गुजरात के अहिंसा परमो श्रेयः कहने वाले वैष्णवों का अवैष्णवी कृत्य
दलित हिंसा से कैसे बचें ?
महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान इंडिनियन ओपीनियन के जरिये बीस अध्याय वाला हिन्द स्वराज अपनी मातृभाषा में भारतीय स्वातंत्र्य के लिये एक क्रांति का रास्ता श्रेयस मानने वाले युवा स्वातंत्र्य प्रेमियों से संवाद करने के पश्चात जो भावनायें व्यक्त कीं उन्हें उन्होंने हिन्द स्वराज कहा। उनके गुजराती भाषा में रचित हिन्द स्वराज का हिन्दी उल्था अमृतलाल नाणावटी महाशय ने किया। महात्मा गांधी ने अधिपति और वाचक दो शब्दों का इस्तेमाल अपनी रचना में किया। हिन्दी उल्थाकार ने अधिपति के लिये संपादक और वाचक के लिये पाठक शब्द उपयोग किये। हिन्द स्वराज के बीस अध्यायों में पांच अध्याय हिन्दुस्तान की दशा वर्णित करते हैं। हिन्दुस्तान की दशा के तीसरे अध्याय का शीर्षक हिन्दू मुसलमान है। अधिपति महात्मा गांधी जिन्हें तब दुनियां मोहनदास करमचंद गांधी के नाम से पहचानती थी उन्होंने अपने प्रश्नकर्ता वाचक को कहा - आपका आखिरी सवाल बड़ा गंभीर मालूम पड़ता है लेकिन सोचने पर यह सहल मालूम होगा। कट्टर वैर शब्द दोनों के दुश्मन ने खोज निकाला है। जब हिन्दू मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगड़ा तो हमारा सबका बंद होगया फिर कट्टर वैर काहे का ? और इतना याद रखिये कि अंग्रेजों के आने के बाद ही हमारा झगड़ा बंद हुआ ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहों के मातहत रहते आये हैं और मुसलमान हिन्दू राजाओं के मातहत रहते आये हैं। दोनों को बाद में समझ में आगया कि झगड़ने से कोई फायदा नहीं। झगड़े तो फिर से अंग्रेजों ने शुरू कराये। मियां और महादेव की नहीं बनती इस कहावत को भी ऐसा ही समझिये। जैसे मैं गाय को पूजता हूँ वैसे ही मनुष्य को भी पूजता हूँ, जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिन्दू उपयोगी ही है। तब क्या गाय को बचाने के लिये मैं मुसलमान से लड़ूँगा ? इसलिये मैं कहूँगा गाय की रक्षा करने का एक यही उपाय है मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिये और उसे देश के खातिर गाय को बचाने के लिये समझाना चाहिये। अगर वह न समझे तो मुझे अगर गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिये लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिये। यही धार्मिक कानून है जिसे मैं तो मानता हूँ। हां और ना के बीच हमेशा वैर होता है। अगर मैं वाद विवाद करूँगा तो मुसलमान भी वाद विवाद करेगा अगर मैं टेढ़ा बनूँगा तो वह भी टेढ़ा बनेगा। अगर मैं बालिश्त भर नमूंगा तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमेगा तो मेरा नमना गलत नहीं कहा जायेगा। जब हमने जिद की तब गोकुशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिये। ऐसी सभा का होना हमारे लिये बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गये तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े तो मैं उसके साथ कैसा बर्ताव करूँगा उसे मारूँगा या उसके पैर पड़ूंगा ? अगर आप कहें कि मुझे उसके पैर पड़ने चाहिये तो मुझे मुसलमान भाई के भी पैर पड़ना चाहिये। महात्मा गांधी ने 101 वर्ष पहले कोचरब आश्रम में हरिजन कुटंब दूधाभाई को आश्रम का हिस्सा बनाने के लिये रखा। महात्मा छुआछूत निवारण के प्रखर पक्षधर थे पर उन्हें कोचरब आश्रम चलाने के लिये चन्दा देने वाले गुजराती वैष्णव वामन बनिये बिदक गये। उन्होंने 1915 में महात्मा गांधी को चंदा देना बन्द कर दिया। महात्मा गांधी द्वारा कोचरब आश्रम चलाने केेे लिये तेरापंथी जैन मिल मालिक अंबालाल आगे बढ़े। उन्होंने महात्मा को तेरह हजार रूपये की थैली भेंट की। कोचरब आश्रम पूर्ववत चलता रहा। महात्मा ने वैष्णव गुजराती बनिया वामनों के आगे घुटने नहीं