आ-आ-पा- का शिव संकल्प
दिल्ली शहर को भिखारी मुक्त बनाने की मुहिम ?
दिल्ली शहर को भिखारी मुक्त बनाने की मुहिम ?
भारतीय संघ राष्ट्र राज्य का 36वां घटक दिल्ली है जिसका क्षेत्रफल 1433 वर्ग किलोमीटर है आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 1,67,87,941 पुरूष 8989326 तथा महिलायें 7800615 लिंगानुपात 868 प्रति हजार प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी का घनत्व 11297 दशाब्द बढ़त 20.96 प्रतिशत साक्षरता 1,27,63,352 86.34 प्रतिशत पुरूष साक्षरता 91.03 प्रतिशत स्त्री साक्षरता 80.93 प्रतिशत। दिल्ली भारत की राजधानी पिछले पांच हजार वर्ष से है जब कि पांडवों का किला बना तथा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के लिये राजसभा मय नामक यशस्वी दानव ने योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के परामर्श के अनुसार बनाई। यह राजसभा आंखों को चौंधियाने वाली थी। जल थल का विभेद अन्यंत कठिन था। यमुना तटवर्ती खांडव वन का नाम तक शक्रप्रस्थ अथवा इन्द्रप्रस्थ रखा गया था। कालांतर में शक्रस्थ को दिल्ली देहली नाम दिया गया याने भारत का दरवाजा था। भारतीयता व हिन्दुस्तानियों की पहचान करने वाला दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो का प्रतीक दिल्ली का पहला दरबार कौंतेय युधिष्ठिर ने सात लाख लोगों से भरे राजप्रासाद में राजसूय यज्ञ से शुरू हुआ। हिन्दू दैनिक का प्रकाशन 1878 में शुरू हुआ था। पिछले 138 वर्षों से भारत राष्ट्र की राष्ट्रीयता की अलख जगाये हुए है। इस अखबार के रविवार 30 जुलाई के दिल्ली संस्करण में मैरिया अकरम द्वारा लिखित AAP to make Delhi a beggar free City प्रकाशित हुआ है। भारतीय व्यवस्थाओं के अनुसार यह राष्ट्र राज्य कल्याण कारी राज है। 1991 में जब वैश्विक बाजार कल्पना का प्रयोग भारत के सातवें प्रधानमंत्री श्री पी.वी. नरसिंह राव ने शुरू किया। लाइसेंस परमिट राज की इति श्री अभिव्यक्त हुई। खुले बाजार में प्रवेश के पश्चात क्या पंडित नेहरू की संकल्पना का कल्याण कारी राज पूर्ववत चलता रहा ? या समाज कल्याण का महकमा वैसे ही चलता रहा जिस तरह पंडित नेहरू के दिवंगत होने के पश्चात पंचवर्षीय योजनायें नाम मात्र रूप में चल रही थीं। उत्तर नेहरू युग में पंचवर्षीय योजना संकल्पना केवल दस्तावेजी रह गयी थी। उसमें वह शक्ति नहीं रही जो पंडित नेहरू ने संकल्पित की थी। भारत के दूसरे घटक राज्यों (पूर्णतः घटक राज्य तथा आंशिक घटक राज्य दोनों) में समाज कल्याण की खानापूरी होती रही। दिल्ली के समाज कल्याण मंत्री महाशय संदीप कुमार भिखारी मुक्त दिल्ली का शुभारंभ कनाट प्लेस जिसे उत्तर राजीव गांधी युग में राजीव प्लेस राजीव सर्कस का नया नामकरण दिया गया है। दैनिक हिन्दू के स्तंभकार लिखते हैं - Social Welfare Minister Sandeep Kumar will kick start the campaign from Cannaught Place along with Delhi Police. Seven teams have been formed and they will take beggar shelters said the officials. Giving details about the implementation of the plan. The official senior that each team will vediograph the eviction of beggars and they will then be taken to mobile courts for trial. “We found that the beggars were let off by the courts