Tuesday, 20 September 2016

क्या आ-आ-पा- आम आदमी पार्टी अपना आपा गँवा चुकी है?
क्या आ-आ-पा- सुप्रीमो केजरीवाल भटक तो नहीं गये?
अण्णा हजारे उवाच - जन लोकपाल अभियान के दर्मियान हिन्द की लोकधानी सहित केन्द्रीय सरकार को राजधानी में जंतर मंतर में क्या कहा ? अरविन्द केजरीवाल की पुस्तिका स्वराज की प्रशंसा करते हुए अण्णा हजारे बोले - अरविन्द केजरीवाल की पुस्तक स्वराज हिन्द के रामराज की कल्पना का प्रेरक है। पांच वर्ष के भीतर अण्णा हजारे ने फिर कहा - केजरीवाल ने मेरे साथ काम किया। कई वर्षों तक अण्णा हजारे ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा - किसी संगठन के कार्यकर्त्ता शिष्ट होने चाहिये। उनका व्यवहार मर्यादित आदर्श वाला होने से ही कार्यक्रम को गति देगा। कार्यकर्त्ता विचार शुद्धि का वाहक हो तथा जिस समाज में वह रहता है उसकी छवि निष्कंलक हो। जब अरविन्द केजरीवाल ने एक राजनीतिक जमात खड़ी कर ली मैंने अपनी मर्यादा बनाये रखी। अरविन्द की राजनीतिक जिजिविषा से नाता तोड़ दिया। अरविन्द केजरीवाल को फिर कहा - मेरे और आपके आदर्श जुदा जुदा हैं। अरस्तू की उक्ति को हिन्दुस्तान टाइम्स ने अण्णा के हृदय की पीड़ा व साथ साथ प्रस्तुत करते हुए सुदीक्षित मानसिकता की पहचान ही यह है कि वह उस विचार को अंगीकृत किये बिना भी उसे सुचिन्तनीय मानता है। विवेकशील खुला दिमाग वैचारिक आदर्श प्रस्तुत करता है।
मोहनदास करमचंद गांधी बैरिस्टरी की पढ़ाई लन्दन में पूरी करने के दर्मियान ही हिन्द के क्रांतिकारियों से मिले जिनकी सोच थी कि बिना हथियार उठाये, बिना हिंसा किये हिन्द की आजादी दिवास्वप्न है। मोहनदास करमचंद गांधी ने रक्तरंजित क्रांति में विश्वास करने वाले हिन्द के नौजवानों से बात की। उन्हें ध्यानपूर्वक सुना चिंतन मनन किया। जब बारिस्टरी करने दक्षिण अफ्रीका गये तो वहां उन्होंने हिन्दुस्तानियों के बीच इंडियन ओपीनियन नामक एक गुजराती पत्रिका शुरू की। इस पत्रिका के ग्राहक तो कुल 850 थे पर इंडियन ओपीनियन क्या लिख रहा है इसे पारस्परिक संवाद के जरिये समझने वाले लोगों की संख्या का आगणन करते हुए उन्होंने लिखा - हजारों हिन्दुस्तानी जो दक्षिण अफ्रीका में तब रहते थे इंडियन ओपीनियन में व्यक्त विचारों को समझने का निरंतर प्रयास करते रहते। इंडियन ओपीनियन का यह हिन्द स्वराज महात्मा गांधी की वैचारिक क्रांति का अग्रदूत हिन्द स्वराज के रूप में सामने आया जिसमें महात्मा संवाद के सूत्रधार के रूप में अधिपति तथा लन्दन में भारतीय क्रांतिकारी युवा वर्ग को उन्होंने वाचक वार्ता पूछने वाला बताया। दरअसल में महात्मा गांधी का 20 अध्याय वाला हिन्द स्वराज कृष्णार्जुन संवाद सरीखा युग प्रवर्तनकारी प्रकाशन है। यूरप की सभी मुख्य भाषाओं के विद्वान विचारकों ने महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज का अपनी अपनी भाषा में अनुवाद करा कर पढ़ा और उनकी यह राय बनी कि हिन्द स्वराज यूरप की औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न सामाजिकता को सही रास्ते में लाने वाला कथ्य है। यूरप के जिन विद्वानों चिंतको तथा मानवता हित संवर्धक मनीषियों ने महात्मा गांधी जो तब मोहनदास करमचंद गांधी नाम से जाने जाते थे, यूरप के विद्वत समाज को उद्वेलित किया। उन विचारकों ने गुजराती भाषा में लिपि बद्ध इंडियन ओपीनियन में निरंतरता लिये छपी हिन्द स्वराज को आधुनिक औद्योगिक युग परिवर्तन के लिये वाम औषध बताया। भारत के लोगों में वहां ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवदगीता, योग वाशिष्ठ सहित वैदिक काल रचित ब्राह्मण ग्रंथ तथा उपनिषद समूह विवेक के आगार थे। संभवतः आधुनिक भारत भारतियों में एकनाथ महाराज रचित अठारह हजार अभंग जिन्हें भारत के मराठी भाषी एकनाथी भागवत कहते हैं साथ संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी जो कृष्णार्जुन संवाद का मराठी उद्गान है, महाराष्ट्र में जनसामान्य श्रीमद्भगवदगीता पाठ करने के बजाय ज्ञानेश्वरी पाठ करता है। तुलसी रचित रामचरित मानस रामकथा उद्गान अवधी में करता है। देश के मौजूदा प्रधानमंत्री गुजराती भाषी हैं। गुजराती लेखकों, कवियों व साहित्यकारों की एक विशाल पंगत है। महात्मा गांधी ने महात्मा माने जाने से पहले लिखी हिन्द स्वराज के बीस अध्यायों की साहित्यिक मीमांसा सहित संपादित किये जाने की जरूरत है। राष्ट्रवादी साने गुरू जी के गुरूमंत्र आंतर भारती की भारत की भाषायी वाणियों की विशेषता को उसी तरह संपादित किये जाने की जरूरत है जिस तरह वैदिक छन्दों व ऋचाओं का संपादन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने किया। गुजरात के साहित्यकारों की पंगत को महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज