Tuesday, 23 August 2016

आज़ाद हिन्द की सप्तपदी
परिवर्तिनी संसारे मृतको वा न जायते
स जातो येन जातेन याति राष्ट्र समुन्न्तिम्
पन्द्रह अगस्त 2016 आजाद हिन्द का सत्तरवां स्वतंत्रता दिवस है। बर्तानी राज में 14 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि बारह बजने के समय राजसत्ता नयी दिल्ली में भारत के भाग्य विधाताओं को हस्तान्तरित की। जब भारत की उज्जयिनी में जहां महाकाल भी विद्यमान हैं सूर्योदय होता है तब विलायत के ज्यूरिक में रात के बारह बजे होते हैं। अंग्रेजों सहित सभी यूरपवासी जूलियन कैलेंडर जिसे 15 अक्टूबर 1582 के पश्चात ग्रेग्रेरियन ग्प्प्प् के नाम पर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर या कालांतरण कहा जाता है उसके अनुसार प्रति दिन रात रात्रि के बारह बजे तारीख बदलती है इसलिये भारतीय स्वातंत्र्य पर्व 14-15 अगस्त की मध्य रात्रि याने रात के बारह बजे का मुहूर्त्त माना गया। अंकों में सात के अंक की हिन्दुस्तान में ज्यादा अहमियत दी जाती है। रविवार से शनिवार तक सात वार होते हैं। मार्कण्डेय पुराण में सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं कुरूक्षेत्र के मैदान ज्योत्सर में भगवद्गीता के नाम से विख्यात कृष्णार्जुन संवाद में भी सात सौ श्लोक हैं। हिन्दुस्तान का बहुसंख्यक समाज विवाह यज्ञ की वेदी में सात फेरे लगाता हुआ वर वधू दाम्पत्य पूर्ण होता है। जब तक सात फेरे यज्ञाग्नि में नहीं लगते भारत के लोग विवाह को पूर्ण हुआ नहीं मानते इसलिये सत्तरवां स्वातंत्र्य समारोह भारत के लिये विशेष महत्व रखता है। आर. जगन्नाथन स्वराज्य संपादन के निदेशक हैं उन्होंने टाइम्स आफ इंडिया के 70वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में 15 अगस्त 2016 के टाइम्स आफ इंडिया के विचारोत्तेजक अग्रलेख में ‘दि डू समथिंग नेशन’ शीर्षक से भारतीय लोकतंत्र जिसे अंग्रेजीदां इंडियन डेमोक्रेसी कहते हैं, स्तंभकार की मान्यता है कि सत्तर वर्ष वाली भारतीय लोकतांत्रिक सत्ता के लिये अपनी निजी व्याख्या में कहा - Our first past post system means Politicians prefer giving specific benefits to identified groups, instead of public goods like Law & Order and universal education that benefit. जगन्नाथन महाशय स्वराज्य संबंधी विश्लेषण में महात्मा गांधी की पहली मातृभाषा रचना ‘हिन्द स्वराज’ बालगंगाधर तिलक संकल्पित स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, महात्मा गांधी के अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज देशवासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज वैदिक ऋचाओं के विश्लेषित स्वाराज्य तथा आज भारत के लोग डेमोक्रेसी के जरिये सुराज अथवा लोककल्याण कारी राज व्यवस्था का उद्गान तो करते हैं पर ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत’ का नीति वाक्य अपनाने से कतराते हैं। इंग्लैंड व यूरप की औद्योगिक क्रांति के पश्चात जो शासन व्यवस्था प्रयुक्त हुुई उसे महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज का अपनी अपनी मातृभाषाओं में उल्था करा कर पढ़ने के पश्चात यूरप के अधिसंख्य विचारकों चिंतकों तथा विश्लेषकों की राय बनी कि औद्योगिक क्रांति का अनुसरण करने वाला यूरप सन्मार्ग का राही नहीं है। भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है यहां यूरप, ईरान व