Wednesday, 22 June 2016

नीलगाय एवं नीलवर्णा गौ के गोमूत्र वाला पंचगव्य 
साने गुरु जी की अान्तर भारती नीलगाय समस्या का समाधान
कानपुर के गोपालक पुरूषोत्तम तोषणीवाल ने इस ब्लागर को बताया कि वे कानपुर तथा पार्श्ववर्ती जिलों में गौशालाओं में पल रही ग्यारह हजार गायों का गोमूत्र बाबा रामदेव को सालाना तीन करोड़ रूपयों में उपलब्ध करा रहे हैं। बाबा रामदेव का पांतजल अधिष्ठान पंचगव्य निर्मित कर उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रहा है। यह तो उत्तराखंड की सरकार तथा बाबा रामदेव द्वारा ही बताया जा सकता है कि पिछले पांच वर्षों में वे कितने मूल्य का पंचगव्य उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा पाये। प्रकाश जावड़ेकर केन्द्रीय राज्यमंत्री पर्यावरण तथा केन्द्रीय मंत्रिमंडल की वन्यजीव संरक्षिका केबिनेट मंत्री मेनका गांधी का सहज धर्म ही वन्यजीव संरक्षा है। बिहार में तीन सौ के करीब नील गाय मारे जाने के प्रसंग ने दो मंत्रियों के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण ने साने गुरू जी की आन्तर भारती विचार पोखर की तात्कालिक उपयोग का महत्व बढ़ा दिया है। जावड़ेकर महाशय का मंत्रालय Blue Bull तथा Vermin  की व्याख्या में उलझ गया प्रतीत होता है। यशस्वी पत्रकार अरूण पुरी के इंडिया टुडे के जून 27, 2016 के अंक में अशोक प्रियदर्शी तथा राहुल नोरन्हा का The Unholy Cow शीर्षक से आलेख छपा है। लेखक द्वय ने Asian Interloper जिसे हम हिन्दुस्तान के चालीस फीसदी लोगों की जुबान हिन्दी में अंग्रेजी भाषा के Asian Interloper को ‘खोद खाद धरती सहे काट कूट वनराय, कुटिल वचन साधु सहे और से सहा न जाये’ समझा जा सकता है। लेखक द्वय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में दो लाख तीस हजार नील गायें हैं जिन्हें यूरप के लोग ब्लू बुल नाम से पुकारते हैं। इन्हें समाप्त करने की मुहिम लगभग असफल बताई गई है। बिहार राज्य ने सन 2015 में अढ़ाई सौ से ज्यादा नील गायों को वर्मिन घोषित किया तथा इन्हें समाप्त करने का काम शुरू किया। अंग्रेजी भाषा में वर्मिन को हिन्दुस्तानी लहजे में समझने के लिये हमें यह सोचना होगा कि अंग्रेजी भाषा का Vermin पौधों व वनस्पति को हानि पहुंचाने वाले छोट छोटे जंगली जीवों को कहा जाता है। भारत का पौराणिक साहित्य चूहों को अनाज का सबसे बड़ा तस्कर मानता है। लेखक द्वय की राय के मुताबिक मध्य प्रदेश ब्लू बुल पीड़ित राज्य है। फसल को नुकसान पहुंचाने के 3278 मामले प्रकाश में आये। महाराष्ट्र की सरकार भी ब्लू बुल मारने की पक्षधर बताई गई है। हरियाणा व राजस्थान में भी नील गाय फसलों को नुकसान पहुंचा रही है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत जी जंगली सुअरों व बंदरों को मारने के पक्षधर हैं। उनकी सोच है कि हरिद्वार की नील गायों को भी समाप्त किया जाना चाहिये। अंग्रेजी राज्य भारत में अपने यूरप के अनुभव प्रयोग में लाता रहा है। महात्मा गांधी ने अपनी पहली पुस्तक हिन्द स्वराज में यूरप की तत्कालीन व्यवस्था की प्रशंसा नहीं की। उन्होंने यूरप के कई विद्वानों का उद्धरण देते हुए यूरप की औद्योगिक क्रांति को जानलेवा बताया। 
अब हम नील वर्णा गौ के उज्ज्वल पक्ष पर बात करें। भारत का वैदिक समाज यह मान्यता रखता है कि नील वर्णा गौ का मूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। कारगर पंचगव्य निर्माण में -
