आजाद हिन्द के सिस्टम फेलियर का विकल्प क्या है?
क्या वैकल्पिक सिस्टम का तत्काल विकल्प जरूरी होगया?
क्या वैकल्पिक सिस्टम का तत्काल विकल्प जरूरी होगया?
असंभवम् हेममयी कुरंगो तथापि रामो लुलुभे मृगाय,
प्रायः समापन्न विपत्ति काले धियोऽपि पुंसाम् मालिनी भवंति।
हिन्दुस्तान की जातिवादी समाज व्यवस्था में पंजाब के खत्रियों के मध्य राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन और आचार्य नरेद्र देव ऐसे व्यक्तित्त्व हैं जिनके पूर्वज पंजाब से संयुक्त प्रांत आगरा अवध के नाम से जाने जारहे गंगा, जमुना, सरयू के त्रिआब आये। राजर्षि टंडन के पूर्वज इलाहाबाद गंगा जमना के दोआब में बस गये। आचार्य नरेन्द्र देव के पूर्वजों को राम का अवध भा गया वे अवध में बस गये। ये दोनों महानुभाव परम वैष्णव थे। अपने व्यक्तिगत आचरण में घर के आंगन से बाहर खुले में आने पर उन दोनों का आदर्श वाक्य था - मनुष्य मात्र बन्धु हैं, यही बड़ा विवेक है, पुराण पुरूषोत्तम पिता प्रभु एक है। आचार्य नरेन्द्र देव ने मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व की सफलता का श्रेय उनकी वैष्णव निष्ठा को दिया। आचार्य नरेन्द्र देव का दृढ़ विश्वास था कि हिन्द को सटीक व सामयिक नेतृत्व केवल वैष्णव ही दे सकता है। प्रह्लाद की नवधा वैष्णव भक्ति तथा नरसी मेहता की दशधा भक्ति से व्यक्तिगत जीवन जीने वाले ये महापुरूष द्वय ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे’ के वैसे ही मान्यता रखने वाले व्यक्तित्त्व थे जैसे महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी। आचार्य नरेन्द्र देव की विशेषता यह थी कि वे जन्मजात अध्यापक-गुरू भी थे। अपने विद्यार्थी के साथ उच्च स्तर का गुरू शिष्य प्रयोजन निर्वाह करते थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तथा लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए भी उन्होंने गुरूधर्म का अनुपालन किया। नित्य अपने शिष्यों को दीक्षा देते रहे। आचार्य नरेन्द्र देव के प्रियतम शिष्यों में कन्नड़ भाषी रामकृष्ण हेगड़े थे जिनकी शिक्षा दीक्षा का महत्वपूर्ण भाग लखनऊ विश्वविद्यालय में आचार्य जी के सान्निध्य में संपन्न हुआ। टंडन जी की विशेषता यह थी कि वे उत्तर प्रदेश असेंबली के स्पीकर थे। आजादी से पहले भी युनाईटेड प्राविंसेज आफ आगरा एंड अवध की असेंबली के स्पीकर के नाते उनका उद्घोष था कि एक भी विधायक उन पर शक करे तो वे स्पीकर रहना पसंद नहीं करेंगे। यू.पी. की असेंबली में मुस्लिम लीग के भी पर्याप्त सदस्य थे। उन्हें यकीन था कि इलाहाबाद के रहने वाले पुरूषोत्तम दास टंडन उनके साथ असेंबली में सदा सद्व्यवहार करेंगे। उनके इस गुण ने ही उन्हें हिन्द का चमकीला नक्षत्र नुमा नेतृत्व शक्ति संपन्न किया।
आचार्य चाणक्य ने कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के समानांतर चाणक्य नीति को भी उजागर किया। उनसे पहले शुक्रनीति ने दैत्यराज बलि तथा विदुर नीति से प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र को नीति वाक्य कहे थे। चाणक्य के बाद भारत में भर्तृहरि का नीतिशतक हिन्दुस्तानी राजनीति समझने के दिग्दर्शक हैं। दाशरथि राम चाणक्य से हजारों वर्ष पहले जन्मे थे। चाणक्य ने ‘धियोऽपि पुंसाम् मालिनी भवंति’ की लक्ष्मण रेखा खींची। चाणक्य कहते हैं हर कोई जानता व समझता है कि सोने का हिरण असंभव है पर राम सोने के हिरण के पीछे दौड़े इसे ही बुद्धि का भ्रम कहा जाता है। जब दाशरथि राम सरीखे मर्यादा पुरूषोत्तम भ्रमित हो सकते हैं सामान्य व्यक्ति का तो तब कहना ही क्या है। लोकतंत्र में लोक और तंत्र दो ध्रुव हैं यदि लोकतंत्र का तंत्र मर्यादित