देवग्वल्ल और कोटगाड़ी दैवी न्याय पथ, काठ का घोड़ा पानी कैसे पी सकता है ?
चितई देव ग्वल्ल और कोटगाड़ि कोकिला देवी का मानवीय स्वरूप से ताकतवर दैवी न्याय के कुमांऊँ के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। मानवीय यहां तक कि अदालती न्याय प्रक्रिया में जो व्यक्ति अपने प्रति अन्याय महसूस कर अल्मोड़ा अस्कोट मोटर मार्ग में अल्मोड़ा से लगभग दस किलोमीटर स्थित चितई मंदिर तथा चितई गांव के शिखर धुर में देवग्वल्ल का प्रसिद्ध मंदिर है जहां न्याययाची अपनी प्रार्थना देवग्वल्ल को प्रस्तुत करते हैं। न्यायार्थियों के अलावा समृद्धि की भिक्षा चाहने वाले लोग भी देवग्वल्ल मंदिर में मनौती करते हैं। हिमालय क्षेत्र के देव देवी आराधना स्थल अनेकानेक हैं। जागर, डंगरिया, जगरिया, पुछेरा, ढोली, भंगरिया सहित सात्विक राजसी तथा तामसी देवी देवताओं की अर्चना आराधना पशु बलिदान सहित आराध्य देवी देवता का स्तवन करने के साथ ही कुमांऊँ में देवग्वल्ल तीन चौथाई कुमांउनियों के ईष्टदेव कुलदेवता और आराध्य हैं। मूल कुमांऊँ काली कुमांऊँ के नैपाल देश के पश्चिमी हिस्से जिसे डोटी कहा जाता है डोटी डंडेलधुरा तथा बैतड़ी सहित नैपाल राष्ट्र राज्य के दारचूला इलाके को महाकाली अंचल कहा जाता है उस भू क्षेत्र पर कुमांऊँ के कालिकुमुं सोर पिथौरागढ़ तथा अस्कोट का प्रमाव है यहां तक कि सीराकोट राज्य का विस्तार एक जमाने में पूरा डोटी तक था। कालिकुमुं के इसी इलाके में ग्वल्ल देव का जन्म हुआ उनकी विमाता ने खबर फैला दी कि महारानी ने सिल लोढे़ को जन्म दिया है। बालक का पालन पोषण एक विधवा ब्राह्मणी के घर हुआ। बालक जब बड़ा हुआ उसने एक काठ का घोड़ा बनाया और काठ के घोड़े को नदी में पानी पिलाने लगा। लोगों ने युवा ग्वल्लदेव से पूछा कि ऐसा क्या कर रहे हो। भला कहीं काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है। तब ग्वल्लदेव ने कहा - जब महारानी सिल लोढ़े को जन्म दे सकती है तो काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है। देवग्वल्ल ने राजपरिवार व राज करने में राजा की सहायता करने वाले लोगों में एक नयी जान फूंक डाली। यही राजकुमार देवग्वल्ल के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। टाइम्स आफ इंडिया ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत जो जन्मे तो पाली पछांऊँ में अखबार का रिपोर्टर उन्हें पिथौरागढ़ वासी मानता है शायद अखबार नवीस को यह पता हो कि जब हरीश रावत अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद चुने गये उन्होंने अपना ठिकाना धारचूला पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील जिसके पूर्व में काली पार नैपाल और उत्तर में लिपुलेख दर्रे के पार परम पावन 14वें दलाई लामा का तिब्बत है जिसे संस्कृत भाषा में त्रिविष्टप अथवा त्रिदश नाम दिया जाता है और त्रिविष्टप में देवता लोग बसते