Thursday, 11 August 2016

आगे से चुनाव गंगा में नहाये महापुरुषों अथवा भद्र महिलाओं को राज्यसभा विधान परिषद् मनोनीत न किया जाये

क्या राज्यसभा में नामित सदस्यता त्यागी सरदार नवजोत सिंह सिद्धू ने 
लोकतंत्र के लिये नया पैगाम देकर सचेत नहीं किया ?
अमृतसर से सांसद रहे नवजोत सिंह सिद्धू के अपने मन के अंतर्नाद को हिन्दुस्तान के कुछ चुटीले अखबारों ने संकेत दिये कि महाशय सिद्धू आआपा की ओर 2013 में आकर्षित होगये थे। सिद्धू फरमाते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी जी ने राज्यसभा में नामित सदस्य होने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने प्रधानमंत्री जी के आग्रह का सम्मान किया पर उनके मन का अंतर्नाद आम आदमी पार्टी के स्वयंभू शंखनाद करने वाले महाशय केजरीवाल से प्रेरित था। वे अकाली दल से भा.ज.पा. का मेलमिलाप भी पसंद नहीं करते थे। सिद्धू का राज्यसभा मनोनीत सदस्यता से त्याग और भाजपा का भी साथ छोड़ना क्या भाजपा के रणनीतिकारों के आकलन में नहीं था ? दरअसल में जब 2014 में अमृतसर से भाजपा के लोकसभा संसदीय उम्मीदवार संयत भाषी अरूण जेटली निर्धारित हुए तभी सिद्धू महाशय का मन डोल चुका था। भाजपा में जो नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का विरोधी खेमा है उसमें बिहार से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा महाशय, वयोवृद्ध नेता तथा बाबू जयप्रकाश नारायण की राजनीति से प्रभावित पूर्व नौकरशाह यशवंत सिन्हा, कानपुर से सांसद डा. मुरली मनोहर जोशी, भागलपुर के सांसद कीर्ति आजाद, इन सबसे शीर्षस्थ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जिन्हें मोदी राज में  मानसिक अनमनापन घेर चुका है जो उम्र के नजरिये से भी मोरारजी नीत जनता पार्टी राज में साठ पर होने पर राजनीति से उपराम ले चुके नाना जी देशमुख पर लोकनीति और लोकसभा में उनकी गहरी रूचि विद्यमान थी। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने बदलते हुए माहौल में साठ को पिचहत्तर पर ला डाला। संभवतः टाटा उद्यमिता के चमकीले औद्योगिक नक्षत्र रतन टाटा ने 75 वर्ष की उम्र पाने पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर टाटा उद्यमिता प्रवाह की कमान मिस्त्री को सौंप डाली। सिद्धू महाशय सहित वे सभी भाजपा नेता जो अपने आपको भाजपा से ज्यादा महत्वशील मानते जिन्हें यह विश्वास रहा कि उनका व्यक्तित्त्व ही उन्हें लोकसभा के लिये चुने जाने का हेतु है। राजनीतिक दल अथवा राजनीतिक दल के नेता की भूमिका उनको लोकसभा सदस्यता दिलाने में गौण रही है। मनोनीत राज्यसभा सदस्य नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा सदस्यता त्यागने के कृत्य में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। क्या नवजोत सिंह सिद्धू की मानसिकता से भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व सजग नहीं था। शिरोमणि अकाली दल से सिद्धू भाजपा का संबंध तोड़ने के पक्षधर थे पर भाजपा नेतृत्व उनकी मन की बात को स्वीकार करने की स्थिति में इसलिये नहीं था क्योंकि पंजाब ने सिख धर्मावलंबियों की संख्या आर्यसमाजी सनातनी हिन्दुओं से ज्यादा है। अकाल तख्त का सम्मान तो हर भारतीय करता है सिखों के लिये अकाल तख्त वैसा ही महत्व रखता है जैसा वैटिकन रोम का पापल ख्रिस्ती धर्म के लिये सर्वोच्च धर्म सभा है। पंजाब का सिख बहुमत अकालियों के साथ है। कुछ सिख कांग्रेस समर्थक हैं। पंजाब का हिन्दू