अरब आदि मध्यपूर्व के सेमेटिक भाषायी  तथा सेमेटिक मजहबी आस्थायें एक ईश्वर एक पुस्तक एक पैगम्बर या प्राफेट अवधारणा मनुष्यता का सरोकार नहीं है। भारत सांस्कृतिक भारत विशाल सांस्कृतिक भारत देश काल तथा स्थानीय परंपराओं के साथ साथ आसेतु हिमाचल की सांस्कृतिक बहुलता के बावजूद अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंततिका पुरी द्वारावती श्चैव सप्तैके मोक्ष दायिका क्षेत्र माने जाते हैं। यूरप और मध्यपूर्व में ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के लिये वेटिकन यहूदियों के लिये यरूशलम इस्लाम धर्मावलंबियों के लिये मक्का शरीफ व मदीना पुण्य क्षेत्र हैं पर भारत में आसेतु हिमाचल तीर्थ परंपरा के हजारों स्थल हैं जिनमें प्रयाग इलाहाबाद में, हरिद्वार, उज्जयिनी व नासिक इन चार स्थानों में प्रति बारहवें वर्ष कुंभ मेला लगते हैं जिसमें लाखों लोग प्रयाग हरिद्वार में गंगा स्नान उज्जयिनी में क्षिप्रा स्नान तथा नासिक त्रयम्बक महादेव में गोदावरी स्नान कर कृतकृत्य हुआ करते हैं। इन चार कुंभ तीर्थोें के अलावा हजारों अन्य तीर्थ हैं जहां भारतवासी यात्रा करना अपना जीवन लक्ष्य मानते हैं। जब रेल सड़क तथा हवाई जहाज नहीं थे तब भी अमरनाथ कैलास मानसरोवर बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री जमुनोत्री हरिद्वार से लेकर पूर्व में कामाख्या तथा गंगा सागर कलिंग में जगन्नाथपुरी आंध्र में तिरूपति सप्तशैल, रामेश्वरम कन्याकुमारी गोकर्ण, सोमनाथ पैदल चल कर करते थे। कबीर की सधुक्कड़ी तब भारत की संपर्क भाषा थी। महात्मा गांधी गुजराती भाषी थे उनसे पहले विवेकानंद बांग्ला भाषी होने के साथ साथ सधुक्कड़ी भी समझते थे। उनके संपर्क में सधुक्कड़ी ज्ञानवान लोग हमेशा रहते। ईस्ट इंडिया कंपनी व कालांतर में बर्तानी राज ने रोमन उर्दू को संपर्क भाषा का दर्जा दिया। आज भारत में 22 समृद्ध भाषाओं तथा साने गुरू जी की राष्ट्रवादिता प्रतीक आंतर भारती अभियान के बावजूद भारत का 12 प्रतिशत अंग्रेजीदां यह कहता है कि भारत की लोकभाषा अंग्रेजी है। अब हम जगन्नाथन महाशय द्वारा अभिव्यक्त मत पर विचार करें। स्तंभकार तथा स्वराज्य मैगजीन संपादक निदेशक महाशय की इस बात पर प्रशंसा करनी ही होगी कि उन्होंने स्वतंत्र भारत के सत्तरवें वर्ष में केन्द्र की पूर्व वाली यूपीए सरकार तथा वर्तमान एनडीए सरकार की आलोचना में पंक्तिभेद का रास्ता नहीें अपनाया। यूपीए सरकार के पहले कदम नेशनल रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी एक्ट के प्रावधानों का भी पुरजोर आक्रामक विरोध करते हुए एनजीआरए को रोजगार देने वाला कार्यक्रम नहीं बताया। उन्होंने अपनी कलम से लिखा - This is because our Politicians are getting it, they know they have to deliver ‘Something’ even if they are not sure what that needs to be. In the UPA years the something was seen to be about delivering ‘Rights’ Manager for jobs RTE for education. Food security for hunger and malnutrition and the land acquisition act of delivering fair prices for compulsorily acquired land. In the states that something has ranged from giving the Laptops in U.P.to prohibition in Kerala and Bihar to low priced food Kitchen in TN job reservation for various allegedly disadvantaged communities Muslims, Jats and Gujjars.
