सचिव वैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलिंहि भय आस राजधर्म तन तीनि कर होई बेगिहिं नास।
रामचरित मानस सुन्दरकाण्ड का सैंतीसवाँ दोहा।
चिंतन पोखर करण थापर ने अपना आत्मभाव मुखरित करते हुए कहा - दलित संदर्भ में क्या हम हिन्दुस्तानी ढोंगी तो नहीं ? पार्लमेंट में जो बहस दलितों से होरहे दुर्व्यवहार पर हुई उसकी प्रतिक्रिया करण थापर महाशय ने अपनी आत्माभिव्यक्ति में कहा - क्या हम सभी पाखंडी अथवा ढोंगी राष्ट्र हैं ? इस अभिव्यक्ति की कुलबुलाहट को उनकी आलोचना करने वाले महाजनों ने करण थापर महाशय की राय को अतिशयोक्ति कहा। करण थापर अपनी वैचारिक ईमानदारी के प्रतीक हैं। वैचारिक ईमानदारी में करण थापर अभिव्यक्त करते हैं लोकसभा में 543 सदस्य हैं पर जब दलित उत्पीड़न पर बहस होरही थी डिप्टी स्पीकर सहित केवल 69 सदस्य ही सदन में हाजिर थे। अ.भा. कांग्रेस के 44 सदस्यों में से केवल 8 सांसद ही उपस्थित थे। शासक दल एनडीए के 76 मंत्री महानुभावों में केवल 6 मंत्री सदन में हाजिर थे। करण थापर लिखते हैं राहुल गांधी कोंग्रेस उपाध्यक्ष तथा सदन के नेता प्रधानमंत्री भी बहस के दौरान सदन में नहीं थे। दलित चिंतन पोखर के जुझारू सांसद उदित राज ने लोकसभा में वक्तव्य दिया कि दलितों पर ज्यादतियों तथा सांघातिक प्रहारों की जब लोकसभा में बहस हुई बहस में भाग लेने वाले तीन चौथाई वक्ता दलित या गिरिजन थे। थापर की मान्यता है कि जिस तरह संयुक्त राज्य अमरीका में श्वेत राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा मिटाई उसे नेस्तनाबूद करने के लिये आत्मबलिदान भी किया। अब्राहम लिंकन की दास प्रथा समाप्ति मुहिम ने विलियम विल्हम फोर्ट सरीखे श्वेत दास प्रथा समाप्ति चाहने वाले महानुभावों ने अब्राहम लिंकन का साथ दिया। अब्राहम लिंकन अपने राष्ट्रपतित्व को नस्लवादी दृष्टिकोण से मुक्त कर दास प्रथा समाप्ति में जो रास्ता अपनाया वैसे ही भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को दलित संत्रास के रोकने तथा हिन्दुस्तानी सनातन परंपराओं की दुहाई देने वाले वैष्णवों शैवों शाक्तों सहित अद्वैत द्वैत द्वैताद्वैत तथा विशिष्टा द्वैत परंपरराओं की मान्यता रखने वाले भारत के तमाम संप्रदाय जिनमें नानक पंथी दादू पंथी गोरख पंथी रैदास पंथी तथा देश के तमाम नाथों गिरिओं गोस्वामियों पुरियों सरस्वतियों उदासीन अखाड़ों सहित सभी सन्यास मार्गियों को भी एक मार्मिक अपील कर दलित उत्पीड़न रोकने के तरीकों पर विचार विमर्श करना चाहिये। दलितों तथा आदिवासियों के अनेकों संप्रदायों में आस्था के महत्वपूर्ण सूत्र विद्यमान हैं। उनकी परंपराओं तथा शिल्पों व कर्म शैलियों को अंग्रेजी के जरिये समझना हिमालय से टकराने जैसा है इसलिये साने गुरू जी ने जो रास्ता भारत के लोगों को आंतर भारती के मार्ग का सुझाया है, देश में जो भाषायें और लिपियां अब भी जीवित हैं तथा भारती सरस्वती का जो रूचिरावतार हिन्द में अनेकानेक भाषाओं के माध्यम से विद्यमान है उसे साने गुरू जी ने आंतर भारती नाम दिया। लार्ड मैकाले ने अपने गवर्नर जनरल कालांतर में वायसराय के सलाहकार परिषद के महत्वपूर्ण सदस्य के नाते तत्कालीन भारत में अरबी फारसी को तब मुस्लिम सल्तनत के जमाने में भारत की राजभाषायें थीं हिन्दुस्तान