Sunday, 12 June 2016

पी.एम.. आदि शंकर प्रकरण को भारतीय भाषाओँ के जरिये फेडराइज  (संघे शक्ति कलौयुगे)  करने का संकल्प ले
वैशाख शुक्ल पंचमी शंकर जयंती है, इसे जनता घोषित करे
आदि शंकर जिनका जन्म केरल राज्य के कालड़ी नामक गांव में हुआ, के बारे में प्रोफेसर पी.एन. राव ने अपनी पुस्तिका में सप्रमाण कहा है कि शंकर ‘शमम् करोति इति शंकर’ सब का कल्याण करने वाले का नाम ही शंकर है। प्रोफेसर राव का मानना है कि शंकर का जन्म ईसा से चार सौ वर्ष पहले लिच्छिवी खस गणतंत्र प्रमुख शाक्य शुद्धोदन के घर जन्मे गौतम बुद्ध से शंकर करीब दो सौ वर्ष पश्चात जन्मे। भारत के लोग साठ संवत्सर कालगणना का महत्वपूर्ण चौराहा मानते हैं। शंकर का जन्म मेष राशिस्थ सूर्य के शुक्ल पक्ष की पंचमी जिसे भारत के लोग पिछले चौबीस सौ वर्ष से आदि शंकर जयंती मनाते आरहे हैं मौजूदा ग्रेग्रेरियन तेरहवें द्वारा निर्धारित 15 अक्टूबर 1582 से जूलियन कैलेंडर के समान ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज के परम पावन पोप जिसे ख्रिस्ती धर्मानुयायी परम पावन तथा परम श्रेष्ठ पापल कहते हैं उन्होंने ग्रेग्रेरियन तेरहवें नाम से ख्यात कैलेंडर काल चक्रांतरण निर्धारित किया। यह कैलेंडर आज दुनियां भर में छागया है क्योंकि हमारी इस दुनियां का सबसे बड़ा मजहबी बेड़ा विश्वभर के अढ़ाई अरब ख्रिस्ती धर्मावलंबी हैं। एक ईश्वर, एक धर्मग्रंथ तथा एक मसीहा या पैगंबर अनुयायियों में पहला स्थान ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज है। सेमेटिक महजब एक पुस्तक एक ईश्वर तथा एक पैगंबर का समर्थक है। सेमेटिक मजहबी समाज का दूसरा बड़ा समूह इस्लाम धर्मावलंबियों का है जिनकी संख्या पूरे विश्व भर में एक अरब साठ करोड़ है। ये दोनों मजहब यहूदी मजहब की तरह सेमेटिक होने के साथ साथ धर्मांतरण के जरिये मजहब मानने वाले लोगों की संख्या में इजाफा करते हैं। हमारी आज की जो आधुनिक दुनियां है इसमें आदि शंकर द्वारा व्याख्यायित सनातन जिसे अंग्रेजी भाषी समाज Catholicity का पर्याय मानता है वेदांत जनित अद्वैत को मूलाधार माना। वैदिक ऋचाओं के अनुसार श्रौत स्मार्त मत के प्रमुख विरोधी आचार्य चार्वाक जैन शासन रत अर्हत तथा गौतम बुद्ध थे। इन्हें वैदिक ज्ञान तथा वैदिक निष्ठा पर आस्था नहीं थी। तब वैदिक ज्ञान के कर्णधारों का मानना था कि ‘नास्तिको वेद निंदकः’। आचार्य चार्वाक जैन शासन रत तथा गौतम बुद्ध ये तीनों वैदिक ज्ञान के अनुभवी न होने के अलावा वैदिक ऋचाओं तथा हव्यवाह हवन कर वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के प्रशंसक नहीं थे। आदि शंकर ने वैदिक वेदांत ज्ञान तथा आस्था के चार स्वरूप जपयज्ञ, प्रार्थना, नमाज, नमाज शब्द की व्याख्या करते हुए हिन्दी वैयाकरण किशोरीदास वाजपेयी संस्कृत वाङमय के नमस्या शब्द को ही नमाज कहा जो हठासन या हठयोग के जरिये अल्लाह ताला की निर्गुण ईश्वर की उपासना है। शंकर ने महाभारत के वैयासिक अनुशासनि पर्व भीष्म युधिष्ठिर संवाद जिसे विष्णु सहस्त्रनाम कहा जाता है भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर के सवाल - ‘को धर्मः सर्व धर्माणाम् भवतः परमो मत’ का जवाब देते हुए कहा था - ध्यायन (जप ध्यान), स्तुवन् (स्तुति प्रार्थना), नमस्यश्च नमाज अता करना, यजमान स्तथैवच भीष्माचार्य ने ध्यान, जपयज्ञ को