मूत्रम् तु नीलवर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मृतय्
दुग्धम् तु ताम्रवर्णायाः श्वेताया दधि स्मरेत् 
आज्यम् तु कपिलायाः कुशोदकम् सम्मेलयेत।
मध्य प्रदेश के एक वन्य पशु इलाज करने वाले महाशय अमरकंटक की पहाड़ियों में तीन बीमार नील गायों का उपचार कर रहे हैं। प्रकाश जावड़ेकर महाशय और वन्य जीव दया पोखर श्रीमती मेनका गांधी में जो विचार भेद उठा उसका निराकरण भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी कर सकते हैं। नील गायें तो अंग्रेजों के भारत में आने से पहले भी थीं। साने गुरू जी की आन्तर भारती विचार पोखर भारतीय भाषाओं में नील गाय संबंधी सभी विश्लेषण सामने लाने की क्षमता रखता है। भारत के प्रधानमंत्री जी कृपापूर्वक घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अनुरोध करें कि भारत में अंग्रेजी राज कायम होने से पहले भी तो नील गायें होती ही थीं। भारत की भाषाओं में नील गाय संबंधी जो साहित्य है तथा नील गायों के बारे में जो लोकमत है उसका अनुशीलन किया जाये। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे सिंधिया नील गाय प्रकरण से जूझ रही हैं पर वो यह तो मालूम करें कि Blue Bull Theory  प्रयोग में आने से पहले भारत के लोगों की धारणा नील गायों के बारे में क्या थी। बादरायण का ब्रह्मसूत्र - ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ से शुरू होता है। पतंजलि महाराज का योगसूत्र समझने के लिये ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ के समानांतर ‘अथातो योग जिज्ञासा’ का ऊर्ध्वगान आवश्यक है। सवाल उठता है कि ब्रह्म जिज्ञासा व योग जिज्ञासा को विश्व बाजार का बिकाऊ व्यक्तित्त्व माना जाये ? इस ब्लागर ने योग मार्ग के दो गृहस्थ योग गुरूओं का आसाराम बापू का समूचे हिन्दुस्तान की नर नारियों में व्यापक प्रभाव के पीछे नैनीताल के योगी लीला साह का भागवत महापुराण के छठे स्कंध के आठवें अध्याय का नारायण वर्त्य कथन अथवा नारायण कवच कहा जाता है। नारायण कवच के अनुसार अंगन्यास, करन्यास विष्णु षडाक्षर न्यास के द्वारा अंगुष्ठ या अंगूठा तर्जनी मध्यमा अनामिका व कनिष्ठिका दांये हाथ व बांये हाथ के लिये अंगुलियों के ऊर्ध्व भाग स्पर्श से शरीर में एक चैतन्यता जागती है। योगी तथा विरक्त लीला साह के श्री चरणों में नानकपंथी आसाराम बापू ने पादाभिन्दन कर परम गुह्य योगमार्ग का सूत्र पकड़ डाला। आसाराम गृहस्थ थे व आज भी गृहस्थ हैं। उनकी वित्तेषणा, पुत्रेषणा व लोकेषणा जाग्रत थी। उन्होंने नारायण कवच का योग मार्ग अपना लिया। करोड़ों भारतीय नर नारियों को अपने जाल में फंसा लिया। उन्हीं की तरह विक्रम चौधरी ने वही सब काम जो भारत में आसाराम बापू करते रहे कैलिफोर्निया में विक्रम चौधरी ने भी संपन्न किये। इन दो कामेच्छु योग गुरूओं की रामकहानी हिमकर ब्लाग में पढ़ी जा सकती है। बाबा रामदेव का प्रभाव क्षेत्र आसाराम बापू व विक्रम चौधरी सरीखा नहीं है। बाबा रामदेव वस्तुतः सन्यासी हैं व गेरूआ वस्त्र धारण करते हैं पर उन्होंने भी योगमार्ग को व्यवसाय का हिस्सा बना डाला है। भारत में तथा विश्व के उन देशों में जहां अथातो ब्रह्म जिज्ञासा या अथातो योग जिज्ञासा के साधक हैं वे प्रचार तथा व्यापार से दूर ही रहते हैं। हमारा आज का मीडिया तंत्र Advertorial पर यकीन करता है Editorial उसके लिये रसहीन विषय है इसलिये जिन योगाभ्यासियों को योगमार्ग की व्यावहारिकी तथा वास्तविकी को हृदयंगम करना हो उन्हें वानप्रस्थी अथवा सन्यासी (भक्ति ज्ञान वैराग्य की तरूणाई वाले योगी) का सान्निध्य प्राप्त करने का लक्ष्य रखना होगा। 
