Tuesday, 30 August 2016

विरुद्ध शीलयो प्रभ्वोर्विरुद्धा भजतो गति
वैभव पुरन्दरे ने अपने स्तंभ टाइम्स आफ इंडिया के मंगलवार 23 अगस्त 2016 के अग्रलेख द्वारा गांधी, अंबेडकर तथा सावरकर के वैचारिक स्तूप उन तीनों महानुभावों केे सक्रिय जीवनकाल की मर्यादाओं को रूखसत देकर वैचारिक पुनर्मिलन का सुझाव दिया। इक्ष्वाकु वंशीय अयोध्या के राजपुरोहित वशिष्ठ थे। उनके पुत्र शक्ति का वध वशिष्ठ से तनाव दुराव रखने वाले राजर्षि से ब्रह्मर्षि पद चाहने वाले विश्वामित्र ने कर डाला। वशिष्ठ का पोता पराशर तब केवल पांच वर्ष का बालक था इसलिये वशिष्ठ ने निर्णय लिया कि वे अपने पुत्र का क्रियाकांड संस्कार स्वयं संपन्न करेंगे। उन्होंने अपने पुत्र शक्ति के त्रयोदशाह भोज के लिये आचार्य चार्वाक् तथा अपने पुत्र का वध करने वाले विश्वामित्र को भी निमंत्रित किया। आचार्य चार्वाक् ने वशिष्ठ द्वारा प्रेषित निमंत्रण पत्र को इस बिनाय पर लौटाया कि जिस तरह बुझा हुआ दीपक तेल या घी का उपयोग नहीं कर सकता मृत्यु के पश्चात मृत व्यक्ति को श्राद्ध भोज या तर्पण का उदक नहीं मिल सकता है। वशिष्ठ चाहते थे कि उनके पुत्र के त्रयोदशाह में आचार्य चार्वाक् सम्मिलित हों। वशिष्ठ ने आचार्य चार्वाक् को कहला भेजा भोजन तो आपने मैंने करना है मृत व्यक्ति तो निमित्त मात्र है। वशिष्ठ के स्पष्टीकरण से आचार्य चार्वाक् सहमत हुए और त्रयोदशाह भोज में सम्मिलित हुए। वशिष्ठ ने उन्हें क्षमतानुसार दक्षिणा भी दी। श्राद्ध भोज में विश्वामित्र भी सम्मिलित हुए उन्हें वशिष्ठ की सहनशीलता पर अचंभा हुआ और उन्होंने मन में ठान ली कि वशिष्ठ का भी वध करेंगे। विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे देखा कि वशिष्ठ अपनी पत्नी अरून्धति से कह रहे थे कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हैं विश्वामित्र ने अपने मन के पाप को वशिष्ठ को बताया। वशिष्ठ ने घोषणा कर दी कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हैं। सहनशीलता तथा व्यक्ति के उदात्त लक्षणों को स्वीकृति देना वशिष्ठ विश्वामित्र अनबन शक्ति के श्राद्ध पर्व में लुप्त होगयी। वर्षों तक चलने वाला विश्वामित्र वशिष्ठ पक्षि युद्ध का यह समापन पर्व था। कृष्णार्जुन संवाद की तरह राम वशिष्ठ संवाद योग वाशिष्ठ कहलाता है। लंका युद्ध में रावण वध प्रकरण को गंगा घाटी के कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने घोषणा कर दी कि रामचन्द्र ने ब्रह्महत्या की है अतः कान्यकुब्ज राम राज्याभिषेक में सिरकत नहीं करेंगे। राम ने वशिष्ठ की बात मान कर कान्यकुब्जों को देश निकाला नहीं दिया। वे मानते थे कि कान्यकुब्ज जो रास्ता अपना रहे हैं वह उन्हें कष्ट देगा पर राम ने वशिष्ठ की सम्मति से कान्यकुब्ज ब्राह्मणों द्वारा अपनाये गये रवैये पर सहनशीलता का रास्ता अपनाया। कालांतर में कान्यकुब्ज अपनी त्रुटि को समझ गये। युद्ध के मैदान में यदि कोई युद्ध कर्ता मारा जाता है उसे हत्या नहीं कहा जाता। यदि ब्राह्मण युद्ध करते मारा गया तो उसे मारने वाले योद्धा ब्राह्मण ब्राह्मणेतर योद्धा को ब्रह्महत्या का अपराध नहीं लगता। यही दृष्टिकोण वशिष्ठ ने व्याख्यायित किया था इसीलिये योग वाशिष्ठ अध्यात्म का चमकीला नक्षत्र है। भारत की आजादी के संघर्ष काल में आजादी के लिये अपना जीवन अर्पित करने वाले अनेकानेक राष्ट्रभक्त थे। इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने आधुनिक भारत के निर्माताओं में सर सैयद अहमद खां तथा मोहम्मद अली