Tuesday, 6 September 2016

परिवर्तिनि पृथिव्यायाम को मृतको वा न जायते
सः जातो येन जातानि यान्ति विश्व समुन्नितम् 
पीटर थामसन कैटलिस्ट - दुनियां में अनुकूल बदलाव लाने वाला विश्व नेतृत्व ?
रोमन लिपि के 26 अक्षरों की छठी सीढ़ी में एक अल्फाबेट ऐफ F है। इस अक्षर से शुरू होने वाले राष्ट्र राज्यों में फिजी, फिनलैंड, फ्रांस तीन देश युनाइटेड नेशन्स आर्गनाइजेशन से जुड़े हैं। युनाइटेड नेशन्स जनरल असेम्बली के नव निर्वाचित अध्यक्ष पीटर थामसन ने कहा - I am aware of India’s frustration. वे फिजी प्रशांत महासागर में न्यूजीलैंड से 1750 किलोमीटर उत्तर में 332 द्वीप समूहों वाला ऐसा राष्ट्र राज्य है जिसमें 14 प्रांत एक इलाका या द्वीप फिजी द्वीप समूहों पर निर्भर है अथवा आश्रित है। फिजी के सभी द्वीपों का क्षेत्रफल 18,376 वर्ग किलोमीटर समुद्र सीमा लाइन 1,129 किलोमीटर व जनसंख्या 8,39,178 है। द्वीप समूहों की राजधानी सुवा तथा बड़े शहरों में लाउरोका, नाडी हैं। अंग्रेजी, फिजियन व हिन्दी भाषायें बोली जाती हैं। 64.53 प्रतिशत ख्रिस्ती धर्मी, 27.09 प्रतिशत हिन्दू, 6.3 प्रतिशत मुस्लिम धर्मावलंबी हैं। साक्षरता 93.7 प्रतिशत औसत आयु 69 वर्ष प्रति व्यक्ति आय 7898 डालर 10 अक्टूबर 1970 को फिजी स्वतंत्र हुआ। फिजी के विकास में हिन्दुस्तान के गिरमिटिया मजदूरों की महती भूमिका है। मनोरमा ईयर बुक के अनुसार गिरमिटिया मजदूरों के वंशधर आज फिजी द्वीप समूहों में आधी से ज्यादा आबादी वाले लोग हैं। इन द्वीप समूहों के मूल निवासी जनसंख्या मात्र 43 प्रतिशत है शेष सात प्रतिशत यूरप व चीनी मूल के लोग हैं। महाशय पीटर थामसन व भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने दिल्ली आये थे भारत के प्रधानमंत्री से मिल कर अत्यंत उत्साहित हुए। उन्होंने दिल्ली में सुहासिनी हैदर को साक्षात्कार दिया। पत्रकार सुहासिनी हैदर के द्वारा प्रस्तुत नौ मुद्दों पर महाशय पीटर थामसन ने छिन्नसंशय विश्व संगठन के नये सदर के रूप में जो मत व्यक्त किया उसका भारत तथा भारत की जनता से गहरा ताल्लुक है। महाशय थामसन विश्व के 199 राष्ट्र राज्यों में से 193 राष्ट्र राज्य जो राष्ट्र संघ यू एन ओ के सदस्य हैं, एक ऐसे राष्ट्र राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो द्वीप समूह में रहने वाले लोगों का कुनबा है। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। उन्होंने सुहासिनी हैदर के सवाल सुना सवाल था राष्ट्र संघ जनरल असेंबली के सत्तरवें सत्र में नव निर्वाचित अध्यक्ष जिन्होंने पहली सितंबर 2016 को अध्यक्ष के आसन में बैठने का उपक्रम कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राष्ट्र संघ से जो वाजिब अपेक्षायें हैं उनके बारे में सवाल किये थे। महाशय पीटर थामसन ने बताया - उनका उद्देश्य ही संयुक्त राष्ट्र सामान्य असेंबली के प्रधान पद की उम्मीदवारी ही सोद्देश्य टिकाऊ विकास के ज्वलंत मुद्दे थे। आतंकवाद से जुड़े समग्र मुद्दों पर नवनिर्वाचित अध्यक्ष महाशय पीटर थामसन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से