उन्होंने नरेन्द्र मोदी सरकार के 2014 के मध्य से कुछ न कुछ करो स्कीमों की एक लंबी कतार इंगित की जिनमें मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टेंड अप इंडिया, जनधन योजना, स्वच्छ भारत, पहल, उदय आदि की शुरूआत की पर महाशय जगन्नाथन की राय में ‘डू समथिंग’ मर्यादाओं को लांघ गया। यदाकदा ‘कुछ न कुछ तो हो ही’ विकल्प उपलब्धि के स्थान पर अलब्धता को बढ़ावा देता भी देखा गया ऐसा जगन्नाथन मानते हैं। अधिकार चाहे वह सूचना प्राप्ति का वर्चस्व हो रोजगार उपलब्ध कराने वाला मनरेगा हो शिक्षाधिकार आर टी ई ही क्यों न हो ये सभी समाधान कारी सरोकारों के बजाय समाधान के रोड़े बन चुके हैं। जगन्नाथन महाशय की इस राय में वैचारिक मजबूती लगती है कि अधिकारिता मूलक सुलझाव के बजाय रोजगार बंधन रोजगार रूकावट का रास्ता प्रशस्त किया है। 
वित्त मंत्री संयत भाषी होने के समानांतर ऊँचे स्तर के वकील भी रहे हैं। संयत भाषा का उपयोग उनकी व्यक्तिगत विशेषता है। भाजपा में भी उनके आलोचकों की लंबी कतार है। उन्होंने जी एस टीका जो खाका तैयार किया है उससे असहमति रखने वाले महानुभावों में श्री आर. जगन्नाथन भी हैं। उनकी लेखनधारा से लगता है वे स्वयं को राजनीतिक नहीं मानते पर राजनीतिक रणनीति का विश्लेषण करते हैं। वे यह तो मान रहे हैं कि बीते सत्तर वर्षों में हिन्द की डेमोक्रेसी व्यापक पैमाने की स्थिरता तो दिखती है पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि डेमोक्रेसी को लोकसंग्रह की मर्यादा में स्थिर करने के लिये अर्गला और कीलक जरूरी है। जी एस टी के लिये अनावश्यक दौड़धूप का उल्लेख करते हुए जगन्नाथन महाशय का मत है कि जी एस टी का चक्रव्यूह कहीं भरभरा कर ढह न जाये। वह हालतें पैदा न हो जायें जो हिन्द की देहाती कहावत - आप डूबे बामना ले डूबे जजमान चरितार्थ न हो जाये पर जी एस टी के बारे में अपना चिंतन पोखर खुल रखने से पहले क्या महाशय जगन्नाथन ने अपनी संशयग्रस्तता को किसी राज सत्तासीन सुप्रीमो घटक राज्यों के बीजेपी विरोधी मुख्यमंत्रियों वित्त मंत्रियों से भी समझने का प्रयास किया है ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी तथा उनके वित्तमंत्री उसी तरह आशान्वित हैं जिस तरह गर्भिणी महिला सुन्दर कन्या कुमार को जन्म देने से पहले प्रसव पीड़ा सहती है। जी एस टी क्रियान्वयन में प्रारंभिक व्यवधान तो आयेंगे ही सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता अंगुली टेढ़ी करनी पड़ती है इसलिये इस संदर्भ में जगन्नाथन महाशय की संशयग्रस्तता के समानांतर वित्तमंत्री अरूण जेटली की छिन्नसंशयता तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समग्र आर्थिक चिंतन को भांप कर ही जगन्नाथन महाशय स्वराज, स्वराज्य, स्वाराज्य, सुराज तथा Economic Governance of Ups & Downs of Demand Supply का भी अनुशीलन कर भारत के घटक राज्यों की स्थितियों की कराधान मर्यादाओं और प्रधानमंत्री दुनियां भर के देशों में भारत की खास पहचान स्थापित करने में षोडषी लोकसभा के आशुवक्ता नेता सदन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो करिश्मा दिखाया है वह छोटी मोटी निराधार तथा तथ्यहीन आलोचनात्मकता