टेके। बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर ने महात्मा गांधी के हरिजन सेवक संघ पर ताना कसा। महात्मा गांधी और कांग्रेस के अछूतोद्धार को दिखावा और बनावटी नाटक भी बताया। भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने जो आक्षेप महात्मा गांधी और कांग्रेस पर बीसवीं शती के पांचवे दशक 1940-1947 में लगाये, गुजरात के वैष्णव और जैन मतावलंबी भी जिन्हें तब अछूत माना जाता था अब दलित कहा जाता है अपने आपको सवर्ण वैष्णव हिन्दू कहने वाले लोगों के संबंध में संस्कृत वाङमय का द्विज शब्द प्रयोग में आता रहा है। द्विज शब्द के दो माने हैं, उड़ने वाले पक्षी भी द्विज कहलाते हैं क्योंकि पहले अण्डा फिर अण्डे से पक्षी जन्म लेता है। भारत में जो लोग अपने आपको द्विज संज्ञा देकर सवर्ण और अवर्ण के शाब्दिक संग्राम में व्यस्त हैं वस्तुतः मनुष्य योनि में आज द्विज शब्द अर्थहीन होगया है। गुरू शिष्य परंपरा लगभग समाप्त प्रायः होगयी है केवल जनेऊ का तागा अपने बांये कंधे से दाईं ओर को डाल कर रखना द्विजत्व नहीं है। जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्यते यह परंपरा वैदिक युग में थी।आज तो भारत में कोई व्यक्ति यह घोषित करने की स्थिति में नहीं है कि वह द्विज है। इसलिये जो लोग अपने आपको सवर्ण मानते हैं वे भी अपने आपको दलित मानने वाले लोगों की पंक्ति में ही विद्यमान हैं, लिहाजा भारत में व्याप्त हिन्दु मुस्लिम मनमुटाव और तथाकथित दलित सवर्ण मनमुटाव जमीनी यथार्थ में पूर्णतया प्रतिकूल है। हिन्दू मुस्लिम मनोमालिन्य तथा सवर्ण अवर्ण या तथाकथित द्विज और दलित मनोमालिन्य का निवारण समय की पुकार है। भारत के मुसलमान अल्पसंख्यक समाज को बहुसंख्यक समाज द्वारा यह आश्वासन नितांत आवश्यक है कि इस्लामी सल्तनत के दौरान जो लोग जबर्दस्ती अथवा लोभ लालच के कारण इस्लाम कबूल करके उन्हें घर वापसी अथवा शुद्धि के नाम पर भारत के बहुसंख्यक समाज के घेरे में नहीं लाया जायेगा। धर्मान्तरण के जरिये ख्रिस्ती मजहब मानने वाले लोग आज दुनियां में अढ़़ाई अरब हैं।ख्रिस्ती मजहब के बाद धर्मान्तरण से अपनी जनसंख्या बढ़ाने वाला मजहबी समूह इस्लाम धर्मावलंबी है। ख्रिस्ती मजहब मात्र दो हजार वर्ष पुराना मजहब है। इस्लाम धर्म की उम्र मात्र सवा चौदह सौ वर्ष है। इन दोनों धर्मान्तरण विश्वासी मजहबों से हजारों वर्ष पहले भारत में जो धार्मिक आजादी थी उसमें चार्वाक सरीखे चिंतकों की भी पूछ होती थी जो ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेत का सिद्धांत मानते थे। जैन और बौद्ध धर्मावलंबी वेद और ईश्वर पर आस्था नहीं रखते थे, इन दो मजहबों के अलावा हिन्द में गुरूनानक द्वारा गुरूग्रंथ साहब का संपादन हुआ। खालसा मजहब सिख परंपरा का आधिकारिक सूत्रपात गुरू गोविन्द सिंह जी ने किया। सनातन धर्म के समानान्तर जैन, बौद्ध तथा सिख धर्म भी ओंकार समर्थक मजहब है। आज के भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में इस्लाम मजहब के अलावा जैन, बौद्ध व सिख धर्मावलंबी भी धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। केन्द्रीय सरकार को यत्र तत्र होरही दलित उत्पीड़न तथा अल्पसंख्यकों में आत्म विश्वास जाग्रत करने के लिये सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करना तात्कालिक जरूरत है कि जिसे लोग हिन्दू मजहब कहते हैं उसमें अन्य मजहबों से धर्मान्तरण के द्वारा घर वापसी अथवा शुद्धि आंदोलन सनातन शास्त्र सम्मत विधा नहीं है। हिन्दू धर्म के नाम से जाने जाने वाले मजहबी समूह में इतर धर्मावलंबियों को धर्मान्तरित करा कर हिन्दू संज्ञा देना सनातन शास्त्र सम्मत नहीं है। धर्मान्तरण के बारे में हिन्दुओं के तमाम खेमों तथा शंकराचार्यों का अभिमत मालूम कर सुप्रीम कोर्ट यह विचार करे कि ख्रिस्ती और इस्लाम धर्म धर्मान्तरण में