न हो तो समाज में भीड़तंत्र हावी हो जायेगा। भीड़तंत्र जिसे अंग्रेजी में Rule of Mob. कहा जाता है Rule of Law विलोमार्थ है। Rule of Law की स्थापना करने के लिये मर्यादित समाज निर्माण पहली जरूरत है। भारत के अधिकांश शहरों में जहां घनी आबादी है रोजगार के लिये गांवों से निरंतर पलायन होता जारहा है। शहरों में विपन्न जन झुग्गी झोपड़ी स्लम में रहते हैं संपन्न व अति संपन्न तथा सत्ताधारी जन जो महत्वपूर्ण व्यक्तित्त्व माने जाते हैं वे सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। भारतीय आजादी के सत्तर वर्ष पश्चात लोकतंत्र के जीवंत तत्वों और लोक में जो सामीप्य तथा संवाद होना आवश्यक है उसका अभाव है। लोकतंत्र के कारक तत्व राजनीतिक दल हैं अधिसंख्य राजनीतिक दल या तो पारिवारिक राज्यकर्ता हैं या एक व्यक्ति जिसे सुप्रीमो या क्षत्रप कहा जाता है उसकी प्रतिभा से प्रतिभासित हैं। लोकतंत्र का मुख्य अंग लोक है लोकायुक्त स्वातंत्र्योत्तर भारत में पिछले सत्तर वर्षों में लोक संग्रह का रास्ता नहीं बना सका है। सामाजिक और राजनीति के नाड़ी वैद्य तथा राजनीति की गंगा को वेगवती तथा शुद्ध जल वाली जलधारा बनाने के काम में भी नये नये किस्म की बाधायें उपस्थित होरही हैं।
दैनिक जागरण अखबार ने जो यह दावा करता है कि भारत में दैनिक जागरण ज्यादा लोगों द्वारा पढ़ा जाता है खबर प्रेस ट्रस्ट की है। अमरीकी चिंतन पोखर की राय में भारत के नौकरशाहों की राजनीतिक दखलन्दाजी से बचाने की जरूरत हैै। दूसरी जरूरत बताते हुए अमरीकी चिंतन पोखर यह मानता है कि राजनीतिक नेताओं (सुप्रीमो किस्म के राजनेताओं) के लिये नौकरशाहों की वफादारी (कैरियर) सफलता का वैकल्पिक पथ है। प्रेस ट्रस्ट की राय में अमरीकी शीर्ष चिंतन पोखर की मान्यता यह है कि पहले वाली (ब्रिटिश राज) प्रशासनिक पद्धति जिसे कंपनी बहादुर तथा कालांतर में बर्तानी संसद तथा बर्तानी राजदरबार ने सन 1858 में भारत में राज करने का दिखने में लोकतांत्रिक तथा व्यवहार में व्यापारिक किसम की जिला मजिस्ट्रेट आधारित शासन पद्धति कायम किया गया। आजाद भारत में जिला शासन पद्धति में वही बरकरार रही जो कंपनी बहादुर के व्यापारिक राज तथा बर्तानी लोकतंत्र जिसकी प्रभुता अथवा सार्वभौम राज सत्ता बर्तानिया के राजकुल में निहित है। उसने कंपनी बहादुर शासन पद्धति में बदलाव नहीं किया। जनवरी 1858 के कुंभ मेेेले में इलाहाबाद में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का संदेश सार्वजनिक किया गया। आजाद भारत में सत्ता का हस्तान्तरण तो हुआ पर शासन पद्धति ज्यों की त्यों बनी रही। 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 के अनुसार देश की राजव्यवस्था चलती रही। भारतीय संविधान सभा द्वारा स्वीकृत संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। आने वाले आगामी 26 जनवरी 2025 को भारतीय संविधान को स्वर्ण जयंती वर्ष भारत मनायेगा। अभी देशवासियों के पास आगामी साढ़े आठ वर्ष का बहुमूल्य समय है। देश आज सिस्टम फेलियर का दंश भोग रहा है। बर्तानी राज में जिला मजिस्ट्रेट जिले का सर्वशक्तिमान शासक था। आजादी के पश्चात तथा संविधान लागू होने के तुरंत बाद से पंडित नेहरू हर पखवाड़े मुख्यमंत्रियों को खत भेजते थे। नेहरू के जीवन काल में जिला शासन चलता तो बर्तानी तौर तरीकों वाले सिस्टम से ही था पर राजनीतिक नेतृत्व चाहे वह पश्चिम बंगाल के वी.सी. राय का हो उ.