जिन्ना को सम्मिलित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति तथा संविधान लागू होने के बाद भारत सरकार के सूचना विभाग ने भी आधुनिक भारत के पचास निर्माता व्यक्तियों के जीवनचरित प्रकाशित किये। उस श्रंखला में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खां का उल्लेख नहीं है। बंगलुरू में रहने वाले देहरादून में जन्मे इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने आधुनिक भारत के उन्नीस निर्माताओं को अपनी पुस्तक में स्थान दिया। पंडित नेहरू महात्मा गांधी के राजनैतिक जीवन दर्शन के उत्तराधिकारी थे। यह महात्मा ने स्वयं स्वीकार किया तथा पंडित नेहरू ने अपने स्वराजिष्ट पिता पंडित मोतीलाल नेहरू की राजनीतिक सोच के विपरीत महात्मा गांधी के पूर्ण स्वराज का उद्बोध 1930 में रावी के तट पर किया। महात्मा गांधी कोरे राजनीतिज्ञ नहीं थे उनका अपना अध्यात्म दर्शन था। उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो अभियान में अपने पहले स्वतंत्रता चेतना वाले प्रथम सत्याग्रही के तौर पर विनोबा भावे को सुनिश्चित किया। संत विनोबा भावे रातोंरात भारत ही नहीं दुनियां में महात्मा गांधी के पहले सत्याग्रही के तौर पर ख्याति पा गये। विनोबा महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी थे। उन्होंने हिन्द स्वराज में अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज तथा भारत के अपने देशवासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की संकल्पना की। इतिहास विशेषज्ञ रामचन्द्र गुहा ने महात्मा गांधी को आधुनिक भारत का निर्माता माना पर महात्मा के अध्यात्म दर्शन के व्याख्याता उनके पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही विनोबा भावे को रामचन्द्र गुहा भूल गये। उन्होंने आधुनिक भारत के उन्नीस निर्माताओं में डाक्टर राममनोहर लोहिया बाबू जयप्रकाश नारायण तथा कमला देवी चट्टोपाध्याय को भी सम्मिलित किया। कमला देवी मूलतः वर्तमान कर्णाटक राज्य के मंगलुरू जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी की कन्या थीं। मूलतः उत्तर भारत से प्रव्रजित सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं। उनका विवाह चौदह वर्ष की उम्र में कृष्णराव नामक युवक से संपन्न हुआ था। विवाह के दो वर्ष में ही कृष्णराव दिवंगत होगये। कमला देवी की मां ने बाल विधवा कन्या को चेन्नै भेज कर पढ़ाई शुरू करने को कहा। मद्रास विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्ति के दौरान कमला देवी भारत कोकिला सरोजिनी नायडू के अग्रज हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय से प्रभावित हुईं। मां ने हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय से अपनी बाल विधवा कन्या का पुनर्विवाह कर दिया। कमला देवी सारस्वत चट्टोपाध्याय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सदस्या भी थीं। उन्होंने भारत के स्त्री समाज के लिये अपनी ननद सरोजिनी नायडू द्वारा अपनायी गयी मर्यादाओं से अभिभूत कर डाला। मूलतः मराठी भाषी पुरन्दरे के जो स्तंभ पुनर्विचार पुनर्चिंतन Reconcile Gandhi Ambedakar तथा पृष्ठभूमि में विनायक दामोदर सावरकर का उल्लेख किया है। महात्मा गांधी जब उन्हें दुनियां मोहनदास करमचंद गांधी संबोधन करती उनकी माता पुतली बाई अपनी कनिष्ठ संतान को मोनिया कह कर बुलाती थी। ईश्वर परायण वैष्णव रामभक्ति में सरोबार पुतली बाई ने अपने कनिष्ठ पुत्र को राम भक्ति की घुट्टी बचपन में ही