हैं। तिब्बत की लोकमान्यता के अनुसार दलाई लामा अवतारी पुरूष हैं। वर्तमान दलाई लामा 14वें दलाई लामा हैं। चीन ने दक्षिण चीन सागर की तरह ही तिब्बत पर कब्जा किया है। तिब्बत की संस्कृति भाषा तथा रहन सहन चीन सरीखा नहीं चीन के निरंकुशवादी शास्ता समूह ने बीजिंग में एक कानून बनाया है वह कानून अंग्रेजी भाषा में Incarnation अवतार परंपरा कही जाती है। तिब्बत के बौद्ध धर्मावलंबी हीन यान मार्ग के अनुयायी हैं व पुनर्जन्म में यकीन करते हैं। पुनर्जन्म की परंपरा को भारत की तरह ही मानते हैं। माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन ने तिब्बत जबरदस्ती कब्जा लिया। दुनियां को बताया कि तिब्बत चीन का Autonomus Region है जो Reincarnation कानून चीन ने निश्चय किया है उसके अनुसार बीजिंग की सरकार ही तिब्बत का धर्मगुरू दलाई लामा कौन हो ? वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु के पश्चात तय करेगी। यह अत्यंत रहस्यमय है कि जो निरीश्वरवादी चीनी शासन ईश्वर अल्लाह या गौड पर यकीन नहीं करते वे परम पावन दलाई लामा संबंधी Reincarnation कानून बना रहे हैं। Periodical incarnation of deities in the Dangaria कुमांऊँ की विशेषता है। यहां रामायण व महाभारत के उपाख्यान जागर में कुमइयां भाषा में गाये जाते हैं जो व्यक्ति जागर गाता है उसे जगरिया तथा उसके साथ गाने वाले भगरिया कहलाते हैं। ज्योतिषी तो आमतौर पर ब्राह्मण होता है पर पुछेरिया ज्यादातर हरिजन होते हैं। पुछेरियों को दैवी शक्ति प्राप्त है। आप पुछेरिया के पास जायेंगे तो उन्हें अक्षत सौंपेंगे। वे आपके समक्ष उपस्थित समस्या का बिन्दुवार विवरण आपको बतायेंगे तथा परामर्श देंगे कि किस देवता जैसे गंगनाथ, भोलानाथ, हरजू, नागमल ग्वल्ल, भद्रकाली, जयंती, मंगलाकाली, कोटगाड़ि की कोकिला देवी आदि किस मंदिर में आराधना करने से दुःख हानि होगी। पुछेरा आपको यदि पितृदोष हो तो उसका भी ब्यौरा ऐसे बता देंगे जैसे आंखों देखा हाल हो। पुछेरा केवल आगंतुक को ही जानकारी देगा, जिसकी समस्या है उसे ही बतायेगा और किसी से कोई चर्चा नहीं करेगा। इसके अलावा डंगरिया में ईश्वर शक्ति को जाग्रत करने का काम ढोली करता है जो अपने आपको देवदास कहता है। वह ढोल बजा कर नाच कर डंगरिया में ईश्वरीय शक्ति जिसे स्थानीय लोग देवता कहते हैं यह दैवी शक्ति कुमांऊँ के हर गाड़ गधेरे में स्थापित मंदिरों में है। कुछ महत्वपूर्ण मंदिर, छुरमल देवता के नौरते में अष्टमी नवमी के दिन विशेष आयोजन भी होते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्रद्धात्रय विभाग योग में सात्विकी, राजसी व तामसी तीन श्रद्धायें व्यक्त करते हुए श्रद्धात्रय के चौथे श्लोक में कहा -
यजन्ते सात्विका देवान् यक्ष रक्षांसि राजसा प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजंते तामसा जनाः।