भी कांग्रेस व भाजपा में बंटा है। पंजाब में भी भारत के अन्या घटक राज्यों की नीति जातिवादी वोट बैंक का अपना महत्व है। नवजोत सिंह सिद्धू सिख हैं कांग्रेस तथा अकाली दल ने भी जाट सिखों की एक अच्छी खासी संख्या है। राजनीतिक रणनीति के तहत सिद्धू केवल क्रिकेट विवेचना के सहारे पंजाब के मुख्यमंत्री बिना सिख समर्थन के नहीं बन सकते, वे दिवा स्वप्न देखते थे जो भाजपा को अकाली दल की अनेकानेक विसंगतियों के बावजूद स्वीकार्य नहीं था। ज्योंही महाशय केजरीवाल नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करेंगे आआपा के विरूद्ध दिल्ली व पंजाब में गये दो वर्षों में सिद्धू ने जो कहा उसका उपयोग कांग्रेस करेगी। लगता तो यह है कि महाशय केजरीवाल पंजाब के आआपा मुख्यमंत्री सिद्धू को घोषित करने से कतरायेंगे। वे सिद्धू के वक्तृत्च का लाभार्जन तो करना चाहेंगे ज्योंही मुख्यमंत्री का उन्हें उम्मीदवार घोषित करेंगे लाभार्थी अ.भा. कांग्रेस रहेगी आआपा नहीं। पंजाब में अब मतों का बंटवारा दो दलों के बजाय तीन दलों में होगा। भारतीय जनता पार्टी के जो पक्के मतदाता हैं वह पार्टी के साथ ही रहेंगे। यदि अकाली दल ने भाजपा ऐन.डी.ए. से नाता तोड़ भी डाला तब भी हिन्दू बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा अपनी पैठ बनाये रह सकती है। अगर शासक दल शिरोमणि अकाली दल ने बीजेपी का दामन नहीं छोड़ा तो अकाली दल सत्ताच्युत होने से बच भी सकता है। 
दूर की कौड़ी को पहचानने वाले उड़ती चिड़िया का रूख समझने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी और अमृतसर से भाजपा उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव में पराजित अरूण जेटली तो सिद्धू को अच्छी तरह जानते थे। वहां चूक होगयी वास्तविकता समझने में आआपा से आकर्षित सिद्धू को मनोनीत राज्यसभा सदस्यता नवाजी गयी। पंडित नेहरू जब तक भारतीय राजनीति के शीर्ष पुरूष थे। वे लोकसभा विधानसभा चुनावों में पराजित व्यक्ति को विधान परिषद अथवा राज्यसभा के लिये न तो उम्मीदवार बनाते थे न ही उनका मनोनयन करते थे। पंडित नेहरू ने भारत भारती रचयिता मैथिली शरण गुप्त, ओजस्वी हिन्दी कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन तथा रामधारी सिंह दिनकर को राज्यसभा के लिये नामांकित किया। उत्तर नेहरू युग में लोकसभा चुनाव में पराजित व्यक्ति यथा मणिशंकर अय्यर सरीखे लोगों को मनोनीत किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने सुब्रह्मण्यम स्वामी तथा नवजोत सिंह सिद्धू को नामित किया। सिद्धू के त्यागपत्र तथा आआपा आकर्षण से आंखें खुल जानी चाहिये लोकसभा विधानसभा चुनाव लड़े व्यक्ति को मनोनीत करना तर्कसंगत नहीं है। प्रधानमंत्री महोदय को हिन्द की राजनीति को सही पटरी पर लाने का भगीरथ प्रयास भी करना ही होगा। स्वयं अपनी पार्टी के हारे हुए नेता को राज्यसभा या विधान परिषद की सदस्यता के जरिये विस्थापित होने से बचाने का कृत्य राजनीतिक रणनीति के प्रतिकूल है। 