प्र. के पंडित पंत का हो बिहार के मुख्यमंत्री महेश राया का हो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यशवंत राव चह्वाण एवं गुजरात के मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया या पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री साहित्यकार द्वारका नाथ मिश्र उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक तमिलनाड के अंतिम कांग्रेस मुख्यमंत्री कामराज नाडार केरल के साम्यवादी नेता तथा मुख्यमंत्री नम्बूदिरिपाद जम्मू कश्मीर के वजीरे आजम शेख अब्दुल्ला आदि सभी मुख्यमंत्री पंडित नेहरू के पाक्षिक पत्रों का मनन करते। नया आधुनिक भारत निर्माण की जो प्रक्रिया पंडित नेहरू ने स्थापित की उनके देहावसान के पश्चात उसमें एक जबर्दस्त रोक लग गयी क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री व इंदिरा गांधी का वह वैचारिक स्तर नहीं था जिसका प्रदर्शन पंडित नेहरू ने 1946 से 1964 तक लगातार किया। भारतीय राजकरण के उत्तर नेहरू (1964-2014) एक पूरी अर्धशताब्दी सिस्टम फेलियर का कारक काल खंड है। 2014 के सामान्य निर्वाचन ने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के अहर्निश जागरूक तथा राजनीतिक विचार भेद को धर्मयुद्ध याने प्रातः आठ बजे से सायं 6 बजे तक शत्रुभाव अपनाने तथा धर्मयुद्ध युद्ध विराम के समय को संवाद के जरिये सुलझाना, क्रीड़ा खेल तथा जिसे अंग्रेजी में गेम कहते हैं रिपु स्तर की अदावत के बजाय खेल के मैदान में जो कृत्रिम प्रतिस्पर्धा होती है उसे लोकतांत्रिक राजनीति के स्पर्धा मैदान में तब्दील करना ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को सफल बना सकता है। भारत का नौकरशाही सिस्टम क्या वास्तव में चकनाचूर होगया है ? ब्रिटिश राज ने जिला प्रशासन के द्वारा भारत में अंग्रेजी राज की जड़ें जमायीं। जब तक जिला स्तर का कलक्टर, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट विलायत से आया हुआ अंग्रेज मूल इंग्लैंड निवासी स्काटलैंड वेल्स तथा आयरिश होता था उसे बर्तानी राज का हुक्म होता कि वह हिन्दुस्तान के जिस इलाके में तैनात हो वहां की भाषा बोली पर अपनी पकड़ पक्की बनाये। जब तक जिलों के कलक्टर अंग्रेज होते थे उनके लिये उनकी प्रशासनिक क्षमता प्रदर्शन के लिये जिले भर के तमाम लोग कानून की नजर में बराबर थे पर अंग्रेज अफसर जिले के जमीदारों ताल्लुकेदारों नवाबों तथा सामाजिक तौर से प्रतिष्ठित लोगों की जानकारी अपने पूर्वाधिकारी से लेते रहते थे। हिन्दुस्तान की आजादी के लगभग तीन दशाब्दी पहले से आई सी एस परीक्षा में भारत के शिक्षित तथा संपन्न परिवारों से आने वाले युवक आई सी एस होकर बर्तानी राज के डिस्ट्रिक्ट सिस्टम के रखवाले बनने लगे पर उन सबका आदर्श वे पुराने अंग्रेज आई सी एस अफसर थे जो जिलों में तैनाती के दौरान हिन्दुस्तानी रियाया के संपर्क में आते। आजादी के बाद 1948 से आई सी एस प्रथा लुप्त होगयी सन 1945 के बैच के अंतिम रहे आई सी एस आजाद भारत में अपना नौकरशाही फरमान देते रहते। पंडित नेहरू और सरदार पटेल का व्यवहार आई सी एस अफसरों से अत्यंत शिष्ट था। वी. पी. मेनन आई सी एस अफसर थे सरदार पटेल उन पर भरोसा रखते थे। वी.पी. मेनन ने हिन्दुस्तान की सैकड़ों स्वतंत्र रियासतों सल्तनतों को भारत के साथ संविलयन के मार्फत जोेड़ा। यहां तक कि सरदार पटेल ने वी पी मेनन के माध्यम से ही गुरू गोलवलकर के माध्यम से कश्मीर के राजा हरी सिंह को भारत में सम्मिलन का मार्ग प्रशस्त किया। वे सरदार पटेल के परामर्श से गुरू गोलवलकर को श्रीनगर ले गये। हवाई अड्डे में महाराजा हरी सिंह ने गुरू जी को साष्टांग प्रणाम कर प्रार्थना की कि गुरू जी का आदेश शिरोधार्य है। आई सी एस अधिकारी वी पी मेनन ने गुरू जी सदाशिवराव माधवराव गोलवलकर के लिये महाराज हरी सिंह के अंतर्मन में जो अद्भुत श्रद्धा थी उसका मनोहारी वर्णन अपने संस्मरणों में लिखा है। सरदार