Tuesday, 9 August 2016

साने गुरूजी की आन्तर भारती ही पर्यावरण वन तथा जलवायु परिवर्तन एवं नीलगाय, जंगली सुअर
आर्ष्टिषेण हनुमान के वंशधरों को मटियामेट करने का
एकमात्र प्रायश्चित्तकारी उपाय
बिहार, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश की सरकारों की सिफारिश पर केन्द्रीय पर्यावरण वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नीलगाय, जंगली सुअर एवं बन्दरों को फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीव घोषित कर एक वर्ष के लिये संबंधित सरकारों को Blue Bull and Vermin Theory  के तहत घोषित करते हुए इन तीनों छोटे छोटे पशुओं के मुकाबले विशालकाय जंगली जानवरों को भी Vermin श्रंखला में जोड़ते हुए वर्ष 2015 के अंतिम माह दिसंबर व चालू कैलेंडर वर्ष 2016 में अधिसूचनायें प्रसारित कीं। पर्यावरण मंत्रालय की ढोल की पोल इंडियन एक्सप्रेस ने खोल के रख दी। मंत्रालय के संयुक्त सचिव महोदय ने कट एण्ड पेस्ट प्रसंग बयान दिया। भोंडी नकल से इन्कार तो किया पर यह भी माना कि अमरीकी तौर तरीकों के आधार पर मंत्रालय अपनी गाड़ी चलाता रहता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर एवं न्यायमूर्ति खनवलिकर की बेंच ने याची गैर सरकारी संगठन Animal Rights Activist को सलाह दी कि वे दिल्ली उच्च न्यायालय से संबंधित याचिका दायर करें। प्रश्नगत विषय उच्च न्यायालय का कार्यक्षेत्र है। बिहार सरकार द्वारा नील गायों को मारने संबंधी प्रसंग पर केन्द्रीय सरकार के दो मंत्रियों में अलग अलग रायें थीं। पर्यावरण अथवा अंग्रेजी के Environment शब्दाधारित शासन पद्धति विशेषतया भारत सरकार के Environment Forest and Climate Change मंत्रालय का चिंतन मूलाधार Blue Bull and Vermin Theory  है। यह समूचा चिंतन यूरप से उधार लिया जाता है। देश की उच्चतम न्यायपालिका के न्यायमूर्ति द्वय ने जो सलाह वन्य जीव संरक्षण के लिये समर्पित व्यक्तियों और असरकारी संगठनों को दी है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में याचना कीजिये। प्रस्तुत प्रसंग दिल्ली उच्च न्यायालय के कार्यक्षेत्र का विषय है। पूर्व से जब सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश कालीन न्यायमूर्ति द्वय याचिकाकर्ताओं की याचना पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधिवत सुनवाई किये जाने का मत व्यक्त करते हुए याचिका कर्ताओं की इस याचना को स्वीकृति नहीं दी कि मंत्रालय द्वारा जारी तीनों अधिसूचनायें रद्द कर दी जायें। याचिका प्रस्तुत करने वाले एन.जी.ओ. का कहना है कि नीलगाय के ब्लू बुल तथा छोटे छोटे जीव जो खेतीबाड़ी को नुकसान पहुंचाते हैं उन्हें अंग्रेजी भाषा में वर्मिन कहा जाता है। नीलगाय तो भारत की देसी गाय से बड़ा पशु है। नीलगाय की क्षमता हाथी सरीखी है इसलिये नीलगाय को वर्मिन कहना तर्कसंगत नहीं लगता। उत्तर प्रदेश की पशुगणना अनुसार उ.प्र. में नीलगायों की संख्या 2,30,000 है। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत या क्षेत्र पंचायत से नीलगायों की संख्या आंकी जाये। भारत सरकार का पर्यावरण वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय बन्दरों और जंगली सुअरों की सही सही गणना नहीं कर पायेगा पर नीलगाय और ब्लू बुल तो बड़े शरीर वाला पशु समूह है। प्रत्येक राज्य सरकार से केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय  उस राज्य की नीलगायों तथा ब्लू बुल या नीला बैल संख्या ग्राम पंचायत क्षेत्र पंचायत जिला पंचायत तथा समूचे राज्य में कहां कहां कितनी नीलगायें और ब्लू बुल हैं इसका तखमीना संबंधित पर्यावरण विभाग पशुपालन विभाग के साझे कार्यक्रम के अनुसार तय करे साथ ही नीलगायों के बारे में भारतीय भाषाओं में जो साहित्यिक विवरण है तथा गांव गांव में नीलगाय के बारे में जो लोकोक्तियां एवं मान्यतायें हैं उसका सटीक संपादन किये जाने हेतु प्रत्येक राज्य में नीलगाय ब्लू बुल तथा फसलों को व्यापक रूप में नुकसान पहुंचाने वाले छोटे पशुओं पक्षियों जिन्हें अंग्रेजी भाषा में वर्मिन कहते हैं उसके लिये प्रत्येक राज्य को नीलगाय या ब्लू बुल तथा वर्मिन इन्क्वायरी कमीशन गठित करने तथा प्रत्येक जिले के लिये उस जिले में जितनी क्षेत्र पंचायतें हैं उनके प्रतिनिधि एवं क्षेत्र पंचायत क्षेत्र के कम से कम तीन अधिक से अधिक सात ग्राम प्रधान, उप प्रधान, पुरूष अथवा महिला ग्राम प्रधान, उप प्रधान, एवं कम से कम अनुसूचित जाति की एक महिला ग्राम प्रधान तथा एक पुरूष ग्राम प्रधान जिनकी उम्र 55 वर्ष से ज्यादा हो उन्हें नामित किया जाये। गांवों में जो लोग 80 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं उनकी राय उनके अनुभव नीलगाय द्वारा फसल नुकसान के संदर्भ में बयान के रूप में दर्ज किये जायें ताकि नीलगाय क्या है ? नीलगाय से क्या लाभ व हानियां हैं गांवों को पूर्व में हुई हैं व्यापक तौर पर नीलगायों द्वारा फसल नुकसान कब से ज्यादा तीव्र हुआ है नीलगाय को बिन्दु मानते हुए जंगली पशुओं जो फसलों तथा बाग बगीचों में व्यापक नुकसान पहुंचाते हैं उसके बारे में लोकमत ज्ञात करना। भारत सरकार हरेक राज्य सरकार तथा केन्द्र शासित क्षेत्र से इन सभी बिन्दुओं पर समीक्षित इन्क्वायरी रपट संबंधित प्रदेश की राजभाषा यथा तमिलनाडु में तमिल, केरल में मलयाली, आंध्र तेलंगाना के लिये तैलुगु व बंग व त्रिपुरा के लिये बांग्ला में आदि आदि में प्रस्तुत करने के साथ साथ अंग्रेजी में भी प्रस्तुत की जाये। नीलगाय, जंगली सुअर तथा बंदर प्रकरण के साथ साथ खेतीबाड़ी व बाग बगीचों के लिये जो दूसरे व्यवधान हैं उनका भी खुलासा हो। दूसरी अहम जरूरत वन नियमावली वन विभागों तथा उत्तराखंड में वन पंचायतों की गतिविधियों सहित वनों से घिरे गांवों के लोगों को वन क्षेत्र में गौचर पनघट के हकहकूक का भी विश्लेषण हो। पर्यावरण मंत्रालय को प्रभावित करने वाला जलवायु परिवर्तन पर सटीक नजर रखने की जरूरत है। चीन के जननेता माओ त्से तुंग ने चीन के लिये 1949 में ही रूस की नकल कर ग्रेग्रेरियन XIII वाला यूरप का कैलेंडर जनवरी दिसंबर अंगीकृत कर लिया। भारत के लोकनेता और पहले प्रधानमंत्री ने हिन्दुस्तानी कैलेंडर अपनाने के लिये आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कैलेंडर (पंचांग) समिति गठित की जिसने 21 मार्च को भारतीय कैलेंडर का पहला दिन मनाये जाने की संस्तुति की। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने अपने महत्वपूर्ण भक्ति काव्य ग्रंथ में श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवे स्कंध के इक्कीसवें अध्याय के चौथे श्लोक - यदा मेष तुलयोवर्तते (भाष्करः) तदा अहोरात्राणि समानानि भवंति। इस का तात्पर्य यह है कि मेष संक्रांति जिसे पंजाब में वैशाखी भी कहा जाता है महाभारत काल तक याने आज से 5116 वर्ष पूर्व तक मेष संक्रांति ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अप्रेल महीने की तेरहवीं तारीख को होती थी तब दिन रात बराबर होते और तुला संक्रांति तब 18 अक्टूबर को होती थी। 2 महीनों दिन रात और दिन बराबर 12-12 घंटे के होते जिसे हिन्दुस्तानी तीस घड़ी का दिनमान कहते थे। पर आजकल दिन रात क्रमशः 21 मार्च और 23 सितंबर को होते हैं। याने यह बात साफ होरही है कि मेष संक्रांति बजाय 13 अप्रेल के 21 मार्च को मनाई जाये और तुला संक्रांति बजाय 18 अक्टूबर के 23 सितंबर को मनाई जाये। जलवायु परिवर्तन का सीधा संबंध मेष संक्रांति का 21 मार्च को मनाया जाना तुला संक्रांति का 18 अक्टूबर को मनाये जाने से है। राज्य सरकारें अपने अपने राज्यों के विभिन्न सांस्कृतिक इलाकों में जो परंपरायें हैं अनका अनुशीलन करें। हिन्दुस्तान की पारंपरिक संस्कृति के अध्येता साने गुरू जी परम राष्ट्रवादी थे। उन्होंने आंतर भारती का सरोकार अपनाये जाने के लिये भारत की लोकभाषाओं को समझने एक लोकभाषा का दूसरी लोकभाषा से जो शाब्दिक संबंध है उसे भाषा विज्ञान के द्वारा समझने का रास्ता सुझाया। भारत में अंग्रेजी राज आने से पहले भारत की लोकभाषा सधुक्कड़ी कबीर द्वारा अपने दोहों में प्रयुक्त भाषा थी जो सारे भारत में व्यापार तथा तीर्थ यात्रा करने वाले लोग अथवा वैरागी और सन्यासी जो एक जगह तीन दिन से ज्यादा नहीं ठहरते वे सभी सधुक्कड़ी ज्ञाता होते थे। स्वामी विवेकानंद तथा महात्मा गांधी ने चंपारण यात्रा के दर्मियान 1918 में हृदयंगम किया। चंपारण के हिन्दू और मुसलमान दोनों ही धड़े वज्जिका स्थानीय भाषा प्रयोग करते थे। चंपारण यात्रा में महात्मा गांधी को यह अहसास हुआ कि भारत की भाषा समस्या का निदान केवल कबीर दास की खड़ी बोली को अपनाना है इसलिये Environment Forest and Climate Change मंत्रालय का कायाकल्प करना भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महोदय की प्राथमिकता होनी आवश्यक है। पर्यावरण को हिन्दुस्तानी आचरण में देखिये यूरप के ब्लू बुल तथा वर्मिन संस्कारों में संशोधन करने के लिये आंतर भारती का सहारा अत्यंत आवश्यक है। नीलगाय बनाम ब्लू बुल प्रकरण में राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाइये। नीलगाय जंगली सुअर तथा बंदरों के गोली मारने का जो आंशिक मात्र अपनाया जारहा है उस पर भारत के 26 राज्यों की राय ज्ञात कर नीलगाय प्रकरण पर राष्ट्रीय मत निर्धारण करने का समय आगया है। वन नीति