का पाराचारी समाज संस्कृत के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। तत्कालीन राजभाषाओं व लोकसभा संस्कृत (पढ़े लिखे हिन्दुस्तानी संस्कृत बोलते थे। निरक्षर हिन्दुस्तानी प्राकृत याने व्याकरण हीन गिरा का प्रयोग करते थे।) इन तीन भाषाओं को छोड़ कर अंग्रेजी राज के लिये कारकुन स्थानीय लोगों में से ही आये इसलिये अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा का श्रीगणेश किया। लार्ड मैकाले के पिता ग्रेट ब्रिटेन के राजपरिवार के गिरजाघर रायल रोमन कैथोलिक चर्च के आर्क बिशप थे। पिता मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे पर पुत्र भारत में अंग्रेजी राज की जड़ें मजबूत करने के लिये शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाना चाहते थे। पिता पुत्र के मतान्तर का पत्र व्यवहार बहुत आकर्षक है। आर्क बिशप ने अपने पुत्र लार्ड मैकाले को लिखा - हिन्दुस्तान की हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दुस्तान में राज करने वाली इस्लामी संस्कृति को मटियामेट मत करो। बेटे ने बाप को लिखा - पिताजी मैं तो आपका काम कर रहा हूँ आप दुनियां में ख्रिस्ती धर्म का प्रसार करना चाहते हैं मैं जो कुछ हिन्दुस्तान में कर रहा हूँ अढ़ाई सौ वर्ष पश्चात हर हिन्दुस्तानी वह हिन्दू हो या मुसलमान भूरा अंग्रेज होगा। मजहब चाहे इस्लाम हो या हिन्दू रहन सहन चालचलन में हर हिन्दुस्तानी बिना बपतिस्मा किया ख्रिस्ती होगा। हिन्दुस्तान का आम आदमी अपनी सभ्यता संस्कृति तथा वेषभूषा भूल कर पूरी तरह यूरोपियन रंग में रंग जायेगा। पिता-पुत्र के बीच सेंतीस पन्नों का पत्र व्यवहार महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी झोली में रखते और अपनी यायावर घुमन्तू जिन्दगी में उन लोगों को पढ़ाते जिन्हें हिन्दुस्तानियत से लगाव रहता। आज बर्तानी किंग्स इंग्लिश तथा क्वींन्स इंग्लिश के समानांतर संयुक्त राज्य अमरीका की अंग्रेजी का बोलबाला है।
करण थापर की सोच है कि अमरीका की दास प्रथा दलित उत्पीड़न से लाखों गुना ज्यादा कष्टकर थी। दासों की खरीद बिक्री होती थी जब अब्राहम लिंकन सरीखे मनीषी ने अमरीका में दास प्रथा समाप्त कर दी हिन्द में अछूत, अस्पृश्यता निवारण का संकल्प महात्मा गांधी ने लिया था पर भारत विभाजन तथा अस्पृश्यता निवारण में दत्तचित्त महात्मा गांधी को बाबा साहेब अंबेडकर जो महात्मा से उम्र में बाईस वर्ष छोटे थे याने बाबा साहेब व महात्मा गांधी में पीढ़ियों का अंतराल था। स्वयं महात्मा गांधी के ज्येष्ठ पुत्र उनके तौर तरीकों को नापसंद करते पिता पुत्र में जो पीढ़ी का पर्दा होता है वह महात्मा तथा बाबा साहेब अंबेडकर में भी तीव्रता से एकपक्षीय था। वहां विवाद द्विपक्षीय न होकर इकतरफा था। बाबा साहेब अंबेडकर की धारणा का महात्मा गांधी ने उस स्तर का विरोध नहीं किया जिस तरह की संकल्पना बाबा साहेब के मानस में थी। महात्मा गांधी की रीति नीति से परहेज करने वाले व्यक्ति कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना भी थे। जिन्ना महात्मा से मात्र सात साल छोटे थे। दोनों मूलतः गुजराती भाषी थे। दोनों के मजहब तथा चिंतन धारा में धरती आसमान का सा अंतर था। हिन्दुस्तानी आजादी के 50 निर्माताओं में मोहम्मद अली जिन्ना