महाशय प्रकाश जावड़ेकर जी का मंत्रालय ब्लू बुल तथा वर्मिन के इर्दगिर्द घूम रहा है इसलिये प्रधानमंत्री जी को विचार करना ही होगा कि क्या एशियन इंटरलोपर संबंधी यूरप और अमरीका की सोच और हिन्दुस्तानी नील गाय जिसे संस्कृत वाङमय में नीलवर्णा कहा गया है, नीलवर्णाया गौ जो वस्तुतः पालतू पशु अथवा पालतू गाय नहीं है अपितु वन्य पशु है। क्या अंग्रेजों के भारत में आने से पहले नील गाय अथवा जिसे हिन्दुस्तान का अंग्रेजीदां शासक वर्ग ब्लू बुल के नाम से जानता है लोकमत ज्ञात किया जाये कि क्या नील गाय का आतंक सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर को मुगल बादशाह द्वारा व्यापार करने की इजाजत देने से पहले भी नील गाय आतंक विद्यमान था ? अथवा जंगलों के कटान बढ़ जाने से नील गाय अथवा ब्लू बुल संकट में इजाफा हुआ। भारत संघ की घटक राज्य सरकारें नीलगाया संबंधी किंवदंतियों सहित जो जो कहावतें समाज में विद्यमान हैं उनका अनुशीलन साने गुरू जी की आन्तर भारती के जरिये संभव है। इसलिये केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तत्वावधान में भारत संघ के घटक राज्यों के विभिन्न भागों में जो लोकोक्तियां हैं जो अनुभव लोगों के हैं उन्हें प्रकाश में लाया जाना निहायत जरूरी है। भारत का भाषायी कष्ट यह है कि नेता जनता जनार्दन का मत जनता की बोली में मांगता है पर हिन्दुस्तान का शासन आज भी मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक संचालित कर रहा है। भारत का यह भद्रलोक अंग्रेजी में सोचता है भारतीय भाषाओं से परहेज करता है। उदाहरणार्थ दिल्ली के मुख्यमंत्री महोदय को उदाहरण नैपोलियन बोनापार्ट का देना पड़ा क्योंकि भारत का अंग्रेजीदां भद्रलोक ही देश का शासक है। उसका विचार पोखर विलायत और अमरीका सहित यूरप के कुछ देशों में भी है। इसलिये प्रधानमंत्री जी को आन्तर भारती का नुस्खा प्रयोग में लाना पड़ेगा तभी भारतीय भाषाओं में और बोलियों में जो विचार छिपा पड़ा है वह सामने आ सकता है। देश के न्यायिक प्रशासनिक व राजनीतिक भद्रलोक को हिन्दुस्तान के जन सामान्य की सुध लेने का सुअवसर मिलेगा। 
आज हिन्दुस्तान के लाखों नर नारियां कर्क व्याधि या कैंसर से पीड़ित हैं। नील गाय के गोमूत्र में कैंसर अवरोधक तत्व विद्यमान हैं। देश के जिन घटक राज्यों में नील गाय का फसल उजाड़ संत्रास व्याप्त है वहां हर जिले में नील गाय बाड़े बनाये जाना आज की तात्कालिक जरूरत है। इस संसार में प्रत्येक जीव के सद्गुण व दुर्गुण को पहचानने की जरूरत है। नील गाय के मूत्र में अनेकानेक सद्गुण हैं इसलिये यदि यह गोमूत्र करीने से प्रयोग किया जाये व उसमें जुड़ने वाले जो इतर गोरस हैं वे काली रंग की गाय का गोबर तांबे के रंग की गाय का दूध तथा पूर्णतया सफेद रंग की गाय का दही, कपिल गाय का घी सत्ताईस नक्षत्रों के हिसाब से पंचगव्य बनाया जाये तो कैंसर व एच.आई.