विचार विमर्श किया। उनकी भावनाओं विशेष तौर पर भारत जैसी आतंकी समस्याओं से जूझ रहा है, विविध प्रकार की उलझनों में जकड़ा हुआ है उन बिन्दुओं को महाशय पीटर थामसन ने मुस्तैदी के साथ राष्ट्र संघ की सत्तरवीं महासभा में भारत की उलझनों की गांठों के किस तरह सुलझाया जा सकता है सारे मसलों पर बातचीत कर अपना मानस बना लिया कि उन्हें आगामी सत्र में ठोस कदम उठाने हैं। हिन्दुस्तान लक्षित टिकाऊ विकास की स्थिरता तथा आतंकी गतिविधियों के जो अंतर्राष्ट्रीय जुगाड़ हैं उन्हें संपादित करने की अनेकानेक सर्वसम्मत प्रविधियों को चिह्नित करना भी संयुक्त राष्ट्र संघ जनरल असेंबली के नव निर्वाचित अध्यक्ष का सर्वोच्च उद्देश्य है। 
  सुहासिनी हैदर ने महाशय पीटर थामसन से दूसरा सवाल किया वह था - Sense of Frustraition खीझ और झुंझलाहट को नेस्तनाबूद करने का कारगर तरीका संयुक्त राष्ट्र संघ सेक्युरिटी काउंसिल जिसके सदर महाशय पीटर थामसन हैं उनमें सुधार संशोधन प्रक्रिया अपनाना। महाशय थामसन ने प्रश्नकारी सुहासिनी हैदर को कहा - प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें सेक्युरिटी काउंसिल में सुधार की आवश्यकता जताई पर वह कल्पना साकार नहीं हो पायी। भारत को राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में दुनियां में आबादी और लोकतांत्रिक व्यवस्था होने तथा विश्व जनसंख्या के नजरिये से दूसरा बड़ा राष्ट्र राज्य जनसंख्या के मामले में चीन के बाद दूसरा राष्ट्र तथा पिछले सत्तर वर्ष से कारगर डेमोक्रेसी वाला विश्व रंगमंच का दूसरा देश पहला संयुक्त राज्य अमरीका है हिन्द को उसका वाजिब विश्व मानवीय राष्ट्र संघीय हक हकूक अभी तक प्रतीक्षारत हैं। संयुक्त राष्ट्र में जो घेराबंदी है उससे बाहर निकलने के कौन से मार्ग हैं। सुहासिनी हैदर का यह दूसरा सवाल की संन्नियुक्ति पर महाशय पीटर थामसन ने सुहासिनी हैदर को कहा - संयुक्त राष्ट्र संघ के किसी सदस्य राष्ट्र ने सुधारों का विरोध करने का कोई प्रसंग मेरी जानकारी में नहीं है उन्होंने यह भी कहा कि मैंने सुधार विरोधी कोई ध्वनि सुनी। सवाल केवल इतना है कि किस प्रकार के सुधार अपेक्षित हैं ? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा असेंबली की भावी आकृति क्या होगी ? मेरा काम तो अंतर्राष्ट्रीय वैचारिक आदान प्रदान के लिये सटीक अधिष्ठान जिसे महाशय थामसन ने Chair कहा तथा किसी विश्व नागरिक अथवा विश्व नागरिक मंच सृजित करना है। इस विश्व संगठन के सभी 193 सदस्य राष्ट्र राज्यों का प्रतिनिधित्व उस निर्णायक मंडल में हो। यह याद रखिये कि विश्व अधिष्ठान परिचर्चा मंडल में सहमति सूत्र पकड़ना होगा। महाशय पीटर थामसन जिस आम सहमति की बात कर रहे हैं अगर हम महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे जी की शैली पर भी गौर करें - विनोबा कहते थे पहले उन मुद्दों पर विचार विमर्श कीजिये जहां मतभेद की गुंजाइश रत्ती भर भी नहीं है। ऐसा लगता है महाशय पीटर थामसन ने संत विनोबा सरोकार शैली आत्मसात कर ली है। महाश्य पीटर थामसन ने