की गिनती नहीं है पर इतिहासकार रामचंद्र गुहा के नजरिये में मोहम्मद अली जिन्ना को भी आधुनिक भारत के निर्माताओं में उन्होंने इंगित किया है। भारत की भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी में यह मान्यता है कि ईशनिन्दा भी भक्ति का एक अनोखा तरीका है। सेमेटिक मजहब के अनुयायी ईशनिन्दा जिसे अंग्रेजी में Blashphemy कहते हैं महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण के सदाचार निर्माण वाले सातवें स्कंध के पहले अध्याय के 16वंेे श्लोक में देवर्षि नारद द्वारा युधिष्ठिर के प्रश्न का जवाब देते हुए कहा -
यथा वैरानुबंधेत मर्त्यस्तन् मयता मियात, न तदा भक्ति योगेन इति मे निश्चिता मतिः।
इस प्रक्रिया को देवर्षि नारद ने वैरानुबंध संज्ञा दी। ईश्वर को सही समझने के लिये भक्ति ज्ञान वैराग्य के समानांतर ईश्वर से सतत वैरभाव भी व्यक्ति को परमात्मा के नजदीक पहुंचाता है। भारतीय धर्म मीमांसा में वैरानुबंध एक ऐसी विधा है कि परमात्मा को वैरी मानने से हिरणकश्यप, वेन, रावण तथा शिशुपाल ने भी परमात्मा के हाथ से मारे जाने के कारण मुक्ति पायी। प्राचेतस वाल्मीकि ने वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड के अढ़चालीसवें सर्ग के बारहवें और तेरहवें श्लोकों में राजधर्म का विवेचन किया है। वाल्मीकि लिखते हैं -
तमेव अक्षम् प्रसमीक्ष सम्यक् स्वकर्म साम्याद्धि समाहितात्मा,
स्मरश्चं दिव्यम् धनुषोडस्य वीर्यम् ब्रजाक्षतम् कर्म।
समारंभाश्च न खल्वियान् काति श्रेष्ठ यत्वां संप्रेषयाश्यहम् इयम् च राजधर्माणाम् क्षत्रस्य च मतिर्मता।
तुलसीदास से पूर्व वाल्मीकि के राजधर्म कुबेर के अनुज विश्रवा नंदन पुलत्स्य पौत्र दशग्रीव रावण से अपने इन्द्रजित् पुत्र मेघनाद की राजधर्म को दीक्षा दी। तुलसी ने जिस राजधर्म का आख्यान दिया भारत के तेरहवें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्हें राजधर्म की याद दिलायी थी। सुन्दरकाण्ड में स्वांतः सुखाय रघुनाथ गाथा गाने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने राजधर्म की सही सही व्याख्या साठ दोहों वाले सुन्दरकाण्ड के सैंतीसवें दोहे में व्यक्त की है। करण थापर का जो मानवीय मंतव्य है वह भारत के तथाकथित गौरक्षकों एवं अपने आपको वैष्णव मानने वाले दलितों पर कहर ढहाने वाले भारतवासी जो अपने आपको वैष्णव के अलावा गौरक्षक भी बताते हैं पर व्यापक रूप से पंक्तिभेद कर अपने लिये रौरव नरक का रास्ता बनाने में व्यस्त हैं। उनको सही मार्ग में लाने का उत्तरदायित्त्व भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का पहला कर्तव्य है। वे अपने विरोधियों की जिन बातों में तथ्य पावें उन पर विचार कर राजधर्म का वह रास्ता अपनायें जिससे सभी प्रकार के अतिवादियों से भारत को छुटकारा मिल सके। महात्मा गांधी ने सन 1929 में पंडित नेहरू द्वारा आयोजित कुमांऊँ प्रवास किया। वे 14.6.1929 के दिन काठगोदाम पहुंचे। उन्होंने यह यात्रा 11.6.1929 के दिन गुजरात के अमदाबाद से शुरू की। महात्मा 1929 में नैनीताल नहीं गये उन्होंने नैनीताल से पहले ही ताकुला नामक स्थान में रात्रि विश्राम किया। अगले दिने 15.6.1929 को भवाली होते हुए ताड़ीखेत पहुंचे। भवाली में उन्होंने कुमांऊँ के स्वतंत्रता वीरों को संबोधित