यूरप के विद्वानों के द्वारा व्यक्त भावनाओं के संदर्भ में आधुनिक गुजराती में संपादित किये जाने की तात्कालिक आवश्यकता है। भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री षोडषी लोकसभा के नेता सदन आशुवक्ता हैं। हिन्दी में उनकी भाषण कला हिन्दीतर भाषा भाषी डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के समान है। डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी की हिन्दी भाषण कला के प्रशंसक पंडित नेहरू थे। हिन्दी भाषियों में आशुवक्ताओं में सेठ गोविन्द दास, सेठ दामोदर स्वरूप, डाक्टर लोहिया, जयप्रकाश नारायण तथा भारत के तेरहवें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आज देश में आशु भाषण कला के एकमात्र माहिर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी हैं। उन्हें भारत की आंतर भारती को वैश्विक रूप दिलाने के लिये पहल करनी ही होगी। हिन्द स्वराज का संपादित संस्करण गांधी ड्योढ़ी शताब्दी वर्ष 2 अक्टूबर 2019 तक विश्व की सभी मुख्य भाषाओं में आये क्योंकि कृष्णार्जुन संवाद की तरह गांधी क्रांतिकारी संवाद का वाहक हिन्द स्वराज है। हिन्द स्वराज और अरविन्द केजरीवाल स्वराज में दोनों स्वराज हैं एक है हिन्द स्वराज और दूसरा है हिन्दुस्तान की आजादी मिलने के बाद पंडित नेहरू द्वारा संकल्पित स्थापित संवर्धित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेकनालाजी प्रायोजना अंतर्गत खड़गपुर स्थित आई.आई.टी. से मैकेनिकल इंजीनियर अरविन्द केजरीवाल की पुस्तक ‘स्वराज’। केजरीवाल महाशय की कृति अंग्रेजी में है या हिन्दी में जिस तरह मोहनदास करमचंद गांधी की तूलिका ने उनकी मातृभाषा गुजराती के माध्यम से अभिव्यक्ति की यूरप के सैकड़ों विद्वानों व विवेकशील चिंतकों ने मोहनदास करमचंद गांधी की पहली रचना को अपनी अपनी भाषा में उल्था कर पढ़ा तथा यूरप के लिये औद्योगिक क्रांति को अभिशाप माना। अधिसंख्य विचारकों की टालस्टाय सहित यह राय थी कि दुनियां के एक हिन्दू ने यूरप को नया मार्ग दिखाया। हिन्द स्वराज की उपादेयता के बारे में यूरप की समृद्ध भाषाओं में लेख छपे। भारत के लिये मोहनदास करमचंद गांधी की यह रचना ‘घर का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध’ कहावत चरितार्थ हुई। पंडित नेहरू के समूचे साहित्य तथा पत्राचार में हिन्द स्वराज को उद्देश्य एवं अर्थहीन नहीं बताया गया। अगर हम यह कहें कि महात्मा गांधी कहलाये जाने से पहले यद्यपि डाक्टर जीवराज मेहता ने अपनी कृति में मोहनदास करमचंद गांधी को उनकी (गांधी जी की) पहली रचना के तुरंत पश्चात अपनी पुस्तक - मोहनदास करमचंद गांधी ए रिअल महात्मा कहा गया पर भारत के लोग अब भी यह कहते नहीं अघाते कि मोहनदास करमचंद गांधी को सर्वप्रथम महात्मा विशेषण कोलकाता में कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अभिव्यक्त किया। श्रीराम मल्होत्रा ने अपने ऐतिहासिक सूक्ष्म अनुसंधान में यह निश्चित किया कि दक्षिण अफ्रीका में डाक्टरी करने वाले गुजराती भाषी डाक्टर जीवराज मेहता ने मोहनदास करमचंद गांधी को 1907-08 में ही महात्मा घोषित कर दिया था। हिन्द स्वराज को महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरू प्रोफेसर गोखले ने मोहनदास करमचंद गांधी रचित हिन्द स्वराज का मूर्ख की रचना बताया। प्रोफेसर गोखले का महात्मा सम्मान करते थे। उन्होंने अपने राजनैतिक गुरू की उक्ति को अन्यथा नहीं लिया। कोई परूष वाक्य गुरू के लिये प्रयोग भी नहीं किया। मूलतः मराठी भाषी गुजराती तथा हिन्दी अभिव्यक्ति के धनी तथा गांधीवाद व्याख्याता काका साहेब कालेलकर (महाशय दत्तात्रेय वामन कालेलकर) ने हिन्द स्वराज लिखे जाने के पचास वर्ष पश्चात 1.8.59 को यह व्यक्त किया कि पंडित नेहरू और संत विनोबा भावे भी हिन्द स्वराज में गांधी अभिव्यक्ति के पक्षधर नहीं थे। अगर हम यह कहें कि महात्मा गांधी के प्रथम सत्याग्रही विनोबा भावे ही गांधी अध्यात्म के व्याख्याता थे वैसे ही जैसे आदि शंकर वेदांत तथा शंकर पोषित अद्वैत के प्रथम प्रतिपादक थे। वैसे महात्मा गांधी की राजनीति को सटीक हृदयंगम करने वाले व्यक्तित्त्व के स्वामी पंडित नेहरू थे। उन्हें अपने स्वराजिस्ट पिता पंडित मोतीलाल नेहरू की रजनीतिक शैली मंजूर नहीं थी। वे गांधी प्रेरित पूर्ण स्वराज के प्रथम जनतांत्रिक आह्वानकर्ता थे। वैसे वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है इस उक्ति के प्रणेता और पंडित नेहरू में पीढ़ी अंतराल था। विचार को आचार में परिवर्तित करने तथा वैयक्तिक आचार को सामाजिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने का भगीरथ प्रयास पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1930 के दिन रावी के तट पर उद्घोषित किया था।