as there was lack of evidence to prove that they beg on street. स्तंभकार के अनुसार समाज कल्याण विभाग के कथनानुसार दिल्ली के भिखारियों की संख्या पिचहत्तर हजार है जिनमें तीस प्रतिशत नाप्त यौवन जिन्हें अंग्रेजी भाषा ओर कानून के नजरिये से Juvenile नाम दिया गया है वे हैं। उनका यह भी कहना है चालीस फीसदी भिखारी औरतें हैं। सन 2009 में कामनवेल्थ खेल शुरू होने से पहले 2009 सन में दिल्ली शहर को भिखारी मुक्त शहर बनाने के लिये दो सचल अदालतें स्तंभकार का कहना है। इस उद्देश्य से लगभग 25 वाहन उपयोग में लाये जाते हैं। भिखारियों को पकड़ने उन्हें किंग्स वे कैंप मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने वहां से उन्हें दिल्ली के ग्यारह भिखारी सदनों को भेजा जाता है। मौजूदा भिखारी सदनों की कुल क्षमता केवल तीन हजार भिखारियों को रखने की है। यजुर्वेद कहता है - ‘तन्मे मनः शिवसंकल्प मस्तु’। स्तंभकार ने अपने स्तंभ में कहीं भी आ.आ.पा. को शीर्ष नेता द्वय अरविन्द केजरीवाल एवं मनीष सिसोेदिया का उल्लेख नहीं किया। भिखारी मुक्त दिल्ली शहर के लिये अदालती तौर तरीके में पुलिस द्वारा भिखारी को पकड़ना, मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना, भीख मांगने का प्रत्यक्ष प्रमाण न होने के कारण मजिस्ट्रेट का भिखारी को स्वतंत्र कर देना कानूनी स्थिति है। भिखारी मुक्त दिल्ली शहर की संकल्पना करते समय ‘बुभुक्षितम् किम् न करोति पापम् क्षीणा नरा निष्करूणा भवंति’ यह कहना है चाणक्य का। लोगों की भूख प्यास शांत करने के लिये कानून नहीं मानवीय करूणा की जरूरत है। अनाज के गोदामों में अनाज सड़ रहा है सुप्रीम कोर्ट ने सम्मति दी कि अन्न को सड़ाने के बजाय जरूरतमंदों में वितरित कर दीजिये पर बात अटक गयी। जहां तक भूखे व नंगे लोगों का सवाल है दिल्ली सरकार की टीमें भिखारियों को पकड़ कर वाहनों में बैठाती है। किंग्स वे कैंप के मोबाइल मजिस्ट्रेट महोदय के सामने पेश करती है। पुख्ता प्रमाण ने मिलने पर भिखारी को अदालत मुक्त कर देती है। वह फिर भीख मांगने चला जाता है। स्तंभकार की रपट के अनुसार दिल्ली सरकार अपने भिखारी सदनों में केवल तीन हजार भिखारियों को ही रख सकती है। शेष 72 हजार कहां जायें, क्या खायें। वैश्विक बाजारीकरण के इस युग में समाज कल्याण का कोई मतलब नहीं रह गया है इसलिये अगर आ.आ.पा. दिल्ली को भिखारी मुक्त बनाना चाहती है तो पिचहत्तर हजार भिखारियों के लिये दो जून दिन व रात का भोजन मुख्य पीने के पानी सहित मुहैया किया जाये। यह काम न तो पुलिस कर सकती है न ही समाज कल्याण विभाग को भूखे को भोजन व नंगे को कपड़ा उपलब्ध कराने का जिम्मा सौंपा जा सकता है। दिल्ली सरीखे शहर में जहां के नगर निगम, दिल्ली राजधानी क्षेत्र के 158 गांव तथा 62 शहराती इलाके हैं जिनमें नयी दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी सहित दिल्ली छावनी, महरौली, पालम, शहादरा, बादली, नजफगढ़ तथा नरेला मुख्य हैं। तीन हिस्सों में बंटे दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन सहित सभी रूट नगर क्षेत्र तथा दिल्ली के शहराती 158 गांवों में वस्तुतः लगभग पौने दो करोड़ की आबादी वाले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र वस्तुतः कितने भिखारी हैं ? भिखारी की व्याख्या करते समय ऐसे