किया। रात को गांधी कुटी 16.6.1929 व 16.6.1929 के दिन विश्राम किया। ताड़ीखेत प्रेम विद्यालय की स्थापना 1921 में भगीरथ पांडे सहित स्वतंत्रता वीरों ने की थी। ताड़ीखेत में महात्मा को सुनने के लिये कुमांऊँ के गांव गांव से लोग इकट्ठे हुए। महात्मा ने कुमांऊँ की पर्वत श्रंखला देख कुमांऊँ को भारत का स्विट्जरलैंड कहा। ताड़ीखेत से महात्मा अल्मोड़ा गये जहां अल्मोड़ा म्यूनिसिपल बोर्ड के अध्यक्ष फादर ओकले ने महात्मा का स्वागत हिन्दी में भाषण देकर किया। फादर ओकले हेनरी रामजे हाईस्कूल के अंग्रेजी अध्यापक थे विक्टर मोहन जोशी स्वतंत्रता सेनानी थे। अल्मोड़ा में महात्मा गांधी ने कुमांऊँ के स्वातंत्र्य वीरों को देश की आजादी के लिये ललकारा। अल्मोड़ा से महात्मा गांधी कौसानी पहुंचे जहां उन्होंने श्रीमद्भगवदगीता केे स्वरचित गुजराती भाष्य की भूमिका लिखी पूरे पखवाड़े भर कौसानी रहे तब गरूड़ तक ही मोटर जाती थी। गरूड़ तक वे मोटर से गये वहां से 13 मील की पैदल यात्रा कर बागेश्वर पहुंचे। महात्मा को सुनने के लिये गांव गांव से पैदल चल कर हजारों लोग बागेश्वर पहुंचे। वहां महात्मा ने जीत सिंह द्वारा निर्मित पैडल ऊनी चर्खा चला कर ऊनी खादी के काम को गति दी। कुमांऊँ यात्रा संपन्न कर महात्मा 4.7.1929 को साबरमती आश्रम लौट आये। महात्मा जी की इस यात्रा के अलावा पुनः सन 1930 में भी नैनीताल जाकर सर माल्कम संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के गवर्नर से किसानों की दुर्दशा पर विचार विमर्श किया। महात्मा ने अपनी कुमांऊँ यात्रा से पूर्व अगस्त 1929 में शांतिलाल त्रिवेदी को साबरमती आश्रम अहमदाबाद से अल्मोड़ा भेजा। शांतिलाल त्रिवेदी ने कुमांऊँ व ब्रिटिश गढ़वाल के नौ हजार गांवों में घूम घूम कर चर्खा कताई हाथ बिनाई के काम को अंजाम दिया। कुमांऊँ अल्मोड़ा जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ने महात्मा गांधी के शिष्य शांतिलाल त्रिवेदी को ऊन कताई बुनाई का संचालक नियुक्त कर गांव गांव में ऊनी उद्यमिता बढ़ाई। हिन्दुस्तान टाइम्स के विचार पोखर ने जहां करण थापर के स्तंभ द्वारा भारत के दलितों को सामाजिक सम्मान दिलाने के लिये अमरीका की दास प्रथा को मिटाने वाले अब्राहम लिंकन को याद करते हुए प्रच्छन्न रूप से हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से अपेक्षा की कि जिस तरह अमरीका की दास प्रथा को अब्राहम लिंकन ने उखाड़ फेंका दलित संत्रास को निर्मूल करने के लिये भी वे आगे बढ़ें। देशवासी जिस पाखंड से घिरे हुए हैं उसे नेस्तनाबूद करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे गुजरात सहित समूचे भारत के वैष्णवों व तथाकथित गौभक्तों को सन्मार्ग पर लाने की दायतावान नेतृत्व हैं। आर. जगन्नाथन जो स्वराज्य के संपादन निदेशक हैं उन्होंने यू.पी.ए. तथा एन.डी.ए. दोनों को ललकारा है।