पटेल की यह दृढ़ धारणा थी कि महाराजा हरी सिंह केवल गुरू जी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की ही राय को मानेंगे। उनकी यह सोच सही साबित हुई। अगर गुरू जी की मध्यस्थता का उपयोग नहीं किया जाता तो संभव है आज जो कश्मीर की स्थिति है वह अलग होती। राजा हरी सिंह द्वारा भारत विलय दस्तावेज में दस्तखत कर देने से कानूनी तौर पर कश्मीर भारत का अंग होगया। पिछले सत्तर वर्षों का जम्मू कश्मीर व भारत तथा भारत विभाजन से उत्पन्न नया मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान के बीच समय समय पर हुए घटनाक्रम श्रंखला के पश्चात भी जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। वहां के स्वतंत्र कश्मीर अथवा पाकिस्तान में विलय की आकांक्षा पालने वाले धड़े अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग अलापते रहते हैं। अंततोगत्वा देखना यह है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर गिलगित बाल्टिस्तान तथा कलात के खान सहित बलूचों के जो धड़े पाकिस्तान का हिस्सा रहने को तैयार नहीं हैं सिंधी भाषी पाकिस्तानी तथा उर्दू भाषी कराची के दिल्ली यू.पी. बिहार से प्रव्रजित इस्लाम धर्मावलंबियों का राजनैतिक ऊँट अंततोगत्वा किस करवट में बैठता है। इंदिरा गांधी ने बंगला भाषी पूर्वी पाकिस्तान को बंगला देश में तब्दील कर डाला। इंदिरा गांधी हिम्मती राजनेता थीं। पंडित नेहरू की तरह वे डेमोक्रेट नहीं थीं वरन मनमानी राजनीतिज्ञ थीं। उनका राजतंत्र वैयक्तिक ज्यादा था पर वर्तमान प्रधानमंत्री दृढ़़निश्चयी आशुवक्ता होने के साथ साथ वैश्विक राजनीतिक बारहखड़ी के पारखी राजनेता हैं। देखना है कि भारत के पड़ोसी सार्क देशों की संख्या 6 से बढ़ कर कहीं बलूचिस्तान, अफगानिस्तान के अलावा म्यांमार सहित सिंध को दोफाड़ कर उर्दू प्रदेश वाला कराची तथा सिंध का शेष सिंधी भाषी प्रदेश कुल मिला कर सार्क देशों की संख्या दहाई का आंकड़ा तो नहीं छू लेती। जो भी हो 1971 से लेकर 1976 तक श्रीमती गांधी ने जो राष्ट्रीय जोश दिखाया पिछले चालीस वर्ष और आगामी 6 वर्षों में विशाल भारत का सामाजार्थिक तथा कूटनीतिक रोडमैप नया आकार लेकर निरीश्वरवादी चीनी शासकों से तिब्बत को वामे दुनियां की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता को परम पावन चौदहवें दलाई लामा के जीवन काल अथवा उनके दिवंगत होने के पश्चात Recarnation of Dalai Lama नवजात दलाई लामा को खोज के कार्य में बौद्ध धर्मावलंबी तिब्बती कृतकार्य तो नहीं हो जाते ? तिब्बत के साथ चीन ने जो जबर्दस्ती की है कहीं राष्ट्रवादी चीनी मानसिकता इलाहाबादी मौनी अमावस का पर्व तो विश्व भर में मंदारिन नये साल के रूप में मनाने का उपक्रम तो नहीं कर लेते। भारत की नौकरशाही इंदिरा जी के जमाने में ही पटरी से उतर चुकी थी पर आरक्षण वह भी अन्य पिछड़े वर्ग के लिये राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर भारत की नौकरशाही को विद्रूप करने में वैसा ही प्रयास किया जैसा भगीरथ ने अपने पूर्वजों को मुक्ति देने के लिये धरती में गंगा को लाने का काम किया था। संंविधान लागू होने पर अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिये क्रमशः पंद्रह प्रतिशत व साढ़े सात प्रतिशत आरक्षण 1950 से दस वर्षों के लिये प्रविधित हुआ था। पिछले सात दशकों में आरक्षण हरेक बार 10 वर्ष के लिये बढ़ता जारहा हैै। आरक्षण के स्थायी लाभार्थी समाज आरक्षण को स्थायित्व देने के पक्षधर हैं। राजनीतिक तौर तरीकों से अनुसूचित जाति व जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों में नयी जातियां जुड़ती रहती हैं। राज्यों के क्षत्रप अपनी