वृद्धों को भी गिनना होगा जो अपना भोजन बनाने की क्षमता खो चुके हैं। उम्र बढ़ गयी शक्ति कम होगयी संयुक्त परिवार टूट गये जिससे इकले बूढ़े व्यक्ति अथवा बूढ़ी स्त्री को भी तो भोजन चाहिये। महाशय अरविन्द केजरीवाल की नजर भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है पर अभी वे नौसिखिये राजनीतिज्ञ हैं। उन्हें दिल्ली के लोगों की भूख प्यास शांत करने के लिये राजा बलदेव दास बिड़ला के उपराम को सोचना होगा। राजा बलदेव दास बिड़ला ने साठ वर्ष होते ही व्यापार को तिलांजलि देकर अपने बेटों को बुलाया कहा अब व्यापार तुम्हारा मैं आम आदमी की तरह बनारस में रहूँगा। राजा बलदेव दास बिड़ला ने मथुरा में मस्जिद के बगल में कृष्ण मंदिर बनाया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सदाचार का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखा -
यावत् भ्रियेत जठरम् तावत्स्वत्वम् हि देहिनाम् अधिकम् योऽभिमन्येत सः स्तेन दण्डमर्हति।
अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के 70 में से 67 स्थानों पर विजय पताका फहराई। उनके मतदाताओं में कुछ लोग संपन्न भी होंगे। वे संपन्न व्यक्तियों को कहें कि दिल्ली शहर को भूख प्यास से मुक्त करना पहला मानवीय धर्म है इसलिये जो व्यक्ति इस मान्यता के हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को भोजन मिलना चाहिये। दिल्ली में भारत भर के 543 लोकसभा सदस्य चुन कर आते हैं इनके अलावा दिल्ली विधानसभा के 70 सदस्य चुने जाते हैं। इनसे यह अनुरोध किया जाये कि प्रत्येक लोकसभा राज्यसभा सांसद अपनी सांसद निधि से कम से कम 15 प्रतिशत दिल्ली के लिये उपलब्ध करे। विधानसभा सदस्य अपनी विधानसभा सदस्यता निधि से 50 प्रतिशत दिल्ली के पर्यावरण संरक्षण हेतु लगाये शेष 50 प्रतिशत अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिये सुरक्षित रखें। दिल्ली को रहने लायक शहर की शकल देने के लिये अरविन्द केजरीवाल महाशय को इंटर नेशनल सुलभ शौचालय के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक से संपर्क कर सुलभ शौचालय प्रत्येक गांव, प्रत्येक शहर के मुहल्ले दर मुहल्ले निर्मित हों साथ ही जिन लोगों के अपने निजी मकान हैं या जो मल्टी स्टोरी आशयानों में रहते हैं प्रत्येक सरकारी निजी तथा हाउसिंग सोसाइटी के भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग संकल्पित किया जाना चाहिये ताकि पानी की समस्या का आंशिक समाधान हो तथा पेयजल आपूर्ति का मार्ग प्रशस्त हो।
दिल्ली के स्ट्रीट चिल्ड्रन तथा बेघर लोगों की गणना दिल्ली सरकार को दक्षिण कैलिफोर्निया के लास ऐंजिल्स शहर तथा लास ऐंजिल्स के समीपवर्ती काउंटियों की तरह संपन्न करना चाहिये। लास ऐंजिल्स दुनियां का समृद्धतम शहर है वहां भी हजारों लोग बेघर हैं तथा दो जून का भोजन उन्हें मुहैया नहीं हो पाता। लास ऐंजिल्स के मेयर महाशय ने स्वयं रूचि लेकर लास ऐंजिल्स तथा काउंटियों के बेघर लोगों की सही गणना के कार्य पर रूचि ली है। उसी तरह महाशय केजरीवाल को दिल्ली को भिखारी मुक्त करने के बजाय भूख मुक्त करने का संकल्प करना चाहिये। चीथड़े बिनने वाले गाड़ियों में सवारी कर रहे श्रीमंत लोगों से भीख ऐंठने के लिये भिखारी जो उपक्रम करते हैं उन्हें मानवीय नजरिये से देखने की जरूरत पुलिस कोर्ट कचहरी का कानूनी कार्यवाहियों से दिल्ली को भिखारी मुक्त नहीं बनाया जा सकता।