प्रश्नगत संदर्भ में शशिशेखर वेमपति का हिन्दुस्तान टाइम्स में 21 अगस्त 2016 के बारहवें पन्ने में करण थापर के स्तंभ के पार्श्व में प्रकाशित हुआ। वे कहते हैं Artificial Inteligence is now real thing.बौद्धिकता, तीक्ष्ण बुद्धिवाद, सटीक समझ तथा विवेक जन्मजात योग्यता भी होती है। दीक्षा संस्कार से बौद्धिकता को संवारा जा सकता है। महाशय शशिशेखर वेमपति ने वर्तमान भारतीय नेतृत्व को नयी दिशा दी है। आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स को आंतर भारती व्यापक भाषाकोश में क्या कहा जाये ? बनावटी अक्ल या कृत्रिम बुद्धि ? वे कहते हैं मेक इन इंडिया स्किल इंडिया डिजिटल इंडिया ये सभी प्रसंग बनावटी बुद्धि कौशल अथवा पूर्णतः कृत्रिमता लिये हुए तो नहीं हैं ? संयुक्त राज्य अमरीका केवल पांच सौ वर्ष का इतिहास वाला एक ऐसा देश व राष्ट्र राज्य है जिसको अपने स्वतंत्रता चार्टर पर गुमान है। यदि अब्राहम लिंकन ने सिविल वार में फतह न पा ली होती तो अमरीका छिन्न भिन्न राज्यों के अनेक समूहों में बंट जाता। अमरीकी नस्लभेद की त्रासद स्थिति वहां के अश्वेत समाज को आज भी उत्पीड़ित करती है। यूरप अमरीका तथा मध्यपूर्व के मुकाबले हिन्दुस्तान की सभ्यता तथा हिन्द की आध्यात्मिक व वैदिक ज्ञान की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी श्रौत परंपरा है जिसे आधुनिक भारतवासी आंतर भारती के माध्यम से अपना सकते हैं। तुलसी के रामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड पाठ भारत के लोग नित्य करते रहते हैं उसमें साठ दोहे सोरठे पांच सौ सैंतीस चौपाइयां सात छन्द हैं। तुलसीदास ने चेताया है राजकर्ता समाज को राजधर्म अपनाने के लिये। शशिशेखर वेमपति ने बनावटी विवेक बनाम असली प्राकृतिक या स्वाभाविक विवेक बुद्धि के सवाल पर आधुनिक भारतीय नेतृत्व को ललकारा है। इस ब्लागर ने अपनी एक पहली वाली पोस्ट में प्रायश्चित्तता का उल्लेख किया है। आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स के लिये अंग्रेजी शब्दकोष कम्प्यूटर द्वारा प्रदर्शित विवेक प्रकरण में भारत के पर्यावरण वन और ऋतु परिवर्तन में अमरीका की नकल की जारही है। नकल से अकल आना मुश्किल है। प्रधानमंत्री जी ने राज्यमंत्री जावड़ेकर महाशय को पदोन्नत कर केबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मंत्री बना डाला। आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स के जरिये जावड़ेकर महाशय की तकदीर उजागर होगयी पर समस्या का समाधानकारी सरोकार तभी होगा जब आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स से निबटने का रास्ता निकाला जायेगा। आज भारत के सभी मंत्रालयों में व समूचे भारत की दिशा दशा बर्तानी राज के सिस्टम फेलियर का तांडव देखने को विवश हैं। आजादी के 70 वर्ष होगये नया सिस्टम नौकरशाही बनने ही नहीं देरही। भारत की वर्तमान नौकरशाही पर 160 वर्ष पूर्व लार्ड मैकाले ने जो शैक्षिक गोटियां हिन्दुस्तान में बिछायीं वे निरंतर बढ़ती ही जारही हैं। महात्मा गांधी ने इंडियन ओपीनियन के जरिये हिन्द स्वराज अपनी मातृभाषा में 108 वर्ष पूर्व लिखा। यूरप के विद्वानों ने हिन्द स्वराज का उल्था अपनी अपनी भाषाओं यथा फ्रेंच जर्मन स्पेनिश रसियन पुर्तगाली इटैलियन भाषाओं में पढ़ कर महात्मा गांधी के मार्ग को ही व्यावहारिक बताया तथा यूरप की आद्योगिक क्रांति व आधुुनिकता को भ्रांत बताया आज इस घटना को घटे एक सौ आठ वर्ष हो चुके हैं। आज यूरप अमरीका लैटिन अमरीकी देशों तथा अफ्रीकी देशों सहित एशिया के महत्वपूर्ण अरब देशों पूर्वी एशिया चीन तथा जापान सहित आस्ट्रेलिया महाद्वीप में जो स्थितियां हैं उनसे वे क्लाइमेट चेंज तथा