भारतीय जनता पार्टी को राजनीति को नैतिकता की पटरी में पक्की तरह स्थापित करने के लिये स्वयं पहल करनी होगी। लोकसभा विधानसभा चुनाव में पराजित उम्मीदवार को विस्थापित होने से बचाने के लिये इतर रणनीतिक उपाय अपनाइये पर पराजित व्यक्ति को कम से कम अगले चुनाव तक के लिये राज्यसभा विधान परिषद सदस्यता पात्रता के लिये नैतिक रूप से पात्रताधारक न माना जाये। अखिल भारतीय राजनीतिक सत्ताशीर्ष पर पहुंची भाजपा अपने दल में यह प्रस्ताव संकल्पित करे। आगामी 2019 के लोकसभा चुनावों के पश्चात दूसरे राजनीतिक दलों को भी राजनीतिक नैतिकता का मंत्रजाप कराया जाये। लोकसभा विधानसभा चुनावों में पराजित उम्मीदवार राज्यसभा विधान परिषद के जरिये सत्तासीन न हो अपितु अगले चुनाव का इन्तजार करे। यही एक कारगर तरीका है जिससे राज्यसभा में माल्या सरीखे उद्योगपति सदस्यता प्राप्त करने में धन शक्ति का प्रयोग करने से घबरायेंगे। 2019 के चुनाव के पश्चात भी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को ही भारत का शासनतंत्र चलाना है। महाशय नितीश बाबू महाशय केजरीवाल जो ठुल्ला का मतलब बताने वाले हैं जिनकी नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी हुई है। नेताजी मुलायम सिंह यादव जद नेता लालू प्रसाद यादव जिन जिन महानुभावों की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी हैं उन्हें 2024 तक प्रतीक्षारत ही रहना पड़ेगा। अभी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी कौंतेय अर्जुन की तरह प्रतिज्ञे द्वै न दैन्यम् न पलायनम् के अपने गुरूमंत्र पर स्थिर हैं। 
विलायती लोकतंत्र में हाउस आफ कामन्स या सर्वोच्च संसद तथा लोअर हाउस या निचले सदन जिसे भारत के संविधान निर्माताओं ने लोकसभा तथा घटक राज्यों की ऐसेम्बली को विधानसभा संज्ञा दी भारतीय राष्ट्र राज्य तथा उसके घटक राज्यों में ब्रिटेन की तरह निम्न सदन तथा उच्च सदन क्रमशः लोअर हाउस व अपर हाउस कहते हैं भारत में लोकसभा तथा विधानसभा कहलाती है। अपर हाउस को ब्रिटेन में हाउस आफ लॉर्ड् या उच्च सदन कहा जाता है। मान्यता यह है कि उच्च सदन के सांसद विचारशील तथा दूरदर्शी राजनीति के ज्ञाता होते हैं। बर्तानी परंपरा राज खानदान से संबंधित व्यक्तियों को लार्ड की उपाधि से विभूषित करती है। भाषायी विद्वान, कवि, नाट्यकार, उपन्यासकार, वैज्ञानिक, अध्यापक, वकील, डाक्टर एवं उद्यमी व्यक्तियों को जिन्हें बर्तानी राजदरबार मंत्रिमंडल की परामर्शी सलाह से उच्च सदन में नामित करता है वे वैचारिक दृष्टि से भी दूरदेश राजनीति के ज्ञाता होते हैं। भारत ने पार्लमेन्टरी डेमोक्रेसी विलायत से उधार ली है। यहां स्थितियां अलग हैं बर्तानियां के मुकाबले भारत विशाल जनसंख्या वाला राष्ट्र राज्य है। ग्रेट ब्रिटेन में जब तक आयरलैंड साथ था अंग्रेजी के अलावा आयरिश स्काटिश तथा वेल्स भाषायें भी प्रयुक्त होती थीं। आयरलैंड के बर्तानियां से छिटकने के पश्चात वेल्स व स्काटलैंड ही बर्तानियां के साथ हैं। भाषाविद डाक्टर ग्रियर्सन के अनुसार भारत में 276 भाषायें हैं। भारतीय संविधान ने अंग्रेजी सहित तेईस भाषाओं को भाषा अनुसूची में बद्ध किया है। मराठी कोंकणी नैपाली संस्कृत संथाली डोगरी हिन्दी तथा सिन्धी मैथिली नौ भाषाओं की लिपि नागरी है। बहुत पुराना उदाहरण नहीं है कर्णाटक राज्य से विजय माल्या राज्यसभा सदस्यता पा गये। उन्होंने राज्यसभा सदस्यता के लिये क्या नहीं किया यह छिपा हुआ इतिहास नहीं। अंततोगत्वा उन्हें राज्यसभा सदस्यता त्यागनी पड़ी। गहराई में जायें तो राज्यसभा सदस्यता के लिये अनेक राष्ट्र नागरिकों में विविध अनैतिक समझे जाने वाले उपाय भी अपनाये। राज्यसभा तथा विधान परिषद उच्च सदन हैं। उनके सदस्यों की राजनीतिक चिंतनशीलता उदात्त राष्ट्रीय प्रकृति की होगी तभी उच्च सदन मर्यादा सदन का आकार ग्रहण कर सकता है इसलिये उच्च सदन में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों का दखल तो हो पर