Sunday, 25 September 2016

देश की पहली सांस्कृतिक जरूरत राष्ट्रीय पंचांग
मेष संक्रांति प्रतिवर्ष 21 मार्च को मानें वही वर्ष का पहला दिन।
महीने का नाम पहली वैशाख से नया साल।
यूरप का ताजा कैलेंडर 15 अक्टूबर 1582 के दिन ग्रेग्रेरियन तेरहवें ने जो तत्कालीन वेटिकन के पापल-पोप थे उनकी सदाशयता ने तत्कालीन जूलियन कैलेंडर के स्थान पर ग्रेग्रेरियन तेरहवां निर्धारित कैलेंडर समस्त ख्रिस्ती धर्मावलंबियों के लिये सुनिश्चित किया। सोवियत यूनियन सरीखे मार्क्सवादी राजतंत्र ने ग्रेग्रेरियन तेरहवां पोप पापल कैलेंडर रूस की मार्क्सवादी क्रांति वर्ष 1917 से अगले साल 1918 में जूलियन कैलेंडर त्याग कर अपनाया। चीन के मार्क्सवादी नेता माओ त्से तुंग ने राष्ट्रीय चीन (चांग काई शेक) के पतन के तुरंत बाद 1949 में चीन के परंपरावादी राष्ट्रीय कैलेंडर जिसका नव वर्ष का पहला दिन हिन्दुस्तानी पंचांग के अनुसार सूर्य के मकर राशि में संक्रमण के पश्चात आने वाली माघी अमावस जिसे हिन्द के इलाहाबादी लोग मौनी अमावस कहते हैं उसका अमांत पर्व मंदारिन भाषी चीनियों का साल का पहला दिन है। निरीश्वरवादी चीनी शास्ताओं के डर से चीन में 1949 से 2016 तक चीनी कैलेंडर का पहला दिन जिसे New Years Day  कहा जाता है, हजारों हजार वर्ष से चीनी माघी अमावस के अमांत पर्व में मनाते आरहे हैं। इस वर्ष मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 को थी राष्ट्रवादी चीनियों के ताइवान, हांगकांग व सिंगापुर सहित चीन की मुख्य भूमि में भी 8 फरवरी 2016 के अमांत पर्व में मंदारिन भाषी चीनियों  का नया साल धूमधाम से मनाया गया। चीन के अनीश्वरवादी शासकों ने कहा - चीन का सरकारी कैलेंडर तथा नया साल पहली जनवरी को ही मनाया जाता रहेगा पर जो राष्ट्रवादी अथवा अन्य चीनी अपना नया साल माघी अमावस जिसे हिन्दुस्तान में मौनी अमावस कहा जाता है उसी दिन रौनक से मनाया। माओ त्से तुंग ने रूस की नकल कर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अपनाया। भारत के जनतंत्र पर विश्वास करने वाले राजनेता पंडित नेहरू ने आजाद भारत के लिये शक संवत् वाला राष्ट्रीय पंचांग सुनिश्चित किया जिसकी पहली तारीख या नये साल का पहला दिन प्रतिवर्ष 21 मार्च को पड़ता है। उस दिन रात दिन साठ घड़ी अथवा बारह घंटे का दिन और बारह घंटे की रात होती है। ऐसा ही दूसरा दिन प्रतिवर्ष 23 सितंबर को पड़ता है जब रात दिन बराबर होते हैं। जब सूर्य मेष राशि व तुला राशि में संक्रमण करते हैं, रात दिन बारह बारह घंटे होते हैं। सौर मास का पहला दिन संक्रांति तथा आखिरी दिन मांसांति कहा जाता है। पंडित नेहरू ने भारत के राष्ट्रीय पंचांग निर्धारण का उत्तरदायित्त्व आचार्य नरेन्द्र देव को सौंपा। आचार्य नरेन्द्र देव समिति की संस्तुति मानते हुए 21 मार्च से भारत नये साल का पहला दिन माना गया। 
मेषार्क वैशाख 21 मार्च से 20 अप्रेल तक मासांति 20 अप्रेल को।
वृषार्क ज्येष्ठ 21 अप्रेल से 21 मई तक मासांत 21 मई।
मिथुनार्क आषाढ़ 22 मई से 21 जून तक मासांत 21 जून।
कर्कार्क श्रावण 22 जून से 22 जुलाई तक मासांत 22 जुलाई।
सिंहार्क भाद्र 23 जुलाई से 22 अगस्त तक मासांत 22 अगस्त।
कन्यार्क आश्विन 23 अगस्त से 22 सितंबर तक मासांत 22 सितंबर।
तुलार्क कार्तिक 23 सितंबर से 22 अक्टूबर तक मासांत 22 अक्टूबर।
