साने गुरु जी का गुरु मंत्र
अान्तर भारती भारतीय लोकव्यवस्था का महातरु
महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने पंचम वेद महाभारत में महातरू शब्द प्रयोग किया। उन्होंने कहा - युधिष्ठिरो धर्ममयो महातरूः भीमो स्कंध अर्जुनस्तस्य शाखा माद्रीपुत्रौ पत्रपुष्पौः मूले कृष्णः ब्रह्मश्च ब्राह्मणश्च। दूसरी ओर उन्होंने पंचम वेद के खलनायक सुयोधन अथवा दुर्योधन जो भी नाम आप देना चाहें कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने कहा - दुर्योधनो मन्युमयो महातरूः कर्णो स्कंध शकुनिस्तस्य शाखा दुःशासन तस्य पत्रपुष्पौः मूले राजा धृतराष्ट्रो मनीषीः। दुर्योधन ने कहा था - जानामि धर्मम न हि मे प्रवृत्तिः तथा जानामि अधर्मम् न हि मे निवृत्तिः। यह दुर्योधन की स्पष्टोक्ति है। धर्म और अधर्म जानता हूँ पर मेरी प्रवृत्ति धर्म में नहीं तथा अधर्म में निवृत्ति नहीं है। धर्ममय महातरूः व मन्युमय महातरूः पंचम वेद महाभारत का आदि सूत्र है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा भारतीय संविधान को विश्व का जागरूक संविधान बनाने वाले भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर के संयुक्त प्रयासों तथा भारतीय संविधान सभा के विज्ञ सदस्योें ने जो प्रयास किये व आजाद भारत का संविधान लाभ किया और संविधान की अंग्रेजी एवं हिन्दी प्रामाणिक प्रतियों पर स्वाक्षरी की। पिछले 66 वर्ष 6 महीनों से संविधान सम्मत लोकतंत्र भारत में फलफूल रहा है। अंग्रेजी और हिन्दी के अलावा भारत में भारतीय संघ के घटक राज्यों की राजभाषायें यथा मइती नैपाली असमी बांग्ला उड़िया तेलुगु तमिल मलयाली कन्नड़ कोंकणी मराठी गुजराती पंजाबी तथा उर्दू पंद्रह घटक राज्य भाषायें अपने अपने राज्य की राजभाषायें हैं। हिमाचल हरयाणा उत्तराखंड दिल्ली राजस्थान म.प्र. उ.प्र. बिहार झारखंड छत्तीसगढ़ इन दस राज्यों की राजभाषा हिन्दी है। भारतीय संविधान में भाषा अनुसूची के अंतर्गत संस्कृत सिंधी संताली बोडो मैथिली डोगरी कश्मीरी ये सात भाषायें भी भाषा अनुसूची का अंग हैं पर इन सात भाषाओं में कोई भी भाषा किसी भी घटक राज्य की राजभाषा नहीं है। इन सात भाषाओं को बोलने वाले लोग भारत में यत्र तत्र उपलब्ध हैं। संस्कृत भारत की जीवंत भाषा है। सिंधी भाषा बोलने वाले लोग भारत में यत्र तत्र फैले हुए हैं। संताली झारखंड में बोली जाती है। मैथिली बिहार राज्य के मिथिला में बोली जाती है। बोडो वर्तमान असम राज्य के बोडो क्षेत्र में बोली जाती है। डोगरी जम्मू कश्मीर के डोगरा राजपूतों की जीवंत भाषा है। कश्मीरी कश्मीर में बोली जाती है पर जम्मू कश्मीर की राज भाषा उर्दू है। आने वाले भविष्य में इन भाषाओं के बोलने वाले लोग अपनी मातृभाषा को संबंधित क्षेत्र या नये घटक राज्य का दर्जा पाने पर अपनी भाषा के लिये संसद को प्रेरित कर सकते हैं कि उनकी भाषा संबंधित क्षेत्र की राजभाषा घोषित की जाये तथा उन्हें घटक राज्य का स्तर प्रदान किया जाये।
भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति अंग्रेजी व हिन्दी में ही है। जिन घटक राज्यों की राजभाषायें क्रमशः नैपाली, मइती-मैनपुरी, असमी, बांग्ला-पश्चिम बंग व त्रिपुरा, उड़िया-ओडिशा, तैलुगु-आंध्र व तैलंगाना, तमिल-तमिलनाडु, मलयाली-केरल, कन्नड़-कर्णाटक, कोंकणी-कोंकण गोआ, मराठी-महाराष्ट्र, गुजराती-गुजरात, पंजाबी-पंजाब, उर्दू-जम्मू कश्मीर की राज्य की राजभाषायें हैं। इन राजभाषाओं में भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति नित्य नैमित्तिक संवैधानिक कार्यों में प्रयोग में लाया जाना साने गुरू जी की आन्तर भारती कल्पना का मुख्य स्त्रोत है। इसलिये