सब धर्मों से ऊपर रखा दूसरे स्थान पर भीष्माचार्य ने स्तुति प्रार्थना रखा जिसे विश्व का समूचा ईसाई समाज गिरिजाघरों में हर रविवार को ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथ बाइबिल का बाइबिल की मूल भावना हिब्रू में नहीं यूरप के ईसाई समाज अपनी अपनी भाषा में बाइबिल की ईश प्रार्थना करते हैं। ईसाई समाज की महत्वपूर्ण विधा बपतिस्मा है। दुनियां में जिन्हें लोग हिन्दू कहते हैं उनके बीच एक जह्नु नाम महत्वपूर्ण व्यक्ति हुए। जिनके नाम पर गंगा का एक नाम जाह्नवी है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के निवासी सर्वोदयी राजाराम सिंह गुनगुनाते रहते - औषधम् जाह्नवी तोयम् वैद्यो नारायणो हरिः। जह्नु शब्द जब भारत से पश्चिम की यात्रा पर निकला उसका नया नामकरण सेंट जाह्न होगया। ईसा मसीह का बपतिस्मा सेंट जाह्न ने पवित्र जल की ईसा मसीह के सिर पर जलाभिषेक करते हुए किया। श्रीमद्भागवत महापुराण के नौवें स्कंध में और्वोपदिष्ट योग तथा और्वोपदिष्ट मार्ग का उद्धरण आया है। शुक्रचार्य का एक नाम और्व भी है। वर्तमान में जिस भू भाग को अरब या अरेबिया नाम से जाना जाता है वह संस्कृत वाङमय में और्व कहलाता है। नमस्या साधना - हठासन अथवा हठयोग की एक ऐसी अद्वितीय प्रक्रिया है जो भारत के शैव धर्मावलंबी समाज तथा यजुर्वेद वर्णित ‘देवता भ्यः पितृभ्यःश्च महायोगीभ्य एव च नमः स्वाहोये स्वधायै नित्यमेव नमो नमः’। यजुर्वेद के पितृ सूक्त के इस मंत्र का त्रिबार उच्चार करने के पश्चात अगला मंत्र है याने छंद है। ‘सप्तव्याधाः दशार्णेषु मृगा कालंजरे गिरौ चक्रवाका सरद्वीपे हंसा सरिस मानसे तेऽपि जाता कुरूक्षेत्रे ब्राह्मणा वेद पारगाः’। यहां शैव मत तथा इस्लाम मत में नजदीकियां प्रतीत होती हैं। सनातनी, स्मार्त, अद्वैत मार्ग का अनुसरण करने वाला कहता है - ‘ऋण न मुच्यते काशी’। उधर हज की यात्रा करने वाला यह मान्यता रखता है करजदार का हज कबूल नहीं होता है। ऋणी व्यक्ति की हज यात्रा अर्थहीन है। यही वह बिन्दु है जहां सनातनी स्मार्त तथा हज यात्रा में जाने वाले इस्लाम धर्मावलंबी ऋण या कर्ज के बारे में एक मत हैं। महर्षि पतंजलि की अथातो योग जिज्ञासा से इस्लाम मजहब की कोई विरक्ति नहीं है। नमस्या या नमाज अता करने का हठासन ही हठयोग का पहला सूत्र है। इसलिये भारत के उन विचारशील महानुभावों को जिन पर कृष्णार्जुन संवाद भगवद्गीता के संवाद का आध्यात्मिक प्रभाव है उन्हें अपने विचार पोखर को सर्वग्राही बनाना होगा। कृष्णार्जुन संवाद के समानांतर दूसरा महत्वपूर्ण संवाद ऊधो माधो का संवाद उद्धव गीता है। उद्धव गीता श्रीमद्भागवद् का ग्यारहवां स्कंध है इसमें 31 अध्याय 1387 श्लोक 203 उवाच हैं। भक्ति के बारे में कबीर ने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देस। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने भक्ति नारद संवाद में पद्म पुराण में कहा - द्रविड़े साहम् समुत्पन्नाः वृद्धिं कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णताम् गताः। भक्ति का पुष्टिमार्गी स्थान महाराष्ट्र में ही प्रफुल्लित हुआ। उद्धव गीता के जरिये संत एकनाथ ने अठारह हजार अभंग रच कर भक्ति ज्ञान वैराग्य को नया मंच दिया। एकनाथ महाराज के अठारह हजार अभंगों को एकनाथी भागवत के समूचे महाराष्ट्र तथा पुष्टिमार्गी भक्ति