स्वान्तः सुखाय राम गाथा गाने वाले महाकवि तुलसीदास ने कहा है - तुलसी कर पर कर करौ करतल कर ना करौ जा दिन करतल कर करौ तादिन मान करौ इसलिये भीख लेने की कोशिश न हो। इस उपभोक्ता युग में जितनी भी सामर्थ्य हो अपनी आमदनी को परोपकार में लगाने का प्रयास करते रहा जाये। हिन्दुस्तान की आजादी की मुहिम में गांव गांव मुहल्ला दर मुहल्ला अपने रोजाना खाने की सामग्री आटा दाल चावल से एक एक मुट्ठी निकाल कर मुठिकान्न इकट्ठा किया जाता रहा। वह परंपरा पुनर्जीवित हो। मुष्टिकान्न के साथ साथ रोजाना एक अठन्नी माहवारी पंद्रह रूपये भी खातापीता हर परिवार देने का संकल्प ले एक नयी क्रांति भूख प्यास मिटाने के काम में आ सकती है। जिस आदमी अथवा महिला के बटुए में एक दफा का निरामिष भोजन होटल में करने के लिये रूपये नहीं हैं लोग गांठ में पैसा नहीं है यह लज्जा त्यागें। जो समर्थ हैं निश्शुल्क भोजन उपलब्ध कराने के लिये दातव्यता बढ़ायें करूणा का वातावरण बने। निश्शुल्क भोजनालयों में एक बार में 108 के आसपास लोगों को भोजन मुहैया कराया जाये। निश्शुल्क भोजन करने वाले लोग शाकाहारी हों उतना ही भोजन करें जितना उनके पेट की जरूरत है। ऐसा मिताहारी समाज खड़ा करके ही हम देश से गरीबी हटाने का कार्य संपन्न कर सकते हैं। भूख निवारण रहने के लिये निजी मकान या अत्यंत गरीब के लिये रैनबसेरे संकल्पित करने के विषय में हिन्दुस्तानी तौर तरीके से सोचना कारगर होगा। मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक भी यह विचार करे कि वे होटल जहां वे भोजन करते हैं एक दफा में सैकड़ों खर्च करते हैं होटल मालिक को प्रेरित करें कि करूणापरक ग्राहकों से प्राप्त अतिरिक्त राशि निश्शुल्क भोजन व्यवस्था करने वाले संगठन या संगठनों को देने का प्रयास करें। भारत सरकार ने सातवें वेतन आयोग की संस्तुति पर न्यूनतम माहवारी वेतन 18,000 तथा अधिकतम 2,25,000 तय किया है। केन्द्र व राज्य सरकारें अच्छी वेतन राशि पाने वाले लोगों को प्रेरित करें कि वे अपने वेतन का 0.5 प्रतिशत नंगे भूखे लोगों को देने के लिये सोचें विचारें याने प्रत्येक कार्मिक जो सरकारी अथवा कारपोरेट सेक्टर से अठारह हजार से ज्यादा वेतन लेरहा है कम से कम 0.5 प्रतिशत राष्ट्रीय भूख निवारण के लिये छोटे छोटे स्थानीय दातव्य संगठनों को उपलब्ध कराये। अगर भारत सरकार को एतदर्थ सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 तथा प्राइवेट ट्रस्ट एक्ट 1958 के तहत ऐसे पूर्ण दातव्य उद्देश्यों के लिये कानूनों में बदलाव भी करना पड़े उस पर विचार करना चाहिये। जिन दातव्य संस्थाओं का भू भवन संपदा एक से ज्यादा राज्यों में हैं उन्हें कानून के तहत एक ही राज्य तक सीमित रहने का तरीका बताना चाहिये।
देश से भिखारी मुक्ति का रास्ता संजोने के लिये केवल कानून पुलिस अथवा न्यायालय का रास्ता अपनाने के साथ साथ मानवीय करूणा भूखे को भोजन उपलब्ध कराने का लोकसम्मत वीथि का भी निर्माण समय की जरूरत है। राजतंत्र की मशीनरी के समानांतर समाज तंत्र की करूणामूलक राष्ट्रीय गलियारा निर्मित करना युग की पुकार है। महाशय केजरीवाल दिल्ली को भूखमुक्त प्यासमुक्त तथा रहने के लिये आशियाना उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठायें। नरेन्द्र