महात्मा गांधी की पहली रचना हिन्द स्वराज एक संवाद है। यह संवाद अधिपति तथा वाचक के मध्य है। संवाद में अधिपति की भूमिका महात्मा गांधी स्वयं निर्वाह कर रहे हैं इस संवाद की पृष्ठभूमि में विलायत में भारत की आजादी के लिये क्रांतिकारी तरीका अपनाने वाले भारतीय नवयुवाओं से मोहनदास करमचंद गांधी ने संवाद किया। उनकी बातें ध्यानपूर्वक गौर से सुनीं यद्यपि आस्था की दृष्टि से महात्मा गांधी अहिंसा परमो श्रेयः मानने वाले परम वैष्णव थे। गुजरात में अहिंसा की दूसरी वेगवती प्रवाहमान धारा अहिंसा परमो धर्मः की है जो जैन धर्म का मूलाधार है। महात्मा गांधी ने विलायत हिन्द के उन सभी नौजवानों से दिली संवाद स्थापित किया। उन्होंने बड़े गौर से हर क्रांतिकारी स्वतंत्रता चाहने वाले युवा से दिल खोल कर बात की। वह उनके आध्यात्मिक अधिपतित्य की धारा थी। यद्यपि अमृतलाल नाणावटी ने अधिपति के हिन्दी में संपादक तथा वाचक के लिये पाठक शब्द का प्रयोग किया है तथा रामचंद्र गुहा सरीखे आधुनिक इतिहासवेत्ता महानुभाव ने अधिपति के लिये एडीटर तथा वाचक के लिये टीचर शब्द उपयोग में लाये इसलिये जरूरत इस बात की है कि भाषायी ऊहापोह के हालात का परिमार्जन करने के लिये प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक साने गुरू जी की आंतर भारती ही कारगर नुस्खा प्रतीत होता है। आज हिन्द की पहली जरूरत महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज के सामयिक संपादन की है इसलिये गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री को गुजराती भाषा के विद्वानों (जो गुजरात में रह कर गुजराती भाषा में ही लिखते हैं) उनसे तथा भारत के अन्य घटक राज्यों में बस गये गुजराती भाषी गुजराती विद्वान जो अपनी मातृभाषा के अलावा जहां बस गये उस घटक राज्य की राजभाषा या लोकभाषा के भी अच्छे जानकार हैं उनसे परामर्श करें तथा भारत से बाहर रहने वाले ऐेसे गुजराती भाषियों का भी सहयोग लिया जाये जो विदेशों में रह कर भी स्वभाषा लेखन का कार्य करते हैं उनका भी परामर्श लिया जाये। इस ब्लागर का एक अभिन्न मित्र जयंत कवि न्यूजर्सी में रहता है जन्मभूमि का संवाददाता रहा है। विदेश में स्थायी तौर पर व्यापारिक कार्य के बाद भी स्वभाषा का प्रेम यथावत बना हुआ है। जरूरत इस बात की है कि गुजरात के मुख्यमंत्री गुजरात, भारत के घटक राज्यों में बस गये गुजराती तथा विदेशों में बस गये गुजराती भाषी गुजराती विद्वानों के परामर्श से मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1908 में प्रस्तुत हिन्द स्वराज का संपादन आधुनिक गुजराती में संपन्न किया जाये। गुजरात सरकार सुसंपादित हिन्द स्वराज का प्रकाशन कर भारत सरकार से अनुरोध करे कि हिन्द स्वराज का आंतर भारती के तहत भारत की सभी संविधान भाषा सूची बद्ध भाषाओं में अनुवादित करने का उत्तरदायित्त्व केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत जो राजभाषा विभाग है उसे आंतर भारती भाषा विभाग के तौर पर संवर्धित किया जाये तथा घटक राज्यों से अनुरोध किया जाये कि घटक राज्य की राजभाषा में हिन्द स्वराज अनुवादित कर गांधी 150वीं ड्योढ़ी शती के अवसर पर हर भारतीय भाषा में हिन्द स्वराज उपलब्ध हो। संयुक्त राष्ट्र संघ महात्मा गांधी जन्मदिन 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है। विश्व की प्रत्येक भाषा में जो राष्ट्र संघ सदस्य देशों की राजभाषायें हैं उन सभी में हिन्द स्वराज का अनुवाद उपलब्ध करने का उत्तरदायित्त्व यूएनओ जनरल काउंसिल के नव निर्वाचित अध्यक्ष थामसन महाशय निर्वाह करें। विश्व शांति के लिये हिन्द स्वराज बहुमूल्य प्रकाशन है। हिन्द स्वराज के बारे में जो अभिमत समय समय पर जारी हुए उनका भी ब्यौरा दिया जाये। हिन्द स्वराज में व्यक्त विचार युग प्रवर्तक हैं। संसार में शांति अहिंसा तथा विवेक का मार्ग अपनाने के लिये हिन्द स्वराज की भूमिका महत्वपूर्ण है।
अण्णा हजारे भारत में अंबुद समान जिसे अंग्रेजी में ओमबड्समैन कहा जाता है अंबुद समान समाज व्यवस्था की शैली का निर्धारण मुंबई से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक दिनमान के यशस्वी संपादक ने विगत शताब्दी के आठवें दशक में पूर्वार्ध में प्रस्तुत कर दिया था। मोरारजी रणछोड़जी देसाई के नेतृत्व में इंदिरा गांधी सरकार ने प्र्रशासनिक सुधार आयोग गठित किया जब मोरारजी देसाई की संस्तुति का आधार अंबुद समान था। विचार कभी कभी आचार का आकार ग्रहण नहीं कर पाता। सद्विचार को प्रयोग में लाना अण्णा हजारे ने जुलाई 2012 में अरविन्द केजरीवाल लिखित स्वराज के प्राक्कथन - दो शब्द शीर्षक से लिखा - ‘आज देश में बदलाव की एक लहर दिख रही है। हर धर्म हर जाति हर उम्र के लोग अमीर हों या गरीब शहरी हों या ग्रामीण सब की आंख बदलाव का सपना देख रही है।’ अगर यह जोश कायम रहा तो आजाद भारत के इतिहास में जो काम 64 साल में नहीं हुआ वह 10 साल में हो सकता है लेकिन इस मोड़ पर यह समझ लेना जरूरी है कि हमें आगे क्या करना है। यह अवसर सत्ता परिवर्तन जैसे किसी छोटे लक्ष्य में न खो जाये इसलिये बहुत गहरे से यह समझना होगा कि यहां से भारत को किधर को जाना है।