परंपरा का स्त्रोत माना जाता है। अखबारी दुनियां को नई ऊँचाई के स्तर तक पहुंचाने की पहल करने वाले रामनाथ गोइनका द्वारा स्थापित इंडियन ऐक्सप्रेस अखबार ने मंगलवार मई 31 2016 के Social intelegence स्तंभ में एक खबर छापी। समाचार का शीर्षक -Is Shankaracharya India’s National Philosopher  इंडियन ऐक्सप्रेस की खबर के मुताबिक Govt. is considering propose to observe May 11 birthday of Adi Shankaracharya a National philosopher’s day who was Shankar, what was his philosophy? Ashutosh Bhardwaj explains. Ashutosh Bhardwaj asks again – What exactly meant by India’s National Philosophy? What is Vedanta the system with which Sankara is most closely associated? So what are Shankaracharya Shankar’s main philosophical thoughts? So can Shankaracharya be called India’s national philosopher? What about the other philosophical stands Shankara was opposed to शंकर दर्शन शंकर भाष्य पर इन छः सवालों को उठाने वाले अखबार नवीस ने शिकागो के विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका वेंडी डोनिगर की ताजी पुस्तक An Alternative History of Hinduism को इस ब्लागर ने अमरीका के कैलिफोर्निया दक्षिण के सेेरिटोस शहर में आद्योपांत तीन बार पढ़ा तथा हिमकर ब्लाग में अढ़ाई वर्ष पहले प्रस्तुत किया साथ ही मजहब की ऐतरेय व्याख्या कर्त्री विदुषी लेखिका को आदि शंकर के वेदांत आधारित अद्वैत दर्शन को आसेतु हिमाचल सनातनता संबंधी वास्तविकता उनके सामने रखी। उन्होंने इस ब्लागर के द्वारा उठाये गयेे बिन्दुओं पर कोेई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। उनकी सुविधा के लिये समूचा पत्र व्यवहार अमरीकी अंग्रेजी में प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने शंकर के अद्वैत के बजाय रामानुजम द्वैताद्वैत तथा मध्वाचार्य के विशिष्टाद्वैत को वरीयता दी जब कि द्वैताद्वैत केवल तमिल ब्राह्मणों तक सीमित था और विशिष्टाद्वैत याने मध्वाचार्य का मार्ग अपनाने वाले व्यक्ति पूर्ण कर्णाटक में भी नहीं थे। An Alternative History of Hinduism पर दीनानाथ बत्रा ने अदालत में सप्रमाण अपना पक्ष रखते हुए An Alternative History of Hinduism पर भारत में पुस्तक को प्रतिबंधित किया गया है। यूरप इंग्लिस्तान तथा अमरीका के लोग जो भारत शास्त्र इन्डोलाजी पर रूचि रखते हैं उन सभी का मानना है कि शंकर ईसा की नवीं शती के प्रारंभ में हुए थे। रामानुजम तथा मध्वाचार्य का काल निर्धारण करते हुए उनकी मान्यता है कि रामानुजम ग्यारहवीं शती में मध्वाचार्य तेरहवीं चौदहवीं शती की उपज मानते हैं। आदि शंकर के बारे में प्रोफेसर राव के निर्धारण बिन्दुओं को भारत सरकार न ही सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के पक्षधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आदि शंकर के काल निर्धारण आदि शंकर की वेदांत व्याख्या, शंकर का अद्वैत मत की व्याख्या जानने के लिये मिथिला में जब आदि शंकर पहुंचे मंडन मिश्र के तोते ने संन्यासी शंकर का संस्कृत वाङमय में स्वागत करते हुए कहा - संन्यासी मेरे स्वामी पंडित मंडन मिश्र अपने पिताश्री का एकोदिष्ट श्राद्ध संपन्न कर रहे हैं। श्राद्ध भोज में संन्यासी निषिद्ध हैं संन्यासी को श्राद्ध