निर्धारण कर्ताओं को उनकी अपनी अपनी मातृभाषा में वाल्मीकि के अरण्यकाण्ड तथा सुन्दरकाण्ड का भाष्य सरल सुगम तरीके से समझने तथा महाभारत के वन पर्व का वनाधिकारी अपनी अपनी भाषाओं में विश्लेषण कर संवाद स्थापित कर भारत की वन नीति का पुनर्निर्धारण करें। इन सबसे बड़ा सवाल 21 मार्च को मेष संक्रांति वैशाखी याने वैशाख का पहला दिन मनाना है। वेदव्यास जिस बात को पांच हजार वर्ष पूर्व भक्ति काव्य के रसीले भागवत पुराण में व्यक्त कर गये हैं वैशाख का महीना 21 मार्च से 20 अप्रेल जेठ का महीना 21 अप्रेल से 21 मई तक आषाढ़ का महीना 22 मई से 21 जून तक सावन 22 जून से 22 जुलाई तक भाद्रपद का महीना 23 जुलाई से 22 अगस्त तक आश्विन 23 अगस्त से 22 सितंबर तक तुला संक्रांति 23 सितंबर कार्तिक महीना 23 सितंबर से 22 अक्टूबर तक मार्गशीर्ष का महीना 23 अक्टूबर से 21 नवंबर तक पौष का महीना 22 नवंबर से 21 दिसंबर तक माघ का महीना याने सूर्य उत्तरायण मकर संक्रांति 22 दिसंबर से 20 जनवरी तक माघ का महीना फाल्गुुन का महीना 21 जनवरी से 19 फरवरी तक चैत्र का महीना 20 फरवरी से 20 मार्च तक पहला महीना वैशाख अंतिम महीना चैत्र। इस चिंतन में गुड़ि पड़वा या संवत्सर पड़वा जिसे युगादि उगादि तथा चैती चांद भी कहते हैं वह चैत्र शुक्लपक्ष पड़वा का पड़ता है। याने पूर्णवत्सरी अमावस और नया संवत्सर चैत्र मास में 20 फरवरी से 21 मार्च के बीच ही पड़ेगा। हमेशा ही संवत्सर पड़वा वैशाखी या मेष संक्रांति से पूर्व होगा क्योंकि चांद्रमास 29 या 30 दिन का होता है जबकि सौरमास 30 दिन का होता है। वर्ष में 10 दिन का अंतर सौरमास व चांद्रमास में है। इसलिये Environment Forest and Climate Change Ministry का कायाकल्प करना आज की पहली जरूरत है। पुनः एक बार भारत सरकार से अनुरोध है कि अथर्ववेद के प्रसंग को पुनः परीक्षित किया जाये। 
मूत्रम् तु नीलवर्णायाः कृष्णाया गोेमयम् स्मृतम् दधि तु श्वेत वर्णाया कपिलायाः घृतम् स्मृतम्।
सम्मेलयेत कुशोदकेन पंचगव्यम् कायशोधनम्। 
अगर भारत के लोगोें को एचआईवी और कैंसर सरीखी व्याधियों से बचना शिवसंकल्प हो पंचगव्य मूत्रम् एक कल्पम् तु संयोजयेत कुशोदकम् एक कल्पम् सत्ताईस नक्षत्रों के हिसाब से मूत्र 2 कल्प, गोबर 1 कल्प, दूध 14 कल्प, दही 6 कल्प, घी 2 कल्प कुशोदक 2 कल्प ये सब मिला कर सत्ताईस नक्षत्रों के प्रतीक हैं। विधिपूर्वक निर्मित पंचगव्य मनुष्य मात्र के लिये अत्यंत हितकारी तथा व्याधि निवारक है। इस समूचे विषय पर मनन करने की जरूरत है। महाशय प्रकाश जावड़ेकर अपने उत्तराधिकारी दवे महाशय को नीलगाय हत्या प्रायश्चित्त पथ अपनाते हुए परामर्श दें कि उनका नया मंत्रालय जामनगर कृषि विश्वविद्यालय को भारतीय कृषि पशु विश्वविद्यालय  का दर्जा उपलब्ध करा कर प्रायश्चित्त मार्ग का अनुसरण करें कि नीलगाय के गोमूत्र तथा गोबर का रासायनिक परीक्षण जामनगर कृषि विद्यालय करे। भारत जरसी गाय संकर गाय तथा मैडकाउ एवं बीफ महोत्सव त्रस्त हैं इसके समाधान का मार्ग नीलगाय गोमूत्र रासायनिक परीक्षण है। 
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