जब लोग मेष संक्रांति (वैशाखी) 13 अप्रेल को मनाते थे उस दिन रात दिन बराबर होते थे। तुला संक्रांति 18 अक्टूबर को भी रात दिन बराबर होते थे। पांच हजार वर्ष पश्चात अब 21 मार्च व 23 सितंबर को रात दिन बारह बारह घंटे के होते हैं। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के इक्कीसवें अध्याय के चौथे पांचवे व छठे श्लोक में कहा है - यदा मेष तुलयोवर्तते तदा अहोरात्राणि समानानि भवंति। महाभारत काल में मेष संक्रांति 13 अप्रेल कभी कभी 14 अप्रेल तथा तुला संक्रांति 18 अक्टूबर कभी कभी 17 अक्टूबर को पड़ती थी। उन दोनों दिन रात दिन बराबर होते थे। अब जलवायु परिवर्तन से रात दिन 21 मार्च व 23 सितंबर को बराबर होते हैं। चौथा व पांचवां श्लोक बताता है - 
यदा वृषभादिषु पंचसु रात्रिषु चरति तदा हान्येववर्धन्ते हृषति च मासे मासे भास्यकैवा घटिका रात्रिषु। 
यदा वृश्चिकादिषु पंचसु वर्तते तदा अहोरात्राणि विपर्ययाणि भवंति। 
वृश्चिकार्क अग्रहायण या अगहन - 23 अक्टूबर से 21 नवंबर तक मासांत 21 नवंबर।
धनुरार्क पौष 22 नवंबर से 21 दिसंबर तक मासांत 21 दिसंबर को।
मकरार्क (मकर संक्रांति) माघ 22 दिसंबर से 20 जनवरी तक मासांत 20 जनवरी।
कुंभार्क फाल्गुन 21 जनवरी से 20 फरवरी तक मासांत 20 फरवरी को।
मीनार्क चैत्र 21 फरवरी से 20 मार्च तक मासांत या वर्षान्त 20 मार्च को।
इसलिये प्रतिवर्ष भारत का बजट फाल्गुन के महीने की आखिरी तारीख 20 फरवरी को संसद में प्रस्तुत होना चाहिये। सरकार व संसद को पूरा चैत्र महीना याने 21 फरवरी से 20 मार्च तक अठाईस या उन्तीस उपलब्ध होते हैं। जी. एस. टी. तथा रेल बजट के सामान्य बजट के साथ जुड़ने के कारण यदि महसूस किया जाये कि बजट के लिये फाल्गुन व चैत्र दो पूरे महीने उपलब्ध हों उस स्थिति में माघ महीने की आखिरी तारीख 20 जनवरी को बजट प्रस्तुत हो और 20 मार्च याने वर्षान्त दिवस तक बजट संसद द्वारा दो महीने की अवधि में पारित हो जाये। राष्ट्रीय पंचांग लागू होने के राज्ञा आदेश तो पंडित नेहरू के शासन काल में साठ वर्ष पहले जारी हो चुके थे पर लोग उन्हें भूल भी चुके हैं। तब एक त्रुटि यह भी रह गयी कि पहले महीने का नाम चैत्र रखा गया जब कि जलवायु परिवर्तन के कारण 21 मार्च को मेष संक्रांति मानी जानी चाहिये थी। इसी वर्ष अप्रेल महीने में लू से ओडिसा, महाराष्ट्र तथा आंध्र में कई मौतें हुईं। यह जलवायु परिवर्तन का ही कारण है। नीति आयोग को सुझाया जाना चाहिये कि आचार्य नरेन्द्र देव संस्तुत राष्ट्रीय पंचांग में सर्वसम्मति से वांछित परिवर्तन किये जायें। सरकारी दस्तावेजों पत्रों आदि में हिन्दुस्तानी महीने वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्र आश्विन कार्तिक मार्गशीर्ष पौष माघ फाल्गुन चैत्र महीने और इनकी तारीखें पहले तथा संक्रमण काल में ग्रेग्रेरियन कैलेंडर की तारीखें महीना व सन भी दिया जाये। सरकारी नया साल मेष संक्रांति 21 मार्च से शुरू माना जाये। महात्मा गांधी ड्योढ़ी शती तक राष्ट्रीय पंचांग पूरा पूरा उपयोग में आये। 21 मार्च 2019 से याने गांधी ड्योढ़ी शती वर्ष में कार्यकर्ताओं का वेतन भी हिन्दुस्तानी महीने अनुसार दिया जाना शुरू हो। राष्ट्रीय कैलेंडर का तुरंत लागू होना भारत की पहली जरूरत है। फेल हो चुके सिस्टम को पटरी में लाने के लिये राष्ट्रीय पंचांग या नेशनल कैलेंडर महत्वपूर्ण विधा है। इसका प्रचलन आने वाले 2 वर्षों में पूर्ण रूप से उपयोग में लाया जाये, यह विचार किया जाये। भारत की पहली राष्ट्रीय जरूरत राष्ट्रीय पंचांग अंगीकृत किये जाने की है। सन 1896 में थिओसोफिकल सोसाइटी के सूत्रधार तथा अ.