यकीन करते हैं पर हिन्दू धर्म में धर्मान्तरण की कोई शास्त्रोक्त सहमति सूचक संकेत नहीं है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने सनातनियों की मूर्तिपूजा को भी पाखंड माना। उन्होंने ख्रिस्ती धर्म इस्लाम धर्म के समानांतर भारत के वैष्णवों, स्मार्तों, शाक्तों सहित मूर्तिपूजक सभी भारतीयों को आड़े हाथों लिया। आर्यसमाज के माध्यम से एक नये समाज का उत्कर्ष हुआ। राष्ट्र धर्म का विकास करने में स्वामी दयानंद सरस्वती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मीराबाई का आदर्श उदाहरण हमारे सामने है। मीराबाई ने दीक्षा संत रैदास से ली, संत रैदास ने मीरा से कहा - महाराणी मैं अंत्यज हूँ आपको दीक्षा देने का अधिकारी नहीं। मीरा ने कहा - संत शिरोमणि रैदास मुझे मेरे गिरिधर गोपाल ने कहा है कि हिन्द में आज केवल रैदास ही सच्चा साधु है। उसी से गुरूमंत्र लो। श्रीमद्भगवदगीता भी कहती है - ज्ञानी या पंडित वही है जो विद्या विनय से संपन्न है। ब्राह्मणे गवि हस्तिनी शुनि चैव श्वपाके च पंडिता समदर्शिनः। इसलिये दलित सवर्ण दीवार को ढहाना अत्यंत आवश्यक है। बाबू जगजीवन राम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उत्पाद थे। उनमें महात्मा गांधी सरीखा आत्मविश्वास था। उन्होेंने श्रीमद्भगवदगीता के श्रद्धा त्रय विभाग अध्याय के आठवें श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा - आयुः सत्व बलारोग्यम् सुख विवर्धना। रस्या स्निग्धा स्थिरा हृद्या आहारा सात्विक प्रियाः। उन्होंने मांसाहार को भी सात्विक भोजन कहा। संसार में सबसे ज्यादा संख्या ख्रिस्ती धर्मावलंबियों की है। यूरप के हर ख्रिस्ती के भोजन का मुख्य हिस्सा गोमांस है। हिन्दुस्तान के हिन्दू मुसलमान मांसाहारी हो सकते हैं पर उन्हें सुबह शाम दोनों वक्त के भोजन में मांसाहार की आदत नहीं के लगभग है किन्तु यूरप के लोग बिना गोेमांस के भोजन को भोजन नहीं मानते। हिन्दुस्तान में भी गोमांस भोजी लोग हैं। कांग्रेस नेता पूर्व नौकरशाह पूर्व प्रधानमंत्री के अत्यंत करीबी व्यक्ति अय्यर ने एकाधिक बार कहा कि वे बीफ भोजी हैं। इलाहाबाद के निवासी चैन्नै उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू महाशय ने कहा वे भी बीफ भोजी हैं। उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया के अनुज गौरहरि डालमिया गो सेवी थे। गौ रक्षा उनका जीवन लक्ष्य था पर उनका इकलौता पुत्र अमरीका में गौमांस भक्षी था। गोसेवक डालमिया जी इस ब्लागर को बुला कर पूछते ‘मुझे राय दो क्या करूँ’। यह तो करमगति है टलेगी नहीं ध्यान मत दीजिये। बेटे को गोमांस का आनंद लेने दीजिये। आसेतु हिमाचल समूचे देश में गोपालन करने वाले दूध ज्यादा चाहने वाले महानुभाव जरसी गाय व संकर गायों के दूध से श्वेतक्रांति लाने का शिव संकल्प लिये हैं। इन शिव संकल्प कर्ता समूह में वे लोग भी हैं जो स्वयं को गौरक्षक कहते हैं। जब भारत आजाद हुआ यहां देसी नस्ल की 60 किस्मों की गायें थीं। एक अध्ययन के अनुसार अब हिन्दुस्तानी देसी नस्लें केवल 24 रह गयी हैं। जरसी गाय और संकर गाय का धंधा यों ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब हिन्दुस्तानी नस्ल की गायें भारत से नदारत हो जायें। गुजरात के जामनगर कृषि विश्वविद्यालय ने गिर के जंगलों में चरने वाली गुजरात की देसी नस्ल की गायों के गोमूत्र का परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि देसी नस्ल की गायों के गोमूत्र में स्वर्णकण भी हैं। इसके अलावा देसी गाय के गोमूत्र में असाध्य रोग निवारक शक्ति भी है। भारत में आज प्रभावकारी लोकतंत्र है जो बहुमत चाहता है वही क्रियान्वयन होगा अगर भारतीय बहुमत बीफ महोत्सव मनाना चाहता है अपने घरों में जरसी गाय अथवा संकर गाय के दूध का रसास्वादन करने वाले तथाकथित गौरक्षक-गौरक्षा पाखंड छोड़ दें अगर देश के दलित महानुभाव अथवा अल्पसंख्यक इस्लाम धर्मावलंबी समूह बीफ महोत्सव मनाना चाहते हैं और अपने आपको हिन्दू कहने वाले हजारों हजार लोग छिपे तौर पर गौमांस भोजन करते रहते हैं - गौरक्षा का पाखंड ज्यादा नहीं चल पायेगा। महात्मा गांधी 108 वर्ष पहले केे अभिव्यक्ति की तथाकथित गौरक्षा भारतीय समाज में नया विवादास्पद माहौल निर्मित करेगी।
