Thursday, 11 August 2016

दलित समूहों के लिये अनर्थकारी भयावह पंक्तिभेद वाली गहरी सांठगांठ क्यों न जल्दी ख़त्म करें ?
क्रिस्टोफ जेफरलेट किंग्स इंडिया इन्स्टीट्यूट लन्दन में भारतीय राजनीति तथा सामाजिकता के प्राध्यापक हैं साथ ही पेरिस स्थित सी.ई.आर.आई. साइंस पी.ओ.सी.एन.आर.एस. के वरिष्ठ अनुसंधान शागिर्द भी हैं। उन्होंने अपने आलेख कंप्लीसिटी और इनइक्वैलिटी शीर्षक से जो स्तंभ इंडियन एक्सप्रेस सोमवार 8 अगस्त 2016 के अंक के संपादकीय पृष्ठ में प्रकाशित किया है उसमें उनका आशय है कि दलितोें से गुजरात में होरहे दुर्व्यवहार के लिये केवल भाजपा राज को दोषी नहीं करार दिया जा सकता। इस पीड़ादायक प्रवृत्ति के लिये कांग्रेस को भी अपना अपराध स्वीकार करना चाहिये। गुजरात तो वैष्णव मतावलंबियों तथा जैन मतावलंबियों का संगम है। अहिंसा परमो श्रेयः वैष्णव आस्था है जैन आस्था की मान्यता अहिंसा परमो धर्म में व्यक्त होती है। गुजरात में जो दलित उत्पीड़न होरहा है उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। ठीक एक सौ एक वर्ष पहले जब अफ्रीका से भारत लौटने पर महात्मा गांधी ने कोचरब आश्रम स्थापित किया तब गांधी जी की मूल धारणा थी कि अस्पृश्यता सनातन समाज पर कलंक है। उन्हें गुजरात के वैष्णव लोग कोचरब आश्रम संचालन के लिये चंदे द्वारा आर्थिक सहयोग देते थे। महात्मा गांधी की आत्मिक पीड़ा थी कि अस्पृश्यता निवारण उनके ग्यारह व्रतों में सर्वोच्च प्राथमिकता वाला व्रत था। उन्होंने अपने आश्रम में दूधाभाई नाम के अस्पृश्य कहे और समझे जाने वाले परिवार को आश्रम में रखना अपना महत्वपूर्ण कर्त्तव्य वाला कृत्य माना। जब गुजरात के वैष्णव मतावलंबी वामन बनिया समाज को पता चला कि महात्मा गांधी के कोचरब आश्रम में दूधाभाई का परिवार रहता है तो उन लोगों ने महात्मा गांधी के इस कृत्य के लिये आर्थिक सहयोग देना बंद कर डाला पर तेरापंथी सेठ अंबालाल को जब मालूम हुआ कि महात्मा गांधी के कार्यक्रम को गुजरात के वैष्णव कहे जाने वाले समाज ने सहयोग देना बंद कर दिया है तो उन्होंने स्वयं आश्रम जाकर तेरह हजार रूपये की थैली महात्मा गांधी को पेश की ताकि उनका कोचरब आश्रम यथापूर्व चलता रहे। इस घटना ने गुजरात के वैष्णव वामन बनियों को झकझोरा पर उनमें जो अछूत मानने की परंपरा थी वह लुप्त नहीं हुई। भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर ने सन 1945 के आसपास एक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी और कांग्रेस के अछूतोद्धार कार्यक्रम की गहरी खिल्ली उड़ाते हुए कहा और लिखा भी कि महात्मा गांधी और कांग्रेस अछूतों के लिये घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। तब भी गुजरात के गांवों के स्कूलों में अछूतों का प्रवेश मुश्किल था। बाबा साहेब महाशय ने महात्मा गांधी के हरिजन सेवक संघ की भी आलोचना ही नहीं की अपितु खिल्ली भी उड़ाई कि महात्मा गांधी का हरिजन सेवक संघ दिखावा मात्र है। गुजरात के वैष्णव समाज में दलित तिरस्कार गहरा है। भारत