भा. कांग्रेस की सदर ऐनीबेसेेंट मदन मोहन मालवीय के साथ अल्मोड़ा पधारीं। सर हेनरी रामजे कुमांऊँ के कमिश्नर थे, उनके जीवन काल में ही ब्रिटिश मिशनरी ने रामजे (मिशनरी) हाईस्कूल सृजित किया था। इस हाईस्कूल से पहला मैट्रिक्युलेशन परीक्षा बैच 1887 में निकला। विद्यार्थियों में पहले बैच के एक मैट्रिक्युलेट छात्र तारा दत्त था। तारा दत्त गंगोलीहाट के पास उपराड़ा नामक गांव का रहने वाला था। उसकी पट्टीदारी के उसके ताऊ लगने वाले महामहोपाध्याय पंडित नित्यानंद शास्त्री काशी विद्वत् परिषद के प्रधान थे। तारा दत्त ने अपने गांव उपराड़ा से बेरीनाग के पास बना गांव जहां उसकी मौसी रहती थी मौसी से मिलने गया। चाय, खाना तथा बेरीनाग की चार पांच दुकानों वाले छोटे से बाजार में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के ब्रिटिश मिशनरी भतीजे मिस्टर ग्रांडी से मुलाकात हुई। तारा दत्त की अंग्रेजी बोलने से प्रभावित मिस्टर ग्रांडी ने तारा दत्त को कहा - Well Mr. Tara, Have a cup of Tea. तारा दत्त ग्रांडी के मिशन गिरजाघर के पार्श्व में ग्रांडी के बंगले में जाकर चाय पी आया। गंगोलीहाट व बेरीनाग का सारा इलाका कांेकणस्थ पेशवाई ब्राह्मणों के गांवों का इलाका था। बेरीनाग के इर्दगिर्द ढनौली भट्टीगांव बना खितोली गरों बरसायत कालशिला आदि बड़े गांव तथा पिनारी हपलेक बुडेरा बनोली पिपली पुनगों बजेत कांडे किरौली आदि अनेक गांव तारा दत्त की पंत बिरादरी के गांव थे। गांवों में होहल्ला होगया कि उपराड़ा के तारा दत्त ने ग्रांडी के यहां चाय पी इसलिये उसे जाति बहिष्कृत करो। यह होहल्ला गंगोलीहाट के पंत लोगों के गांव उपराड़ा जजुट अगरौन पाली पिपलेख हाटकाइक ब्राह्मणों के हर गांव में खबर जंगल में आग की तरह फैल गयी। तारा दत्त अल्मोड़ा गया उसे मिशनरियों ने रामजे हाईस्कूल में क्लर्क रख दिया और एक ईसाई महिला से उसकी शादी करा दी। तारा दत्त के पिता इस घटना से पीड़ित होकर दिवंगत हो गये। तारा दत्त ने अपने पिता का अंतिम संस्कार किया तथा एकोद्दिष्ट श्राद्ध व पार्वण श्राद्ध करने लगा। सारे कुमांऊँ में तारा दत्त के ईसाई पुत्र मिस्टर डैनियल पंत के अनुसार एक बहस छिड़ गयी। तरा दत्त ने बपतिस्मा करने से इन्कार कर दिया पर ईसाई पत्नी के साथ रहते रहा। वह स्वयं पाकी था, अपनी पत्नी व बच्चों का छुआ पानी भी नहीं पीता था। इस प्रकरण को कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडे जो तब सोलह सत्रह वर्ष के नौजवान किशोर थे महामना मदनमोहन मालवीय व ऐनीबेसेंट के संज्ञान में प्रस्तुत किया। यह प्रसंग स्वामी विवेकानंद के संज्ञान में भी आया। तारा दत्त के प्रति सहानुभूति बढ़ती रही। थिओसोफिकल सोसाइटी की प्रमुख ऐनीबेसेंट ने कहा - कोई व्यक्ति तभी क्रिश्चियन कहलायेगा जब उसका बपतिस्मा होगया हो। तारा दत्त का बपतिस्मा नहीं हुआ था इसलिये अल्मोड़ा के क्रिश्चियनों ने ऐनीबेसेंट की राय मान कर तारा दत्त को क्रिश्चियन मानने और होने से इन्कार कर दिया। महामना मदनमोहन मालवीय तारा दत्त के नैतिक आदर्श से प्रभावित थे। उन्होंने वाराणसी लौट कर महामहोपाध्याय नित्यांनंद शास्त्री से चर्चा की। काशी विद्वत् परिषद ने घोषित कर दिया कि तारा दत्त अपने माता पिता का श्राद्ध करने का अधिकारी है। धर्मान्तरण कब होता है ? क्या तारा दत्त धर्मान्तरित हुआ ? यह एक यक्ष प्रश्न था जिसका समाधान काशी विद्वत् परिषद ने तारा दत्त द्वारा अपने माता पिता का एकोद्दिष्ट व पार्वण श्राद्धाधिकार पात्रता को मान्यता देना था। विद्वत् परिषद ने तारा दत्त के विवाह ईसाई पत्नी होने के प्रसंग पर विचार नहीं किया। तारा दत्त प्रकरण जहां ब्राह्मणों की अतिवादिता का ज्वलंत उदाहरण है वहीं धार्मिक संपन्नता का तत्कालीन भाारत का दृष्टिपथ है। 