आन्तर भारती का पहला सूत्र घटक राज्यों की राजभाषाओं में भारतीय संविधान की प्रामाणिकता का दस्तावेज आन्तर भारती की पहली जरूरत है। इसलिये संसद से नौ, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, नेता सदन तथा नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, नेता सदन व नेता प्रतिपक्ष कुल मिला कर नौ वर्तमान में देश में 36 घटक हैं राज्य हैं या केन्द्र शासित प्रदेश इन सब के विधान मंडल विधान सभा तथा विधान परिषदों के स्पीकर डिप्टी स्पीकर नेता सदन व नेता प्रतिपक्ष विधान परिषद के अध्यक्ष उपाध्यक्ष नेता सदन व नेता प्रतिपक्ष कुल मिला कर आठ प्रति घटक राज्य ज्यादा से ज्यादा 36Í8=288 संसद सहित यह संख्या 297 होती है। डाक्टर ग्रियर्सन के अनुसार भारत में तब 276 भाषायें बोली जाती थीं। बहुत सी भाषायें भी मृत होगयी होंगी। जो भाषायें जीवित हैं उनके बोलने वाले लोग देश में यत्र तत्र विद्यमान हैं। उनके संवर्धन के लिये केन्द्र सरकार में जो राजभाषा मंत्रालय है उसे आन्तर भारती भाषा मंत्रालय का दर्जा दिया जाये तथा जिन जिन घटक राज्यों की भाषायें घटक राज्य की राजभाषा है उनके लिये भाषा मंच रूप में देसी भाषा विभाग चालू किया जाये। जो घटक राज्य भारत सरकार से अपने राज्य की राजभाषा में पत्राचार करना चाहें उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ताकि भारतीय संसद तथा संबंधित घटक राज्य जिसकी अपनी राजभाषा अंग्रेजी व हिन्दी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा है उस भाषा में भारतीय संविधान की अधिकारिक प्रति सर्वप्रथम आवश्यकता है। असम राज्य में असमी भाषा में भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति प्रयोग में आये। इसी प्रकार बांग्ला उड़िया तेलुगु तमिल मलयाली कन्नड़ कोंकणी मराठी गुजराती पंजाबी उर्दू तथा नैपाली भाषाओं भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति निर्धारित करने के लिये समयबद्ध कार्यक्रम निर्धारित करने के लिये राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, नेता सदन तथा नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, नेता सदन व नेता प्रतिपक्ष यह सुनिश्चित करें कि आने वाले दस वर्ष भीतर भारत की हों व भाषा में भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति उपलब्ध की जायेगी। संसद तथा घटक राज्य विधान मंडलों के 297 महत्वपूर्ण पद धारण करने वाले व्यक्ति मिल बैठ कर तय करेंगे कि भारतीय भाषाओं में भारत का राजकाज चलेगा। पहल उन भाषाओं से शुरू की जाये जिनकी घटक राज्य की राजभाषा अंग्रेजी या हिन्दी के अलावा कोई भारतीय भाषा है। दो सौ सतानवे सदस्यीय भाषायी संविधान अधिकारिक प्रति निर्धारण करने के लिये भारत के उप राष्ट्रपति तथा लोकसभा स्पीकर संयुक्त रूप से अध्यक्षता करें तथा निर्णायक भाषायी संविधान अधिकारिक प्रति निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल स्तर पर संसद में संयुक्त सत्र एवं राज्यों के विधानमंडल को संबोधित करते समय प्रति वर्ष भारतीय भाषाओं में भारतीय संविधान की अधिकारिक प्रति का उल्लेख किया जाये। 297 प्रतिनिधियों वाला सर्वसत्ता संपन्न आन्तर भारती उपकरण प्रति वर्ष संबंधित घटक राज्य तथा संसद में भारतीय भाषाओं में भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रति उपलब्ध कराने का संकल्प राष्ट्रपति के अभिभाषण तथा घटक राज्य के राज्यपाल के अभिभाषण का मुख्य स्त्रोत होगा ताकि आने वाले दस वर्ष पश्चात भारत का संविधान भारतीय भाषाओं में प्रामाणिक तौर से प्रयुक्त हो।
महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आत्मा थे। उन्होंने उद्घोष किया कि सीतारामैया का कांग्रेस अध्यक्ष होना उनकी अंतरात्मा की पुकार है। पंडित नेहरू सहित भारत के ज्यादा से ज्यादा लोग को अखिल भारतीय कांग्रेस से जुड़े थे। उनकी पसंद नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। नेता जी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये पर महात्मा गांधी का मंतव्य ज्यों का त्यों रहा। वे डिगे नहीं। संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के तब के प्रीमियर पंडित गोविन्द वल्लभ पंत ने महात्मा गांधी के विचार के पक्ष में जो तर्क दिये तथा सीतारामैया को कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के लिये प्रतिनिधियों से जो अनुरोध किया उसका व्यापक असर पड़ा। नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने निर्वाचित अध्यक्ष पद से केवल स्वयं ही त्यागपत्र नहीं दिया। पंडित नेहरू सरीखे नेता जी सुभाष चंद्र बोस के समर्थक लोगों को आकर्षित किया। यह थी वाणी के सदुपयोग की कहानी। पंडित पंत ने जो तर्क प्रस्तुत किये उससे प्रतिनिधि प्रभावित हुए। उन्होंने महात्मा गांधी का रास्ता अपनाया। आज भारत में वाणी पर आत्मनियंत्रण तथा श्रोता को अपनी बात से प्रभावित करने की कला फिर सामने आरही है। भारत विश्व में अपने लिये सुनिश्चित स्थान बनाने के लिये अग्रसर है इसलिये भारत को भाषायी जरूरत पहली आवश्यकता है जिसके लिये इसे साने गुरू जी की आन्तर भारती का सटीक प्रयोग करना चाहिये।
जीवित भारतीय भाषाओं के अंग्रेजी भाषा सहित कम से कम सात सौ तीन विद्वानों को चिह्नित करना होगा। जो भाषायी विद्वान एक से ज्यादा भाषाओं का ज्ञाता है उन्हें पहल देनी होगी। दो भारतीय भाषाओं के जीवंत ज्ञानी व्यक्ति जो एक भाषा से दूसरी भाषा में भाषान्तरण के ज्ञाता हैं उन्हें चिह्नित करना, भाषाविदों को राजनीतिक रणनीति के ऊपर उठ कर वाणी विलास का मार्ग अपनाना होगा। अंग्रेजी और हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के आन्तर भारती प्रयोग से भारत की भाषायी ऊहापोह स्थिति पर लगाम लगा सकेगी तथा मातृभाषा या चाहत भाषा में अपना पक्ष प्रस्तुत करने वाले लोकप्रतिनिधि गर्व महसूस कर सकेंगे। सात सौ तीन भाषाविदों में तीन सौ इक्यावन भाषाविदों का चयन केन्द्रीय नौ महानुभावों के परामर्श से किया जाये। शेष तीन सौ बावन भाषाविदों का मनोनयन राज्य सरकारों संबंधित भाषा के भाषायी विश्वविद्यालय के घटक राज्य की राजभाषा के विभाग द्वारा विधानमंडल द्वारा किया जाये ताकि भाषान्तरण में जो विसंगतियां उपज रही हैं उनका निराकरण करने के उपाय हों। अंग्रेजी से भारतीय भाषा में भाषान्तरण एक भारतीय भाषा से अंग्रेजी में भाषान्तरण में जो त्रुटियां सामने आरही हैं अनुवाद को दुबारा पुनर्वाचन करने की परंपरा छूट गयी है। अनुवाद वे लोग कर रहे हैं जो न तो भारतीय भाषा के मर्मज्ञ हैं नही अंग्रेजी पर अधिकार पूर्वक लिखने तथा भाव व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं। आज भारत की जरूरत सस्ता साहित्य मंडल के संस्थापक हरिभाऊ उपाध्याय सरीखे अनुवादकों की है। पंडित नेहरू अपनी महत्वपूर्ण कृति डिस्कवरी आफ इंडिया का हिन्दी अनुवाद चाहते थे। उन्होंने हरिभाऊ उपाध्याय से कहा - हरिभाऊ मेरी किताब को हिन्दी में अनूदित कर दो। हरिभाऊ उपाध्याय ने पंडित नेहरू से कहा - पंडित जी यह मेरा सौभाग्य होगा कि मैं आपकी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक को हिन्दी में अनुवादित करूँ। मेरी एक शर्त्त है कि मेरे अनुवाद को आपको स्वयं पूरा पूरा पढ़ना होगा तथा मेरे अनुवाद पर अपनी राय हिन्दी में स्वयं अपने हाथ से लिख कर देनी होगी। पंडित नेहरू ने शर्त्त स्वीकार कर ली। हरिभाऊ उपाध्याय के द्वारा अनूदित डिस्कवरी आफ इंडिया का हिन्दी संस्करण लोक समर्पित करते हुए पंडित नेहरू ने लिखा - हरिभाऊ उपाध्याय ने हिन्दी में भारत की खोज का भााषान्तरण इतना आकर्षक है कि मैं जो अंग्रेजी में साफ साफ नहीं कह सका हरिभाऊ उपाध्याय ने उसे आकर्षक बना डाला। भारत की खोज हिन्दी संस्करण अंग्रेजी संस्करण से कई गुना उत्तम है।