इस प्रकार पिला दी थी कि महात्मा गांधी अपने युग के स्वयं राज करने से परहेज करने वाले विश्व प्रसिद्ध राजनीति वेत्ता थे। ख्रिस्ती मतावलंबियों के मिशनरी सेवा के प्रशंसक थे। उन्होंने अपनी मातृभाषा में इंडियन ओपीनियन के जरिये एक नयी राजनीति का सूत्रपात किया। अफ्रीका जाने से पहले वे विलायत के उन भारतीय युवाओं से मिले जो क्रांतिकारी मार्ग से हिंसा का आश्रय लेकर हिन्दुस्तान को आजाद कराने के पक्षधर थे। जिन भारतीय युवा क्रांतिकारियों से वे मिले उन्होंने ध्यानपूर्वक उन लोगों को सुना। क्रांतिकारियों से महात्मा का संवाद ही हिन्द स्वराज की मूल आत्मा है। विलायत में बारिस्टरी पढ़ने वाले मोहनदास करमचंद गांधी पर उनकी माता पुतली बाई द्वारा डाले गये संस्कार जिन्हें भारतीय लोग श्रौत संस्कार कहते हैं श्रौत विद्या सुन कर ही आ जाती है। उसे लिखने का अभ्यास न भी किया जाये तो भी श्रौत संस्कार माता पिता से पुत्र पुत्रियों में उपलब्ध होते रहते हैं। महात्मा ने अपनी मातृभाषा में जो संवाद अधिपति-वाचक के मध्य संपन्न करते हुए बीस अध्याय की पुस्तक हिन्द स्वराज कहलाई। उसकी आज वैसी व्याख्या जरूरी होगयी जैसे आदिशंकर ने महाभारत के अनुशासनिक पर्व में भीष्म युधिष्ठिर संवाद का श्रेयस्कर तत्व विष्णु सहस्त्रनाम की टीका अपने तरीके से लिखी है। समूचे महाभारत की अनेक उक्तियां तथा संवाद एवं कथानक ज्ञानेश्वरी की तरह ही ज्ञानबोधी हैं। आदिशंकर ने वेदांत की महत्वपूर्ण विद्या अद्वैत की व्याख्या विष्णु सहस्त्रनाम टीका में संपन्न की। आज भारत के अधिकांश शिक्षित तथा शब्दवेत्ता भारतीयता को समझने के लिये अंग्रेजी का सहारा लेते हैं पर अंग्रेजी भाषा के जरिये भारत शास्त्र को हृदयंगम नहीं किया जा सकता बल्कि भारत शास्त्र को सटीक समझने के लिये ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी, संत एकनाथ की एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंग तुलसी के रामचरित मानस मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत जयशंकर प्रसाद की कामायनी जयदेव के गीत गोविन्द कंबन की रामायण सहित भारत की लोकभाषाओं में छिपे हुए रत्नों को खोजना होगा। आज की धरती में सम्यक विवेक से अध्यात्म और आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान तथा तकनालाजी जिन नये आयामों की तरफ बढ़ रही है उसका सटीक व विवेक सम्मत मार्ग चौड़ा करने की जरूरत है ताकि वैज्ञानिक व जैविक अनुसंधान सृष्टि के लिये विनाशकारी न होकर उस स्थिति में विद्यमान रहे जिस स्थिति का उल्लेख ‘विरूद्ध शीलयो प्रभ्वो’ शीर्षक में किया गया है। पाश्चात्य तथा मध्यपूर्व के सेमेटिक मजहबों व सेमेटिक वाणियों के माध्यम से खुदा, अल्लाह, गौड को निर्विकार तथा एकल तत्व मानते हैं वैसे अंग्रेजी भाषा के गॉड शब्द के अक्षरों की मीमांसा करते हुए कुछ यूरोपीय विद्वान GOD को Genrator Operater Destroyer कह कर गॉड की सर्वव्यापकता तथा समस्त सत्ता का गुणगान भी करते हैं। भारत में दैवी वातावरण में सृष्टिकर्ता चतुर्भुज ब्रह्म, पालन अथवा स्थिति दाता विष्णु तथा संहारकर्ता शिव रूद्र अथवा महादेव के रूप में मानता है। इन तीनों के साथ गणपति तथा दैवी शक्ति ईश्वर केवल पुरूषत्व में नहीं प्रकृतिस्थ भी है। इसे गायत्री सावित्री तथा सरस्वती के तीन रूपों के समानांतर रूपान्तरित परिप्रेक्ष्य में दुर्गा पार्वती उमा भवानी तथा लक्ष्मी व वाक्वाणी सरस्वती भी ईश्वर का नारी स्वरूप या मातृ स्वरूप प्रतिबिंबित किया गया है। इसलिये हिन्द में जिसे पश्चिमी दुनियां और मध्यपूर्व के मनीषी समाज द्वारा रिलीजन या मजहब कहा जाता है हिन्द के लोगों की जिजीविषा ही जीवन शैली या प्राणी धर्म है जिसका स्त्रोत सोऽहम् श्वास प्रक्रिया है।