राजनीतिक दल ने लोकसभा और विधानसभा में प्राप्त मतों के प्रतिशत के आधार पर राजनीतिक दलों को राज्यसभा व विधान परिषद सदस्य संख्या आवंटित की जाये। प्रत्येेक राजनीतिक दल से यह अपेक्षा की जाये कि वह लोकसभा अथवा राज्य विधानसभा में पराजित अपने उम्मेदवार को राज्यसभा विधान परिषद सदस्यता के लिये उम्मीदवार नहीं बनायेगा। उच्च सदन की आयु मर्यादा भी संकल्पित की जाये। राज्यसभा अथवा विधान परिषद सदस्यता आकांक्षी भारतीय नागरिक की स्वेच्छा जिस राजनीतिक दल से नैतिक रूप से जुड़ने की हो वह जुड़े पर राजनीतिक दल की सक्रिय सदस्यता केवल वे ही लोग लें जो ग्राम सभा से लोकसभा तक जनप्रतिनिधित्व के आकांक्षी हैं। राजनीतिक दलों से अपेक्षा रखी जाये कि प्रत्येक राजनीतिक दल चुनाव लड़़ने वाले अपने उम्मीदवार की पूरी वैधानिक जानकारी निर्वाचन आयोग को देगा। राजनैतिक दलों के ऐसे विचार पोखर महानुभावों की एक गोष्ठी संयोजित करेगा जो राजनीतिक दल के उम्मीदवारों की पूरी जीवन गाथा से अवगत हो तथा संदेहास्पद उम्मीदवारों को राजनीतिक दल संबल न दें। ऐसे उम्मीदवार अगर निर्दल उम्मीदवार के रूप में चुनाव में शामिल हों राजनीतिक दलों सर्वसम्मति से फैसला करें कि निर्दल उम्मीदवार को राजनीतिक दल समर्पित उम्मीदवार से तीन या चार गुना निर्वाचन शुल्क जमा करना होगा तथा कम से कम एक हजार मतदाताओं का समर्थन पत्र भी रिपोर्टिंग आफीसर को प्रस्तुत करने की शर्त निर्धारित करनी होगी ताकि उम्मीदवार संख्या प्रबंधनीय रह सके। 
क्रिकेटर तथा क्रिकेट संबंधी विवेचना में निपुण नवजोत सिंह सिद्धू महाशन ने कहा - प्रधानमंत्री के अनुरोध को वे टाल नहीं पाये। उनके मन में भारतीय जनता पार्टी के लिये विषाद तो लोकसभा के चुनाव से पूर्व ही उत्पन्न हो चुका था। कौंतेय अर्जुन को जब योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में गीता का उपदेश दिया अर्जुन का विषाद लुप्त होगया। अर्जुन ने योगेश्वर श्रीकृष्ण से कहा - नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादात् मया अच्युत स्थितोष्मि गतसंदेह करिष्ये वचनम् तव। 
पंजाब की अकाली बनाम कांग्रेस लाबी राजनीति को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिये मास्टर तारा सिंह के सिख राजनीति दर्शन को समझना बहुत जरूरी है। सरदार नवजोत सिंह सिद्धू अभी मात्र बावन वर्षीय क्रिकेटर से भाजपा की ओर झुके राजनीति करने वाले महापुरूष हैं। उनको यह मालूम होना चाहिये कि अकाली पंजाब के आर्यसमाजियों अथवा सनातन धर्मावलंबियों को आज से नहीं इतिहास में लंबे अरसे से नापसंद करते रहे हैं। उनका सबसे बड़ा दुःख ननकाना साहिब गुरू नानकदेव की जन्मभूमि भारत बटवारे में पाकिस्तान का हिस्सा बन गयी। मोहम्मद अली जिन्ना की दिली इच्छा थी कि बनिया वामन हिन्दू नेतृत्व को पाकिस्तान के अलावा पृथक सिख स्थान तथा दलितों का दलित स्थान भी मिले ताकि हिन्दुस्तान के टुकड़े टुकड़े हो जायें और गांधी नेहरू की कांग्रेस टापती रहे। अंग्रेजों ने जाने से पहले हिन्दुस्तान का बिखराव देखना चाहा पर सरदार पटेल सरीखे राजनीति को गहराई से समझने वाले राजनेता थे, दलितों व सिखों को भारत से जुड़ा ही रखा। भारत बटवारा केवल हिन्दू मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्रीयतायें हैं मोहम्मद अली जिन्ना उसे प्राप्त करने में सफल हुए पर भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर तथा कांग्रेस से जुड़े सिख नेताओं को मोहम्मद अली जिन्ना को