Tuesday, 27 September 2016

जिला प्रशासन सिस्टम और सबका साथ&सबका विकास
जिला प्रशासन सिस्टम कंपनी बहादुर व ब्रिटेन के राजकुल की घिनौनी धरोहर ध्वस्त कर सबका साथ 
सबका विकास संपन्न करने के लिये तालुका/क्षेत्र पंचायत/विकास खंड प्रशासन को समर्थ बनाइये।
 अंग्रेजियत वाला सिस्टम बदल डालिये ? विकास खंड की आबादी अढ़ाई लाख से कम रहे।
स्मार्ट सिटी के नगर निगम महापौर अध्यक्ष नगर पालिका का चुनाव नगर निगम के मतदाताओं द्वारा सीधे किया जाये। मतदाता गांव या शहर एक ही जगह मतदाता रहे जिन जिन महानुभावों की भू भवन संपदा गांव और शहर दोनों जगह है वे तय करें कि मतदाता गांव के रहेंगे या शहर के। एक सौ स्मार्ट सिटी निर्धारण के अनुक्रम में जिन जिन स्मार्ट सिटी को चुना गया है उनके बारे में म्यूनिसिपल कानून में एकरूपता रहे। जिन जिन राज्यों ने म्यूनिसिपल बोर्ड/नगर निगम आदि से जलकल स्यूअरेज व्यवस्था जल निगम, जल संस्थान को दे दी है जहां जहां नगर परिषद नगर पंचायत नगर पालिका व नगर निगम हैं संविधान के संशोधन 73-74 के अनुसार जलकल तथा स्यूअरेज प्रबंधन तथा प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा पुनः नगरपालिकाओं को हस्तांतरित किया जाये। नगरों में प्रत्येक मकान में रेन वाटर हार्वेस्टिंग पद्धति को अनिवार्य किया जाये। जहां जहां बिल्डर समूह बहुमंजिली इमारतें खड़ी करता है उन्हें बहुमंजिली इमारत बनाने की सुविधा ही तब स्वीकार की जाये जब वे रेन वाटर मैनेजमेंट संबंधित शहर या शहरनुमा देहात में बहुमंजिली इमारत खड़ी कर उसे आशियाना चाहने वाले लोगों को बेचते हैं। 
अण्णा हजारे और उनकी सदारत में स्वराज की कल्पना नये तरीके से करने वाले महाशय केजरीवाल कहते - मुहल्ला सभा खड़ी करो। म्यूनिसिपल एक्ट में वार्ड संकल्प है वार्ड आमतौर पर काफी बड़े होते हैं वार्डों के नागरिक अलग अलग मोहल्लों में रहने वाले लोगों से सुपरिचित नहीं भी होते हैं इसलिये मोहल्ला को म्यूनिसिपल वार्ड का दर्जा मिलना चाहिये। वार्ड का सभासद या म्यूनिसिपल काउंसलर अधिक से अधिक 250 घरों व कम से कम 100 घरों के 250 से 300 तक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करे। शहरी क्षेत्रों में म्यूनिसिपल सिस्टम के अलावा स्वयंसेवी अंबुद समान व्यक्तियों की अवधारणा वाला Non-Governmental Apolitical Self Deciplined वानप्रस्थ शैली का सामाजिक ढांचा भी शहरी क्षेत्रों के लिये इसलिये जरूरी है क्योंकि हिन्दुस्तानी शहरों में Rule of Mob. Tendency बढ़ने का खतरा बढ़ते जारहा है। इसलिये श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मोरारजी रणछोड़जी देसाई की अध्यक्षता में जो Administrative Reforms Commission गठित किया। आयोग की एक महत्वपूर्ण सिफारिश उत्तरी यूरप की भांति भारत में Ombudsman  पर विचार किये जाने का आग्रह किया है। भारतीय वाङमय में अंबुद समान शब्द का उल्लेख है। उत्तरी यूरप के स्कैन्डेनेवियन देशों में अंबुद समान पद्धति दीर्घकाल से अस्तित्व में है। जहां जनसंख्या का घनत्व प्रबंधनीय है अंबुद समान संस्था या व्यक्ति समूह कारगर हो सकता है पर जहां भूख प्यास आधि व्याधि का भीषण जंजाल है भारतीय वाङमय का यह कथ्य लागू होता है -