प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। संपन्न राष्ट्रों व विपन्न राष्ट्रों में अमीरी व गरीबी के बीच खाई चौड़ी होती जारही है। दुनियां के संपन्न लोगों व देशों की निर्धन लोगों के लिये केवल शाब्दिक सहानुभूति व्यक्त होती है। भूख मुक्ति के उपाय होने के बजाय उपभोक्तावाद निरंतर बढ़ता जारहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में स्तंभकार शशिशेखर महाशय का निजी मत यह है कि बनावटी विवेक अब एक वास्तविकता का आकार ग्रहण कर चुका है। जिस देश में कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजकर्ताओं के लिये मार्गदर्शक लोकायतन है वहां के लोग बनावटी विवेक सिनेमाई दृश्यों क्रिकेट सहित खेल जगत के सारे उपक्रमों में जीवन का यथार्थ होने के बजाय एक क्रीड़ामूलक दृष्टिकोण अपनाये हुए है। सिनेमा मनोरंजन का साधन है। खेल और सिनेमा दोनों व्यावहारिकी व वास्तविकी दुनियादारी से अलग हैं। मानव जीवन वस्तुतः कर्मतंत्र का प्रयोग है। श्रीमद्भगवदगीता कहती है - कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके। आप जो कार्य करोगे उसका कर्म फल भोगना ही पड़ेगा। उसे आप मनोरंजन अथवा खेल नहीं मान सकते इसलिये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को रोजमर्रा के कामों में दखल देने वाला कदम उठाना श्रेयष्कर नहीं होगा। राजनीति की सही बारहखड़ी आप इंग्लैंड से हृदयंगम नहीं कर पायेंगे। आपको सत्ता में पहुंचने के लिये नब्बे दिन में अंग्रेजी बोलना सहायक सिद्ध नहीं होगा। मतदाता से मत मांगने के लिये उसकी भाषा का ही उपयोग करना होगा। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि मुंबई हैदराबाद चेन्नै कोलकाता अहमदाबाद तथा चंडीगढ़ में जो बाजारू हिन्दी या सिनेमाई हिन्दी बोली जाती है उसका सहारा लेकर मतदाताओं तक पहुंचा जा सकता है परंतु भारत की जो मर्यादायें हैं जिन्हें साने गुरू जी आंतर भारती कहते हैं उन भाषाओं के जरिये मतदाता का मन जीतना जरूरी है इसलिये आंतर भारती के जरिये अंग्रेजी सहित भारत की 23 भाषाओं का सहारा लेकर ही भारतीय स्थितियों को समझा जा सकता है। भारत की विशेषता यह है कि इस देश की मूल भाषाओं में जिसे अंग्रेजी भाषा वाटर कह कर पुकारती है भारत में जल सलिल नीर उदक तोय पानी पय आदि पर्यायवाची शब्द हैं। भारत की विभिन्न लिपियों में चाहे वे संस्कृत मूलक हों अथवा द्रविड़ मूलक स्वर व्यंजन दो ध्वनियां जिन्हें लैटिन अंग्रेजी आदि भाषाओं में अल्फाबेट कहा जाता है ये ध्वनियां 51 हैं जबकि लैटिन में 24 तथा रोमन में 26 अल्फाबेट ही हैं। संयुक्त राज्य अमरीका का पचासवां राज्य हवाई है वहां की भाषा हवाई ही है शेष अमरीकी राज्यों में अंग्रेजी फ्रांसीसी स्पेनिश का ज्यादा बोलबाला है। मध्य पूर्व की भाषाओं में फारसी में 28 अल्फाबेट अरबी में 31 अल्फाबेट हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का स्त्रोत तो मूलतः कम्प्यूटर तक वाला ही है मानवीय विवेक के समानांतर कृत्रिम विवेक का आज दुनियां में बोलबाला है। हिन्दुस्तान वह देश है जहां ध्वनि का उत्कर्ष तांडव नृत्य के पश्चात नटराज महादेव ने जो महानृत्य किया और नृत्यावसान में उनके डमरू से नौ और पांच बार ध्वनियां उत्पन्न हुईं जिसे भारत के लोग 51 ध्वनियों वाला