वी. से भारत मुक्त हो सकता है। जरूरत केवल इतनी ही है कि जर्सी गाय तथा संकर गाय के उत्पादों का उपयोग न हो। अगर नील गाय के गोमूत्र से निर्धारित विधिपूर्वक पंचगव्य निर्मित होगा और उस पंचगव्य का लेप हर नर नारी शनिवार के दिन नहाने से पहले अपने शरीर पर लीपा पोती कर के 2 घन्टे बाद नहायेगा या नहायेगी तो पंचगव्य के प्रभाव से कर्क व्याधि तथा एच.आई.वी. पंचगव्य के प्रयोग करने वाले के शरीर पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे। मानक स्तर के गोशाला संगठन इस विधि पर प्रयोग करें तथा देश के भिन्न भिन्न इलाकों में ये प्रयोग हों तो देश के लोगों की सेहत संरक्षा क्षेत्र में एक नयी क्रांति आ सकती है। कर्क व्याधि या कैंसर तथा एच.आई.वी. जैसे भयानक रोग के प्रकोप पर कारगर रोक लग सकती है किन्तु जरूरत प्रयोग करके देखने की है। आन्तर भारती चिंतन पोखर भारत को नया रास्ता दिखा सकता है इसलिये प्रधानमंत्री जी को गम्भीरता से विचार करना चाहिये कि ब्लू बुल तथा वर्मिन चिंतनधारा में कौन कौन विसंगतियां विद्यमान हैं तथा फिर उन विसंगतियों से छुटकारा पाने के उपाय भी सहेजे जा सकते हैं। 
इंडिया टुडे के यशस्वी स्तंभकार द्वय श्री अशोक प्रियदर्शी एवं राहुल नोरोन्हा ने अपने स्तंभ का शीर्षक ‘द अनहोली काउ’ निश्चित किया। अगर प्रियदर्शी व नोरोन्हा को नीलवर्णा गाय के गोमूत्र के लाभान्वित करने वाले गुण मालूम होते तो वे नील गाय या ब्लू बुल कही जाने वाली गाय को ‘अनहोली काउ’ कह कर धिक्कारते नहीं। हो सकता है कि लेखक द्वय ने नील गायों के द्वारा उजड़े हुए खेत तथा उन किसानों की पीड़ा का आंखों देखा हाल स्वयं अनुभव किया हो तथापि उनका निष्कर्ष इकतरफा लगता है। हिन्दुस्तान में गाय को ‘होली काउ’ कहा जाता है। हिन्दी भाषी उत्तर प्रदेश सहित जहां जहां हिन्दी बोली जाती है उस इलाके को हिन्दुस्तान का अंग्रेजीदां भद्रलोक Cow Belt  कहता है। उत्तर प्रदेश सहित भारत के अनेक हिस्सों में गौहत्या जारी है फिर चाहे आप जर्सी गाय या संकर गायों को मारें अथवा देसी गायों को। गाय की देसी नस्ल की जो चौबीस पच्चीस नस्लें देश में बची हैं कृपया उन बची नस्ल की गायों का वध न करें। नील गाय के भी इस तरह मारे जाने को भारतीय समाज गो हत्या ही मानता है इसलिये नीलगाय को मार कर गोहत्या का आरोप अपने आप पर जड़ने का पक्षधर नहीं है। उत्तिष्ठ, जाग्रत, वरान्निबोधयत। चैतन्य होइये नील गाय पर चिंतन मनन कीजिये फैसला राष्ट्रीय तथा प्राणियों के हित में लीजिये। बिहार की तरह जहां जहां नील गायों से संकटापन्न अवस्था उपस्थित हुई है उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने का उपक्रम कीजिये ताकि हिन्दुस्तान में ब्लू बुल के संदर्भ में राष्ट्रीय हित में नीति निर्धारण संपन्न कर सकें। नील गाय होली काउ भी बन सकती है बशर्ते हिन्दुस्तान के लोग नील गाय के प्रसंग को खेती उजाड़ू घोषित करने के बजाय नील गाय में जो सद्गुण हैं व नील गाय के गोमूत्र में जो कायशोधन शक्ति विद्यमान है उसका आंशिक नहीं अपितु पूरा पूरा लाभ लेने का उपक्रम तत्काल शुरू किया जाना चाहिये। Holy Cow और Unholy Cow विवाद में फंसने के बजाय पशुधन विशेषकर दुधारू पशु यथा बकरी, गाय व भैंस के लिये भारत के लोग ज्यादा ध्यान दें। डाक्टर जे.सी. कुमारप्पा की सम्मति भारत के गोधन विकास का ज्वलंत स्त्रोत है। 
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