\ इस श्वास प्रक्रिया का कारक है इसलिये जो लोग मानते हैं कि ओंकार सर्वत्र है भगवद्गीता में योगेश्वर वासुदेव कृष्ण ने ज्ञान विज्ञान वितान का ब्यौरा कौंतेय अर्जुन को बताते हुए कहा - रसोहस्मप्सु कौंतेय प्रभास्मि शशि सूर्ययो, प्रणवः सर्व वेदेषु शब्दः रवेः पौरूषम नृषु। 
  इसलिये जिसे दुनियां के लोग हिन्दू धर्म कहते हैं हिन्द के हम लोग भी अपने आपको हिन्दू कहते आरहे हैं। क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू शब्द की नयी व्याख्या की कहा - हिन् (हिंसा) से द्वै रित अपने को न जोड़ने वाला मानक हिन्दू है। अहिंसा के माने कायरता नहीं वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। युद्ध में दोनों पक्ष मर्यादा उल्लंघन न कर योद्धा के तौर पर युद्ध करे उसे ही युद्ध व्याख्याकारों ने धर्मयुद्ध कहा है। महाशय वैभव पुरन्दरे ने गांधी और अंबेडकर में ऐतिहासिक समीकरण वाली वैचारिक विरूद्धशीलता पर तालमेल का रास्ता अपनाने की पहल की है। जो विचारक कर्तृत्व तथा पृथ्वी को नयी जाग्रति वती बनाने में अपना जीवन खपा कर इस धरती से विदा होगये पर उनके विचार यहां विद्यमान हैं। उनके अनुयायी अपनी वैचारिक रीति नीति का आह्वान भी करते रहते हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में जन्मे महात्मा गांधी कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर तथा उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में भारत धरती में उत्पन्न वैशाखी मेष संक्रांति के अगले दिन जन्मे भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर और महात्मा के बीच पीढ़ी का अंतराल था। इसलिये जेनरेशन गैप वाली स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं में बाबा साहेब अंबेडकर का महात्मा गांधी के चिंतन पथ से पार्थक्य तथा वैचारिक आक्रोश जिसे बाबा साहेब ने समय समय पर महात्मा गांधी तथा उनके द्वारा पोषित हरिजन सेवक संघ पर किया पर महात्मा ने कभी भी बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर की आलोचना नहीं की। दोनों का लक्ष्य अछूत उद्धार या अंत्यज समझे जाने वाले भारतीय समाज को अस्पृश्यता दंश से बाहर निकाल कर भारत के बहुसंख्यक समाज में अंत्यजों को दुत्कारने के कुकृत्य को रोकने के लिये बर्तानी राज क्रिश्चियन मिशनरियों के माध्यम से भारत के आदिवासियों तथा अछूत कहे जाने वाले भारतीय शिल्पकला हाथ से काम करने वाली भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या को हिन्दुओं के घेरे से बाहर निकाल कर उन्हें अंग्रेजी शिक्षा सेहत सुधार मिशनरी दृष्टिकोण की तरफ आकर्षित किया। महात्मा गांधी और भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर में अंत्यज हितों के लिये आत्मसमर्पण अपने अपने तरीके से था तथा एक साम्य दोनों में दीखता है वह है ईसाईयत इस्लाम की ओर समस्या समाधान के लिये सेमेटिक मजहबों की ओर न झुकना। हिन्द की हिन्दुस्तानियत के लिये दोनों का समभाव था। आज भारत का दलित समाज यह महसूस करता है कि उसके साथ अपने को सवर्ण संस्कारित व वैष्णव कहने वाले लोग ही पंक्तिभेदी अत्याचार कर रहे हैं। गांधी और अंबेडकर दोनों ही हिन्दुस्तानियत के हामी थे इसलिये आज की जरूरत इन दोनों दिवंगत महापुरूषों के विचारों लेखों व्याख्यानों