बुभुक्षितम् किं न करोति पापम् क्षीणा नराः निष्करूणाः भवन्ति। 
दिल्ली सहित भारत के तमाम बड़े शहरों में भारतीय वाङमय की उपरोक्त उक्ति लागू होेती है। पहला यक्ष प्रश्न यह है भूख प्यास आधि व्याधि से मनुष्य मात्र किस तरह मुक्त किया जा सकता है ? लोकतंत्र या डेमोक्रेसी क्या कानून बना देने से भूखे लोगों की भूख शांत हो सकती है ? यह कानून से हल होने वाला सवाल नहीं है। शहरी समाज के संपन्न लोगों में करूणा जाग्रत करना सदाचार व नैतिक मार्ग है। सेठ राजा बलराम दास बिड़ला ने साठ वर्ष की उम्र में पहुंचने पर अपने पुत्रों को व्यापार सौंपा व स्वयं काशी वास करने लगे। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - मथुरा में जहां कृष्ण जन्म हुआ वह अब मस्जिद है। मस्जिद के बगल की जमीन खरीदो कृष्ण मंदिर बनाओ। उसमें मंदिर के मुख्य द्वार पर अंकित करो - यावत् जठरम् भ्रियेत तावत्स्वत्वं हि देहिनाम्। अधिकम् योऽभिमन्येत सः स्तेन दण्ड मर्हति। व्यावसायिक जीवन से उपराम लेने वाले राजा बलदेव दास बिड़ला ने अपने गांव पिलानी राजस्थान से कोलकाता जाते समय एक लोटा, एक रस्सी व पहनने के कम से कम कपड़ों सहित कोलकाता में व्यापार शुरू किया। बर्तानी सरकार ने उन्हें राजा की उपाधि दी। उन्होंने कोलकाता को औद्योगिक नगर में बदल डाला। आज भारत की पहली जरूरत राजा बलदेव दास बिड़ला सरीखे उपराम लेकर सामान्य जन के बीच जीवन बिताने की इच्छा रखने वाले श्रीमंत धनी पुरूषों के आम आदमी के बीच आम आदमी की तरह जीवन जीने की जिजिविषा वाले धनी पुरूषों के हृदय परिवर्तन की जरूरत है। करूणा सदावर्त नंगे को कपड़ा भूखे को भोजन प्यासे को पानी तथा रोगी को उपचार मुहैया कर निरोग रहने का गुर सिखाने की जरूरत है। संयुक्त परिवार व्यवस्था टूटने से जिन्दगी भर आराम से जिन्दगी बिताने वाले संपन्न व्यक्ति भी आज अकेले रह रहे हैं। उन्हें अपने लिये भोजन तैयार करने की क्षमता भी बुढ़ापे ने छीन ली है। पास में धन है दौलत संपदा है पर शक्ति नहीं है। उनके पुत्र पुत्रियां अपना घर देख रही हैं। संपन्नता बढ़ रही है पर परिवारों के टूटने से जहां बूढ़े लोग तरस रहे हैं बच्चों विशेष कर अपंग बच्चों की भी सही सही देखभाल करने की फुर्सत उनके मां बाप को नहीं है। इसलिये सरकारी कानून व्यवस्था के समानांतर मनुष्य मात्र में करूणा का भाव उत्पन्न कराना आज के हिन्दुस्तान की पहली जरूरत है, यह कौन करे ? डेमोक्रेसी की सरकार कानून तो पास करा सकती है पर समाज को सदाचार का रास्ता केवल करूणा से मिल सकता है। सिविल सोसाइटी एवं एन जी ओ का अपना अपना ऐजेंडा है। उनके ऐजेंडे में करूणा के लिये कहीं कोई ठौर नहीं है। Ministry of Minority Affairs ने दीनदयाल अंत्योदय भवन का आकार प्रधानमंत्री के सबका साथ सबका विकास आह््वान कर पर्यावरण भवन का नया नामकरण कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय को उद्धृत करते हुए ‘हमारी भावना और हमारा सिद्धांत है कि मैले कुचैले सीधे साधे गरीब लोग हमारे नारायण हैं। हमें उनकी पूजा करनी है। जिस दिन हम उनके पक्के घर बना देंगे जिस दिन हम इनके बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा और जीवन दर्शन का ज्ञान देंगे जिस दिन हम इनके हाथ और पांव की बिवाइयों को भरेंगे और जिस दिन हम इनको उद्योग और धंधा की शिक्षा देकर इनकी आय को ऊँचा उठा देंगे उस दिन हमारा मातृभाव सही अर्थों में व्यक्त होगा।’