक्त रखेगा वहीं पंचामृत के पान से अकाल मृत्यु अपमृत्यु का भय भी समाप्त हो जायेगा। जब वाहन चलाने वाला व्यक्ति मदिरापान के बजाय पंचामृत पान कर अपने वाहन को चलाना शुरू करेगा समूचे देश में अकाल मृत्यु अपमृत्यु व अल्पमृत्यु भय से स्थायी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इसलिये भी कमखर्च में में ग्रामीण रोजगार संवर्धन का मार्ग प्रशस्त करते हुए पंचगव्य व पंचामृत योग मार्ग का नया रास्ता है। भारत के धर्मों में अकार उकार तथा मकार को ओंकार कहा जाता है। ओंकार श्वास प्रश्वास प्रक्रिया का अंग है व्यक्ति जितनी बार सांस लेता है तथा सांसें बाहर छोड़ता है उसमें नयी शक्ति का संपात हुआ करता है। इसलिये ओंकार को सोहम से जोड़ कर देखने की जरूरत है। यह प्रक्रिया शरीर के श्वास प्रश्वास का अंग है। इसका जीवात्मा के आत्म तत्व से संबंध है इसलिये ओंकार को सनातन धर्म से ऊपर के अस्तित्व वाली विद्या मानना श्रेयस्कर है। पंचगव्य व पंचगव्य ओंकार के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने वाली प्रक्रिया है। दुनियां के सभी मजहबों के लोगों के लिये श्रेयस है।
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