सुहासिनी हैदर से कहा - विश्व अधिष्ठान यू एन ओ में जनरल असेंबली के सदर होने के नाते मेरी भूमिका परिवर्तनशील संसार में अपेक्षित बदलाव का आगाज करने की है। अंग्रेजी भाषा में उन्होंने कैटलिस्ट शब्द का प्रयोग किया। आम सहमति का मार्ग प्रशस्त करने की नेतृत्व कला। सुधारों का विरोध करने वाले राष्ट्र राज्यों के प्रतिनिधियों को सहमति के चबूतरे पर इकट्ठा करने के लिये आम सहमति का मार्ग चुनने वाले इटली सरीखे विचार-क्रीड़ा में माहिर देशों के प्रतिनिधियों का आह्वान करना होगा तथा हिन्दुस्तान जिसे पश्चिमी दुनियां तथा अंग्रेजी के जरिये समझबूझ कायम करने वाले लोग जी 4 साइड आवेदकों का ग्रुप जिनमें हिन्दुस्तान, जापान, जर्मनी, ब्राजील पी पांच यू.एन.एस.सी. के स्थायी सदस्य एवं अफ्रीकी राष्ट्र राज्य समूहों के बीच सटीक कारगर संवाद की आवश्यकता है। सुहासिनी हैदर ने महाशय पीटर थामसन से तीसरा सवाल किया - क्या जी-चार में जुड़ना हिन्दुस्तान के लिये त्रुटि मार्ग तो नहीं है ? क्योंकि इन चार राष्ट्र राज्यों हिन्द जापान जर्मनी ब्राजील का विरोध स्वर अपेक्ष तथा ज्यादा उग्र होगा और उनमें से किसी एक राष्ट्र राज्य के विरोध से ज्यादा तीखापन लिये रहेगा इसलिये क्या हिन्द इकला चलो वाला कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर का रास्ता पकड़ना होगा ? सुहासिनी हैदर के इस तीखे सवाल के जवाब में जनाब पीटर थामसन ने कहा - संयुक्त राष्ट्र में सदस्य राष्ट्र राज्यों की प्रकृति ही सौदेबाजी का धंधा है जिससे सदस्य देश धड़ेबाजी में घिर जाते हैं। उदाहरण 77 धड़ेबाजी से अछूते देशों का नया धड़ा यह तो राष्ट्र संघ राजनीतिक चालबाजी है। वास्तविकता तो यह कि क्या आप किसी धड़े से जुड़़े हैं ? सुधार के यह मतलब तो नहीं कि आपने अंगद का पांव खड़ा रखने की हैसियत अपनायी हैै या नहीं ? दूसरे धड़े में आपकी कदमताल कहां है ? महाशय थामसन ने जो आगे कहा - वह हिन्दुस्तानी दर्शन शास्त्र में वादे वादे जायते तथ्व बोधः कहा जाता है। बहस की निरंतरता नया गुल खिलाने की पूरी क्षमता रखती है। हिन्दुस्तानी कहावत यहां चरितार्थ होरही हैै.... नहले पर दहला। महाशय थामसन ने सुहासिनी हैदर को कहा - एक धड़े से दूसरे धड़ेे में दस्तक यदा कदा आम सहमति का फाटक खोल देती है। ऐसे हालात में आप उसी धड़े में बने भी रह सकते हैं। हिन्दुस्तानी सोच में ऐसी कूटनीति को आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति कहा जाता है जिसकी व्याख्या महाभारत के शांतिपर्व तथा भीष्मपर्व के कृष्णार्जुन संवाद एवं त्रेतायुग में राम के सवाल तथा वशिष्ठ के जवाब - योगवाशिष्ठ कहलाता है। जिस विश्व कूटनीति का उल्लेख पीटर थामसन महाशय कर रहे हैं वह कूटनीतिक महापर्व है। सुहासिनी हैदर ने चौथे कदम का चौखंभा सवाल महाशय पीटर थामसन से किया। थामसन दिल्ली आने से पहले पेइचिंग भी पहुंचे थे। चीन के बारे में सुहासिनी हैदर का सवाल था कि चीन व्यापक सुधारों का पक्षधर नहीं है। लगता है जी 4 वाले देश जिन सुधारों के बारे में मनन चिंतन करते हैं चीन के लिये वे परिवर्तन