गांधी जी कहते थे - सच्ची लोकशाही केन्द्र में बैठे 20 लोग नहीं चला सकते। सत्ता के केन्द्र बिन्दु इस समय दिल्ली मुंबई कोलकाता जैसी राजधानियों में हैं मैं उसे भारत के सात लाख गांवों में बांटना चाहूँगा। 26 जनवरी 1950 को हमने पहला प्रजा सत्ता दिन तो मनाया लेकिन गांधी जी का यह लोकशाही मंत्र हम भूल गये इसीलिये आज अमीर गरीब का फासला इतना बढ़ा हुआ है। जाति धर्म की खाई गहरी होरही है। मंहगाई और भ्रष्टाचार के चलते आम आदमी का जीना मुश्किल होरहा है। आजादी के 64 साल बाद भी न हर हाथ को काम है और न हर पेट को रोटी। आज अगर देश की अर्थनीति को बदलना है तो गांव की अर्थनीति को बदलना होगा और यह अर्थनीति दिल्ली में बैठ कर बन रही योजनाओं या इसके तहत बांटे जारहे पैसे से नहीं बदलेगी। यह काम होगा लोगों के मजबूत बनने से। आज हमारे लोकतंत्र में तंत्र लोक पर हावी है। कभी कभी तो लगता है कि तंत्र ही लोक का मालिक बन कर बैठ गया है। हमें सच्ची लोकशाही का मतलब समझना होगा। हमें यह समझना होगा कि लोगों की भूमिका पांच साल में एक बार वोट देकर सरकार चुनने की ही नहीं होती। इसके लिये सत्ता में आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। सत्ता के केन्द्र बिन्दुओं को दिल्ली और राजधानियों से निकाल कर गांव और कस्बों तक लाना होगा।
आज भी देश में जहां जहां ग्राम सभा खड़ी होगयी है वहां कुछ साल में खुशहाली बढ़ गयी है। हमने रालेगण सिद्धि में कुछ ऐसे प्रयोग किये। इस पुस्तक में कई और ऐसे गांवों की कहानी बतायी गयी है। जिस गांव में भी लोगों ने सरकार की दखलंदाजी के बिना जमीन ओर पानी की प्लानिंग की है उसी गांव में हाथ के लिये काम और पेट के लिये रोटी का प्रश्न छूट गया है। आज हमें मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है तो इन गांवों के माडल से सबक लेते हुए व्यवस्था बदलनी होगी। एक ऐसी व्यवस्था पर काम करना होगा जहां गांव में ग्राम सभा नगरों में मुहल्ला सभा सत्ता के केन्द्र में हो।
प्रस्तुत पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गयी है कि व्यवस्था में बदलाव का मतलब क्या है ? कौन से कानून किस स्तर पर बदलने से सही मायने में स्वराज होगा। सच्ची लोकशाही के लिये गांव से लेकर संसद तक की व्यवस्था क्या होगी ? इन सब सवालों के जवाब समझना हर उस आदमी के लिये जरूरी है जो देश में बदलाव की उम्मीद लगाये बैठा है। मैं समझता हूँ यह पुस्तक आगे के भारत का घोषणा पत्र है। उम्मीद है कि बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, ऊँचनीच, हिंसा, नक्सलवाद जैसी समस्याओं के जटिल समाधान खोज रही दुनियां इस पुस्तक के माध्यम से इन समस्याओं का सरल समाधान खोज सकेगी। अण्णा हजारे का उपरोक्त पंचसूत्री प्राक्कथन उनका शिवसंकल्प था पर क्या इस शिवसंकल्प को केजरीवाल लिखित स्वराज युगान्तरकारी रचना बना पायेगा ? यही यक्ष प्रश्न है। आगे हम देखेंगे कि महाशय केजरीवाल ने स्वराज का मूल लेखन किस भाषा में किया ? स्वराज के अंग्रेजी संस्करण से यह प्रतीति होती है कि मौलिक लेखन अंग्रेजी में हुआ है पर लेखक ने यह उद्बोधन नहीं किया कि उनकी मूल रचना अंग्रेजी में रचित है। सामाजिक कार्यकर्ता तथा अपनी धुन के पक्के अण्णा हजारे ने अपना पांच सूत्री प्राक्कथन हिन्दी में लिखा है जिसकी तारीख इंगित नहीं है महीना जुलाई 2012 लिखा गया है। हार्पर हिन्दी संस्करण में हार्पर कालिंस पब्लिशर्स इंडिया द्वारा 2012 में प्रकाशित में कहा गया है - लेखक इस पुस्तक का मूल रचनाकार होने का नैतिक दावा करता हैै। इस किताब में व्यक्त किये गये सभी विचार तथा दृष्टिकोण लेखक के अपने हैं और तथ्य जैसे उन्होंने बयां किये हैं, प्रकाशक किसी भी तौर पर इनके लिये जिम्मेदार नहीं है। स्वराज के अंग्रेजी संस्करण में प्रकाशक ने यह नहीं कहा या लिखा कि पुस्तक स्वराज के लेखक अरविन्द केजरीवाल हैं। पुस्तक के बारे में प्रकाशक का कहना है - Arvind Kejriwal is a social activist fighting to change the political system by bringing a transparency and peoples participation. He is the main Architect of the Anna Hazare led anti corruption agitation that shock the Nation in 2011-2012.