उत्तराखंड की राजधानी दून में ग्वल्लदेव की भांति काठ का घोड़ा उड़ीसा के मूर्तिकार कालीचन्द पारीदा व फकीरचन्द पारीदा ने पांच लाख लागत से निर्माण किया। गणेश जोशी विधायक ने घोड़े की टांग तोड़ी या नहीं यह तो अगर मुकदमा जोशी पर चलता तब मालूम पड़ता। सरसरी नजर से लगता है समूचा प्रकरण केवल घटिया राजनीतिक दांवपेंच का मसला था। कुमांऊँ के तीन चौथाई बाशिन्दे कुमांऊँ में रह रहे हों या प्रवासी कुमाउंनी हों देवग्वल्ल उनके ईष्टदेव हैं। देवग्वल्ल के साथ काठ के घोड़े की कहावत जुड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि किसी अंग्रेजी न जानने वाले देहाती कुमाउंनी देवग्वल्लभक्त ने महाशय हरीश सिंह रावत को चेतावनी दी कि देवग्वल्ल की स्तुति नहीं काठ के घोड़े की नुमाइश कर देवग्वल्ल की न्यायप्रिय दैवी संपत् का अपमान होगा यह चेतावनी शायद महाशय हरीश रावत को चुभ गयी। सत्ताईस नक्षत्रों में से पहला नक्षत्र अश्विनी है जिसे साधारण बोलचाल की भाषा में घोड़ी भी कहा जाता है। जब समुद्र मंथन हुआ था क्षीर सागर में उससे चौदह रत्न निकले उनमें से एक रत्न उच्चैःश्रवा नाम का घोड़ा भी था जिसे इंद्रदेव ने अपने पास रखा। यह संभव हो सकता है कि घोड़े की मूर्ति निर्माण करने का संकल्प लेते समय महाशय हरीश रावत की देवग्वल्ल की काठ की घोड़ी वाली बात स्मरण न रही हो वैसे प्रतीत तो यह होता है कि वे देवग्वल्ल के पारंपरिक उपासक हैं। देवग्वल्ल पशुबलि भी स्वीकार करते हैं पर जब देवग्वल्ल की शरण में याचक बन कर आया हुआ याची निरामिष होता है तथा बलिदान करने का पक्षधर नहीं होता ऐसे याचियों से देवग्वल्ल गौदान स्वीकार करते हैं। पशुबलि उनके गणों के आहरार्थ दी जाती है। देवग्वल्ल के आलव जिसे कुमइयां भाषा में माड़ कहते हैं जहां गांव में देवग्वल्ल की स्थापना की जाती है उसे ग्वल्लमाड़ कहते हैं।
हिमालय के अलाव बर्फानी पहाड़ यूरप के आल्प्स में भी हैं। उत्तरी यूरप के देशों में जाड़ों में बर्फ गिरती है पर वे स्थान हिमालय नहीं कहलाते। उत्तर अमरीका व कनाडा में भी बर्फानी पहाड़ हैं वे पहाड़ हिमालय नहीं पुकारे जाते। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में पार्थ अर्जुन को कहा था - यज्ञानां जप यज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः। द्वारका में श्रीकृष्ण ने उद्धव से अपनी विभूतियों के बारे में कहा - घिष्णुयानमाम स्याहम् मेरूः गहनानाम् हिमालयः। मेरू श्रंग भी हिमालय में ही है। हिमालय आदिदेव महादेव की स्थली कैलास है। हिमालय के नदी नाले गाड़ गधेरे जहां जहां भी कंकर हैं वे सभी शंकर हैं। हिमालय में ईश्वर एवं महादेव के अलावा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तथा सृष्टि पालनकर्ता विष्णु की स्थली सहित क्षीर सागर के दक्षिणापथ को ही हिमालय नाम दिया जाता है इसलिये भारत के उत्तर में हिमालय मानस खंड, केदार खंड, जलंधर खंड तथा कश्मीर खंड के नाम से जाना जाता है। न्यायकर्ता देवग्वल्ल