Saturday, 13 August 2016

ढहते हुए निखरते हुए सिस्टम फेलियर का निदान खोजना ही होगा।
मैला हाथ से ढोने के काम को जल्दी रुखसत मिले
यह आज की पुकार है।
दिल्ली उच्च न्यायालय को गहरा सदमा लगा कि देश की राजधानी दिल्ली में मैला ढोने वाले जिसे पुराने जमाने में मेहतर नाम से पुकारे जाने वाले लोग टट्टी कमाना कहते थे Delhi State Legal Senior Authority – DSLSA के सर्वेक्षण से पता चला कि परास्नातक डिग्रीधारक सहित मैला ढोने का काम हजारों लोग आज भी कर रहे हैं। उच्च न्यायालय के मत में A shocking realty in the National Capital इस ब्लागर के ‘भिखारी मुक्त’ दिल्ली अभियान संबंधी ब्लाग में दिल्ली के पिचहत्तर भिखारियों के लिये भिखारी सदनों में भिखारियों के बसाने की क्षमता दिल्ली के विभिन्न भिखारी सदनों में मात्र तीन हजार भिखारियों के रहने आदि की व्यवस्था है। हिन्दू अखबार ने ही दिल्ली को भिखारी मुक्त शहर बनाने के आआपा दल की दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री महाशय द्वारा कनाट सर्कस से भिखारी मुक्त दिल्ली का अभियान चलाया। एक गरीब महिला भिखारी ने जो सवाल दिल्ली सरकार से पूछा उससे आआपा सुप्रीमो महाशय केजरीवाल की दिव्य दृष्टि खुल गयी। उन्होंने भिखारी मुक्त दिल्ली अभियान को बन्द करने की हिदायतें अपने सहयोगियों को दी। भिखारी मुक्त दिल्ली शहर अभियान ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े किये कि एक भिखारी सदन में केवल एक सज्जन निवास करते हैं जिन पर भिखारी सदन बजट पेटे सालाना करोड़ों रूपये व्यय किये जाते हैं। बारह व्यक्तियों का स्टाफ केवल एक व्यक्ति की सेवा सुश्रुषा में दत्तचित्त है। दिल्ली शहर में भीख मांग कर जीवन व्यतीत करने वाले बच्चों पुरूषों व महिलाओं की संख्या यथार्थ अखबारी दुनियां ने मात्र पिचहत्तर हजार आंकी है परन्तु राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की समग्र आबादी निरंतर बढ़ती जारही है। ऐसा प्रतीत होता है कि भिखारियों में भी भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता अनेकानेक भिखारी हैं। दिल्ली की मौजूदा आबादी यद्यपि 2011 की जनगणना के मुताबिक एक करोड़ सतसठ लाख से ज्यादा थी। पिछले पांच वर्षों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आबादी दो करोड़ के आसपास पहुंच गयी होगी। जब भारत आजाद हुआ दिल्ली में 276 गांव थे। आज उन गांवों में संख्या 158 रह गयी है। सन 1947 से लेकर पिछले साढ़े छः दशकों में दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन जो हिन्दुस्तान की महानगर पालिका में महत्वपूर्ण नगर निगम है। पूर्ववर्ती दिल्ली सरकार ने दिल्ली नगर निगम के तीन हिस्से कर डाले। सवाल यह उठता है कि संविधान संशोधन 73-74 के अनुसार नगर निकायों तथा पंचायतों को संसद तथा राज्य विधान मंडलों की तरह संवैधानिक प्रशासनिक इकाई का स्तर नवाजा गया। अढ़ाई दशक बीत जाने के बाद भी नगर निगम नगरपालिका तथा पंचायतें भारतीय गणतंत्र के घटक राज्यों की पिछलग्गू मात्र हैं। उन्हें जो संवैधानिक स्वायत्तता उपलब्ध होनी चाहिये थी वह राज्यों के क्षत्रपों तथा विधान मंडलों को अपने अधिकार की कटौती लगता है यही कारण है कि नगर निकाय और पंचायतें अपना वाजिब संवैधानिक हक नहीं पारही हैं। उन्हें टुकुर टुकुर कर घटक राज्य की क्षत्रप शक्ति सत्ता की ओर देखना पड़ता है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने अपने रचित अठारह पुराणों में विष्णु पुराण में उद्गान किया - कूर्म मगध खस गणैः लिच्छिवि खस गण के प्रधान शाक्य शुद्धोदन मगध गणराज्य के एक गणतंत्र लिच्छिवि के गण प्रमुख थे जिनके पुत्र गौतम बुद्ध हुए। मगध के प्रतापी गण प्रमुख सभी खस गणतंत्रों के नियन्ता जरासंध थे जिनकी गणतंत्रीय राजधानी राजगृह थी। जिसे वर्तमान बिहार राज्य का राजगीर कस्बा माना जाता है। जो गण प्रमुख मगध नरेश जरासंध का विरोध करते जरासंध की जेल में बंद थे। जरासंध मथुरा के राष्ट्रपाल कंस का श्वसुर था। जब श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर डाला जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बलराम की मदद से जरासंध को हराया पर स्वयं विचार कर गुजरात में द्वारका पुरी का निर्माण करा कर यादवों को मथुरा से द्वारका भेज दिया। स्वयं जरासंध से युद्ध न कर निरायुध श्रीकृष्ण ने रणछोड़़ कर गुजरात चलने का निश्चय किया। उद्धव की राय मान कर श्रीकृष्ण ने जरासंध से युद्ध भिक्षा मांगी। जरासंध और भीम के बीच सात दिन लगातार गदा युद्ध हुआ। गदा युद्ध में वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा सुझाये गये तरीके से भीम ने जरासंध का वध कर डाला। मगध नरेश जरासंध के मारे जाने पर योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने उन गणाधीशों को मुक्त कर डाला जो जरासंध द्वारा बन्दी बनाये गये थे। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने मगध की गद्दी पर जरासंध के पुत्र को प्रतिष्ठित किया तथा गण प्रमुखों को राजगृह में राजोचित सम्मान देते हुए उन्हें अपने अपने गणतंत्रों को जाने की राय दी तथा आन्वीक्षिकी राजनीति का अनुसरण कर अपने अपने गणराज्य की प्रजा का पोषण करने का मार्ग प्रशस्त किया। मगध नरेश महाबली जरासंध के मारे जाने से शक्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का संपादन योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने ही किया। हिन्दुस्तान के लिये राष्ट्रीय शर्मिन्दगी का हेतु हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली में संडासों के मलमूत्र को हाथ से उठाना प्रक्रिया जिसे आज से पचास साठ वर्ष पहले अब वाल्मीकि कहे जाने वाले लोग तब मेहतर या भंगी नाम से पुकारे जाते थे वे मानव मल मूत्र को हाथ से उठाने के काम को टट्टी कमाना कहा करते थे। इस ब्लागर ने अल्मोड़ा में भंगी बस्ती में भंगियों को पढ़ाने उनकी आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति सुधारने का कार्य सन 1948 में संपन्न किया था इसलिये यह ब्लागर वाल्मीकि समाज के कष्टों से वाकिफ है। डाक्टर राममनोहर लोहिया की ननिहाल अल्मोड़ा थी। महापंडित राहुल सांकृत्यायन भी यदाकदा डाक्टर लोहिया की तरह भंगी बस्ती आकर उनकी सामाजिकता को उत्साहित करते रहते थे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस शर्मिन्दगी भरे अध्याय की ओर दिल्ली की आआपा सरकार के साथ साथ भारतीय रेलवे दिल्ली नगर निगम द्वारा हजारों लोगों को हाथ से मलमूत्र उठाने जिसे रपट में मैन्युअल सीवेजिंग कहा गया है। सर्वेक्षण कार्य डी.एस.एल.एस.ए. के तत्वावधान में पैरालीगल वालेंटियर्स ने संपन्न किया। जो बदनुमा तस्वीर सर्वेक्षण से सामने आयी उसके अनुसार जिन 233 लोगों के अपने ब्यौरे बताये उनमें 86 निरक्षर 46 दर्जा पांच तक पढ़े 80 छठी से दसवीं कक्षा तक पढ़े 10 ग्यारहवीं व बारहवीं कक्षा तक पढे़ बारहवीं कक्षा से ऊपर तक पढ़े 5 लोग थे। जिन 233 व्यक्तियों से जानकारियां मिलीं उनमें 228 पुरूष व 5 महिलायें थीं। रोजगार ब्यौरों में 64 व्यक्ति वाल्मीकि तथा 168 दूसरे लोग थे। 