विवेच्य विषय यह है कि क्या प्राचीनकालीन भारत जिसके एक नगर वैशाली नरेश का उल्लेख महाशय अरविन्द केजरीवाल रचित स्वराज में हुआ है तत्कालीन भारत पंचायती शासन पद्धति अपनाता था। विष्णु पुराण के अनुसार ‘कूर्म मगध खस गणैः’ खस गणतंत्र में एक मुख्य मागधी खस गणतंत्र लिच्छिवियों का गणतंत्र था जिसके राजा (लोकान् अनुरंजते इति राजा) राजा शब्द ही इस बात का प्रतीक है जो व्यक्ति लोक, समाज को सुशासन दे वही राजा है। अराजकता तथा राष्ट्रपाल निरंकुशता को समाप्त करने वाला समर्थ लोक नेतृत्व की दस्युधर्मी तथा अराजक तत्वों पर रोक लगाने वाला व्यक्तित्त्व ही राजा कहलाता था। लगता है महाशय केजरीवाल ने वैशाली की नगरवधू उपन्यास पढ़ कर कहानी गढ़ी है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के नवम स्कंध के दूसरे अध्याय में वैशाली संबंधी ब्यौरे इस प्रकार हैं।
विशालः शून्य बंधुश्च धूम्रकेतुश्च तत्सुताः, विशाले वंशकृद् राजा वैशालीम् निर्ममे पुरीम्।
हेमचन्द्रः सुतः तस्य धूम्राक्षस्य तस्य चात्मजः, तत्पुत्रात् संयमादासीत् कृशाश्वः सहदेवजः।
कृशाश्वात् सोमक्तोऽभूत् योऽश्वमेधे यऽस्यतिम्, इष्टवा पुरूष मायाग्रयाम् गतिं योगेश्वरा श्रितः।
 सौमदत्तिस्तु सुमतिः तत्सुतो जन्मेजयः, ऐते वैशाल भूपाला तृणविन्दोर्यशोधरा।
यदि महाशय केजरीवाल जो यह दावा कर रहे हैं कि स्वराज उनकी स्व कृति है उन्होंने यदि व्यास रचित अष्टादश पुराणों में से विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भागवत महापुराण वर्णित वैशाली विवरण तथा पिंगला वेश्या आख्यान - वैशाली की नगरवधू उपन्यास के पढ़ने के पश्चात ध्यानपूर्वक मनन करते हुए अपनी कथा कही होती तो उसमें सारतत्व ज्यादा ग्राह्य हो सकता था। नगरवधू आख्यान के बारे में जब पंडित नेहरू 1934 में इलाहाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष निर्वाचित हुए पार्षदों में महामना मदनमोहन मालवीय भी थे। इलाहाबाद शहर से वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिये इलाहाबाद म्यूनिसिपैलिटी में प्रस्ताव आया। पंडित नेहरू ने जो वक्तव्य इलाहाबाद म्यूनिसिपल बोर्ड की बैठक में वेश्यावृत्ति निवारण के लिये दिया वह आंख खोलने वाला था। पंडित नेहरू का सामाजिक दोष निवारण का पक्ष व विपक्ष संबंधी विवेचनात्मक वक्तव्य है। महाशय केजरीवाल नेे स्वराज्य रचना में वाणी का सत्प्रयोग संभवतः उचित नहीं समझा। महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज तथा केजरीवाल महाशय के स्वराज का गहन अनुशीलन करने के पश्चात लगता है कि महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की जो प्रशंसा यूरप के विद्वानों ने की वह आज भी उतनी ही महत्वशील है जितनी इंडियन ओपीनियन पत्रिका प्रकाशन के समय थी। महाशय केजरीवाल ने हरियाणा के भोंडसी गांव का उल्लेख किया है संभवतः वे भोंडसी गये भी हों। उन्होंने भोंडसी वृक्षारोपण प्रसंग अपनी पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इस गांव में चन्द्रशेखर का भोंडसी आश्रम भी है। वे सुदूर दक्षिण से भोंडसी आश्रम तक यात्रा करते हुए आये भी, हो सकता हो कि महाशय केजरीवाल को चंद्रशेखर के व्यक्तित्त्व का दर्शन लाभ न मिला हो पर चंद्रशेखर भारत की स्वातंत्र्य संघर्ष बेला तक स्वतंत्र भारत में लोकप्रतिनिधि के तौर पर विख्यात राजनीतिज्ञ थे। उनकी सादगी उनका उद्बोधन अत्यंत आकर्षक था। पुस्तक के हिन्दी संस्करण की भाषा से लगता है महाशय केजरीवाल परूष वाक्य विशारद हैं। वे कहते हैं पंचायतें झाड़ू भी नहीं खरीद पाती हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली के उप राज्यपाल तथा भारत के प्रधानमंत्री महोदय को डेंगू तथा चिकनगुनिया प्रसार के लिये उत्तरदायी बताया है। वे कहते हैं कि उनके सहित उनके माननीय मंत्रियों को कोई अधिकार नहीं है। वे स्वयं दिल्ली के विशाल बहुमत द्वारा चुने गये मुख्यमंत्री हैं पर उनका ज्यादा समय दिल्ली के बजाय गोआ गुजरात तथा पंजाब में बीत रहा है। दिल्ली के लोग डेंगू त्रस्त हैं पर केजरीवाल महाशय तथा उनके सहयोगी मंत्री देश विदेश घूम रहे हैं। ग्राम सभा और मोहल्ला सभा संबंधी जो संकल्प महाशय केजरीवाल कर रहे हैं उनको विचार करना चाहिये कि वे ओमबड्समैन या अंबुद समान सामाजिक संगठन अपनी मोहल्ला सभाओं के मार्फत स्थापित करने का सामाजिक संकल्प लें। वे अब स्वयं दिल्ली सरकार हैं सरकार को जो सुविधा तथा विशेषाधिकार संविधान तथा विभिन्न कानूनों से उपलब्ध है उनका भरपूर उपयोग कर रहे