से प्रभावित नहीं हो सकता है बल्कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के व्यक्तित्त्व में नया निखार लाने वाला तत्व है। भारत में ज्यादातर राजनीतिक प्रशासनिक व्यावसायिक तथा तकनालाजी क्षेत्रों में जो मनीषी जुड़े हुए हैं उनके मध्य 75 प्रतिशत से ज्यादा लोग ऐसे हैं जिन पर मैकोलाइट अंग्रेजीदां भारतीय भद्रलोक का बिल्ला लगा हुआ है। स्वाधीनता संघर्ष के दौरान महात्मा गांधी ने स्वयं को भारतीय विपन्नता से जोड़ा और भारत की समस्याओं का सटीक अध्ययन किया। वे इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत को आधुनिक दुनियां के राजनीतिक नक्शे पर स्वतंत्र पहचान बनाने के लिये देश के गांवों को खेतीबाड़ी के समानांतर कम से कम हरेक गांव में एक ग्रामीण उद्यम की जरूरत 1934 में ही विज्ञप्त कर दी। बयासी वर्ष के बाद भी भारत के गांवों की गरीबी जहां की तहां यथापूर्व वर्तमान है। पिछले वर्ष 2015 में इंडियन एक्सप्रेस ने भारत के सबसे गरीब जिले नवरंगपुर की गरीबी का खाका खींचा था। पवई मुंबई स्थित आई टी आई के प्रोफेसर मौदगल्या ने घोषणा की कि आई टी आई पवई मुंबई देश के निर्धनतम जिले नवरंगपुर को अंगीकृत कर रहा है। ठीक एक वर्ष पश्चात जब हिन्दुस्तान आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है सनडे इंडियन एक्सप्रेस ने सोलह चित्रों के जरिये नवरंगपुर जिले की असलियत उजागर की है। संपूर्ण ओडिशा का क्षेत्रफल 155,757 वर्ग किलोमीटर जनसंख्या सवा चार करोड़ है जिसमें से 5291 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल आबादी सवा बारह लाख वाला भारत का दरिद्रतम जिला नवरंगपुर है। मूलतः उ.प्र. के मुजफ्फरनगर निवासी डाक्टर यशवीर सिंह चौधरी चरण सिंह के विश्वासपात्र वैज्ञानिक थे। उ.प्र. के किसान चौधरी चरण सिंह को उनकी जयंती पर उदार चित्त होकर थैली भेंट में प्रस्तुत की। चौधरी साहब ने जन्मदिन पर मिले जन किसान सहयोग की राशि से किसान ट्रस्ट गठित कर किसान हित संवर्धन का उत्तरदायित्त्व प्रोफेसर यशवीर सिंह को सौंपा। प्रोफेसर यशवीर सिंह ने पूर्ण मनोयोग से चौधरी साहब की किसान समृद्धि कल्पना को साकार किया। चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजित राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रोफेसर राममूर्ति को खादी आयोग का सदर बनाना चाहते थे पर उनके उद्योग मंत्री ने उ.प्र. के ही किसान ट्रस्ट के प्राणवायु यशवीर सिंह को खादी आयोग का सदर तैनात कर संबंधित फाइल प्रधानमंत्री के अवलोकनार्थ भेज दी। प्रोफेसर यशवीर सिंह ने इस ब्लागर को बुलाया और पूछा - भारत का सर्वसमृद्ध जनपद तथा सर्वगरीब जनपद कौन कौन है। इस ब्लागर ने प्रोफेसर यशवीर सिंह से निवेदन किया - श्रीमन रोटी गोल होती है भारत का समृद्धतम जिला आपका गृह जनपद मुजफ्फरनगर है और देश का सबसे गरीब जिला उड़ीसा का मयूरभंज और यू.पी. में उत्तरकाशी है तब नवरंगपुर मयूरभंज का ही हिस्सा था। इंडियन एक्सप्रेस के खोजी पत्रकार श्री ई.