सुविधानुसार आरक्षण का प्रसार यत्र तत्र करते रहते हैं। अगर जाटों के आरक्षण का प्रसंग गुज्जरों के अपने आपको मीणा लोगों की तरह अनुसूचित जनजाति घेरे में लाने का प्रयास तथा गुजरात के संपन्न समाज पटेल लोग आरक्षण प्राप्त करने में सफल होगये तो एक ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि देश में आरक्षण अस्सी फीसदी से नब्बे फीसदी तक भी पहुंच सकता है। न्यायालय ने 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण करना न्यायसंगत नहीं ठहराया है पर राज्य सरकारें इस विषय में अपना अपना उपक्रम बनाये रखती हैं। क्रीमी लेयर प्रसंग भी महंगाई निरंतर बढ़ते रहने से क्रीमी लेयर की वार्षिक आय का अंतर आगे खिसक सकता है ।
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार उन्मूलन आन्दोलन अण्णा के कार्यक्रम से लाभान्वित आआपा का राजनैतिक वजूद जो अपने तथा अपना समर्थन करने वाले व्यक्ति समूहों के अलावा हर विरोधी को भ्रष्टाचारी मानता है पर भ्रष्टाचार की जड़ में प्रहार करने का उपक्रम न तो अण्णा हजारे के कार्यक्रम में था न ही महाशय अरविन्द केजरीवाल के आआपा में है। जब अंग्रेजी राज द्वारा स्थापित सिस्टम ही चकनाचूर होगया हो भ्रष्टाचार के विरूद्ध कोई भी मुहिम केवल दिवास्वप्न ही है।
डाक्टर राममनोहर लोहिया ने चौखंभा राज की चर्चा स्वतंत्रता के चार पांच वर्ष पश्चात ही शुरू कर दी थी। लोहिया कल्पित चौखंभा राज में गांव ब्लाक घटक राज्य तथा भारतीय संसद के समानांतर देश में जहां जहां एस.के.डे. संकल्पित ब्लाक हैं गांव ब्लाक शहरी क्षेत्र के लिये नगर पालिका/नगर परिषद/नगर निगम घटक राज्य तथा केन्द्र ये पांच ही बिन्दु हों। वर्तमान जिला प्रशासन को ब्लाक प्रशासन में तब्दील कर दिया जाये। ब्लाक तहसील को एक दूसरे से जोड़ कर Duplication of Administration as well as Developmental Activities of similar planned projects performed by more than one Organisation or Corporates इसलिये जिला स्तर पर जो प्रशासनिक तथा टिकाऊ विकास ढांचे की संकल्पना की गयी थी उस पर Supremo and Kshtrap style socio political दबाव उत्तर नेहरू युग में बढ़ते गये हैं। अ.भा. कांग्रेस सहित एक परिवार पर आधारित अथवा एक क्षत्रप या सुप्रीमो द्वारा निरंतर संचालित राजनीतिक दलों की पकड़ नौकरशाही में जातीय अथवा राजनीतिक व पुरोधा का वर्चस्व भारतीय संघ के घटक राज्यों के राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रशासनिक सिस्टम सुप्रीमो शैली की राजनीति का बंधुआ मजदूर नुमा बंधक होगया है। कानेगी ऐंडोमेंट फार इंटरनेशनल फीस द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट The Indian administration meets big data में कहा गया है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में तत्काल सुधार की जरूरत है। यह रिपोर्ट भारतीय मूल के मिस्टर मिलन वैष्णव तथा सक्षम खोसला द्वारा तैयार की गयी है। प्रधानमंत्री जी ने योजना आयोग का कायाकल्प कर उसे नीति आयोग में बदल डाला है। नीति आयोग में राज्यों के मुख्यमंत्रियों का स्तर उन्नत कर दिया है। वे अब नीति निर्धारण करने वाले क्षेत्रीय नेतृत्व हैं। नीति आयोग के तौर तरीकों का लाभ देश व देश के राज्यों को मिलने वाला है। जो सिस्टम फेलियर हुआ है जिला प्रशासन क्षत्रपों व सुप्रीमो का बंधक बन गया है। जिला प्रशासन को योजना आयोग की तरह कायाकल्प की तात्कालिक जरूरत है। टिकाऊ विकास तथा विकास खंड स्तर पर विकास प्रशासन, लोक प्रशासन, पुलिस प्रशासन तथा समाज कल्याणकारी केन्द्रीय तथा घटक राज्यों के उपक्रमों की पड़ताल एक अखिल भारतीय District Administration Mechanism Enquiry