6 लोगों की माहवारी आमदनी रूपये पांच हजार तक 141 लोगों की माहवारी आमदनी 6000 से 10000 तथा 6 लोगों की आमदनी 11000 से 15000 रूपये तक बतायी गयी। 104 लोग सरकारी अर्ध सरकारी स्वायत्तशासी संगठनों और 129 लोग प्राइवेट सेक्टर याने ठेकेदारों की नौकरी करते थे। 78 लोग स्थायी नौकरी करने वाले 81 लोग दिहाड़ी मजदूरी तथा 74 लोग ठेकेदारों के नौकर थे। रपट ने यह भी इंगित किया कि 131 लोग विभिन्न रोगों पीड़ित भी थे। सबसे ज्यादा 46 लोग चर्म रोग पीड़ित थ दूसरे क्रम में आंख के मरीज थे कुल मिला कर बीमारों की संख्या आधे से ज्यादा थी। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि यहां के आंकड़े विश्वास योग्य तो हैं ही नहीं। सन 1952 की बात है उत्त्र प्रदेश में इटावा, सहारनपुर व अल्मोड़ा में तीन आदर्श विकास खंड चुने गये जिनमें अल्मोड़ा में गरूड़ विकास खंड का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित पंत ने किया। उन्होंने अल्मोड़ा के जिला प्रशासन को आगाह किया कि जिला अल्मोड़ा में जितनी खेती योग्य जमीन नहीं है उससे ज्यादा कंपोस्ट खाद के गड्ढे निर्मित किये बताये गये हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से यह भी अपेक्षा की कि गलत आंकड़े देने से देश का विकास नहीं होगा। ऐसा लगता है जिन 1000 लोगों का सर्वेक्षण किया गया उनमें 90 प्रतिशत पुरूष 10 प्रतिशत महिलायें थीं पर आधे अधूरे ब्यौरे केवल 233 व्यक्तियों ने दिये 767 व्यक्तियों के ब्यौरे उपलब्ध नहीं हैं। 
स्वाधीनता से पूर्व वर्तमान उत्तर प्रदेश का सरकारी नाम जिसे कंपनी बहादुर तथा बर्तानी सरकार ने यूनाइटेड प्राविंसेज आफ आगरा एंड अवध नाम रखा था जिसे हिन्दुस्तानी में संयुक्त प्रांत आगरा अवध कहा जाता था गंगा यमुना बेसिन के ब्रज अवध अहिच्छत्र बुंदेलखंड कौशल काशी गढ़वाल कुमांऊँ गंगा यमुना का दोआब तथा तराई में दस सांस्कृतिक क्षेत्र थे। इन क्षेत्रों की भाषायें भी क्रमशः ब्रज अवधी बुंदेली रेखता(खड़ी बोली) भोजपुरी गढ़वाली व कुमांउंनी ये सात समृद्ध भाषायें बोलने वाले लोग मिलजुल कर संयुक्त प्रांत कहलाते थे। वृन्दावन में जो ब्रज का मुख्य आकर्षण है वहां राजा महेन्द्र प्रताप ने प्रेम महाविद्यालय की स्थापना कीं कुमांऊँ में भगीरथ पांडे ने ताड़ीखेत में प्रेम विद्यालय 1921 में स्थापित किया। ये दोनों प्रेम महाविद्यालय वृन्दावन तथा प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत भारतीय राष्ट्रीय अभियान के शीर्ष स्थल थे। देश के आजाद होते समय प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत के सदर पंडित पंत थे। संस्था के सेक्रेटरी स्वतंत्रता सेनानी देवकी नंदन पांडे थे। स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिये पंडित पंत ने प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत के लिये सहभोज का इंतजाम किया। संस्था के सेक्रेटरी सेे कहा कि भोजन वितरण का कार्य रानीखेत के मेहतर करेंगे। स्वतंत्रता दिवस समारोह की सफलता के लिये उन्होंने अपने शिक्षा मंत्री डाक्टर संपूर्णानंद को ताड़ीखेत प्रेम विद्यालय भेजा। महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आंदोलन को पंडित पंत तथा उनके अनन्य सहयोगी डाक्टर संपूर्णानंद ने नयी राह दिखायी। यह ब्लागर तब प्रेम विद्यालय में गणित का अध्यापक था। संस्था के सेक्रेटरी महोदय ने इस ब्लागर को कहा - सहभोज का पूरा उत्तरदायित्त्व