भोज नहीं कराया जा सकता इसलिये श्राद्ध पूर्ति के पश्चात मेरे स्वामी मंडन मिश्र आपका स्वागत करेंगे। यह घटना इस बात की प्रतीक है कि मंडन मिश्र ने बौद्ध धर्म अंगीकृत तो किया पर ब्राह्मण धर्म का मुख्य कार्य श्राद्ध त्याग नहीं किया। श्राद्ध के अगले दिन मंडन मिश्र ने कालड़ी से मिथिला पहुंचे संन्यासी शंकर का स्वागत किया। मंडन मिश्र की धर्मचारिणी भारती विदुषी स्त्री थी। उसकी वार्ता सुन कर संन्यासी शंकर ने मंडन मिश्र से कहा - मिश्र जी आपके मेरे बीच होरहे शास्त्रार्थ की निर्णायिका माता भारती ही होगी। शास्त्रार्थ में संन्यासी शंकर ने मंडन मिश्र के सारे तर्क खण्डित कर डाले। भारती मिश्र ने निर्णय दिया। संन्यासी शंकर ने मेरे पति मंडन मिश्र को निरूत्तर कर दिया है। विदुषी भारती ने संन्यासी शंकर से निवेदन किया कि संन्यासी शंकर मेरे पति मंडन मिश्र सद्गृहस्थ हैं वे तभी पराजित माने जायेंगे जब आप शास्त्रार्थ में मुझेे भी पराजित कर दो। मैं स्त्री हूँ केवल काम शास्त्र की ज्ञाता हूँ मुझसे आपको काम शास्त्र पर शास्त्रार्थ करना होगा। आप मुझे भी पराजित कर दोगे तभी मंडन मिश्र आपके अनुयायी हो सकेंगे। संन्यासी शंकर ने परम विदुषी भारती से कहा - मां सप्ताह भर की मोहलत दो। आपसे काम शास्त्र पर ही शास्त्रार्थ करूँगा। उद्धव गीता के पंद्रहवें अध्याय में उद्धव ने वासुदेव कृष्ण से कहा - कया धारणया कास्वित कथम् स्वित सिद्धिरच्युत कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनाम् सिद्धियो भवान। योगेश्वर वासुदेव ने अपने भृत्य सखा सुहृत उद्धव से कहा - 
अणिमा महिमा मूर्ते लघिमा प्राप्ति रिन्द्रियैः प्राकाट्यम श्रुत दृष्टेषु शाक्ति प्रेरण भीशिता। 
गुणेष्व संगोविशिता यत्काम स्तद् वस्यति एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः। 
अनूर्मिमत्वं देहोस्मिन दूरश्रवण दर्शनम् मनोजव काम रूपम परकाय प्रवेशनम्
स्वच्छन्द मृत्युर्देवानाम सह क्रीड़ा नु दर्शनम् यथा संकल्प संसिद्धि राज्ञा प्रतिहता गतिः।
त्रिकालज्ञत्वा मदृन्द्वम् पर चित्ताभिज्ञता अग्न्याकीश्वु विषादीनाम् प्रतिष्ठंभो पराजयः। 
          अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने उद्धव से जो कहा आदि शंकर ने परकाय प्रवेश के जरिये सात दिन तक मृत्युग्रस्त माहिष्मती नरेश के शरीर में परकाय प्रवेश द्वारा कामक्रीड़ा का अनुभव अपने शरीर से नहीं माहिष्मती नरेश के शरीर से अनुभूत किया। विदुषी माता भारती को काम मार्गण में पराजित कर दिया। विदुषी ने संन्यासी शंकर से पूछा बिना स्त्री सहवास किये कामशास्त्र नहीं जाना जा सकता। संन्यासी शंकर ने भारती मिश्र को कहा - मां इस देह से मैंने स्त्री सहवास नहीं किया है। मंडन मिश्र दंपत्ति ने संन्यासी शंकर के अद्वैत स्मार्त पथ को अंगीकृत कर लिया। प्रोफेसर राव के अनुसंधान को भारत का मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक निरंतर अनदेखी कर रहा है। भारत का मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, साने गुरू जी, डाक्टर संपूर्णानंद, डाक्टर भगवान सिंह सरीखे भारतीय विद्वानों तथा भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा व्यक्त भावना कि भारतीय वाङमय विशेष तौर पर कृष्णार्जुन संवाद अंग्रेजी के जरिये हृदयंगम नहीं किया जा सकता इसलिये अगर भारत सरकार