Commission द्वारा पड़ताल किये जाने की जरूरत है तथा संसद एवं राज्य विधान मंडलों द्वारा बहस मुबाहसा चलाने की जरूरत है। क्या वास्तव में जिला प्रशासन सिस्टम फेल हो चुका है ? यदि संसद तथा राज्य विधान मंडलों के द्वारा अंग्रेजी राज की मजबूत प्रशासनिक इकाई District Magistrate System चरमरा गयी है। कंपनी बहादुर चल रहे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट सिस्टम कंपनी बहादुर ब्रिटिश ताज व बर्तानी पार्लमेंट द्वारा स्वीकृत सिस्टम में छेद होगये माना जाता है तो वास्तविक स्थिति क्या है ? इस पड़ताल को करने के लिये संसद व विधान मंडलों को समीक्षित प्रस्ताव के द्वारा Examination of system failure in State के पश्चात संसद तथा विधान मंडलों को जिला प्रशासन की भूमिका विकास खंड प्रशासन को हस्तांतरि किये जाने हेतु सटीक प्रयास किया जाना जरूरी है ताकि यदि यह प्रमाणित हो जाता है कि कंपनी बहादुर तथा ब्रिटिश ताज द्वारा शुरू किया गया District Administraition System यदि पूर्णतया ध्वस्त होगया है तो Developmental Think Tank को यह विचार करना ही चाहिये कि संसद राज्य विधान मंडल के पश्चात तीसरा कदम क्षेत्र पंचायत या तालुका पंचायत हो। चौथा स्तर ग्राम पंचायत अथवा नगरस्थ निगम, पालिका या परिषद की संकल्पना को बलवती बनाने के लिये तात्कालिक प्रयास हों।
हिन्द के आठवें प्रधानमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की अंश कालिक सत्ता कांग्रेस विरोधी सभी दलों के संविद ने प्रधानमंत्री के आसन में प्रतिष्ठित किया। मोरारजी सरकार ने समाज के अन्य पिछड़े वर्गों की सामाजार्थिक स्थितियों का अनुशीलन कर अदर बैकवर्ड क्लासेज के योगक्षेम के उपाय सुझाने के लिये वी.पी. मंडल की सदारत में एक आयोग गठित किया। इस आयोग की संस्तुति मोरारजी देसाई तथा चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में निर्णायक स्तर तक नहीं पहुंची। जब 1980 से इंदिरा गांधी पुनः सत्ताधिष्ठान में पहंुची मंडल कमीशन की रपट सरकार को मिली उन्नीस वर्ष मंडल कमीशन संस्तुतियां ठंडे बस्ते में पड़ी रहीं। कुछ न कुछ नया कर दिखाने की लालसा ने राज विश्वनाथ प्रताप सिंह को मंडल कमीशन रपट की धूल साफ कर उन्होंने अन्य पिछड़े वर्गों के योगक्षेम का मसीहा बनते हुए 1931 की जनगणनानुसार अदर बैकवर्ड क्लासेज वाली जाति के लोगों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 54 प्रतिशत मानते हुए संस्तुतियां प्रस्तुत कीं। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ये सिफारिशें आनन फानन में स्वीकार कर आरक्षण के समुद्र में ओबीसी का नया पानी का जहाज खड़ा कर दिया। संविधान के लागू होने की तारीख 26 जनवरी 1950 से पंद्रह प्रतिशत अनुसूचित जाति साढ़े साठ प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण को दो छोटे पानी के जहाज भारतीय संविधान समुद्र मेें डूबने से पहले से ही याने 40 वर्ष से तैर रहे थे। आरक्षण के नये ओबीसी जहाज को उतारे जाने से भारतीय संविधान सागर में एक नयी जाग्रति आयी। अनुसूचित जाति व जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों सहित आरक्षण का स्तर 49.50 प्रतिशत तक पहुुंच गया। ओबीसी आरक्षण ने दलित तथा आदिवासी आरक्षण को भी संबल मिला। राष्ट्र राज्य भारत में आरक्षण प्रक्रिया से सबसे ज्यादा प्रभावित नौकरशाहों को किया। भारत के नौकरशाह चार खेमों में बंट गये। पहला खेमा दलित समाज के नौकरशाहों का था दूसरा तथा कमजोर खेमा आदिवासी या शेड्यूल्ड ट्राइब वाला था। तीसरा खेमा ओबीसी आरक्षण लाभार्थियों का था ओबीसी आरक्षण लाभार्थी संख्या में ज्यादा थे उन्हें जातीय तथा क्षेत्रीय रीजनल