तुम पर है। पाली पछांऊँ याने रानीखेत का इलाका कुमांऊँ का संपन्न इलाका होने के साथ साथ यहां के हरेक गांव से स्वातंत्र्य वीर भारत की आजादी के लिये आगे बढ़े यहां तक कि सल्ट खुमाड़ में अनेकानेक स्वातंत्र्य वीर हताहत हुए। पूरे अल्मोड़ा जिले में 1942 के स्वातंत्र्य आन्दोलन में अठारह स्वातंत्र्य वीरों ने आत्मबलिदान किया। रानीखेत की गोरी पल्टन ने कहर ढहाया। ताड़ीखेत में महात्मा गांधी भी जून 1929 में गांधी कुटी में दो अहोरात्र रहे। भारत भर के स्वातंत्र्य वीर गर्मियों में ताड़ीखेत आकर रहते थे। डाक्टर संपूर्णानंद ने मेहतरों द्वारा भोजन वितरण प्रबंध की भूरि भूरि प्रशंसा की। यह एक ऐसा प्रसंग था जिससे वाल्मीकि समाज को भी संबल मिला। 
आजाद भारत के पिछले साढ़े छः दशकों में समाज के सबसे दुर्बल वर्ग वाल्मीकि समाज की प्रताड़ना हाथों से गंदगी उठाना ढोना तथा भारत की राजधानी में ही तीन हिस्सों में बांटे गये। नगर निगम दिल्ली जल बोर्ड तथा भारतीय रेलवे के अंतर्गत 104 वार्डों में से 30 वार्डोें के मानव मलमूत्र का निस्तारण सफाई कर्मचारी हाथ से कर रहे हैं। इन कर्मचारियों की दुर्दशा का संज्ञान दिल्ली उच्च न्यायालय ने लिया। वकील कमलेश कुमार मिश्र ने अदालत से निवेदन किया कि नगर निगम जल बोर्ड व रेलवे की लापरवाही तथा व्यवस्था संबंधी अकर्मन्यताओं से जब दिल्ली के ही हजारों लोग हाथ से मानव मल मूत्र ढोने का काम कर रहे हैं उन लोगों की सुध न तो दिल्ली सरकार अथवा दिल्ली महानगर निगम ले रहा है। जब राजधानी में ही प्रोहिबिशन आफ इम्प्लायमेंट ऐज मैनुअल स्केवेजर एंड दिअर रिहैबिलिटेशन कानून का सरेआम उल्लंघन होरहा है तथा संबंधित सक्षम अधिकारी शपथ पत्र देकर घोषित कर रहे हैं कि कोई व्यक्ति हाथ से मल मूत्र नहीं ढो रहा है यह बड़ी दर्दनाक स्थिति है। सिस्टम फेलियर का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है ? इसलिये स्वच्छता अभियान के समानांतर मलमूत्र सिर पर ढोेने सहित खुले आसमान के नीचे मलमूत्र विसर्जित करने तथा मलमूत्र सिर पर ढोने हाथ से सफाई करने के सवाल को स्वच्छता आंदोलन से जोड़ कर यथाशीघ्र Prohibition of manual scavager and rehabilitation of manual scavagers Enquiry Commission गठित किया जाना चाहिये। जहां जहां यह परंपरा चल रही है सभी घटक राज्यों को इन्क्वायरी कमीशन में प्रतिनिधित्व मिले। राज्य सरकारों से कहा जाये कि वे अपने अपने राज्य के लिये भी जांच आयोग गठित करें। महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती तक मैला ढोने संबंधी जो परंपरायें चल रही हैं तथा छुआछूत का भूत पंक्तिभेद का महातांडव रोकने के उपाय तुरंत किये जाने चाहिये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध है कि वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों का ध्यानाकर्षण कर मैला ढोने की परंपरा का सही सही ब्यौरा हर शहर में कितने लोग सीधे या ठेकेदार इस काम में लगे हैं उसका पूरा पूरा विवरण बनाया जाये तथा गांधी 150वीं जयंती पर राष्ट्र यह संकल्प ले कि मैला सिर पर ढोने सहित दलित उत्पीड़न पर राष्ट्रीय स्तर पर तात्कालिक नीति निर्धारण के समानांतर स्मार्ट सिटी अभियान का मुख्य कारक तत्व मैला हाथ से उठाने के काम में लगे दिल्ली के 1000 से ज्यादा लोगों के साथ साथ भारत भर में जहां जहां यह उपक्रम चालू है उसको जगजाहिर किया जाये तथा समाज के इन दुर्बल वर्गों की सुध नेतृत्व ले। 
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