इंडियन ऐक्सप्रेस ने राज्यसभा में दलितों के उत्पीड़न पर शुक्रवार जुलाई 22-2016 के अंक के मुखपृष्ठ में Dalit anger worries House Landers ask Govt. to check Gaurakshakshs 3 Bastis one united voice such an activity should not never happen again. अहमदाबाद मेहसाना सुरेन्द्र नगर से अविनाश नायर लक्ष्मी अजय तथा ऋतु शर्मा ने लिखा -When Girish Parmar a Dalit businessman from Ahmadabad approached a real estate developer to purchase a house in VASTRAL an area dominated by Pattidars, the first question he faced was this. ‘Tell me your caste’. ‘When I told him that I am a Dalit he told me, I would have to look after a house elsewhere. But his reaction did not come as a shock because I face similar situation daily’ said Parmar.
राज्यसभा में विभिन्न दलों के नेताओं ने गौरक्षकों पर अंकुश लगाने की बात की। महात्मा गांधी 108 वर्ष पूर्व चेतावनी दे चुके थे कि गौरक्षा समितियां निरूद्देश्य हैं तथाकथित सवर्णों व दलितों में जो नयी दीवार बनी है अविश्वास का जो वातावरण बना है उसे केवल कानून और सरकारी अमला सही रास्ते पर नहीं ला सकता इसलिये माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को स्वयं पहल करनी होगी। गुजरात के वैष्णव वामन बनियों को महात्मा गांधी भी रास्ते पर नहीं ला सके। उन्हें दूधाभाई परिवार के कोचरब आश्रम में रखने के कारण वैष्णवों का असहयोग सहना पड़ा। वैष्णवों और जैनियों में जो लोग उदार स्वभाव के हैं उन्हें आगे आना होगा। गुजरात के संपन्न पाटीदारों सहित वैष्णवों, जैनियों में अराजनैतिक मानवीय नैतिकता का रास्ता चुनना होगा। प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण बात कही - राजनीतिक ऊहापोह केवल चुनावों तक चुनाव होने के पश्चात राष्ट्रवादी मानवीय दृष्टिकोण जिसका बीजारोपण साने गुरू जी ने किया वह शुरू हो। विरोध पक्ष के प्रमुख नेताओं ने यथा बाबू नितीश कुमार महाशय अरविन्द केजरीवाल महाशय लालू प्रसाद यादव कांग्रेस प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी के विश्वासभाजन अहमद पटेल भद्रलोक महिला नेत्री ममता बनर्जी दलित समाज की प्रखर मूर्ति बहन मायावती जिन्हें लोग देवी की तरह पूजते हैं। मायावती महाशया को भी मार्कण्डेय पुराण में वर्णित देवी शक्ति यो माम् जयति संग्रामे यो मे दर्पम् व्यपोहति का उद्गान करते हुए देवी की उस दिव्य शक्ति को भी आत्मसात करने का सुअवसर बहन मायावती उपयोग करते हुए घोषणा कर सकती हैं कि वे भारत के दूसरे नेता समूह के साथ मिल बैठ कर सरोकारों पर सहमति का रास्ता खोजने को तैयार हैं। मातृशक्ति की षडमहाविभूतियों में जे. जयललिता, ममता बनर्जी, महबूबा मुफ्ती, मायावती राजस्थान व गुजरात की बी.जे.पी. महिला मुख्यमंत्रियों सहित गुजरात में जो गुजर रहा है तथाकथित सवर्ण व दलित समाजों में जो सामाजिक विकराल स्थिति उपस्थित है उसके समाधानकारी सरोकार संकल्पित किये जा सकते हैं। अपनी कहें दूसरों की भी सुनें शांतिपाठ आवश्यक है। मनुष्य हैं मनन करें पशुता की तरह व्यवहार न करें न ही संकल्प लें। प्रधानमंत्री जी कृपापूर्वक राजनीतिक दलों के सभी सुप्रीमो सहित वामपंथी तथा भा.ज.पा. नेतृत्व से भी संपर्क साध कर सवर्ण दलित संघर्ष को शांत करने के उपायों पर तत्काल विचार करें।
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