पी. उन्नी ने भारत के सबसे गरीब जिले नवरंगपुर की परस्पर विरोधाभासी वास्तविकियों को उजागर किया है जिसमें ज्यादातर आदिवासी व गिरिजन हैं। पत्रकार ने नवरंगपुर की ‘कोढ़ में खाज’ वाली अवर्णनीय गरीबी की स्थिति का यथार्थ सामने लाते हुए कहा - वहां स्कूल तो हैं पर पढ़ाने वाले गुरूजन मास्टर साहब नहीं हैं। रोजगार बहुत कम हैं पर देवता ज्यादा हैं जिन्हें उन्नी महाशय ने गॉड कहा है। एकमात्र शहर नवरंगपुर के मंदिर रथ शहर के बीचों खड़ा है। वाहनों के पार्किंग का माकूल इंतजाम का अभाव है। मदर टेरेसा पब्लिक स्कूल नवरंगपुर शहर का आकर्षण है पत्रकार ने मदर टेरेसा पब्लिक स्कूल के छात्रों को 70वां स्वातंत्र्य दिवस समारोह का रिहर्सल करते दिखाया है। मुनतुमा के हरेभरे मैदान में पुराने वाहनों की उल्टी सीधी कब्रगाहनुमा मैदान बन गया है। प्रफुल्ल कुमार पटनायक नवरंगपुर जिले के एकमात्र सिनेमा घर लक्ष्मी टाकीज का प्रोजेक्शन कर रहे हैं। आदिवासियों के गांव में राज्य सरकार की गृह निर्माण योजना का इकला नक्शा पेश किया है। मंगलम टिंबर्स औद्योगिकीकरण का प्रतीक है पर औद्योगिकीकरण की मुहिम अटक गयी है। डाक्टर योमा तुलु आई.ए.एस. दिल्ली में पढ़ीं संप्रति नवरंगपुर जिला ग्राम विकास अधिकरण की प्रमुख हैं। इन्द्रावती बांध के इलाके के किसान गरीब हैं उन्हें पानी की चाह है। राजकुमार नायक व उनकी टीम का चित्र दिखाया गया है। चित्र तो सोलह हैं बताया गया है कि ज्यादा जानकारी चाहें तो WWW indianexpress.com पर देखें। स्तंभ में उन्नी महाशय ने सोलह चित्र चौदह पैराग्राफ में अपना निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। लगभग एक वर्ष पहले आईटीआई पवई मुंबई ने देश के सबसे ज्यादा गरीब जिले नवरंगपुर को अंगीकृत किया, घोषणा की कि वहां के नौजवानों कोे इन्फार्मेशन टेक्नालाजी का लाभग्राही बनाया जायेगा। ओडिशा एक ऐसा राज्य है जहां की हाथ कती हाथ बुनी उड़िया साड़ियां भारत भर में पसंद की जाती हैं। आजादी के पश्चात गोपबंधु चौधरी ने कुटीर उद्यमों को जहां बढ़ावा दिया अगर अन्य उड़ीसा के जिलों की तरह नवरंगपुर में भी कताई बुनाई का काम उड़ीसा खादी ग्रामोद्योग बोर्ड तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई दत्तचित्त होकर संपन्न करें खादी के मार्फत ही जिले में रोजगार याप्ता परिवार संख्या बढ़ सकती है। गरीबी के संत्रास से पीड़ित नवरंगपुर की आबादी के बारह लाख लोगों में से चर्खा कताई तथा उड़िया साड़ी बुनाई के काम में ही रोजगार बढ़त हो सकती है। खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अनुरोध किया है कि उनके कार्मिक सप्ताह में एक दिन खादी पहनें। राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा भारत सरकार के मंत्रालयों के कार्यकर्ताओं द्वारा हफ्ते में एक दिन खादी परिधान पहनने की पहल करने से पूर्व आयोग के अध्यक्ष महाशय को खादी कमीशन के कर्मचारियों तथा खादी संस्थाओं के कर्मचारियों को खादी पहनने के लिये प्रेरित करना चाहिये। खादी को महंगा बता कर यदि कार्मिक उनका अनुरोध स्वीकार न करें खादी आयोग के अध्यक्ष महोदय को खादी आयोग खादी संस्थाओं तथा राज्य खादी बोर्ड के कर्मचारियों के वर्ष भर के लिये पांच पांच खादी वर्दियां कुर्ता पाजामा या पैंट बुश्शर्ट सलवार कमीज अथवा साड़ी ब्लाऊज निःशुल्क न भी देना चाहें तो भी उन्हें प्रेरित करें कि वे 20 प्रतिशत वर्दी कीमत