उनके काठ के घोड़े वाला प्रसंग उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रावत महाशय के कंठ में लटक गया। उन्हें शक्तिमान की मूर्ति का अनावरण करने में दैवी भय सताने लगा। दरअसल में अनुयायी तथा उनके लाभार्थी राजनीतिज्ञों ने जल्दबाजी में न्यायदेव से याचना की। ईश्वरीय न्याय मानवीय न्याय से पृथक होता है। वहां याची, याची की प्रार्थना तथा न्यायदेव का निष्कर्ष होता है। याची के मन में यदि पापकर्म का दंश हो याची भी दण्ड का भागी हो सकता है।
दिशायेें दस होती हैं उनके दिक्पाल तथा लोकपाल भी दैवी संपत् के अंग हैं। प्रकृति का जो धर्म है वह मजहबी विश्वासों से ऊपर है। हिन्द में एक सोच परंपरा है वह है यम की दिशा दक्षिण है नैऋत्य दिशा दैत्य दानवों की है। हिन्द का पारंपरिक प्राकृतिक ज्ञान प्रकृति के हर पक्ष का तर्पण करता है वह एकांकी नहीं सर्वांगी है हिमालय का प्रतीक है।
टाइम्स आफ इंडिया स्तंभकार या अखबार नवीस कौटिल्य सिंह ने ही महाशय हरीश रावत के अंतर्मन के भय को व्यक्त करते हुए Fearing God of Justice, Rawat dumps SHAKTIMAN. शीर्षक से ब्यौरा दिया। उत्तराखंड के दूसरे अखबारों ने शक्तिमान प्रकरण को ही राजनीति का हिस्सा माना उन्हें शक्तिमान प्रकरण में हर पहलू से केवल सियासत नजर आयी। यह मामला ठीक वैसा ही था जैसा देवीधुरा में महर फर्त्याल संघर्ष होता रहा है। सैकड़ों वर्ष बाद भी वाराही देवी के मंदिर देवीधुरा में प्रतिवर्ष श्रावणी को महर फर्त्याल संघर्ष का पुनराभ्यास दिखता है। अगर महाशय हरीश रावत जी ने कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडे के कुमांऊँ इतिहसय जैसा कूर्मांचल केसरी ने लिखा उनके पौत्र द्वारा संपादित संस्करण नहीं उसे पढ़ते पीताम्बर बड़थ्वाल के गढ़वाल का जो इतिहास लिखा उसे पारायण कर देहरादून के मुख्य मंत्री की कुर्सी पर विराजते उनकी समस्याओं का समापन होता। उत्तराखंड (देहरादून, हरिद्वार तथा नैनीताल की तराई को छोड़ कर) जो पूर्णतः पहाड़ी इलाका है उसमें कुमांऊँ तथा पौड़ी गढ़वाल की स्थिति टेहरी से अलग है। देहरादून हरिद्वार की रैयतबाड़ी व्यवस्था कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़वाल के पौढ़ी जिले भू प्रबंधन व्यवस्था से पूर्णतः अलग है। उत्तर प्रदेश में जब तक गढ़वाल हिमालय व कुमांऊँ हिमालय के विकास को सही रास्ता देने वाले राजनेता थे तब तक कुमांऊँ व गढ़वाल के पार्वत्य क्षेत्रों की समस्या का निराकरण मानवीय आधार पर होता था। पर्वतपुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा जब उ.प्र. के मुख्यमंत्री थे उन्होंने देहरादून जिले को मेरठ कमिश्नरी से हटा कर गढ़वाल कमिश्नरी का मुख्य जिला तय कर दिया। तब तक डाक्टर संपूर्णानंद के राज्यकाल में गठित उत्तराखंड डिवीजन को लुप्त कर बहुगुणा जी ने गढ़वाल डिवीजन के देहरादून, टेहरी, चमोली, पौढ़ी चार जिलों को गढ़वाल कमिश्नरी का नाम दिया। अल्मोड़ा पिथौरागढ़ तथा नैनीताल कुमांऊँ कमिश्नरी कहे जाने लगे।