क्षत्रपों तथा सुप्रीमो शैली की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों का ओबीसी नौकरशाहों व दलित संगठित था। लक्ष्य प्राप्त करने वोल समूहों में तब्दील होगये। लोकतंत्र या डेमोक्रेसी में संख्या बल ही मुख्य होता है। आज के भारत में ओबीसी तबकों में दो मनीषी राजनीति वेत्ता बिहार में लालू प्रसाद यादव तथा उत्तर प्रदेश में डाक्टर राममनोहर लोहिया का नाम जपने वाले सैफई धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव हैं। यादव या अहीर जो भी नाम आप यादवों को गोप मंडल, भगत कह कर दें या प्रिय प्रवास लेखक हरिऔध उपाध्याय रचित प्रिय प्रवास वर्णित आभीर ही क्यों न कहें। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत महापुराण यादवों अथवा आभीरों की उपस्थिति आसेतु हिमाचल सर्वत्र स्वीकारा है। वेदव्यास ने लिखा -
तिस्त्र कोट्यः सहस्त्रणाम् अष्टारीति शतानि च आसन् यदु कुलाचार्याः
कुमाराणाम् इति श्रुतम संख्यानाम् यादवानाम् कः करिष्यति महात्मनाम्।
अतएव ओबीसी में सर्वाधिक जनसंख्या आभीर, यादव, जाधव, गोप, माल, भगत, रेड्डी आदि की है। बिहार के लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव तथा उ.प्र. के भूमि पुत्र मुलायम सिंह यादव ओबीसी वर्ग से धर्मान्तरित मुसलमानों में भी अपना वर्चस्व बनाये रखने की राजनीतिक कला विद हैं पर इन दोनों नेताओं का जातीय उद्देश्य केवल यादवों को ही नौकरशाही में विश्वासपूर्वक प्रोत्साहित करना है। नौकरशाह और स्थायी सुप्रीमो स्तर के क्षत्रप जिनकी राजनीति का मूलाधार उनकी जाति है नौकरशाहों और सुप्रीमो राजनेताओं की युति को तोड़ना अत्यंत दुष्कर है। इस मामले में इन्क्वायरी कमीशन बिठाना भी अब अर्थहीन होगया है। जहां जहां आबादी का घनत्व अप्रत्याशित रूप से ज्यादा है वहां नेशनल कैपिटल रीजन सरीखा त्नसम व Rule of Mob.अनियंत्रित भी हो सकता है वह भी तब जब Rule of Law का अधिष्ठाता स्वयं को अराजक कहना पसंद करता है। उदाहरण नैपोलियन बोनापार्ट का देता है। शहरों में गांवों से रोजगार के लिये पलायन कर आया हुआ झुग्गी झोपड़ी और स्लम में अपने दिन बिताने वाले लोग ऐसे रूल आफ मॉब को ही सही राजनीति मानने वाले व्यक्ति लोगों की दिक्कतों को दूर करने का आश्वासन देते हैं। उन्हें भरमाते हैं जब यह इतना बढ़ जायेगा कि उस पर नियंत्रण करना अत्यंत दुष्कर हो जायेगा इसलिये राजनीतिक यज्ञ डंडी कंपनी बहादुर द्वारा शुरू किया डिस्ट्रिक्ट प्रशासन सिस्टमों का कामाभ्यंतर कर दिया जाये। विकास खंड क्षेत्र पंचायत या तालुका पंचायत को विकास प्रशासन का वाहक बनाने के लिये राजनीति दलों को प्रेरित किया जाये। रूल आफ मॉब राजनीतिक आग्रह करती है कि क्या सनातन धर्म में छुआछूत मंदिर प्रवेश आदि के लिये अंत्यज अथवा अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों को मंदिर प्रवेश न करने सहित पंक्तिभेद का प्रावधान शास्त्र सम्मत है ? यदि धर्मशास्त्र इस प्रकार के कृत्य को गर्हित मानता है उसका खुलासा होना आज की सामयिक जरूरत है।
विश्व में जहां जहां लोकतंत्र है डेमोक्रेसी का उद्दाम परिचालन है आचार्य चाणक्य ने अपने कौटिल्यीय अर्थशास्त्र में हिन्द की तत्कालीन पंचायती लोकतंत्र या पंचायती गणतंत्र के स्थान पर शक्तिशाली मगध राज्य की नींव पक्की करने के लिये मगध की तत्कालीन गणतंत्रीय व्यवस्था जिसे विष्णु पुराण में कूर्म मगध खस गणैः कहा गया है, खस गणराज्य के बजाय सार्वभौम शक्ति संपन्न राज की स्थापना का उद्घोष करते हुए चंद्रगुप्त मौर्य को मगध नरेश के सिंहासन में प्रतिष्ठित कर गणतंत्र व्यवस्था को शक्तिशाली सार्वभौम सत्ताधिष्ठान के अधिपतित्व के लिये हानिकर घोषित किया परंतु