तथा उनके रोजमर्रा के जीवन दृष्टिकोण को उसी तरह संपादित करने की जरूरत है जिस तरह महर्षि कृष्ण द्वैपायन सत्यवती पराशरनंदन वेदव्यास ने चारों वेदों के ऋक् यजु साम अथर्व ऋचायें जो कृतयुग से ऋषि ऋत्विज श्रौत विद्या के रूप में उच्चार कर रहे थे अपने पुत्र शिष्य प्रशिष्यों को श्रौत वैदिक ऋचायें कंठाग्र कराते थे। पांच हजार वर्ष पूर्व व्यास ने उन्हें संपादित कर ऋक् यजु साम की त्रयी तथा चतुर्थ वेद अथर्व जो आयुर्वेद धनुर्वेद ज्योतिष व सामाजिकता का आयतन था उसे चौथे वेद का नाम देकर अथर्व कहा - अथर्वणाचार्य अथर्ववेद के ज्ञाता होते एक महत्वपूर्ण बात वेदों के पहले तत्व ऋग्वेद का प्रकाशन दो सौ वर्ष पूर्व विलायत के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने जर्मनभाषी वेदज्ञ मैक्समूलर के अहर्निश परिश्रम से किया। मैक्समूलर कभी भारत नहीं आये थे उन्हें वही अद्भुत दैवी संपदा प्राप्त थी जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा संत ज्ञानेश्वर को दैवोपलब्ध थी। मैक्समूलर ने संस्कृत शब्द मोक्ष के साथ मूलः को जोड़ कर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को अक्षपत्तन नाम दिया। वैदिक संस्कृत नागरी लिपि  में प्रस्तुत ऋग्वेद मोक्षमूल महानुभाव की देन है। पाश्चात्य विद्वानों को वैदिक ज्ञान के अजस्त्र स्त्रोत के प्रदर्शक जर्मनभाषी मोक्षमूलः ही थे। यूरप की दो भाषाओं रसियन जो रूस में बोली जाती है रूस को संस्कृत में ऋषि देश कहा जाता है दूसरा जर्मनी है जिसे संस्कृत में शर्मणि भी कहते हैं। जर्मनी स्वास्तिक चिह्न को मान्यता देता है। पुरानी रसन तथा पुरानी जर्मन भाषाओं में संस्कृत के 95 प्रतिशत शब्द हैं। रूस जर्मनी तथा विलायत के सैक्सन गिरजाघरों में सामवेदी विधि से बाइबिल संगीतमय लहजे में प्रार्थना होती है। आज जरूरत इस बात की है कि यह खोज की जाये कि क्या कैस्पियन सागर जिसे संस्कृत में कश्यप सागर कहा जाता है कश्यप मरीचि नंदन थे उनकी स्त्री शक्तियों में अदिति दिति और दनु मुख्य थीं। अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते थे आदित्यों का मुख्य स्थान त्रिविष्टप या तिब्बत था। दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष थे। हिरण्याक्ष का वध वाराह ने कर डाला था। हिरण्यकश्यप भारत का पहला दैत्य शास्ता था। उसकी दैत्यधानी हरिद्रोही थी हरिद्रोही को आजकल अवधी भाषा में हरदोई कहा जाता है। यह अवध के मुख्य नगर लखनऊ से करीब 48 मील दूर है। हिरण्यकश्यप का बेटा प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। जब नृसिंह ने दैत्यराज हिरण्यकश्यप को मार डाला नृसिंह ने प्रह्लाद को दैत्यराज बनाया। दैत्येश्वर प्रह्लाद ने अपने पुत्र विरोचन को राजगद्दी नहीं सौंपी। उसका विचार था कि उसके चचेरे भाई हिरण्यकश्यप के जुड़वां भाई हिरण्याक्ष के पुत्र अंधक को दैत्यराज बनाया जाये। वह वानप्रस्थी होगया हरिद्रोही का दैत्यराजेश्वर अंधक को बना गया। हिरण्यकश्यप आदित्य तथा दानव परिवार मातृप्रधान थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सृष्टि के आदिकाल में मनुष्य मातृप्रधान परिवारी था। वैमव पुरन्दरे महाशय ने वैचारिक सापेक्षता के जिस बिन्दु पर महात्मा गांधी भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर तथा हिन्दुस्तान के क्रांति मसीहा विनायक दामोदर सावरकर को Reconcile Theory का विषय बनाये जाने की वकालत की है। वहीं भारत के आदिवासियों के उन समूहों को जिन्होंने अंग्रेजी राज के