समस्याओं विविधताओं का साहसिक समाधान करने के बजाये गढ़वाल कमिश्नरी के देहरादून जिले तथा कुमांऊँ के वर्तमान ऊधम सिंह नगर जिले को विकास पर सारे उत्तराखंड का दारोमदार रूक गया। पहाड़ दुर्गम होगया शासकों की नजर सुगम देहरादून हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर पर केन्द्रित होगयी इसलिये वर्तमान उत्तराखंड राज्य में पांच क्षेत्र हैं। पहला पूर्ववर्ती टेहरी राज का वर्तमान उत्तरकाशी जिला चमोली और रूद्रप्रयाग जिले जो पूर्व में ब्रिटिश गढ़वाल के तहसील थे कुमांऊँ के पिथौरागढ़ बागेश्वर तथा चंपावत जिले शेष पर्वतीय क्षेत्र के पौड़ी अल्मोड़ा व टेहरी जिले देहरादून तथा देहरादून का जौनसार बाबर इलाका हरिद्वार शहर तथा हरिद्वार जिले में खेतीबाड़ी वाले गांव नैनीताल तथा पौड़ी गढ़वाल का भाबर इलाका काशीपुर सहित ऊधम सिंह नगर जिले पूरी तराई मुख्यमंत्री महोदय को चाहिये कि वे अपने कार्यालय के मातहत 1. केदारखंड 2. मानसखंड 3. अल्मोड़ा पौढ़ी तथा नैनीताल जिलों पूर्णतः पर्वतीय। 4. देहरादून तथा जौनसार बाबर का इलाका का 5. ऊधम सिंह नगर की तराई 6. पौढ़ी तथा नैनीताल का भाबर का इलाका 7. हरिद्वार शहर 8. हरिद्वार के गांव के इलाके। इनकी समूची समस्याओं का पूरा पूरा आकलन कर उत्तराखंड के व्यावहारिक विकल्प का मार्ग खोजें। उस पर सक्रियतापूर्वक आयोजन करें तभी वर्तमान तदर्थ व्यवस्था के बदले वेगवती विकास धारा का प्रवाह संभव है। हरिद्वार शहर गंगा द्वार है गंगा एक्ट बनने जारहा है। हरिद्वार को वैटिकन तरीके का शहर निर्मित करने का लक्ष्य रखा जाये। सबसे पहली जरूरत हरिद्वार को नशामुक्त आमिष, अंडा मुक्त गंगा द्वार बनाने का संकल्प करें। हरिद्वार शहर से प्रदूषण फैलाने वाले हर बड़े व मझले उद्यम को इतर स्थानों में स्थानांतरित किया जाये। भारत सरकार से मुख्यमंत्री प्रार्थना करें कि उत्तराखंड में हरिद्वार को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिया जाये। भारत के राज्यों से जो लोग गंगा स्नान करने हरिद्वार आते हैं उन्हें गंगा स्नान गंगा पूजन गंगा आरती के पश्चात गंगा नहाने आने के कारण सूचीबद्ध किया जाये। विभिन्न धर्मावलंबियों यथा जैन, बौद्ध, सिख, शैव, स्मार्त, वैष्णव, शाक्त, गोरखपंथी, नानकपंथी, रैदासपंथी, दादुरपंथी आदि गंगा स्नान के प्रति रूचि संवर्धन गंगा गाय के प्रति लोकसंग्रह का विपुल स्वरूप गंगा प्रकरण से जोड़ने हेतु मुख्यमंत्री अनुरोध करें। कुमांऊँ व गढ़वाल के सभी गाड़ गधेरे जिनका जल गंगा में समाता है उन्हें गंगा एक्शन प्लान का हिस्सा घोषित किये जाने के लिये मुख्यमंत्री जी जल संसाधन मंत्री का ध्यानाकर्षण करें तभी ग्वल्लदेव तथा कोटगाड़ि देवि उन्हें दैवी संपत मार्ग में चलने की सुपात्रता दे सकेंगे।
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