अस्वीकार्य तरीके वाले हैं। नवीन राष्ट्र संघ की रीति नीति के बारे में क्या धारणा रखता है ? महाशय थामसन से क्या चीन के राष्ट्र नेताओं ने खुले दिल दिमाग से वार्ता की ? चीन राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्यों में से है उसे जो बात अनुकूल नहीं आती उसे निषेधाधिकार या वीटो का उपयोग करने से नहीं हिचकता। सुहासिनी हैदर के द्वारा उठाये गये चौथे कदम के सवालों का देते हुए महाशय पीटर थामसन ने सुहासिनी से कहा - चीन और हिन्द आने का कारण यह है कि चीन आबादी के नजरिये से दुनियां का सबसे बड़ा राष्ट्र राज्य है दूसरे नंबर पर हिन्दुस्तान आता है। वे आगे फरमाते हैं - मैंने जो वर्गीकरण किया है फिजी को एशिया पैसिफिक ग्रुप ने आगे बढ़ाया साथ ही सुरक्षा परिषद में आम राय कायम करने के लिये यदा कदा द्रविड़ प्राणायाम भी करना पड़ सकता है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि मैं धूर्तता के स्तर पर पहुंच कर भी सत्य अहिंसा सहित अपने एकादश व्रतों को संपन्न करने का राही हूँ। महाशय पीटर थामसन का मानना है कि धूर्तता का आंशिक उपयोग सत्ताधिष्ठान संतुलन में सहायक हो सकता है। चीन और हिन्द दोनों फिजी के अपेक्षाकृत नजदीकी विशालकाय राष्ट्र राज्य होने के समानांतर जहां हिन्द की धार्मिक तथा भाषायी नजदीकी भी फिजी के लिये महत्वपूर्ण है मजहब के नजरिये से फिजी में 64 प्रतिशत ख्रिस्ती धर्मावलंबी व हिन्दू धर्मावलंबी 27.09 प्रतिशत हैं। भारत मूल के फिजी भाषी पचास फीसदी हैं इसलिये फिजी का सामाजिक व सांस्कृतिक सरोकार हिन्दू प्रभावित है। राष्ट्र संघ सहित जितने भी वैश्विक चिंतक हैं उनमें हिन्द और चीन एक दूसरे से भिन्न रूचि वाले देश हैं जिससे कभी कभी लगता है कि राष्ट्र संघ में सहमति के लिये विभिन्न धड़ों की गुंजाइश व गुजारिश अलग अलग होने के कारण चीन और भारत एक दूसरे के भीषण राजनीतिक प्रतिद्वंदिता से भी पीड़ित हैं। 
  पांचवीं सीढ़़ी में सुहासिनी हैदर ने राष्ट्र संघ महासभा के नवनिर्वाचित सदर जिन्होंने 1 सितंबर 2016 के दिन यू.एन.ओ. में अपनी उपस्थिति की दस्तक दी जिससे पहले वे एशिया के 2 राष्ट्र राज्य चीन व हिन्द की राजधानियों में जाकर इन दोनों देशों के राष्ट्रीय नेतृत्व से मिल चुके थे। प्रश्नकर्त्री महिला ने फिर पूछा - सुधार कब तक संपन्न हो क्या कोई निर्णायक तिथि घोषित हुई है। पीटर थामसन महाशय ने कहा - हम सभी सुधारों के पक्षधर हैं। जब कभी इस बिन्दु पर विचार विमर्श होता है कि रिफार्म की निर्णायक तिथि का निर्धारण कब और कैसे हो रिफार्म प्रक्रिया का भी जायजा लिया जाये। अपेक्षित सुधारों पर जब विलंब के बादल छा जाते हैं थामसन व्यक्त करते हैं - जो चीन के पूर्व प्रधानमंत्री चाऊ ऐन लाई ने हेनरी किसिंजर के सवाल के जवाब में फ्रांसीसी क्रांति के संबंध में उस क्रांति के विफल होने का प्रसंग कहा था जिसे चाऊ ऐन लाई के उल्था करने वाले ने गलत बात बोल दी इसी को वाणी की वाग्दग्धता कहते हैं। ऐसे मामलों में राजनीतिज्ञ का छिन्नसंशय होना आवश्यक है। थामसन ने सुहासिनी को कहा - संशयग्रस्त वाक्य विष को विद्रूप कर देता है संशय निवारण पहली जरूरत है। थामसन ने कहा महत्वपूर्ण बात यह है कि महत्ताशील समस्या का समाधान किया जाये। 