पिछले दो सौ वर्षों तथा आजाद भारत के 70 वर्षों में गिरिजनों आदिवासियों की मौलिक आस्था को त्याग कर ख्रिस्ती धर्म अपना लिया है पर यूरप के ख्रिस्ती धर्मावलंबी भारत के अंत्यज सहित स्वधर्म से ईसाईयत में धर्मान्तरित समाज को वह स्थान देने से कतराते हैं जो यूरप के श्वेत नस्ल वाले यूरपियन व अमरीकी लोग ईसा मसीह को सैंट जाह्न ने पवित्र जलाभिषेक कर बपतिस्मा किया था। संभवत अंग्रेजी का बैपटिज्म शब्द संस्कृत वाङमय के जलवाप्ति शब्द से निसृत हुआ है। जिस तरह हिन्दुस्तान के वे लोग जो सनातन धर्मावलंबी हैं जल को परम पवित्र मानते हैं जाह्नवी तोयम् इसका प्रतीक है। जाह्नवी तोयम से जलाभिषेक किये जाने के समानांतर भारत के लोग - अपवित्र पवित्रो वा सर्वाबाधा हरेषुवा यः स्मरेत पुंडरीकाक्ष ... उच्चारित करते हैं। ख्रिस्ती धर्मावलंबिता में बपतिस्मा तथा अपवित्र पवित्रोवा .... उक्ति में साम्यता प्रतीत होती है। आज भारत की मूल जरूरत इस बात की है कि इस देश के बहुल मजहबी स्वरूप को करीने से अध्ययन कर मजहबों में जो मूल तत्वों की एकता है उसे उजागर करने तथा देशवासियों को उसका अनुशीलन करने मनन तथा व्यावहारिकता में तब्दील करने की जरूरत है। विचार भेद को सुलझाने का नायाब तरीका संत विनोबा भावे ने सुझाया - उनकी दृढ़ मान्यता थी कि पहले उन बिन्दुओं पर सामूहिक विचार आचार का मार्ग प्रशस्त करें जिनमें मतांतर की गुंजाइश कम से कम है मतभिन्नता को राष्ट्रीय सरोकार बनाने की जरूरत है। वैचारिक समशीतोष्णता कायम करने के लिये विभिन्न खेमों को झुकने नमने की जरूरत है। इस राष्ट्रीय आवश्यकता की संपूर्ति का प्रयत्न केवल अजातशत्रु राष्ट्रीय नेतृत्व ही कर सकता है। शासन की बागडोर येन केन प्रकारेण अपने हाथ में लाने वाला व्यक्तित्त्व इस ओर नहीं बढ़ सकता। स्वतंत्रता के 70 वर्ष अथवा 70 संवत्सर बीत गये हैं रोजाना की राजनीतिक चक्रव्यूह में प्रवेश करने तथा राजनीतिक चक्रव्यूह से सही सलामत बाहर निकलने की कला न तो वर्तमान राजनीतिज्ञ ही हृदयंगम कर पारहे हैं न सोशल मीडिया तथा हरेक घटना का दलीय राजनीति या जातीय खेमों की अपने अपने खेमों हित तथा निहित हितार्थी की राजनीतिक बारहखड़ी रटने वाले दलीय सुप्रीमो अथवा क्षत्रपों की बेफुर्सती भी एक मुख्य कारण है जो उन्हें चिंतन मनन तथा उनके राजनैतिक हित साधन का भारतीय राजनीति का व्याकरण न तो समझने का अवसर देती है न ही विरोधी खेमे के चिंतन पोखर का ही जायजा लेने देती है। इसलिये भी राजनैतिक दलों के विचारकों को अपने अपने दल एजेंडा जारी करने के साथ साथ अपने मुख्य विरोधी जो चुनाव में अखिल भारतीय अथवा एक प्रांतीय या द्वि प्रांतीय राजनीतिक दल स्वदल से आगे या पीछे हैं उनकी जमीनी हकीकतें जान कर अपना प्रवचन अथवा चिंतन धारा का समीक्षित अध्ययन करना चाहिये।
वैभव पुरन्दरे महाशय ने जातीय उपनाम या गोत्र त्याग संबंधी जो मुहिम चलाई वह नई नहीं है। आजादी संघर्ष के दर्मियान आजादी मिलने के बाद संविधान लागू के पश्चात अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के निर्धारण में अनुसूचित वर्ग की जातियों उपजातियों का उल्लेख आवश्यक था। आरक्षण प्रबंधन में जातियां उपजातियां तथा व्यवसायमूलक जातियां गिनते समय केवल आरक्षण का ही मुद्दा प्रमुख था। अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों की अखिल भारतीय गणना तब साढ़े बाईस प्रतिशत निर्धारित हुई। मंडल कमीशन ने 1931 की जातिगणनानुसार इतर पिछड़े समूहों में पूरी जनसंख्या का 54 प्रतिशत निश्चित