मोदी का विरोध करते रहने के बावजूद उनके सद्गुणों को हृदयंगम करें तभी आज तुरंत नहीं। नितीश कुमार महाशय की तरह केवल अनर्गल विरोध के बजाय मोदी से सीखने का प्रयास भी करें ताकि वे आज नहीं तो आने वाले 20-25 वर्ष के अंतराल में दिल्लीश्वर बन सकें। केवल संदीप कुमार महाराज जी भिखारी मुक्त दिल्ली नहीं बना सकते पर मिल जुल कर ही लक्ष्य उपलब्ध किया जा सकता है। घटना 1957 की है विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा बांबे प्रेसीडेंसी में सन 1937 में बी.जी. खेर मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री रहे वैकुंठ ल. मेहता को पंडित नेहरू ने खादी ग्रामोद्योग आयोग का सदर नियुक्त किया। तब वे भारतीय स्टेट बैंक के मुंबई स्थित मुख्यालय के उपाध्यक्ष भी तैनात हुए थे। वैकुंठ ल. मेहता अध्यक्ष खादी ग्रामोद्योग आयोग पंडित नेहरू से मिलने दिल्ली आये। उन्होंने इस ब्लागर को कहा - पंडित नेहरू व पंडित पंत से मुलाकात का समय मांगो। एक दो बार फोन करने पर दोनों महानुभावों के निजी सचिवों से पंडित नेहरू व पंडित पंत के संज्ञान मंे लाकर समय निश्चित कर दिया। इस ब्लागर को वैकुंठ ल. मेहता पंडित नेहरू व पंडित पंत के आवासों पर लेगये। इस ब्लागर को दोनों नेता जानते थे। पंडित नेहरू ने कहा - दिल्ली में 276 गांव हैं उनमें घूम कर पड़ताल कर वैकुंठ ल. मेहता के मार्फत मुझे रिपोर्ट दो और हर गांव में ग्रामीण उद्योग सहकारी संगठन निर्मित करो। पंडित नेहरू दिल्ली के गांवों की उद्यमिता संवर्धन के प्रबल समर्थक थे। हर महीने रपट चाहते थे। गांवों के तेलियों से वे ज्यादा प्रभावित थे उन्होंने इस ब्लागर के साथ गये रामचन्द्र तेली से पूछताछ की। वह करौलबाग में बैलघानी चलाता था। पंडित नेहरू ने तेल सूंघा और कहा रामचन्द्र हर माह एक टिन सरसों का तेल यहां पहुंचाओ भुगतान इंदिरा से लो। पंडित नेहरू सरसों के तेल की पकौड़ी के शौकीन थे। वे गांव गांव के उद्यमियों की कुशल लेते रहते। जिसे एक बार देख लेते व्यक्ति उनकी याददाश्त का भाग बन जाता। दस्तकारों कारीगरों तथा गांवों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की पूरी जानकारी रखते। जब कभी मौका मिलता अनायास ग्रामीण औद्योगिक सहकारी समितियों के सदस्यों की उद्यमिता स्वयं जाकर देखते थे। केजरीवाल महाशय के शासन में अब केवल 158 गांव रह गये हैं बाकी शहर होगये। इन गांवों की ग्रामीण उद्यमिता के लिये दिल्ली सरकार विचार करे ताकि गांवों की स्थिति में सुधार हो। भिखारी मुक्त दिल्ली शहर के लिये सबको साथ लेकर चलना ही एकमात्र रास्ता है जिसका अनुमान दिल्ली के मुख्यमंत्री जी कर सकते हैं परंतु दिल्लीश्वर भारत का प्रधानमंत्री है जिस कुर्सी पर महाशय अरविन्द केजरीवाल नजर गड़ाये हुए हैं। युधिष्ठिर के पश्चात जो मेधावी दिल्लीश्वर हुए उनमें पृथ्वीराज चौहान, सम्राट अकबर तथा स्वाधीन भारत में पंडित नेहरू अग्रणी हैं। दिल्ली दरबार को भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री ने नया नारा दिया है। उन्हें अपनी नहीं देश भारत की छवि निखारनी है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने दिल्ली को दरबार संस्कृति से उबार लिया है।