लालच ने अपनी ओर तथा भारत विरोध की तरफ नहीं झुकने दिया। नवजोत सिंह सिद्धू भारतीय जनता पार्टी के अकाली दल से संबंधों को पसंद नहीं करते थे। उनके मन में गैर अकाली गैर कांग्रेस सिख मुख्यमंत्री के रूप में पंजाब की गद्दी में बैठने की लालसा लग रही थी। उन्हें लगा कि आआपा सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल पंजाब में अकाली व कांग्रेसियों को पछाड़ कर आआपा का राज वहां कायम कर सकते हैं पर उनके पास पंजाब में आआपा के चार सांसदों में एक सांसद महाशय मदिरा के नशे में लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा ले रहे हैं। पहले तो कैप्टेन अमरेन्द्र सिंह आआपा को पंजाब में सरकार बनाने ही नहीं देंगे। यदि कदाचित पंजाब के मतदाता भरमा गये उन्होंने आआपा को पंजाब विधानसभा में बहुमत भी दिला दिया तो भी महाशय केजरीवाल नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री के आसन में नहीं बैठायेंगे। उन्हें आआपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करना भी महाशय अरविन्द केजरीवाल के लिये टेढ़ी खीर होगी। उन्होंने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा उन्हें आशा थी कि उन्हें लोकसभा की 100 सीटों पर विजय मिलेगी और वे भारत का प्राइम मिनिस्टर बन जायेंगे। उनका सपना धरा का धरा रहा। अब वे गोआ, पंजाब, गुजरात की तरफ मुंह किये हैं। अपने आपको 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अपने को अराजक घोषित कर भारत को अराजकता की ओर ढकेलना चाहते हैं पर उनका यह सपना दिवा स्वप्न ही रहने वाला है। अराजकता देश को बर्बाद तो कर सकती है पर अराजकता में वह कुव्वत नहीं कि वह अव्यवस्था सिस्टम फेलियर तथा लूटखसोट को रोक सके। देखते रहिये महाशय अरविन्द केजरीवाल आगे क्या क्या गुल खिला सकते हैं। 
लोकतंत्र में जब क्षत्रप तंत्र या राजनीतिक दल के सुप्रीमो का एकाधिपत्य अथवा सुप्रीामो के परिजनों का एकदम स्थायी राजतंत्रनुमा सुई घूमने लगती है। लोकतंत्र डेमोक्रेसी अथवा पंचायती व्यवस्था ध्वस्त हो जाया करती है। स्वाधीन भारत में लोकतांत्रिक राज व्यवस्था संकल्पित है परन्तु हिन्दुस्तान का बहुसंख्यक समाज अनेकानेक जातियों उप जातियों में बंटा हुआ समाज है। जातीय पंचायतें जातीय नेतृत्व तथा संबंधित जाति के सामूहिक योगक्षेम को देखने वाले जात बिरादरी के लोगों के संपन्न अर्धसंपन्न शिक्षित अर्धशिक्षित अशिक्षित तथा विपन्न एवं दारिद्र दुःख पीड़ित वर्गों के लिये सहानुभूति भी प्रदर्शित होती है परन्तु भारत की आजादी मिलने के वक्त तथा संविधान निर्माण संवैधानिक परंपरायें लागू करने के पश्चात कल्याणकारी राज की कल्पना एवं अवधारणा ने वैश्विक बाजारीकरण तथा खुली अर्थव्यवस्था ने जहां संपन्न व्यक्ति की संपन्नता में वृद्धि की वहीं आमदनी के लिहाज से संपन्न विपन्न के बीच की आर्थिकी खाई चौड़ी होती गयी। आर्थिक खुलेपन का पचीस साला अनुभव भारत की व्यवस्था अनुभूत कर चुकी है। बर्तानी राज का डिस्ट्रिक्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम धराशायी हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता के वातावरण ने धार्मिक भावनाओं नैतिक प्रतिषेध और निषेध का मार्ग अवरूद्ध होगया है। संयुक्त परिवार प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। परिवार में भी स्त्री पुरूष संघर्ष ने नया आकार ले लिया है जिससे शादियां टूट रही हैं तलाक बढ़ रहे हैं। स्त्री पुरूष संबंधों में