हैं। महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज - अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज तथा देशवासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की कल्पना की। उनके मन वाणी तथा कर्म में एकरूपता थी। अपने आलोचकों के प्रति विशेष तौर पर कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना तथा भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर के प्रति उनके मन में किसी भी प्रकार की विद्वेष भावना नहीं थी। उन्होंने कभी भी कायदे आजम जिन्ना तथा बाबा साहेब अंबेडकर के लिये परूष वाक्य का प्रयोग नहीं किया यही महात्मा की विशेषता थी। नौजवान अभी अप्रौढ़ महाशय केजरीवाल की पहली जरूरत वाणी का शिष्टाचार अपनाना है।
स्वराज रचयिता महाशय अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पुस्तक के मुखपृष्ठ पर अण्णा हजारे का मंतव्य व्यक्त करते हुए लिखा - यह किताब व्यवस्था परिवर्तन और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे आंदोलन का घोषणा पत्र है और देश में असली स्वराज लाने का प्रभावशाली माडल भी ? पुस्तक के पाठकों के बीच पहुंचने तक महाशय केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी सृजित करने का संकल्प भले ही मन ही मन में ले लिया हो जुलाई 2012 में जब अण्णा हजारे ने अरविन्द केजरीवाल महाशय की पुस्तक की पंचसूत्री अनुशंसा की। व्यवस्था में बदलाव का क्या मतलब है ? वे यह भी व्यक्त करते हैं कि महाशय केजरीवाल की पुस्तक स्वराज आगे के भारत का घोषणा पत्र है। संभवतः अपने महत्वपूर्ण दो शब्द अरविन्द केजरीवाल की रचना की प्रशंसा में लिखने के लिये रालेगण सिद्धि के रचनाकार महाशय अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक आकांक्षा का दर्पण आ.आ.पा. अस्तित्व में आने दिल्ली की वास्तविक यूनियन टेरिटरी जिसे संवैधानिक व्यवस्था में वर्ष 1991 में विधायिका का भी प्रावधान संपन्न हो गया। दिल्ली सरकार चलाने वाले अरविन्द केजरीवाल महाशय तीसरे राजनीतिक दल हैं पहले पहल जब दिल्ली के लिये विधानसभा प्रविधित हुई भारतीय जनता पार्टी के खुराना ने सत्ता सूत्र हाथ में लिया। सर्वाधिक अवधि के मुख्यमंत्रित्व का उत्तरदायित्त्व शीला दीक्षित ने संपन्न किया। वे मूलतः पंजाबी खत्री थीं। वैवाहिक संबंध से उन्हें उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण नेता पंडित उमाशंकर दीक्षित जो पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के विश्वासभाजन थे उनके पुत्र के साथ विवाह संपन्न होते ही वे उ.प्र. के ब्राह्मण नेतृत्व में तब्दील होगयीं। उन्होंने लगातार पंद्रह वर्ष तक दिल्ली सरकार का नेतृत्व किया। शीला दीक्षित को 2013 में पराजित कराने में आआपा और भारतीय जनता पार्टी इन दो राजनीतिक दलों से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस नेतृत्व की थी। उन्हें डर सताने लग गया था कि कहीं शीला 2013 में जीत गयीं तो कांग्रेस नेतृत्व की किरकिरी हो सकती है। महाशय केजरीवाल को दिल्ली में सरकार गठन के लिये कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन किया। केजरीवाल मुख्यमंत्री होगये पर केवल 49 दिन ही राज कर पाये। उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। 2015 में दिल्ली के मतदाताओं से उन्हें 67 विधायकों का साथ मिला वे महत्वाकांक्षी अखिल भारतीय राजनेता होगये। फरवरी 2017 में उन्हें दिल्ली सत्ता संभाले दो वर्ष हो जायेंगे। पंजाब विधानसभा गोआ विधानसभा तथा आगामी विधानसभा गुजरात के चुनाव में कूदने का अवसर वे गंवाना नहीं चाहते। उनका व्यक्तिगत राजनीतिक उद्देश्य भारत की केन्द्रीय सत्ता तक पहुंचना है। 2014 में उन्होंने स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरूद्ध काशी में चुनाव लड़ा। उनके तब पैरोकार योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण थे। पैरोकार मानते थे कि आआपा लोकसभा की 100 सीटें जीत सकती है पर उन्हें विजय केवल पंजाब में चार सीटें हासिल होने पर संतोष करना पड़ा। ममता बनर्जी, जयललिता, मायवती और महबूबा मुफ्ती सहित नेताजी मुलायम सिंह यादव, राजद अध्यक्ष श्रीमान लालू प्रसाद यादव शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल उनके सुपुत्र सुखबीर सिंह बादल ओडिशा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक तेलगू देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू तैलंगाना नेता के सी राव ये सभी सुप्रीमो पद्धति के राजनेताओं की पंगत में अरविन्द केजरीवाल महाशय नवागत हैं। उनके तौर तरीके तथा उनके द्वारा योगेन्द्र यादव प्रशांत भूषण सरीखे विचारकों को दूध की मक्खी की तरह खुद सामने न आकर आआपा से निष्कासित करना सुप्रीमो शैली का नया शिगूफा है। इन्होंने स्वराज में जो लिखा है वह गोआ गुजरात तथा पंजाब के मतदाता भी पढ़ें समझें तथा केजरीवाल महाशय की राजनीतिक नियत क्या है ? पंजाब में अ.