का सनातन शास्त्र सम्मत कथन है कि पंक्तिभेदम् न कर्तव्यम् न गच्छेत रौरवम् महत। यदि आप रौरव नरक नहीं जाना चाहते हैं तो पंक्तिभेद मत कीजिये। गुजरात सहित भारत के अन्य राज्यों में दलितों के साथ जो पंक्तिभेद होरहा है उसे रोकना तथा दलितों के मंदिर प्रवेश का रास्ता प्रशस्त करना। जो लोग अपने आपको सवर्ण या द्विज कह रहे हैं वे संस्कारित द्विज नहीं एक बनावटी जीवन जी रहे हैं। सनातन धर्म की सबसे महत्वपूर्ण धारणा भगवद्गीता में व्यक्त हुई है। प्राणिमात्र समान हैं प्राणीमात्र बराबर हैं यह उद्घोष श्रीकृष्ण ने कहा - विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः। पंडित या ज्ञानी वही है जो विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गौ हाथी कुत्ता व कुत्ता का भोजन करने वालों को जो एक नजर से देखे रूप को समान माने। क्रिस्टोफ जेफरलेट महाशय ने अपने आलेख में पंक्तिभेद कारी सांठगांठ की जिम्मेवारी से कांग्रेस को बरी नहीं किया है। 
गुजरात राज्य में 18066 गांव तथा 242 शहरी क्षेत्र हैं। नवसर्जन ट्रस्ट ने राज्य के 1589 गांवों की दलित आबादी का विश्लेषण करते हुए इंगित किया कि गुजरात में पीढ़ियों से चली आरही पंक्तिभेद करने वाली प्रथा आज भी जारी है। सन 2013 में प्रस्तुत नवसर्जन ट्रस्ट की आख्या कहती है कि Dalit’s did not have the access to the Wells, Temples, Tea Stalls, Panchayat Office, Barbers, Non Dalit Midwives, Mid Day Meals etc.क्रिस्टोफ जेफरलेट व्यक्त करते हैं After all the SCs have never supported the BJP in large number, but the party may barely miss the 25.35 percent of them who used to vote for the BJP now that the State Govt. has dienated sections of Patel’s. मुख्य सवाल अल्प संख्यकों में  इस्लाम धर्मावलंबी तथा दलित समाज के बारे में प्रधानमंत्री जी को अपने मन के उद्गार कि दलितों को मारने के बजाय वे अपना आत्मबलिदान करने से घबराने वाले नहीं हैं। पंडित नेहरू को मृत्यु भय नहीं था नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भी मृत्यु भय से डरने वाले व्यक्तित्त्व नहीं हैं इसलिये उन्होंने दलितों पर अत्याचार करने वाले लोगों को ललकारा है। राष्ट्रीय एकता के लिये प्रधानमंत्री का संकल्प अद्वितीय है। गुजरात सहित जहां जहां अल्प संख्यक इस्लाम धर्मावलंबी व दलित समाज पंक्तिभेद से पीड़ित है उसके लिये प्रधानमंत्री महोदय को महात्मा गांधी का रास्ता अपनाना होगा। वसंत पंचमी सन 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का श्रीगणेश करते समय महात्मा गांधी ने वडील मदन मोहन मालवीय से सवाल पूछा था क्या छुआछूत शास्त्र सम्मत है ? निष्कपट महामना मदन मोहन मालवीय ने महात्मा को कहा था मैं भी परंपरा के कारण छुआछूत मानता हूँ पर यह शास्त्र सम्मत है या नहीं मैं नहीं जानता। मेरे विश्वविद्यालय में सर्वपल्ली राधाकृष्णन आपकी समस्या का समाधान कर सकते हैैं। महात्मा गांधी महामना के साथ डाक्टर राधाकृष्णन के डेरे