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भिखारी मुक्त शहर होने के प्रकारण में भारत के राष्ट्रीय प्रकृति को तब बढ़ावा देने वाले अखबार जब भारत में बर्तानी राज था ज्यादातर अंग्रेजी अखबार तब राष्ट्रीयता की बात करने से घबराते थे। चेन्नई से छपने वाले दैनिक हिन्दू और घनश्याम दास बिड़ला पोषित अ्रंग्रेजी अखबार जिसके संपादक देवदास गांधी थे ये ही दो राष्ट्रीय भावना फैलाने वाले अखबार अंग्रेजी अखबार थे। मुंबई से छपने वाला पहला हिन्दुस्तानी अंग्रेजी का अखबार टाइम्स आफ इंडिया कोलकाता से छपने वाला स्टेट्समैन मुख्य अखबार में जो बर्तानी राज के गुणगान को प्राथमिकता देते उनमें बदलाव आया। भारत की आजादी के पश्चात 15 अगस्त 1947 से दैनिक हिन्दू ने फिर दिल्ली की भिखारी मुक्त शहर कल्पना को मरिया अकरम के स्तंभ - A King size life in Delhi expensive beggar home शीर्षक से 12 जुलाई 2016 के अंक में स्तंभकार कहती हैं Ninedays away from release the sole inhabitant of the facility is unhappy over loosing generous benefits. नरेला दिल्ली शहरी इलाका है यहां म्यूनिसिपैलिटी भी है। यह इलाका कुटीर तथा माइक्रोक्राफ्ट का भी इलाका है। यहां चर्खा कताई करघा बुनाई का काम स्वतंत्रता आंदोलन के बीच चौ. लज्जा राय ने शुरू किया था। खादी का काम दिल्ली में नरेला केन्द्र से उन्होंने खादी बुनवाने का काम बदायूं जिले में भी शुरू किया था। उस नरेला में मरिया अकरम के अनुसार नरेला का भिखारी सदन की क्षमता इसके भिखारी सदन लामपुर मंे 1525 भिखारियों को रैनबसेरा सुविधा है। स्तंभकार कहती हैं वहां करीब 70 कमरे हैं पर केवल एक व्यक्ति जिनकी उम्र 60 वर्ष बताती हैं उनका नाम अरविन्द सिंह बताया गया है। वे यह भी लिखती हैं कि वे भिखारी नहीं हैं 2020 फीट कुर्सी क्षेत्र वाले कमरे में रईसाना जिन्दगी बिता रहे हैं। उनकी देखभाल तीन केयर टेकर कर रहे हैं। उनके कमरे में डेजर्ट कूलर भी है। दिल्ली सरकार लामपुर भिखारी सदन संचालन के लिये सालाना पांच करोड़ खर्च करती है। वहां ग्यारह कर्मचारी हैं। स्तंभकार के अनुसार लामपुर भिखारी सदन मुंबई भिखारी सदन के अधीक्षक श्री नारायण सिंह इस सदन में राजेश नामक व्यक्ति की सोलह वर्ष रहने की चर्चा भी करते हैं। मुंबई के भिखारी एक्ट 1959 को दिल्ली शहर में भी लागू किया गया है। लामपुर स्थित भिखारी सदन सोलह एकड़ भूमि में निर्मित हुआ है। यहां पांच बगीचे भी बनाये गये हैं। स्तंभकार का कहना है कि भिखारी सदन की इलाकाई व्यवस्था उन विदेशी व्यक्तियों के ठहरने खाने पीने आदि में साझा की जारही है जिन्हें कानूनी स्थितियों में निरूद्ध किया जाता है। अभी वहां 80 निरूद्ध विदेशी रहते हैं जिनमें ज्यादातर लोग अफ्रीकी या पाकिस्तानी हैं। दिल्ली को भिखारी मुक्त शहर बनाने का महत्वपूर्ण प्रयोजन दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री की देखरेख में शुरू हुआ है। जरूरत इस बात की लगती है कि पंजाब गोआ तथा गुजरात में आआपा का डंका बजाने वाले महाशय अरविन्द केजरीवाल तथा उनके सहयोगी उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया महाशय को दिल्ली शहर को भिखारी मुक्त शहर बनाने स्वयं पहल करनी चाहिये। भारतीय विधि आयोग को मुंबई भिखारी रोकथाम एक्ट 1959 का पुनर्वाचन करना चाहिये। भिक्षा सनातन धर्म के स्मार्त वैष्णव शैव शाक्त मतों सहित भारत में जितने भी संप्रदाय हैं तथा जैन धर्म बौद्ध