किया। अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिये आरक्षण प्रतिशत पचास से ज्यादा न हो यह शीर्ष न्यायालय की सम्मति थी परन्तु क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों में आरक्षण के लिये कृत प्रयत्नशील रहते आरहे थे। जब जब मौका मिलता अपने समर्थकों के लिये आरक्षण कराना वे भूलते नहीं थे। भारतीय संविधान में मूलतः सेकुलरिज्म की कोई प्राविधिक व्यवस्था नहीं दी गयी थी। श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने शासनकाल में भारतीय संविधान को सेकुलर घोषित कर दिया। सेकुलर मूलतः अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक भावार्थ यूरप के ख्रिस्ती धर्मावलंबी देशों में गिरजाघर या चर्च का राजकरण पर प्रभावी न होना है याने चर्च राजप्रबंध पर दखलंदाजी नहीं कर सकता। भारत तो ख्रिस्ती धर्मावलंबी देश नहीं है इसलिये सेकुलर शब्द का प्रयोग भारतीय नजरिये से शब्द के शाब्दिक भाव - Secularism means (U) the belief that the Religion should not influence or be involved in the Organisation of the Society, Education, Government etc.। यहां सवाल उठता है कि क्या Religion मजहब तथा धर्म (कर्तव्यपरायणता) एक हैं या अलग अलग। भारत में धर्म से तात्पर्य मर्यादापूर्ण जीवन व्यतीत करना। मजहब की जब बात की जाती है मजहब से मतलब आस्था का स्वीकृत स्वरूप रिलीजन या मजहब पाश्चात्य अथवा मध्यपूर्व के दृष्टिकोण हैं। मजहब के मायने एकेश्वरवाद मजहब की एक खास पुस्तक यथा बाईबिल एवं कुरआन शरीफ तथा मजहब का एक मसीहा या पैगम्बर जिसे अंग्रेजी भाषा में Profet कहा जाता है। हिन्दुस्तान के लोगों की पारंपरिक जिजीविषा व्यक्ति के कर्तव्याधार पर निश्चित है। 
भारत में संविद शब्द की विशेष महत्ता इसलिये है कि जब महाविष्णु को महसूस हुआ कि अदिति के पुत्रों इंद्रादि को अमृत पिलाना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भृगुनंदन उशना मृतसंजीवनी विद्या से दैत्य दानवों (अदिति के बहनें दिति के पुत्र दैत्य व दनु के पुत्र दानव) को युद्ध में मारे जाने के पश्चात पुनर्जीवित कर लेते थे। मार्कण्डेय ने इस प्रकरण को रक्तबीज के रूप में पौराणिक कथ्य बनाया। दैत्य दानवों की अद्वितीय सामर्थ्य से आदित्य त्रस्त थे। उनके संत्रास निवारण का सटीक उपाय महाविष्णु ने क्षीरसागर मंथन के उपक्रम के लिये आदित्यों के अग्रणी इंद्र या शक्र नाम से मधोना को सुझाया और यह भी कहा कि क्षीरसागर मंथन तथा अमृत उत्पादन के लिये वह दैत्यराज बलि से परामर्श करें यदि दैत्यराज बलि समुद्र मंथन के लिये तैयार हो जाते हैं तो आदित्य व दैत्य दानवों का यह संविद धरती में नई जाग्रति ला सकता है। इंद्र अपने शत्रु बलि से परामर्श करने गये। बलि की यशोगाथा इंद्र से कहीं ऊँची थी। बलि सत्यवादी था, बलि पर उसके पिता विरोचन नहीं अपितु उसके दादा प्रह््लाद की विष्णु भक्ति का असर था। बलि ने इंद्र से क्षीरसागर मंथन अमृतोत्पादन उपक्रम की सहमति दे दी। दो दुश्मन मिल गये तथा उन्होंने एक नया उपक्रम आरंभ किया। समुद्र मंथन या क्षीरसागर मंथन का मूल उद्देश्य अमृतोत्पादन था पर इस उपक्रम से तेरह अन्य रत्न भी निकले। क्षीरसागर मंथन से निकले अन्य रत्न - श्री रंभा विष वारूणी अमिय शंख गजराज धनु धन्वंतरि धेनु तरू चंद्रमणि अरू वाजि थे। सबसे दुःखद प्रसंग विष का था। महाविष्णु सहित सभी लोग विष से डर रहे थे। देवाधिदेव महादेव ने कहा - पार्वती विष कषाय से सृष्टि पीड़ित है इसलिये मैं इसे पी जाता हूँ। देवाधिदेव