बहुभाषी - बहुलिपि वाले हिन्दुस्तान की दूसरी अनिवार्य जरूरत ? साने गुरू जी की आंतर भारती विधा।
आधुनिक हिन्दुस्तान की दूसरी महत्वपूर्ण तात्कालिक आवश्यकता साने गुरू जी का आंतर भारती भारत की प्रमुख भाषाओं और लिपियों का एक दूसरी भाषा से भाषा शास्त्रीय सरोकार - भारत में लिपियों में नागरी लिपि के समानांतर गुरूमुखी, गुजराती, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तैलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती, दस लिपियां तथा फारसी लिपि सहित ग्यारह लिपियां और उर्दू, कश्मीरी, डोंगरी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कोंकणी, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तैलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती(मणिपुरी), नैपाली, बोडो, मैथिली, संथाली, सिंधी, संस्कृत, भोजपुरी भाषायें हिन्दी तथा अंग्रेजी के समानांतर बोली लिखी जाती हैं इसलिये भाषायी ऊहापोह से बचने के लिये साने गुरू जी द्वारा सुझाया गया मार्ग आंतर भारती भारत की भाषा समस्या का माकूल समाधान है अतएव भारत की तात्कालिक भाषायी जरूरत आंतर भारती है। आंतर भारती का पहला प्रयोग भारत की संसद लोकसभा व राज्यसभा में भारतीय सांसदों को अपनी मातृभाषा अथवा चाहत भाषा में अभिव्यक्ति का अधिकार तुरंत दिया जाये। सांसद से यह अपेक्षा न की जाये कि वह अपना वक्तव्य अंग्रेजी अथवा हिन्दी में दे वरन उसे इस बात की पूरी पूरी छूट मिले कि वह अपना मंतव्य स्वमातृभाषा या चाहत भाषा में स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त करे तथा संसद का भाषायी तंत्र प्रत्येक सदस्य को उसकी मातृभाषा अथवा चाहत भाषा में बहस सुनने की भाषायी व्यवस्था करे। साथ ही आने वाले दस वर्षों में भारत का संविधान भाषा अनुसूची में दर्ज प्रत्येक भाषा में उपलब्ध हो। संसद के दोनों सदनों द्वारा प्रमाणित भारतीय संविधान जब उर्दू पंजाबी गुजराती मराठी कोंकणी कन्नड़ मलयाली तमिल तैलुगु उड़िया बांग्ला असमी बोडो मइती नैपाली मैथिली सिंधी संथाली संस्कृत डोगरी भाषाओं में उनके द्वारा प्रयुक्त लिपियों में प्रस्तुत आधिकारिक भारतीय संविधान हिन्दी व अंग्रेजी के समानांतर उपलब्ध होगा तभी भारत विश्व के भाषायी संदर्भ में अपना माथा ऊँचा रख कर घोषित कर सकेगा कि भारत में स्वभाषा में अभिव्यक्ति की पूर्व स्वतंत्रता है। इसलिये संसद तथा उन राज्यों की विधान मंडलों में जहां एक से ज्यादा भाषा भाषी हैं स्वभाषा या चाहत भाषा में अभिव्यक्ति का स्वाधिकार सुनिश्चित किया जाये। उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय में भारतीय भाषाओं अपना पक्ष प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता का प्रयोग हो सके। यही है साने गुरू जी की आंतर भारती का रहस्य जिसका उपयोग भारत को यथाशीघ्र करना शुरू कर देना चाहिये। 

ध्वस्त डिस्ट्रिक्ट सिस्टम का एकमात्र विकल्प - विकास खंड