धर्म एवं सिख धर्म में भी भिक्षा प्रकारांतर से विद्यमान है इसलिये भीख मानना कानूनन अपराध श्रेणी में जोड़ने से पहले जकात चैरिटी सदावर्त निश्शुल्क भोजन तथा निश्शुल्क जल उपलब्ध तथा विभिन्न मजहबी चन्दों तथा राजनीतिम व सामाजिक चन्दों सहित विदेशों से ली जाने वाली सेहत सुधार शिक्षा तथा उपचार सहित जितने भी प्रकार के चन्दे हैं क्या वे भीख नहीं हैं ? यह समझ विचार कर भिखारी रोकथाम एक्ट 1959 को राज्य स्तर पर नहीं केन्द्रीय स्तर पर सारे देश की स्थितियों का अवलोकन कर नया एक्ट बनाने का संकल्प लिया जाना चाहिये। जब तक नया कानून नहीं बन जाता कानून के समानांतर मानवीय दया दृष्टिकोण से भूखे प्यासे व नंगे को भोजन जल तथा शरीर ढकने के लिये कपड़ा नहीं मिल जाता ऐसे लोगों में जो काम कर सकते हैं उन्हें हाथ का काम नहीं मिल जाता भिखारी को पकड़ कर मजिस्ट्रेट द्वारा भिखारी को मुक्त करने का जो फैसला लिया जाता है वह मनुष्यता की पहचान है। मनुष्य भूखा न रहे यह पहली जरूरत है। दिल्ली को भूख मुक्त बनाने का संकल्प दिल्ली के मुख्यमंत्री महाशय को स्वयं लेना चाहिये।
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भिखारी मुक्त शहर होने के प्रकारण में भारत के राष्ट्रीय प्रकृति को तब बढ़ावा देने वाले अखबार जब भारत में बर्तानी राज था ज्यादातर अंग्रेजी अखबार तब राष्ट्रीयता की बात करने से घबराते थे। चेन्नई से छपने वाले दैनिक हिन्दू और घनश्याम दास बिड़ला पोषित अ्रंग्रेजी अखबार जिसके संपादक देवदास गांधी थे ये ही दो राष्ट्रीय भावना फैलाने वाले अखबार अंग्रेजी अखबार थे। मुंबई से छपने वाला पहला हिन्दुस्तानी अंग्रेजी का अखबार टाइम्स आफ इंडिया कोलकाता से छपने वाला स्टेट्समैन मुख्य अखबार में जो बर्तानी राज के गुणगान को प्राथमिकता देते उनमें बदलाव आया। भारत की आजादी के पश्चात 15 अगस्त 1947 से दैनिक हिन्दू ने फिर दिल्ली की भिखारी मुक्त शहर कल्पना को मरिया अकरम के स्तंभ - A King size life in Delhi expensive beggar home शीर्षक से 12 जुलाई 2016 के अंक में स्तंभकार कहती हैं Ninedays away from release the sole inhabitant of the facility is unhappy over loosing generous benefits. नरेला दिल्ली शहरी इलाका है यहां म्यूनिसिपैलिटी भी है। यह इलाका कुटीर तथा माइक्रोक्राफ्ट का भी इलाका है। यहां चर्खा कताई करघा बुनाई का काम स्वतंत्रता आंदोलन के बीच चौ. लज्जा राय ने शुरू किया था। खादी का काम दिल्ली में नरेला केन्द्र से उन्होंने खादी बुनवाने का काम बदायूं जिले में भी शुरू किया था। उस नरेला में मरिया अकरम के अनुसार नरेला का भिखारी सदन की क्षमता इसके भिखारी सदन लामपुर मंे 1525 भिखारियों को रैनबसेरा सुविधा है। स्तंभकार कहती हैं वहां करीब 70 कमरे हैं पर केवल एक व्यक्ति जिनकी उम्र 60 वर्ष बताती हैं उनका नाम अरविन्द सिंह बताया गया है। वे यह भी लिखती हैं कि वे भिखारी नहीं हैं 2020 फीट कुर्सी क्षेत्र वाले कमरे में रईसाना जिन्दगी बिता रहे हैं। उनकी देखभाल तीन केयर टेकर कर रहे हैं। उनके कमरे में डेजर्ट कूलर भी है। दिल्ली सरकार लामपुर भिखारी सदन संचालन के लिये सालाना पांच करोड़ खर्च करती है। वहां ग्यारह कर्मचारी हैं। स्तंभकार के अनुसार लामपुर भिखारी सदन मुंबई भिखारी सदन के अधीक्षक श्री नारायण सिंह इस सदन में