  सुहासिनी हैदर सवालों की छठी सीढ़ी में खड़ी होकर राष्ट्र संघ जनरल असेंबली के नवनिर्वाचित अध्यक्ष पीटर थामसन से पूछ रही हैं - उन्हें लगता है कि हिन्दुस्तान के हाथ विश्व राष्ट्र संघ से निराशा का ही वातावरण बना है। सी सी आई टी से भारत 1996 से त्रस्त है। इस प्रसंग में पीटर थामसन महाशय ने कहा - वस्तुतः हम (संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की सेक्युरिटी काउंसिल) यह प्रयास करेगी कि सी सी आई टी प्रक्रिया संपूर्ति के लिये सक्रिय कार्यवाही का श्रीगणेश शीघ्र किया जा सके। उन्हांेने यह भी बताया कि वे भारत के प्रधानमंत्री को आश्वस्त कर चुके हैं। आतंकवाद को धरती से ही मिटाना होगा। जनरल असेम्बली अध्यक्ष होने के नाते जो वे कर सकेंगे उसे पूर्त करेंगे। 
  सी सी आई टी का जहां तक सवाल है उसके लंबा खिंचने वाला प्रसंग तो मात्र एक नमूना उदाहरण है। सुहासिनी हैदर ने महाशय पीटर थामसन का ध्यानाकर्षण एक बड़े व्यापक दैत्याकार प्रकरण की ओर आकर्षित कर पूछा - क्या राष्ट्र संघ की उपादेयता लुप्त तो नहीं होरही ? पीटर थामसन यू एन जनरल असेंबली के नवनिर्वाचित अध्यक्ष हैं। राष्ट्र संघ क्या अर्थहीन होगया ? आने वाले युग के लिये उसकी उपादेयता तथा प्रासंगिकता लोप तो नहीं होगयी ? महाशय पीटर थामसन ने इस प्रश्न को गंभीरता से लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ का क्या विकल्प है ? तकनालाजी ने आज समूची पृथ्वी को एक गांव सा बना डाला है प्रकृति में सर्वत्र तकनालाजी पहुंच चुकी है। आलोच्य विषय पर साफ साफ बात हो। मानवता को यह सोचना ही होगा कि क्या राष्ट्र संघ का कोई विकल्प भी है ? क्या राष्ट्र संघ के वैचारिक आचार को तिलांजलि देने से धरती में जो घटेगा वह प्रलयकारी भी हो सकता है। राष्ट्र वाद व मानव वाद में जब घटाटोप होगा पड़ोसियों में दुश्मनी उसी तरह बढ़ेगी जिस तरह भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान के निर्माण के बाद हिन्दू मुस्लिम कटुता ने हिन्दुस्तान पाकिस्तान कटुता का स्वरूप ले लिया। आज के दिन हिन्द में इन्डोनेशिया के पश्चात दुनियां के हर किसी देश से ज्यादा मुसलमान रहते हैं। भारत विभाजन की पीड़ा ने पहले पश्चिमी व पूर्वी पाकिस्तान सृजित किया पूर्वी पाक के बांग्लाभाषी मुसलमान भारत विभाजन के चौबीस वर्ष पश्चात ही बंगला देश में तब्दील होगये। भाषा ने मजहब को गर्त में ढकेल डाला। बंगला देश में भी मजहबी कट्टरता ने पांव फैलाने शुरू किये। आज विशाल भारत जिसमें किसी काल खंड में भारत वर्मा लंका एक देश माने जाते थे वहां भारत व उसके पड़ोसी देशों की संख्या नैपाल व भूटान सहित सात राष्ट्र राज्य हैं ये सभी सांस्कृतिक भारत के अंग हैं। दक्षिण एशियाई इन देशों में सार्क नामक सामूहिकता संवर्धित भी हुई है। उसके बावजूद उग्रवाद, आतंकवाद का संवर्धन भी निरंतर चालू है। आतंकवाद से भारत का जम्मू कश्मीर राज्य सर्वाधिक