भारतीय गणतंत्र में अभी 29 घटक राज्य हैं। इन घटक राज्यों के जिलों की वर्तमान संख्या 754 है। साथ में सात केन्द्र शासित क्षेत्र भी हैं जिनके जिलों की संख्या दिल्ली व पुडुचेरी विधान मंडलों सहित तेईस है जिनमें 11 जिले दिल्ली तथा चार जिले पुडिचेरी के हैं। हिन्दुस्तान में ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर व ब्रिटिश राज ने जिला प्रशासन को ही महत्व दिया तथा बर्तानी राज की जड़ जिला प्रशासन में ही थी। कंपनी बहादुर व ब्रिटिश राज द्वारा बर्तानी राज की जड़ें मजबूत करने के लिये ही शासन सूत्र डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के हाथ सौंपा। जब तक जिला स्तर में ब्रिटिश आई सी एस अफसर तैनात होते थे बर्तानी राज केवल ऐसे अफसरों को ही जिले में तैनाती देता था जो स्थानीय भाषा व बोली के जानकार हों। आजादी मिलते ही बर्तानी आई सी एस अफसर स्वदेश लौट गये और हिन्दुस्तानी आई सी एस अफसरों को जिला शासन चलाने का मौका मिला। भारत सरकार ने आई सी एस की जगह 1948 में आई ए एस इंडियन ऐडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस सृजित किया। भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात 26 जनवरी 1950 से सिस्टम तो वही पुराना बरकरार रहा जिला प्रशासन में हिन्दुस्तानी आई ए एस अफसर तैनात होने शुरू हुए। सिस्टम में स्वातंत्र्योत्तर भारत में शनैः शनैः परिवर्तन की बयार आनी चाहिये थी। जब तक पंडित नेहरू का 27 मार्च 1964 पर्यन्त शासन चलता रहा वे मुख्यमंत्रियों का पाक्षिक मार्गदर्शन अपने अर्धशासकीय हृदयग्राही पत्रों द्वारा संपन्न करते रहते थे। उनके दिवंगत होने के पश्चात भारत की राजनीति और प्रशासनिक ढर्रे में विशेष तौर पर जिला प्रशासन पर राज्यों के क्षत्रपों का दबाव बढ़ता गया। नतीजा यह निकला कि पिछले बावन वर्षों में जिला प्रशासन का अंग्रेजी सिस्टम पूरी तरह ढह गया है। घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों की गणेश परिक्रमा संपन्न करने वाला प्रशासन तंत्र अपने नये अवतार में उदित हुआ है। आसेतु हिमाचल जिला स्तर पर शासन की चूलें हिल चुकी हैं। पुराने जमाने में पुलिस तथा राजस्व कर्मचारियों में रिश्वत की बातें होती थीं। आजादी के बाद देश का कोई महकमा आज बिना सुविधा दक्षिणा के कागज देखना भी पसंद नहीं करता। इसलिये तीसरी अहम जरूरत जिला प्रशासन के बजाय विकास प्रशासन की आधारशिला रखने की तात्कालिक जरूरत है। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग का कायाकल्प कर उसे घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सहयोग से भारतीय नीति आयोग का नया स्वरूप दे डाला है उसी तरह विभिन्न दलों के मुख्यमंत्रियों के परामर्श से जिला प्रशासन की सारी विकास जिम्मेदारी क्षेत्रीय पंचायत/तालुका पंचायत या विकास खंड जिस नाम से भी उसे पुकारें वर्तमान जिलाधिकारी के पद का उत्तरदायित्त्व विकास को मुखर गति देने वाले विकास खंड मुख्य कार्यकारी CEO of Development Administration  कर हर विकास खंड का सीईओ आई ए एस अफसर हो वह विकास खंड के Block Development Officer Tehsildar Station House Officer Block level Education Officer Block level Health Care Medical Officer SubTreasury Land Records Officer Agri-Horti Officer Block level Animal Husbandry Social Security Affairs Officer Taluka Panchayat  या क्षेत्रीय पंचायत का समूचा उत्तरदायित्त्व देखे। मुख्यमंत्रियों के परामर्श से सिस्टम फेलियर वाले जिला प्रशासन कायाकल्प कर प्रत्येक जिले को शासन सूत्र की पहली इकाई के बजाय वर्तमान कमिश्नरी पद्धति का मार्ग दर्शक बनाया जाये। गांव पंचायत नगर पंचायत नगर परिषद नगरपालिका नगर निगम (शहरी क्षेत्रों के लिये ग्रामीण क्षेत्रों के लिये Chief Executive of all Developmental Activities) का दर्जा दिया जाये। वर्तमान सिस्टम फेलियर पर काबू पाने स्वतंत्र भारत का अपना सिस्टम स्थापित करने के लिये Enquiry Commission for Suggesting Alternative। 