विषाक्तता ने बच्चों तथा बुड्ढों एवं विकलांग लोगों के सामने एक नयी समस्या खड़ी कर दी है। जब तक संयुक्त परिवार पद्धति वे में थी बच्चों बूढ़ों तथा अशक्त विकलांगों की देखभाल पारिवारिक नैतिकता का हिस्सा थी। आज पारिवारिक नैतिकता बिखर चुकी है। स्त्री पुरूष भेद का यह कसैला मनोभाव कहां आकर रूकेगा अभी यह कल्पना करना मुश्किल है। हिन्दुस्तानी समाज पचास साठ वर्ष पूर्व तक समष्टि मार्गी था आज समाज व्यष्टि या व्यक्ति मार्गी होगया है। आधुनिकता तथा यूरप की जीवन शैली का आंख मूंद कर अनुसरण करना भारत का तथाकथित शिक्षित समाज कर रहा है। लोकतंत्र व कानून के राज कानून निर्माण प्रक्रिया पर देसी प्रभाव नहीं बर्तानियां की अंग्रेजी कानून तथा अंग्रेजी न्याय प्रशासन लागू है। छोटी अदालतों में वादी प्रतिवादी अथवा फौजदारी मामलों में पुलिस बयान तो स्थानीय भाषा में लेती है पर जब उच्च अदालतों में उन बयानों के अंग्रेजी अनुवाद ज्यादातर मामलों में त्रुटिपूर्ण हुआ करते हैं। उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालयों की न्यायभाषा अंग्रेजी है लगता है अनंत काल तक बनी रहने वाली है। इसलिये सबसे पहली जरूरत विधायिका के उच्च सदनों को दलीय राजनीति से ऊपर उठा कर राष्ट्रीय लोकनीति का हिस्सा बनाया जाना अत्यंत आवश्यक होगया है। विधान परिषदों तथा राज्यसभा में सत्तासीन सरकार द्वारा उन लोगों को भी मनोनीत किया जाता है जिन्हें मतदाता ठुकरा चुके हैं इसलिये उच्च सदन की सदस्यता भी उच्च हो उसमें ज्ञान वैराग्य का मिश्रण हो। निम्न सदनों लोकसभा तथा विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को उच्च सदन सदस्यों से नसीहत मिले। राजनैतिक दलों का राज्य स्तरीय तथा राष्ट्रीय कन्फेडरेशन गठित हों। राजनैतिक दलों में कारगर संवाद कायम हो। दलीय राजनीति चुनाव में परूष वाक्य छोड़ व्यक्ति अथवा दल के पक्ष अथवा विपक्ष में मानवीय आदर्श अपनाये जायें। चुनाव संपन्न होने के उपरान्त वैयक्तिक तथा राजनीतिक शत्रुता को अगले चुनाव तक सदाचार का वेदी बना दिया जाये तभी भारतीय लोेकतंत्र सफलतापूर्वक चल सकता है। 
राजनीतिक नेतृत्व व्यवसाय नहीं जिससे प्रभूत धनार्जन बिना भ्रष्टाचार किये अर्जित किया जा सके। राजनीति करने वाले और राजनीति समझने वाले व्यक्ति को सबसे पहले अपनी लोकहितकारी चिंतन शक्ति का संपात करना होगा। अगर हर एम.एल.ए. एम.एल.सी. तथा सांसद की नजर मंत्री की कुर्सी पर गड़ी होगी तो वह जनप्रतिनिधि लोकतंत्र या डेमोक्रेसी का स्तंभ नहीं परिवार अथवा अपनी बिरादरी के जातिवाद को ही बढ़ावा देगा इसलिये राजनीति करने के इच्छुक महानुभाव कामराज नाडार, चन्द्रभानु गुप्त, गोपबंधु चौधरी, सी.एम. अन्नादुरई, नंबूदिरिपाद, बाल ठाकरे, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर तथा नाना जी देशमुख सरीखे राजनीति कर्ताओं के जीवन अनुभवों से सीख लें। लोकसभा चुनाव में पराजित नेताश्री यदि राज्यसभा में नामित किया गया हो अथवा उनके राजनीतिक दल ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाने के लिये नैतिक अथवा नैतिक न माने जाने वाले तौर तरीके अपनायें हैं ऐसे राज्यसभा सांसदों को भारत की राजनीति गंगा को निर्मल बनाने के लिये स्वयं आगे आकर राज्यसभा सदस्यता त्याग कर अगली बार अपनी तकदीर 2019 के सामान्य निर्वाचन में विजयी होने के लिये संकल्प लेना चाहिये, मर्यादा निर्वहन आज की पहली जरूरत है।
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