ने विषपान कर लिया किन्तु उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। विष के प्रभाव से केवल कंठ नीला होगया जिससे वे नीलकंठ भी कहलाये। महादेव का विषपान सृष्टि के लिये वरदान था। क्षीरसागर से संबंधित जो और उपाख्यान हैं उन पर यहां चर्चा करना अप्रासंगिक है। प्रासंगिक बिन्दु यह है कि वैरी से भी संविद कर महान उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है। इंद्र और बलि के बीच जो संविद हुआ वह आज के राजनैतिक क्षत्रपों के लिये एक अद्वितीय उदाहरण है। उन्हें परस्पर वैर करने के बजाय वार्ता का रास्ता निकालना होगा। संत विनोबा ने जो रास्ता समस्या निदान हेतु सुझाया उसका वरण करना होगा। जब चुनाव युद्ध करना हो - युद्धस्व विगतः ज्वरः खूब लड़ो पर चुनाव होने के बाद विस्मृति का अपनाओ भूल जाओ कि अपने चुनाव युद्ध में कैसे कैसे वाग्बाणों से अपने शत्रु पर विरोधी को घायल किया। भारत के राजनैतिक दलों की लंबी कतार है। कुछ दल स्थायी क्षत्रप या सुप्रीमो किस्म के हैं कुछ दल राजनीतिक दलीय अधिष्ठान को एक व्यक्ति की जागीर नहीं बनने देते। उनके अध्यक्ष दो या तीन साल से ज्यादा पदधारक नहीं रहते। इसलिये आज की जरूरत यह है कि जिन राजनैतिक दलों ने दस फीसदी से ज्यादा मतदाताओं का समर्थन पाया है उनमें एक संविद हो जिसमें वे राष्ट्रीय महत्व अथवा क्षेत्रीय महत्व एवं उनके सामाजिक आध्यात्मिक तथा व्यापक मानव हितकारी राजनीति दर्शन के जो दिव्य पुंज हैं उनकी जीवनियां संबंधित व्यक्ति की मातृभाषा में राजनीतिक दल द्वारा प्रकाशित की जायें। संबंधित राजनीतिक दल द्वारा प्रस्तुत नेतृत्व जीवन चरित उनकी चिंतन शैली उनके द्वारा संपन्न बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के उपक्रम का किसी अन्य व्यक्तित्त्व की अस्तुति निन्दा किये बगैर प्रकाशित हो। संबंधित लोकभाषा में प्रकाशित जीवन चरित को संपादित करने के लिये उस भाषा के प्रयोक्ता इतर राजनीतिक दल के अनुयायी अथवा पक्षधर भी हो सकते हैं। सुसंपादित जीवन चरित अंग्रेजी सहित भारत की 22 भाषा अनुसूची में दर्ज भाषाओं में उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्त्व केन्द्र सरकार का भाषा या संस्कृति विभाग वहन करे। पहल उन भाषाओं की हो जो एक या एक से ज्यादा घटक राज्यों की संविधान सम्मत राजभाषायें हैं। इस प्रकार के राजनीतिक दलों के एक दूसरे के साथ संबंध स्थापित होने से राजनीतिक सहिष्णुता केे साथ क्षत्रप राजनीति की चिंतन शैली में जो नूतनता है उसे दूसरे राजनीतिक दलों को हृदयंगम करने का सुअवसर प्राप्त होगा तथा नयी पीढ़ी को देश के राजनीतिक चिंतकों के बारे में अधिकृत तथा लोकसम्मत विवेचन से ज्ञान लाभ होगा। यहां फिर साने गुरू जी की आंतर भारती की प्रमुखता भारतीय राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्र राज्य को वैचारिक क्षेत्र में राजनैतिक संबल देगी इसलिये Reconcile Gandhi, Ambedakar तथा Savarkar के साथ साथ हर भारतीय भाषा में राजनीतिक सूझबूझ का नया स्तूप खड़ा हो सके। समाज सेवा सहित ऐसे निस्वार्थ समाज सेवी लोकोपकार ही अपना जीवन लक्ष्य मानने वाले फकीरों संतों महात्माओं साहित्यकारों नाट्यकारों संगीतकारों भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी सरीखे लोगों चाहे वे कोई भाषा बोलते हों किसी मजहब को मानते हों उनका जीवन चरित भारत के भावी कर्णधार भी पढ़ सकें प्रेरणा ले सकें पर आप विचार करें।
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