संत्रस्त है। यह संत्रास दूर करने के लिये ही महाशय पीटर थामसन भारत के प्रधानमंत्री से वार्तालाप करने हिन्द की देहली पहुंचे। टिकाऊ विकास के घड़े ऐसा सरोकार था जिससे हिंसा के बढ़ते व्यापार को रोका जा सकता था तथा सापेक्ष विचार विमर्श द्वारा उग्रवाद तथा आतंकपूर्ण आतताइयों को शांति के रास्ते लाने का उपक्रम संकल्पित था परंतु द्वेष की ज्वाला में झुलस रहे पाकिस्तान की लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकार और पाकिस्तान सैन्यशक्ति का लक्ष्य कश्मीर की वादियों को हिन्दुस्तान से छिन्न भिन्न करना था। पाकिस्तान की सेना व वहां के प्रधानमंत्री जनाब नवाज शरीफ को केवल कश्मीर की वादियां ही नजर आती थीं। कराची शहर के हिन्द से पाकिस्तान गये उर्दू भाषियों सिन्धी भाषियों तथा बलूचों पर जो राजनीतिक अत्याचार किये जारहे थे वे उस ओर सोचने को भी तैयार न थे। महाशय पीटर थामसन यू. एन. जनरल असंेबली के अध्यक्ष के नाते हिन्द की उलझनों को समझ चुके हैं व साथ ही समाधान का रास्ता भी खोज रहे हैं। चूंकि विश्व राष्ट्र संघ के निर्णय तत्काल नहीं थोपे जा सकते इसके लिये राष्ट्र राज्यों के एक दूसरे के साथ समझबूझ का रास्ता ही अपनाना होगा, ताली दोनों हाथों से बजती है। पीटर थामसन महाशय को मध्यम मार्ग अपनाये जाने की पूरी पूरी आशा है। सुहासिनी हैदर की प्रश्नावली की आठवीं सीढ़ी पर उन्होंने कश्मीर के प्रसंग को उठाया है। सुहासिनी हैदर का सवाल है कि पाकिस्तान कश्मीर घाटी की अशांत स्थिति के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ सहित विश्व के समर्थ राष्ट्रों के संज्ञान में कश्मीर घाटी  के सरोकारों को उत्तेजित कर रहा है विशेष दूतों को भी अपना पक्ष स्पष्ट करने यत्र तत्र भेज रहा है। सुहासिनी हैदर को संदेह है कि पाकिस्तान की इन करतूतों से कही राष्ट्र संघ में पाक समर्थक राष्ट्र संघ के सदस्य देश आगामी संयुक्त राष्ट्र संघ जनरल असेंबली के सत्र को अर्थहीन व निरूपाय न बना दें। प्रश्नकर्ता के इस सवाल पर महाशय पीटर थामसन का मत है - नहीं मैं ऐसा नहीं सोचता। राष्ट्र संघ के सदस्य देशों के राजप्रमुख तथा राष्ट्र संघ में सदस्य राष्ट्रों के प्रतिनिधि डेलीगेट्स का यह अधिकार है कि जो वो विश्व हित में समझते हैं उस पर निर्णायक पथ पर अग्रसर करें। उन्होंने यह भी इंगित किया कि दिल्ली में उनकी जो वार्तायें भारतीय नेतृत्व से हुईं ऐसी किसी शंकित संभावना पर चर्चा नहीं हुई। बलूचिस्तान में जो मानवाधिकार हनन होरहे हैं क्या उस संदर्भ में दिल्ली में आपसे भारतीय नेतृत्व ने कोई चर्चा की ? महाशय पीटर थामसन ने प्रश्नकर्ता को बताया कि ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई। पीटर थामसन महोदय ने जिन सवालों का जवाब दिया उसमें पाक के जबरन कब्जे वाले कश्मीर गिलगित तथा बाल्टिस्तान के अलावा बलूचिस्तान के लोगों का जन संघर्ष तथा बलूच आकांक्षाओं को खुली राजनीतिक बहस का केन्द्र बिन्दु घोषित कर दिया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले सितंबर 2016 के अंक में कलात के