भा. कांग्रेस तथा अकाली दल व गोआ में भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस को तथा गुजरात में भी कांग्रेस व भाजपा को स्वराज की अरविन्द केजरीवाल की शैली को क्रमशः पंजाबी, उर्दू, गुजराती तथा कोेंकणी में प्रकाशित कर उन राज्यों के मतदाताओं को केजरीवाल की असली करतूत मतदाताओं के संज्ञान में लानी चाहिये ताकि पंजाब गोआ व गुजरात के मतदाता अरविन्द केजरीवाल के खेल को समझ सकें और विवेकशील होकर अपने मत का उपयोग करें। संबंधित राजनीतिक दलों को भी केजरीवाल की पुस्तक स्वराज का अंग्रेजी व हिन्दी संस्करण पढ़ कर उनके खेल को समझना चाहिये। अण्णा हजारे प्रायश्चित्त कर रहे हैं उनका मत भी गोआ पंजाब तथा गुजरात के मतदाताओं के संज्ञान में लाया जाये।
मुद्रक थाम्सन प्रेस इंडिया लिमिटेड का कथन है कि यह पुस्तक इस शर्त पर विक्रय की जारही है कि प्रकाशक हार्पर कालिंस पब्लिशर्स इंडिया की लिखित पूर्वानुमति के बिना इसे व्यावसायिक अथवा अन्य किसी भी रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसे पुनः प्रकाशित कर बेचा या किराये पर नहीं दिया जा सकता तथा जिल्द बंद या खुले किसी अन्य रूप में पाठकों के मध्य इसका परिचालन नहीं किया जा सकता। ये सभी शर्तें पुस्तक के खरीददार पर भी लागू होती हैं। इस संदर्भ में सभी प्रकाशनाधिकार या पुनः प्रकाशनार्थ अपने रिकार्ड में सुरक्षित रखने इसे पुनः प्रस्तुत करने के प्रति अपनाने इसका अनूदित रूप तैयार करने अथवा इलेक्ट्रानिक मैकेनिकल फोटोकापी तथा रिकार्डिंग आदि किसी भी पद्धति से इस का उपयोग करने हेतु समस्त प्रकाशनाधिकार रखने वाले अधिकारी तथा पुस्तक के प्रकाशक की पूर्वानुमति लेना आवश्यक है। पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण में लेखक अरविन्द केजरीवाल महाशय ने पुस्तक का मूल रचनाकार होने का दावा किया है तथा प्रकाशक ने मुद्रक थामसन प्रेस इंडिया लिमिटेड के माध्यम से चेतावनी पुस्तक के हिन्दी संस्करण स्वराज हार्पर हिन्दी कापीराइट / अरविन्द केजरीवाल 2012 के जरिये दी है। पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण यह प्रतीति कराता है, स्वराज को अरविन्द केजरीवाल हार्पर कालिन्स पब्लिशर्स इंडिया - इंडिया टुडे ग्रुप नयी दिल्ली के जरिये प्रकाशित किया गया है। स्वराज के 151 पृष्ठीय अंग्रेजी संस्करण तथा 175 पृष्ठीय हिन्दी संस्करण में भाषायी अंतराल होने के कारण स्वराज पुस्तक का कौन संस्करण मौलिक है ? किसे अनुवाद कहा जा सकता है ? पंजाब, गोआ तथा गुजरात की सरकारों को जहां महाशय केजरीवाल आआपा को विधानसभा चुनाव रणांगण में उतार रहे हैं, उन सरकारों को अपने अपने कानून मंत्रालय संबंधित राज्य के महाधिवक्ता के परामर्श से हार्पर कालिन्स पब्लिशर्स इंडिया तथा इंडिया टुडे ग्रुप से यह ज्ञात करना चाहिये कि भारतीय कानून की दृष्टि से स्वराज (नागरी लिपि तथा हिन्दी भाषा में प्रस्तुत 175 पृष्ठ की पुस्तक) ैनतंर रोमन लिपि अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत 151 पृष्ठीय पुस्तक में कौन प्रकाशन मूल है जिसे विधानसभा चुनावों में भारतीय संघ के घटक राज्य पंजाब में पंजाबी तथा बहुसंख्य पंजाबी भाषी उर्दू भाषा व फारसी लिपि का प्रयोग भी अपने दैनंदिन नित्यकर्म में करते हैं इसलिये पंजाब के लिये पंजाबी और उर्दू भाषाओं में अरविन्द केजरीवाल की अभिव्यक्ति की सटीक जानकारी हो, लेखक व प्रकाशक द्वय को यह बताना ही चाहिये कि लेखक की मूल पुस्तक किस भाषा में है ? गोआ के लिये जहां की लोकभाषा और राजभाषा कोंकणी है, पुर्तगाली उपनिवेश होने के कारण पुर्तगाली भाषा भी वहां बोली जाती है इसलिये गोआ के लिये कोंकणी व पुर्तगाली भाषा में स्वराज का अनुवाद होना चाहिये। तीसरा राज्य गुजरात है जहां की राजभाषा गुजराती है गुजराती में भी गुजरात के मतदाता अरविन्द केजरीवाल के चिंतन को समझें उनके लिये गुजराती में पुस्तक छपनी जरूरी है। चूंकि क्षत्रप शैली के राजनेताओं में क्षत्रप के समानांतर एकल नेतृत्व के जो स्तूप भारतीय लोकतंत्र में पिछले सत्तर वर्षों में उभरे हैं उनमें सबसे ताजा तथा नया नवेला स्तूप महाशय अरविन्द केजरीवाल का है। गुरू शिष्या प्रयोजन की कारक शक्ति स्त्रोत जयललिता तथा उनको राजनीतिक दीक्षा से दीक्षित करने वाले एम.