तीसरा महत्वपूर्ण सूत्र
सौर वर्ष के समानांतर चान्द्र वर्ष की राष्ट्रीय सांस्कृतिकता
संवत्सर, गुड़िपड़वा, युगादि, चैती चांद वाला चान्द्रमास
आचार्य नरेन्द्र देव ने हिन्दुस्तानी राष्ट्रीय पंचांग के लिये सौर मास या सौर वर्ष के बारह महीने वाला कालान्तरण (कैलेंडर) सुझाया। पंडित नेहरू ने आचार्य नरेन्द्र राष्ट्रीय पंचांग समिति की संस्तुतियां स्वीकार करते हुए सौर वर्ष का पहला दिन चैत्र संक्रांति या मीन संक्रांति संबोधित किया। महीनों का क्रम 21 मार्च से चैत्र, 21 अप्रेल से वैशाख, 22 मई से ज्येष्ठ, 22 जून से आषाढ़, 23 जुलाई से श्रावण, 23 अगस्त से भाद्र, 23 सितंबर से आश्विन, 23 अक्टूबर से कार्तिक, 22 नवंबर से मार्गशीर्ष, 22 दिसंबर से पौष, 21 जनवरी से माघ, 21 फरवरी से फाल्गुन, इस प्रकार 20 मार्च शक संवत्सर पूरा हुआ। इस संस्तुति को भारत के सनातन धर्मावलंबियों की जो विद्वत्सभायें क्रमशः श्रंगज्योतिपुर, नवद्वीप, नालंदा, काशी, कांची, पुणे, द्वारका, श्रंगेरी, तिरूपति, पुरी, हरिद्वार, मथुरा तथा प्रयाग के तीर्थ पुरोहितों का मार्गदर्शन करती हैं उन्होंने आचार्य नरेन्द्र देव समिति की सिफारिशें खारिज कर दीं। सौर मास के 365 या 366 दिन (भारत में हर चौथे वर्ष सौर वर्ष 366 दिन का होता है ग्रेग्रेरियन कैलेंडर हर चौथे वर्ष फरवरी का महीना 29 दिन का मानते हुए उसे लीप ईयर कहता है। 15 अक्टूबर 1582 से यूरप के देशों ने ग्रेग्रेरियन तेरहवें पापल पोप के नेतृत्व में जो कैलेंडर सुनिश्चित किया उसे ग्रेग्रेरियन कैलेंडर कहा जाता है। सोवियत संघ ने इस नये कैलेंडर को रूस की सोवियत क्रांति वर्ष 1917 से से अगले वर्ष 1918 में अंगीकृत किया जबकि चीनी साम्यवादी विचारक तथा पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के प्रवर्तक माओ त्से दुंग ने 1949 में यूरप के ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को अपना कर चीन के परंपरावादी राष्ट्रीय कैलेंडर का त्याग कर चीन के नये वर्ष का पहला दिन पहली जनवरी 1949 को अपना राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित किया। 
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवादिता श्रौत परंपरा मूलक है। यूरप के जो विद्वान भारत शास्त्र जिसे वे इंडोलौजी कहते हैं इंडोलौजी का आध्यात्मिक विज्ञानमूलक विश्लेषण अत्यंत गूढ़ है। कालगणना का प्रारंभ आंखें झपकाने में जो समय लगता है उसे निमिष कहते हैं निमिष पल विपल घटिका अहोरात्र सात वार पंद्रह दिन चौदह दिन का पखवाड़ा जिसे हिन्दुस्तान में शुक्ल पक्ष व कृष्ण पक्ष नाम से जाना जाता है शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कलायें बढ़ कर पूर्णमासी को पूर्ण चंद्र होता है तथा कृष्ण पक्ष में चंद्र कलायें घटती रहती हैं अमावस्या को विधु क्षय कहा जाता है। शुक्ल-कृष्ण पक्ष द्वय का समुच्चय मास या महीना कहलाता है। सत्ताईस नक्षत्र अश्विनी से शुरू होकर रेवती में पूर्ण होते हैं। लगभग सवा उन्तीस दिन का पक्ष द्वय समुच्चय चांद्रमास कहलाता है। हिन्दुस्तानी महीनों में शारदीय परंपरा से पहला महीना आश्विन का नाम अश्विन