आदि शंकर जयंती वैशाख शुक्लपक्ष पंचमी के संबंध में राष्ट्रीय निर्णय लेना चाहती है तो पहले यह सुनिश्चित किया जाये आदि शंकर कालड़ी में कब जन्मे थे ? प्रोफेसर राव और भारतीय चिंतन पोखर द्वारा निर्धारित तिथि ईसा से चार सौ वर्ष पूर्व या ईसा की नवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्ष आदि शंकर का काल निर्धारण पहली जरूरत है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित भारत के तमाम संस्कृत विश्वविद्यालयों तथा आसेतु हिमाचल भारत के ख्याति प्राप्त पंचांग निर्माताओं का अभिमत प्रधानमंत्री कार्यालय भारत के घटक राज्यों की सरकारों की राजभाषाओं तथा संविधान सम्मत क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यों में वैशाख शुक्ल पंचमी आदि शंकर जयंती माना गया है। जब आदि शंकर मंडन मिश्र शास्त्रार्थ हुआ था तब संस्कृत भारत की एक यत्र तत्र सर्वत्र समझी व बोली जाने वाली भाषा थी। कालिदास भवभूति भाष सरीखे कवियों तथा नाट्यकारों ने संस्कृत व प्राकृत दो भाषाओं याने व्याकरण सम्मत संस्कृत भाषा का तथा निरक्षर समाज द्वारा बोली जाने वाली प्राकृत भाषा का चलन हो चुका था। इसलिये भारत के भाषायी ज्ञान पोखर को गहराई में पैठ कर भारत की भाषाओं व आदि शंकर संबंधी वृत्तांत किस तरह प्रस्फुटित हुए यह अध्ययन करने की जरूरत है। चार्वाक अर्हत जैन अनुशासन तथा गौतम बुद्ध के वैदिक ज्ञान को नकारने तथा अपना मत प्रस्तुत करते रहने का जो उपाय हुआ उसे टालना समीचीन नहीं है। आदि शंकर की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत के दशावतार श्रंखला में नवें अवतार के रूप में गौतम बुद्ध को महाविष्णु का नवां अवतार घोषित कर बौद्धावतार गौतम बुद्ध को भगवान महाविष्णु के अवतार के रूप में स्थापित करना एक अद्वितीय निर्णय है। भारत सरकार का प्रधानमंत्री कार्यालय क्षेत्रीय भाषाओं को प्रश्रय देने के मार्ग में बढ़ रहा है। हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा मइती असमी बांग्ला उड़िया तेलुगु तमिल मलयाली कन्नड़ गुजराती मराठी कोंकणी पंजाबी तथा उर्दू भाषाओं व उनकी लिपियों में आदि शंकर संबंधी प्रसंग तत्काल खोजे जायें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस मुहिम को हाथ में ले तथा आदि शंकर को नवीं शती का महापुरूष मानने का जो सिलसिला चल रहा है उस पर मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक की व्याख्या भाष्य - आन्तर भारती के जरिये से प्रकट की जाये। पहला और महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि क्या आदि शंकर ईसा से चार सौ वर्ष पूर्व जन्मे थे ? या ईसा की नवीं शती में उनका उदय हुआ ? प्रोफेसर राव के निष्कर्ष पड़ताल करने योग्य हैं। यदि भारतीय विद्वत समाज भारतीय पंचागकार इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि आदि शंकर गौतम बुद्ध के जन्म के लगभग डेढ़ सौ वर्ष बाद उदित हुए और उन्होंने जो रास्ता बौद्धावतार का अपनाया वह भारत की आस्था पद्धति का प्रवेश द्वार है। आचार्य नरेन्द्र देव की मान्यता थी कि भारत को नेतृत्व देने की क्षमता केवल वैष्णव मतावलंबियों में है। वैष्णव सभी को साथ लेकर चल सकता है। यह परम महावैष्णव महात्मा गांधी ने अपनी जीवन यात्रा से परिपुष्ट किया।
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