खान सुलेमान दाऊद जान अहमद आदि ने अपने यूनाइटेड किंगडम के कार्डिफ को कहा - पाकिस्तानी पंजाब और चीन अगर अपनी करतूतों में सफल हो जाता है तो बलूच लोगों की संख्या कम हो जायेगी। कलात के खान का कहना है कि बलूचों का पतन हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा नुकसान है। कलात खान का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र अमरीका की मदद से बलूच लोग पाकिस्तान को उसका सही विकल्प बना सकते हैं। यदि चीन पाकिस्तान व्यापार गली बनाने में सफल होगया बलूचों की स्वतंत्रता आकांक्षा पर वज्रपात हो जायेगा। वे कहते हैं भारत के प्रधानमंत्री का बहादुरी भरा उपक्रम बलूचिस्तान का भाग्योदय कर सकता है। जरूरत इस बात की लगती है कि भारत सरकार का विदेश मंत्रालय डाक्टर अब्दुल गफ्फार खां तथा सीमांत गांधी ने भारत की आजादी के संग्राम में जो शिरकत की भारत ने खान अब्दुल गफ्फार खां को भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया। बलूचिस्तान को पाकिस्तान के चंगुल से निकालने का प्रयास भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा उसी तरह किया जाये जिस तरह श्रीमती इंदिरा गांधी ने बंगला देश को एक स्वतंत्र देश के राज्य में खड़ा किया। बलूच और सिंध के लोग अगर पंजाबी मुसलमानों के आधिपत्य वाले पाक का असली चेहरा उजागर कर भारत के विभाजन का अंग्रेजी राज का कृत्य भारत विभाजन के 75 वर्ष में निर्मूल भी हो सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि कलात के खान सहित जो बलूच विदेशों में हैं यदि वहां की सरकारें उन्हें स्वतंत्र बलूचिस्तान की विदेश सरकार का दर्जा स्वीकार कर बलूचिस्तान की आजादी को पंख लगायें तो पाकिस्तान केवल पंजाब तक सीमित रह सकता है। भारत का शिवसंकल्प तथा भारत भूमि की विशिष्टता में यूरप और मध्यपूर्व की दो सभ्यतायें - रोमन सभ्यता जिसका तंतुवात ग्रीक सभ्यता से जुड़ा हुआ है तथा मध्यपूर्व में जन्मे दो सेमेटिक मजहब यहूदी मजहब तथा इस्लामी मजहब के समानांतर तीसरा सेमेटिक महजब ख्रिस्ती मजहब है। मजहब के बजाय वाणी या बोलचाल अथवा भाषा जिसे अंग्रेजी में लैंग्वेज कहते हैं यूरप राष्ट्रवादिता के मूल में मजहब न होकर वाणी है। जर्मनी, रूस, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, इटली भाषायी राष्ट्र हैं। यदि हम कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण में व्याख्यायित और्वोपदिष्ट मार्ग, और्वोपदिष्ट योग तथा और्वोपाख्यान का विश्लेषण समझने का प्रयत्न करें तो यह साफ हो जाता है कि मजहब राष्ट्र निर्माण का हेतु नहीं है इसलिये कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना संकल्पित हिन्दू मुसलमान एक कौम या राष्ट्र नहीं वो अलग अलग कौमें हैं। भारत विभाजन के 70 वर्ष पश्चात द्विराष्ट्रवाद की रस्सी के जलने के बाद भी उसकी ऐंठन बरकरार है। भारत का नूतन नेतृत्व टिकाऊ विकास धारणा से राष्ट्र संघ के नये अध्यक्ष का सहारा पाकर भारत के आतंकवाद पर अंकुश लगा सकता है। 
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