राजेश नामक व्यक्ति की सोलह वर्ष रहने की चर्चा भी करते हैं। मुंबई के भिखारी एक्ट 1959 को दिल्ली शहर में भी लागू किया गया है। लामपुर स्थित भिखारी सदन सोलह एकड़ भूमि में निर्मित हुआ है। यहां पांच बगीचे भी बनाये गये हैं। स्तंभकार का कहना है कि भिखारी सदन की इलाकाई व्यवस्था उन विदेशी व्यक्तियों के ठहरने खाने पीने आदि में साझा की जारही है जिन्हें कानूनी स्थितियों में निरूद्ध किया जाता है। अभी वहां 80 निरूद्ध विदेशी रहते हैं जिनमें ज्यादातर लोग अफ्रीकी या पाकिस्तानी हैं। दिल्ली को भिखारी मुक्त शहर बनाने का महत्वपूर्ण प्रयोजन दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री की देखरेख में शुरू हुआ है। जरूरत इस बात की लगती है कि पंजाब गोआ तथा गुजरात में आआपा का डंका बजाने वाले महाशय अरविन्द केजरीवाल तथा उनके सहयोगी उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया महाशय को दिल्ली शहर को भिखारी मुक्त शहर बनाने स्वयं पहल करनी चाहिये। भारतीय विधि आयोग को मुंबई भिखारी रोकथाम एक्ट 1959 का पुनर्वाचन करना चाहिये। भिक्षा सनातन धर्म के स्मार्त वैष्णव शैव शाक्त मतों सहित भारत में जितने भी संप्रदाय हैं तथा जैन धर्म बौद्ध धर्म एवं सिख धर्म में भी भिक्षा प्रकारांतर से विद्यमान है इसलिये भीख मानना कानूनन अपराध श्रेणी में जोड़ने से पहले जकात चैरिटी सदावर्त निश्शुल्क भोजन तथा निश्शुल्क जल उपलब्ध तथा विभिन्न मजहबी चन्दों तथा राजनीतिम व सामाजिक चन्दों सहित विदेशों से ली जाने वाली सेहत सुधार शिक्षा तथा उपचार सहित जितने भी प्रकार के चन्दे हैं क्या वे भीख नहीं हैं ? यह समझ विचार कर भिखारी रोकथाम एक्ट 1959 को राज्य स्तर पर नहीं केन्द्रीय स्तर पर सारे देश की स्थितियों का अवलोकन कर नया एक्ट बनाने का संकल्प लिया जाना चाहिये। जब तक नया कानून नहीं बन जाता कानून के समानांतर मानवीय दया दृष्टिकोण से भूखे प्यासे व नंगे को भोजन जल तथा शरीर ढकने के लिये कपड़ा नहीं मिल जाता ऐसे लोगों में जो काम कर सकते हैं उन्हें हाथ का काम नहीं मिल जाता भिखारी को पकड़ कर मजिस्ट्रेट द्वारा भिखारी को मुक्त करने का जो फैसला लिया जाता है वह मनुष्यता की पहचान है। मनुष्य भूखा न रहे यह पहली जरूरत है। दिल्ली को भूख मुक्त बनाने का संकल्प दिल्ली के मुख्यमंत्री महाशय को स्वयं लेना चाहिये।
महाशय अरविन्द केजरीवाल को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ संचालक मोहन भागवत महोदय से मिल कर दिल्ली शहर में पूरे दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जहां जहां संघ की शाखायें लगती हैं शाखा संचालकों से मिलना चाहिये तथा स्वयं को संघम् शरणम् गच्छामि का मंत्रपाठ कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं से अनुरोध करें कि प्रत्येक शाखा में कम से कम 108 भूखे व प्यासे व्यक्तियों को भोजन व पानी निश्शुल्क उपलब्ध करने के लिये आआपा का भी सहयोग देें ताकि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से भूख मिटाने का संकल्प लिया जाय और आआपा को जो भिखारी मुक्त दिल्ली वाला संकल्प है वह पूर्ण हो सके। केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही दिल्ली की भूख प्यास समस्या का समाधान कर सकता है।
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