प्रोफेसर रघुवीर तथा पंडित नेहरू अंग्रेजी से हिन्दी में भाषान्तरण के पक्षधर थे। भाषान्तरण की त्रुटियां न पंडित नेहरू को स्वीकार थीं न ही प्रोफेसर रघुवीर त्रुटिपूर्ण भाषान्तरण के पक्षधर थे। इसलिये भारत की तात्कालिक भाषायी जरूरत साने गुरू जी की आन्तर भारती है। साने गुरू जी ने राष्ट्रवाद का जो गुरूमंत्र आन्तर भारती के रूप में प्रस्तुत किया है उसे क्रियान्वित करना भारतीय संघ की संवैधानिक आवश्यकता है। इसलिये राजभाषा मंत्रालय को आन्तर भारती मंत्रालय का दर्जा देकर भारतीय भाषाओं को उनका वाजिब अधिकार दिलाना आवश्यक है। कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर की विश्वभारती अवधारणा तभी फलवती हो सकती है जब साने गुरू जी की आन्तर भारती राष्ट्रवादी मानसिकता को संबल दिया जाये। साथ ही भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय को आन्तर भारती विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प करना चाहिये ताकि आन्तर भारती विश्वविद्यालय के जरिये भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के नजदीक आने का अवसर मिले एवं आन्तर भारती भाषा पर्याय कोश के जरिये एक भाषा से दूसरी भाषा में भाषान्तरण कार्य को सहज योग का सहारा दिया जाये। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रहे मार्कण्डेय काटजू ने जब वे मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे उन्होंने तमिल को मद्रास हाईकोर्ट की सहायक भाषा निश्चित करने का आदर्श प्रस्तुत किया। अंग्रेजी राज तथा भारत में अंग्रेजी के प्रभुत्व को नकारा नहीं जा सकता। बंगाल प्रेसिडेंसी मद्रास प्रेसिडेंसी तथा मुंबई प्रेसिडेंसी में क्रमशः बंग्ला तमिल तथा मराठी भाषाओं को हाईकोर्ट की सह भाषा बनाना जरूरी है प्राकृतिक न्याय का तकाजा भी यही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दी में बहस होती है हिन्दी में भारतीय संविधान की आधिकारिक प्रति भी है। ज्योंही बांग्ला तमिल भाषी भाषाओं को संबंधित उच्च न्यायालय में वाजिब हक मिलेगा न्याय पथ सुगम हो सकेगा। शनैः शनैः दूसरे घटक राज्यों की राजभाषाओं को भी उच्च न्यायालय में स्थान मिले। सर्वोच्च न्यायालय में भी शनैः शनैः भारतीय भाषाओं की पहुंच हो तभी हिन्दुस्तान सही हिन्दुस्तान हो सकेगा तथा मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक के समानांतर भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ताओं को अपना सिर उठा कर चलने का सौभाग्य हासिल होगा। पुनः महादेव के ताण्डव नृत्यावसान में महादेव के डमरू ने जो ध्वनि की साढ़े चार हजार वर्ष पहले जो नटराज कांस्य मूर्ति आस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री को सौंपी उसका उद्गान है -
नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्।
शंकर के डमरू के यही नौ और पांच ध्वनियां भारत का ध्वन्यालोक होने के साथ साथ विश्ववाणी का पुण्यश्लोक है। हिन्द के लोगों को इन चौदह ध्वनियों से उपजे 51 अक्षर जिसे अंग्रेजी में अल्फाबेट कहते हैं उसका सार तत्व प्रयोग में लाना अनिवार्यता का साक्ष्य सूत्र है।
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