जी. रामचंद्रन, भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर के गुरूमंत्र को राजनीतिक रंगमंच में वामसेफ तथा बहुजन समाज की संकल्पना को क्रियात्मक करने में महाशय कांशीराम ने अपनी शिष्या मायावती बहन को मार्ग प्रशस्त किया। वह इन दोनों महिला स्त्री शक्ति को शीर्षासन पर पहुंचा चुका है। पारिवारिक राजतंत्र के प्रतीक नेतृत्व राजद नेता लालू प्रसाद यादव, भूमिपुत्र सैफई नंदन नेताजी मुलायम सिंह यादव भारत के प्रथम पिछड़ा वर्ग से आने वाले प्रधानमंत्री देवगौड़ा ओडिसा में दो पीढ़ियों के राजकर्ता परिवार बीजू पटनायक उनके पुत्र नवीन पटनायक तथा पारिवारिक राजनीति के अकाली नेतृत्व करने वाले प्रकाश सिंह बादल और उनके राजनीतिज्ञ पुत्र सुखबीर सिंह बादल तथा दो पीढ़ियों से बिना स्वयं राज किये राजतंत्र के सूत्रधार प्रबोधनकार बाला साहेब ठाकरे उनके पुत्र उद्धव ठाकरे वर्तमान में अस्थिर कश्मीर घाटी के राज खानदान दिवंगत शेख अब्दुल्ला उनके यशस्वी पुत्र डाक्टर फारूख अब्दुल्ला शेख अब्दुल्ला के पौत्र उमर अब्दुल्ला, पिता पुत्री दुहितृवत्सल पिता तथा पितृवत्सला महबूबा मुफ्ती तैलुगु भाषी दोनों प्रदेश तटीय आंध्र और तैलंगाना के एन.टी. रामाराव जामाता चन्द्रबाबू नायडू नवगठित तैलंगाना के के.सी. राव का पारिवारिक राज, बंग की नेत्री ममता बनर्जी एकल नेतृत्व बिहार के मुख्यमंत्री नितीश बाबू को पारिवारिक राज से इसलिये नहीें जोड़ा जारहा है न ही उन्हें सुप्रीमो शैली वाला राजनेता माना जारहा है। 2005 से 2012 तक उनकी वैशाखी का काम सुशील मोदी करते थे 2015 में बिहार में महागठबंधन का परचम खड़ा करने वाले नितीश बाबू जिन्होंने बिहारी बनाम बाहरी का नारा उछाला उनके दल जदयू के तब के अध्यक्ष यादव भी म.प्र. के मूल निवासी होने के कारण बाहरी ही थे। उन्हें विजयपताका फहराने में मददगार प्रशांत किशोर भी बाहरी ही थे। राजद उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह तथा प्रभावशाली मुस्लिम राजद नेता शहाबुद्दीन के कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती। लालू प्रसाद यादव का राजद बिहार में 81 विधायक वाल सबसे बड़ा दल था। नितीश कुमार को कुर्सी का मोह त्याग कर बिहार के लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव को कहना चाहिये था सरकार का मुखिया आपका दल तय करे। देखते रहिये बिहार में अब क्या गुल खिलता है ? अब आइये दिल्ली की लंगड़ी विधानसभा के विधायक दल नेता महाशय अरविन्द केजरीवाल की सुप्रीमो शैली का एकदम नया स्वरूप। महाशय केजरीवाल को स्वयं अपनी 12 अध्याय वाली पुस्तक स्वराज का भारत की सभी भाषाओं में अनुवाद कराना चाहिये तथा भारत के मतदाताओं को बताना चाहिये वे कैसा स्वराज कल्पना कर रहे थे और आम आदमी पार्टी का जो राजनीतिक रसूख उन्होंने तय किया है जैसे वे दिल्ली के कामकाज को देखने के बजाय पंजाब गोआ और गुजरात में आम आदमी पार्टी का आपा स्थापित करने या आम आदमी पार्टी को अपना आपा खोने वाली पार्टी के रूप में निर्मित करते हैं। अण्णा हजारे ने उनकी पंचसूत्री प्रशंसा की अब अण्णा हजारे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि राजनीतिक पार्टी - आम आदमी पार्टी गठित कर दो बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और वर्तमान में दिल्ली का निजाम अपने सहयोगी मनीष सिसोदिया को सौंप कर पंजाब गोआ और गुजरात में भी वैसी ही सरकार गढ़ने को आतुर हैं जैसी उन्होंने अपना राजनीतिक कौशल पिछले पौने दो सालों में दिल्ली के मतदाताओं को दिखायी है। उपयुक्त मुहूर्त्त आगया है कि अपनी तथाकथित कृति ‘स्वराज’ में महाशय केजरीवाल ने जो लिखाया या स्वयं लिखा तथा आनन फानन में दिल्ली में पहली बार 2013 में सरकार बनायी छोड़ भी दी, मतदाताओं को कहा वे उनकी सेवा करेेंगे। उन्हें 67 सीटें मिल गयीं। उन्हें दिल्ली को सुधारना नहीं दिल्लीश्वर याने भारत का प्रधानमंत्री बनने की लालसा है। वे स्वयं को अनार्किस्ट भी कहते हैं। कहीं उनका राज वैसा ही न हो जैसा राष्ट्रपाल कंस का था जिसने अपनी चचेरी बहन देवकी के 6 पुत्रों व एक पुत्री को पटक पटक कर मार डाला था। अण्णा हजारे को जो निराशा हाथ लगी उसका प्रायश्चित्त कैसे हो ? महाशय केजरीवाल के ढोल की पोल कौन खोले ?
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