ध्वन्यालोक मानते हैं। ध्वन्यालोक का ग्रंथ आज भारत में भी उपलब्ध नहीं है पर उसका पहला चरण ‘भिन्नः रूचिर्हि लोकः’ में अभिव्यक्त होता है। आज कम्प्यूटर साइंस रोमन लिपि के 26 अल्फाबेट अथवा भारतीय संदर्भ में ध्वनियों पर आधारित है जबकि भारतीय लिपियों में वह चाहे नागरी लिपि हो ब्राह्मी खरोष्ट्री हो गुरूमुखी गुजराती कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बांग्ला असमी मइती लिपि ही क्यों न हो उन लिपियों में जो लिखा जाता है वही उच्चारित भी होता है इसलिये भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बदले वास्तविक तथा व्यावहारिक विवेक को अपनाना समय की पुकार है। इस तथ्य की ओर भारतवासियों को साने गुरू जी ने अपनी आंतर भारती विधा से सचेत किया है। भारत के लोगों से राष्ट्रवादिता के प्रखर चमकीले नक्षत्र साने गुरू जी ने एक रास्ता सुझाया है कि भारत की वाणियों को एक दूसरे के निकट लाने तथा भारत की वर्तमान में 22 संविधान सूची बद्ध भाषाओं तथा बर्तानी सरकार द्वारा भारत में अंग्रेजी के पठन पाठन को जो महत्व पिछले अढ़ाई सौ वर्षों में मिला है तेईसवीं भाषा अंग्रेजी को भी जोड़ कर आंतर भारती का शंखनाद करने की जरूरत है। आंतर भारती का नाद भारत के सवा अरब से ज्यादा भारतवासियों के लिये छिन्न संशयता वाला वातावरण तैयार करने की क्षमता रखता है। इसलिये जो आर्टिफिशियल इंटेलिजंेस पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं उनकी बात भी भारतीय नेतृत्व को सुननी चाहिये ताकि आर. जगन्नाथन तथा शशिशेखर वेमपति सरीखे विचारक जो सवाल खड़े कर रहे हैं उनके समाधान का मार्ग प्रशस्त हो। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया सरीखे कार्यक्रमों तथा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के चिंतन पोखर द्वारा जो बड़ी मझोली अथवा माइक्रो क्राफ्ट वाली परियोजनायें संकल्पित होरही हैं वे धरती की जरूरत के मुताबिक हों तथा भारत की धरती में आंतर भारती के जो 23 मुख्य पड़ाव हैं उनको भी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जाये। तुलसीदास ने अपने महत्वपूर्ण लोकभाषायी स्वांतः सुखाय रचित रामचरित मानस के सुन्दरकाण्ड में सैंतीसवे दोहे के माध्यम से सचिव वैद गुरू का उद्घोष करते हुए राजधर्म का निरूपण किया है। सचिव से तात्पर्य केवल भारत सरकार या भारत गणतंत्र केे घटक राज्यों के सरकारों के सचिव ही नहीं वे सभी सचिव हैं जो राजकरण में सहायता करते हैं। राजधर्म का अनुपालन आज की मौलिक जरूरत है। भारत के लोकप्रिय नेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को खुले दिल से सलाहों पर मनन चिंतन कर अपना राजधर्म का मार्ग प्रशस्त करना होगा।
कश्मीर घाटी के राजनीकि ऊहापोह के बीच पाक अधिकृत कश्मीर बाल्टिस्तान गिलगित तथा बलूचों में पाक सरकार के रवैये के प्रति जो पिछले 70 वर्षों से निरंतर आक्रोश है उस भारत की चौथी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ने सिक्किम को भारत का प्रदेश सुनिश्चित करने तथा ईस्ट बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान के बजाय बंगला देश बनाने में जो कूटनीतिक तथा राजनैतिक साहस वाली भूमिका निर्वाह की। 