वसूल करें तथा प्रत्येक कार्मिक को खद्दर स्वयं पहनने हेतु प्रेरित करें। देखने में आया है कि खादी कमीशन के दफ्तरों में कोई इकला दुकला कभी खादी पहनता हो। ज्यादातर लोग गैर खादी वस्त्र पहनते हैं। उड़ीसा के लिये इस ब्लागर ने खादी आयोग के अध्यक्ष महोदय का ध्यानाकर्षण कर ओडिसी साड़ी ओडिसी नृत्यकार तथा दक्षिण कैलिफोर्निया में रहने वाली श्रीमती नंदिनी बेहरा का उल्लेख किया था। ओडिसी नृत्य ओडिसी साड़ी पहन कर ओडिसा की खादी उत्पादकता को नई ऊँचाईयां दे सकती है। खादी आयोग के सदर सक्सेना महोदय चर्खा म्यूजियम बना रहे हैं। वे दिल्ली मुंबई भुवनेश्वर में नंदिनी बेहरा का ओडिसी नृत्य आयोजित कर ओडिसी साड़ियों का उत्पादन बढ़ा सकते हैं। पूर्व में भी इस ब्लागर ने सक्सेना महाशय का ध्यानाकर्षण किया था। 
फिर आर जगन्नाथन महाशय के डू समथिंग की तरफ बढ़ें। जगन्नाथन महाशय ने सांसद विकास निधि MPLADS पेटे प्रति सांसद को सालाना पांच करोड़ रूपये उपलब्ध कराने का प्रावधान है। वे आगे फर्माते हैं कि हमने चुनाव खर्च का प्रावधान नहीं किया है यदि लोकसभा का चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवार को चुनाव खर्च मुहैया कराया जाये तो चुनाव खर्च में कमी लायी जा सकती है तथा भ्रष्टाचार पर रोकथाम भी लगायी जा सकती है। अगर सांसद विकास निधि का प्रावधान खत्म कर सांसद चुनाव व्यय का संकल्प लिया जाये भ्रष्टाचार तथा काले धन के चुनावी उपयोग में रोक लग सकती है। महाशय जगन्नाथन फिर कहते हैं कि हमारी न्यायपालिका अपने अधिकार सुरक्षित रखने के लिये प्रतिबद्ध है कि न्यायमूर्तियों का चयन उसका ही स्वत्वाधिकार हैै तथा बीसीसीआई का संचालन किस तरह हो यह भी न्यायमूर्ति गण निर्णय लेते हैं। हमारे संविधान में एक लंबी सूची केन्द्र राज्य की साझा सूची में है जिससे केन्द्र व राज्यों के बीच तनाव बढ़ता है। हर बदनुमा कानून चाहे वह आर टी ई हो भूमि अधिग्रहण या भोजन अप्राप्ति हो कानूनी विसंगतियां विरूद्ध मार्गी भी हो सकती हैं। वे आगे फरमाते हैं कि आजादी के साठ दशक उपरांत भारतीय डेमोक्रेसी की बहुत बड़ी तस्वीर यह अहसास तो करा रही है कि डेमोक्रेसी में जीवन्तता है। यह कदम कदम बढ़ भी रही है कभी कभी त्रुटियां भी हो जाती हैं जो स्वाभाविक है। संविधान की तात्कालिक प्राथमिकतायें विविध संस्थानों की स्वायत्तता तथा सत्ता का आयतन ग्राम पंचायत नगर निगम जिला पंचायत घटक राज्य विधान मंडल तथा संसद में प्रत्येक की स्वायत्तता के बावजूद सत्ताधिष्ठान को जो व्यवहार स्वयं को अनुकूल नहीं वह सत्ता के दूसरे अधिष्ठानों से न किया जाये। यही भारत की मानवीय आत्मा की अंतर्मन पुकार है। ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत’। डीएसटी प्रावधान भारतीय संघ घटक राज्य विधान मंडल जिला पंचायत नगर निगम तथा गांव पंचायत में चौखंभा लोकतांत्रिक राजव्यवस्था डाक्टर लोहिया की संकल्पना है। उसे संबल देना निर्वैर नेतृत्व द्वारा ही संभव हो सकता है। भारत राष्ट्र राज्य की समुन्नति का मार्ग प्रशस्त करना मौजूदा राष्ट्र नेतृत्व की प्राथमिकता हो यही शिवसंकल्प है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

No comments:

Post a Comment