इसलिये पड़ा क्योंकि आश्विन पूर्णिमा को आमतौर पर अश्विनी नक्षत्र होता है। इसी प्रकार कार्तिक पूर्णिमा कृत्तिका नक्षत्र को वरण करती है तो महीना कार्तिक कहलाता है। शारदीय संकल्प में तीसरा महीना मार्गशीर्ष इसलिये मार्गशीर्ष कहलाता है क्योंकि मृगशिरा नक्षत्र अगहनी पूनम होने से महीना मार्गशीर्ष या मंगसीर कहलाता है। इसी प्रकार पौष नक्षत्र में पूर्णिमा होने के कारण पौष, मघा नक्षत्र में पूर्णिमा होने के कारण माघ, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में पूर्णिमा होने के कारण फाल्गुन, चित्रा नक्षत्र में पूर्णिमा के कारण चैत्र मास कहा जाता है। विशाखा नक्षत्र में पूर्णिमा, ज्येष्ठा नक्षत्र में पूर्णिमा, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में पूर्णिमा के कारण आषाढ़, श्रवण नक्षत्र वाली पूर्णिमा से श्रावण, उत्तरा भाद्र नक्षत्र के कारण भाद्रपद मास नाम पड़े हैं। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के पहले दिन को संसत्सर पड़वा, गुड़ि पड़वा, युगादि, उगादि, चैतीचांद के नाम से भी जाना जाता है। भारत के लोग युगादि, उगादि, गुड़ि पड़वा, संवत्सर पड़वा को ईश्वरी सृष्टि का पहला दिन मानते हैं। आचार्य नरेन्द्र देव ने जो राष्ट्रीय पंचांग सुझाया उसमें विश्व जलवायु परिवर्तन की महती भूमिका है। इसलिये सवा पांच हजार वर्ष पूर्व जब महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का संपादन कर ऋग् यजु साम तथा अथर्व वेद याने चार वेद निर्धारित किये पंचम वेद महाभारत की रचना करने के समानांतर अठारह पुराण गणेश जी को लिखाये जिनमें एक महत्वपूर्ण पुराण श्रीमद्भागवत महापुराण है जिसके पांचवे स्कंध के उन्नीसवें अध्याय के श्लोक चार से छः तक नीचे उद्धृत हैं। 
यदा मेष तुलयावर्तते तदा अहोरात्राणि समानानि भवंति। 
(मेष संक्रांति व तुला संक्रांति को रात दिन बराबर बारह बारह घंटे के होते हैं)
जब कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने मेष तुला संक्रांति का जिक्र किया तब भारत में मेष संक्रांति ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक 13 अप्रेल हर चौथे वर्ष 14 अप्रेल को हुआ करती थी। तुला संक्रांति 18 अक्टूबर और हर चौथे वर्ष 17 अक्टूबर को पड़ती थी। मौसम बदल गया सवा पांच हजार वर्ष बीतने के बाद अब 21 मार्च व 23 सितंबर को रात दिन बराबर हुआ करते हैं इसलिये जलवायु परिवर्तन का पहला नक्शा मेष संक्रांति 21 मार्च को मनाने का उद्घोष कर रहा है तथा तुला संक्रांति 18 अक्टूबर के बजाय 23 सितंबर को मानी जाये। वर्ष 2016 में अप्रेल के महीने में लू चलने से उड़ीस आंध्र में लोग दिवंगत होते रहे इसलिये जलवायु परिवर्तन वाला प्रसंग भारत के सौर मास व चांद्र मास का पुनर्वाचन राष्ट्रीय आवश्यकता है। इसलिये संवत्सर पड़वा गुड़ि पड़वा युगादि उगादि का पुनर्निधारण जरूरी है। ग्रेग्रेरियन XIII  महाशय ने लीप इयर तथा सौ वर्षों में पचीस लीप ईयर होंगे उन्होंने ईस्टर के संडे का निर्धारण करने के लिये पौर्णमासी जिसे भारत के लोग होलिका दहन पूनम कहते हैं उसके पश्चात पड़ने वाले पहले रविवार को ईस्टर सन्डे जब जेसस क्राइस्ट पुनर्जीवित हो गये वह दिन निर्धारित तो किया परंतु 15 अक्टूबर 1582 के पश्चात अठारह वर्ष के पश्चात ग्रेग्रेरियन कैलेंडर की पहली शताब्दी सोलह सौ संपन्न हुई। सोलह सौ सन से 2016 सन तक पिछले चार सौ सोलह वर्ष उससे पहले 15 अक्टूबर 1582 से 1 जनवरी 1600 तक