24-25 वर्षों में ही मोहम्मद अली जिन्ना के द्वि राष्ट्र सिद्धांत को तहसनहस कर डाला। उत्तर प्रदेश दिल्ली तथा बिहार से कराची गये उर्दू भाषी मुसलमान कराची को उर्दू प्रदेश बनाना चाहते हैं इसलिये पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर सहित बलूचिस्तान के स्वात्माभिमान की संरक्षा में नैतिक सहयोग से बलूचिस्तान एक स्वतंत्र देश का आकार ले सकता है। स्वतंत्र बलूच ईरान अफगानिस्तान तथा भारत की मैत्री को बढ़ावा दे सकता है। हिन्दुस्तान की एक पुरानी कहावत है - ‘पुनर्भूषिको भव’ देश की अल्पसंख्यक तथा दलित जो 1947 से पहले अस्पृश्य माने जाते थे जिन्हें महात्मा गांधी ने हरिजन कहा पर दलित हितैषी समाज को महात्मा गांधी द्वारा सुझाया हरिजन अपच कर गया। मराठी भाषी वैभव पुरन्दरे ने गांधी अंबेडकर और विनायक दामोदर सावरकर व्यक्तित्त्व कृतित्व का वैचारिक पुनराभ्यास सुझाया है। इस पूरे प्रसंग को भारत की मुख्य अल्पसंख्यक इस्लाम धर्मावलंबी समाज तथा पिछले अढ़ाई सौ वर्षों से ख्रिस्ती धर्मावलंबी मिशनरियों को भी जोड़ कर देखना चाहिये। ख्रिस्ती धर्माचरण का एक अहम बिन्दु भारत के अंग्रेजीदां भद्रलोक का यह मानना कि आदिवासी भारत के मूल धर्म से जुड़े नहीं हैं। उनकी आस्था सनातन धर्म से मेल नहीं खाती इसलिये आदिवासियों में जो लोग वर्तमान में ख्रिस्ती धर्मावलंबी हैं उनका सामाजिक सरोकार समूचे आदिवासियों को ख्रिस्ती धर्मावलंबन में लाना है इसलिये जातपांत तोड़ो का जो रास्ता समाजवादी चिंतक डाक्टर राममनोहर लोहिया तथा भारत के दलित समाज के उद्धारक भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर की जातपांत रहित समाज सृजन की परिकल्पना को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जाति सूचक उपनाम या जाति नाम न जोड़ने का प्रसंग वैभव पुरन्दरे ही नहीं पहले से अनेक विचारक इस तरफ बढ़े हैं पर हिन्दुस्तान की हिन्दुस्तानियत जाति आधारित ही है। मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने कहा - ‘या देवी सर्वभूतेषु जाति रूपेण संस्थिता’ दैवी शक्ति संपात सृष्टि के जीव मात्र में जाति के रूप में स्थित है इसलिये भारत की जाति प्रथा का उन्मूलन तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय जातिवाद की वकालत पूर्ण संस्तुति वैश्विक धर्म सभा शिकागो में की। यूरप के मौजूदा इसाई देश ईसा मसीह के उद्भव से पहले विद्यमान थे। उनकी संस्कृति तथा आस्था भी रही होगी। समूचा यूरप जब इसाई समाज बन गया उनके गिरजाघरों में प्रार्थना का लहजा कई एक भारतीय विद्वानों ने सामवेदी तरीके वाला माना है। ईसा से छः शताब्दी अनंतर मोहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म की पताका फहराई। भारत को छोड़ कर ज्यादातर एशियाई देश इस्लाम धर्मावलंबी होगये। जाति प्रथा ने समूचे हिन्दुस्तान को मुसलमान नहीं बनने दिया इसलिये जाति विहीन भारत की कल्पना भारतीयता के अनुकूल नहीं है। जातियों में सामाजिक सामंजस्य स्थापित करना आज की जरूरत है। महात्मा गांधी ने भारत के अछूत माने जाने वाले लोगों को तुलसीदास के सुन्दरकाण्ड की ओर खींचा। सुन्दरकाण्ड कहता है -
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी, सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।
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