पहुंचे। उन्होंने डाक्टर राधाकृष्णन से भी वही सवाल किया। डाक्टर राधाकृष्णन ने पंद्रह दिन की मोहलत चाही। धर्मशास्त्रों का पूरा निष्कर्ष निकाल कर महात्मा गांधी को कहा - छुआछूत धर्म शास्त्र सम्मत नहीं है। यह महादोष हमारे समाज में घुसा हुआ पापकर्म है। यह बात तो एक सौ साल पुरानी घटना है। अल्प संख्यकों एवं दलितों में आत्मविश्वास जाग्रत करने के लिये आज जरूरी होगया है कि भारत सरकार भूतकाल में धर्मान्तरित किये गये मुसलमानों इसाईयों को आश्वस्त करने के लिये सनातन धर्म से संबंधित जितने भी संप्रदाय हैं उनमें मुसलमानों व इसाईयों को पुनः हिन्दू समाज से जोड़ने या हिन्दू बनाने की कोई शास्त्र सम्मत विधि नहीं है इसे हिन्दू धर्मशास्त्रों के निष्कर्ष से खोजने की जरूरत है तथा छुआछूत के बारे में जो निष्कर्ष डाक्टर राधाकृष्णन ने दिया उसे भी जांच पड़ताल के बाद पक्ष विपक्ष में मतामत ज्ञात करने के पश्चात भारत सरकार को सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंचना चाहिये ताकि कुंओं से पानी पीने मंदिर प्रवेश सहित सभी पहलुओं पर सनातन धर्मशास्त्र सम्मति को कानूनी जामा मिले। देश के वे लोग जो अपने आपको द्विज कहते हैं अपने को सवर्ण मानते हैं उन्हें यह अहसास कराया जा सके कि दलितों व सवर्णों में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। जन्मना जायते शूद्रो संस्कारात् द्विज उच्यते। शिक्षा दीक्षा पाने के पश्चात द्विज अद्विज का भेद नहीं रह जाता। जहां तक पक्षियों का सवाल है वे ही द्विज हैं पहले अंडा फिर शावक जहां तक मनुष्यों का सवाल है सब मनुष्य बराबर हैं। उनमें ऊँच नीच का भेदभाव न तो शास्त्र सम्मत है न आधुनिक जीवनशैली निर्वाह करने वाले समाज में ही ऊँच नीच का कोई भेद है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिन्दुओं की मूर्तिपूजा का भी विरोध किया इसाईयत व इस्लाम को भी ललकारा। इसलिये भारत के बहुसंख्यकों को विवेकानंद महात्मा गांधी के रास्ते चलना ही पड़ेगा। मनुष्य मात्र बंधु हैं यही बड़ा विवेक है। पुराण पुरूषोत्तम पिता प्रभु एक है इस मार्ग का अनुसरण करना ही मनुष्य समाज के लिये हितकारी है। केवल कानूनी प्रावधान ही दलित प्रताड़ना को नहीं रोक पायेंगे गुजरात में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मनुष्य मात्र को बंधु मानते हैं इसलिये वे लोग जो जिन्दगी के 75 वसंत पार कर चुके हैं उन्हें समतावादी समाज के निर्माण के लिये आगे बढ़ना होगा। हिन्दुस्तान के कई बड़े शहरों में सिविल सोसाइटी क्रियाशील है। सिविल सोसाइटी के समानान्तर हर गांव, हर मुहल्ले तथा हर शहर में ऐसे लोगों को एकजुट करना अत्यंत आवश्यक है जो दलितों पर होरहे अत्याचार रोकने के लिये कटिबद्ध होकर आगे बढ़ें। हिन्दुस्तान की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां करोड़ों लोग सन्यास मार्ग के रास्ते चलने वाले हैं। गुलजारी लाल नंदा ने अपनी राजनीतिक जीवन यात्रा मजूर महाजन के मार्फत गुजरात से ही की। उन्होंने भारत साधु समाज का भी