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा - ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने हमेशा कहा - चरैवेति चरैवेति। उनका यह कथन उत्साहवर्धक था कि आप अपने मिशन या लक्ष्य बाधाओं के बावजूद याद रखें ताकि आप त्याग (परहित सम पुण्य नहिं भाई) व कड़ी मेहनत को न छोड़ेें।’ हम सभी को पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा सुझाया गया रास्ता छोड़ना नहीं चाहिये। मिलजुल कर काम करने से उनके अंत्योदय के स्वप्न को साकार करने में अपना योगदान देना चाहिये। आज भारत की पहली जरूरत भूखे को भोजन प्यासे को पानी वस्त्रहीन नंगे को पहनने का कपड़ा तथा रेनबसेरा की पहली जरूरत पूरी करने से ही अंत्योदय का संकल्प शिवसंकल्प बन सकता है। सवाल यह है कि यह कौन करे ? मुसलमान संपन्न समाज द्वारा चल रहे यतीमखानों, सदावर्ताें भूखों को भोजन कराने वाले भलेमानसों को पहचान कर उन्हें दीनदयाल उपाध्याय और उनसे पहले महात्मा गांधी तथा स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र नारायण - गरीब आदमी को नारायण का अवतार माना। वैसे नारायण के माने ही श्वास प्रक्रिया है, नारायण जिन्दादिली का भी नाम है। 
डाक्टर लोहिया स्वयं को कुजात गांधीवादी कहते थे पर उनका गुरूमंत्र चौखंभा राज गांव, शहर, विकासखंड, घटक राज्य सरकार, यूनियन टेेरीटरी तथा भारतीय संसद ये चार खंभे उनके चौखंभा राज के स्तूप बनें। लोहिया संकल्पित चौखंभा राज कायम करने के लिये संविधान संशोधन 73वां व 74वां का पुनर्पाठन कर जिला प्रशासन सिस्टम को लुप्त कर विकास खंड स्तर पर प्रशासन की मौलिक इकाई सुस्थापित करनी होगी तभी सिस्टम फेलियर से होरहे राष्ट्रव्यापी नुकसान को रोका जा सकता है पर जिला प्रशासन जिस पर घटक राज्यों की सरकारों की चूलें हैं सिस्टम फेलियर से ध्वस्त जिला प्रशासन को लुप्त करने व जिला प्रशासन की भूमिका का निर्वाह विकास खंड प्रशासन द्वारा हो। इस महत्वपूर्ण बदलाव के लिये भारत सरकार को राज्य सरकारों की सहमति इसलिये जरूरी है जिससे विभिन्न राजनीतिक दलों व घटक राज्यों का शासन चलाने वाले क्षत्रपों एवं पौलीटिकल सुप्रीमो नेतृत्व को भी विश्वास में लेकर उनकी राय को महत्व देना जरूरी होगा इसलिये समूचे विषय पर घटक राज्य सरकारों द्वारा सुझाये गये तीन व्यक्तियों के Panel से Distt. Administration System Enquiry Commission गठित किया जाना चाहिये। कंपनी बहादुर तथा बर्तानी राज द्वारा स्थापित जिला प्रशासन सिस्टम का अध्ययन, उसके गुण अवगुण कंपनी बहादुर तथा बर्तानी राज द्वारा समय समय पर उठाये गये कदम तथा उनकी पड़ताल करने की जरूरत है।
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