कुल 434 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं इस बीच लीप ईयर की भांति ग्रेग्रेरियन कैलेंडर चार लीप दिनों का निर्धारण नहीं कर पाया है जबकि हिन्दुस्तानी पंचांग निर्माता समाज ने संवत्सर पड़वा, गुड़ि पड़वा, उगादि, युगादि एवं चैती चांद का पहला दिन 20 फरवरी से 20 मार्च (29 दिन ग्रेग्रेरियन लीप ईयर में 30 दिन) तक मीनार्क चैत्र मास मानना चाहिये। इस बीच जिस दिन पूर्णवत्सरी अमावस्या होगी उससे अगला दिन संवत्सर पड़वा, गुड़ि पड़वा, उगादि, युगादि एवं चैती चांद कहलायेगा तथा चित्रा नक्षत्र में जिस दिन पूर्णिमा होगी वही चैती पूनम कहलायेगी इसलिये आसेतु हिमाचल की कालगणना करने वाले पंचांगकारों तथा लब्धप्रतिष्ठ ज्योतिर्विदों तथा सनातन, स्मार्त, वैष्णव, शाक्त, शैव, गोरखपंथी, नाथ पंथी, रैदास पंथी, दादू पंथी, नानक पंथी तथा कबीर पंथी जितने भी समुदाय तथा जातियां भारत में हैं उनकी जातीय परंपराओं को प्रतिष्ठा देते हुए भारतीय चांद्र मास, चांद्र वर्ष तथा भारत के अल्पसंख्यक समाज में सर्वाधिक जनसंख्या वाले इस्लाम धर्मावलंबियों व 355 दिवसीय चांद्र वर्ष को भी और्वोपदिष्ट मार्ग व और्वोपदिष्ट योग के अनुसार सम्मान दिया जाये। जैन, बौद्ध तथा सिख धर्म \कार प्रणवमूलक धर्म हैं उनकी हिन्दुस्तानी परंपरागत आस्था शैली से विलोमधर्मिता नहीं है इसलिये पूर्णिमांत चांद्र मास तथा अमांत चांद्र मास के विविध पक्षों को लोकसंग्रह का मार्ग प्रदर्शित करना पंचांगकारों का राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। कालचक्र निर्धारण के इस महापर्व में जहां सरकार को विशुद्ध सौर मास संक्रांति से लेकर मासांति पर्यन्त महीना 29 दिवस हो, 30 दिन का हो, 31 दिन का हो, यहां तक कि ज्येष्ठ व भाद्र महीने 32 दिन के भी होते सकते हैं। सौर वर्ष का पहला दिन मेष संक्रांति, वैशाखी, विषुवत् संक्रांति, बिखू तथा बिहू नियमित रूप से 21 मार्च को ही मनाया जाये। नये राष्ट्रीय पंचांग में आसेतु हिमाचल समूचे हिन्द का कालचक्र प्रवर्तित हो। किसी भी समुदाय या जाति को यह महसूस न हो कि उनकी जातीय परंपरा का भारत सरकार ने अवमानना की है। आदिम जाति में जिन्हें अंग्रेजों ने ट्राइब कहा उनकी सामाजिक मान्यतायें व आस्थाओं का सम्मान रानी गुडलो की तरह होना चाहिये। त्रिपुरा के आदिवासी राजा की भव्य मूर्ति स्थापित करना बिरसा मुंडा को वाजिब श्रेय देना भारत का राष्ट्र धर्म है। इसलिये भारतवासी विभिन्न आस्था वाले समाज के लिये सेक्यूलरिज्म का सही मतलब तभी समझा जा सकेगा जब कि प्रत्येक संप्रदाय को उसके विगत इतिहास बोध का मार्ग प्रशस्त हो। भारत के पंचायती राज तथा महाकवि तुलसीदास का कथन मांग के खाइबो मजीद पर सोइबो के समानांतर एतो मतो हमारो तुलसीदास ने सम्राट अकबर के बुलाने पर कहा - सीकरी सों संतन को कौन सा सहारो है ? संत अथवा जिसे आधुनिक समाज Ombudsman System  मानता है यूरप के कई उत्तरी यूरोपीय देश Ombudsman System समाज व्यवस्था में स्वयंसेवी शैली से लागू कर रहे हैं। भारत की तात्कालिक जरूरत गैर सरकारी स्तर पर Civil Society नहीं Non-Governmental Social Activity के बजाय संत समाज वाली अंबुद समान मानसिकता संवर्धन की तत्काल जरूरत है। देश में करीब दो करोड़ सन्यासी फकीर संत और सूफी हैं उनका सहयोग लेकर कानून के समानांतर Rule of Mob. को Rule of Law  के स्वयंसेवी मार्ग पर चलने की जरूरत है। 
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