आह्वान किया। दलितों पर जो ज्यादती गुजरात के गांवों और शहरों में होरही है दूसरे भारतीय राज्यों में भी दलित उत्पीड़न विद्यमान है। दलितों और दलितेर समूहों के बीच सामाजिक पुल का निर्माण केवल साधु, सन्यासी या फकीर चाहे वे फकीर या सन्यासी बनने से पहले हिन्दू रहे हों या जैन अथवा बौद्ध रहे हों ईसाई मोंक ही क्यों न हों वे अगर गृहस्थ नहीं सन्यासी हैं उन्हें दलितों के लिये मानवीय व्यवहार संरचना के लिये प्रेरित करने की जरूरत है। आजादी के पश्चात पंडित नेहरू ने भारत सेवक समाज तथा गुलजारी लाल नंदा ने भारत साधु समाज गठित कर सरकार के समानान्तर एक ऐसा लोकायतन खड़ा किया जो लोक हितकारी गैर सरकारी अंबुद समान भूमिका का निर्वाह करे। भिक्षुओं सन्यासियों फकीरों तथा ईसाईयत के मोंक जनों का सहयोग ऐसे समाज की संरचना में प्रयुक्त किया जा सकता है जहां समाज के वंचित लोगों के साथ सामाजिक व आर्थिक दुर्व्यवहार न हो। गुजरात सहित भारत के अनेेक राज्यों के वे लोग जो अपने आपको वैष्णव कहते हैं उन्हें पहले करनी होगी। उनमें अनेक लोग विष्णु सहस्त्रनाम का नित्य पाठ करते होंगे। युधिष्ठिर ने शरशय्या पर अठावन दिन रहे भीष्माचार्य से पूछा था - को धर्मः सर्व धर्माणाम् भवतः परमो मतः। भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर से कहा - ध्यायन, स्तुवन नमश्यंश्च यजमानस्तन्यैव च। ध्यान धर्म का अनुसरण सन्यासी व फकीर करते हैं। स्तुति या प्रार्थना गिरजाघर में ख्रिस्ती मतावलंबी करते हैं। नमस्या जिसे नमाज भी कहा जाता है हठासन से इस्लाम धर्मी करते हैं। यजमान याने यज्ञ के द्वारा वातावरण को शुद्ध रखने का कार्य हवन करने वाला समाज करता है। आज भारत की अल्पसंख्यक समस्या तथा दलित उत्पीड़न निराकरण समस्या का समाधान केवल मिल बैठ कर किया जा सकता है। संपन्न दलितों को भी विचार करना चाहिये कि गांवों शहरों में जो पंक्तिभेद दलितों के साथ जाने अनजाने किया जारहा है उसमें रूकावट पैदा करने तथा समाज के सभी वर्गों को मेलजोल रखने में संपन्न तथा सत्ताधिष्ठान से जुड़े दलितों की भी तात्कालिक भूमिका है। उन्हें अपने अपने इलाके के निर्धन साधनहीन दलितों के उत्थान के लिये वातावरण तैयार करना होगा। वैष्णवों को महाभारत के शांतिपर्व और अनुशासनिक पर्व में व्यक्त कथाओं का पुनराभ्यास भी करना होगा ताकि वे सही सही राजनीतिक मार्ग का अनुसरण कर सकें। प्रधानमंत्री ने दलित उत्पीड़न के बारे में जो हृदयग्राही भावना व्यक्त की है उसे सोचने समझने तथा विपन्न लोगों के प्रति सद्भाव का रास्ता अपनाया जाये। देश के लोगों को यह अहसास हो कि दलित समाज का उत्कर्ष राष्ट्रीय हित साधन का मार्ग है। उन्हें समुचित सामाजिक स्थान उपलब्ध कराना भारत की राष्ट्रीय जरूरत है। गुजरात सहित भारत के सभी वैष्णवों से पुनर्निवेदन है - 
पंक्तिभेदम् न कर्त्तव्यम् न गच्छेत् रौरवम् महत्। 
ऐ हिन्दुस्तानी वैष्णवो! दलितों के साथ पंक्तिभेद मत करो। रौरव नरक का रास्ता मत अपनाओ।
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