चाणक्य ने अपनी नीति अपने पौने छः सौ के लगभग सूत्रों तथा स्वरचित अर्थशास्त्र के छः हजार श्लोकों के माध्यम से सुशासन कायम करने के तौर तरीकों का बारीक से बारीक अध्ययन कर पाटलिपुत्र में जिसे आज हम हिन्दुस्तानी पटना कहते हैें मौर्य साम्राज्य की आधार शिला चंद्रगुप्त मौर्य को सार्वभौम राजा घोषित करते हुए बड़ी मजबूती से रखी। आज भारत में न तो कौटिल्य के अर्थशास्त्र सृजित सार्वभौम नरेश की व्यवस्था है न गणतंत्रों व पंचायतों की परंपरा। चंद्रगुप्त मौर्य के मगध राज्य के पश्चात हिन्द इतिहास के गहरे कुंए में थानेश्वर का हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य सहित गुप्त साम्राज्य के प्रगतिशील सार्वभौम राजाओं की राजव्यवस्था जिसे मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम के रामराज्य के उच्च आदर्श से संचालित करना चाहते थे भर्तृहरि की राजनीतिक मान्यतायें जिसे आज भी भारत के लोग भरथरि के रूप में लोकगीतों में गाथा करते हैं, हिन्द की राष्ट्रीयता सदैव राज प्रधान न रह कर संस्कृति प्रधान रही जो आज भी सांस्कृतिक भारत के रूप में गंगा जमुनी संस्कृति का उद्गान करती है। राज चाहे हिन्दू राजाओं का हो मुस्लिम सल्तनत का हो अथवा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अस्तित्व ने राज करने का नुस्खा अपना लिया ब्रिटिश राज ने कंपनी बहादुर की व्यापारी राजव्यवस्था को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट संस्था को अपनी इंतजामिया व्यवस्था को स्त्रोत निश्चित किया। शासन का सिस्टम डिस्ट्रिक्ट या जिला सरकार एक मजबूत व्यवस्था के तहत जनवरी 1858 से 14 अगस्त 1947 तक नब्बे साल साढ़े आठ महीने हिन्द पर राज किया। बर्तानी राज का बुनियादी मजबूत किला डिस्ट्रिक्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन था। पिछले सत्तर सालों में ब्रिटिश राज स्थापित आजाद भारत का सिस्टम लड़खड़ा गया है या कहिये सिस्टम फेल होगया है। नया सिस्टम हम हिन्दुस्तानी पिछले सत्तर वर्षों में संकल्पित नहीं कर पाये हैं इसलिये राजनीतिक दलों को एक दूसरे पर आरोप जड़ने के बजाय यह विचार अपने अपने दल में चिंतन मनन करना ही चाहिये कि क्या जिला स्तर का शासन तंत्र का सिस्टम वास्तविक तौर पर उखड़ गया है ? राजनीतिक दलों के सर्वोच्च नीति नियंता जिसे अलग अलग दल अलग अलग नाम से पुकारते हैं उन्हें नौकरशाही और नौकरशाही से शासन सूत्र चलाने वाले राजनीतिक दलों को अपने अपने राजनीतिक अनुभवों के आधार पर सिस्टम के लिये हुआ था ? यदि सिस्टम फेलियर हुआ तो उसकी मात्रा तथा परिणाम क्या हुए ? मौजूदा केन्द्र सरकार विकास प्रक्रिया - सबका विकास तथा सबका साथ लेने की बात कर रही है इसलिये विकास को यदि पैमाना मान कर भारत का राजनीतिक रोडमैप बनाने का सर्वसम्मत संकल्प लिया जाय। डाक्टर लोहिया के चौखंभा राज का पुनर्वाचन करना जरूरी है। पंडित नेहरू ने सुबोध कुमार डे के माध्यम से ब्लाक डेवलपमेंट इलाकाई विकास का संकल्प लिया। इसलिये शासन की धुरी जिला प्रशासन के बजाय विकास प्रशासन का संकल्प निरंतर चिंतन मनन के पश्चात निश्चित किया जाये ताकि राजनीतिक एक्जीक्यूटिव तथा नौकरशाही के विकास खंड स्तरीय सिस्टम निर्मित करने की दिशा में राष्ट्र अग्रसर हो। अभी पूरे देश में जिला प्रशासन है इनके स्थान पर ज्यादा से ज्यादा अढ़ाई लाख आबादी वाले ब्लाक विकास खंडों में भारतीय नौकरशाही का पहला कदम हो। आई.ए.एस. आई.आर.एस. आई.एफ.एस. आई.ए.एस. इंडियन फारेस्ट सर्विस, इंडियन ऐजुकेशन सर्विस, इंडियन मेडिकल हेल्थ सर्विस, इंडियन यातायात वायुयान रेल रोड तथा जलयान सेवा के समानांतर देश में कोई व्यक्ति भूखा नंगा तथा बेघर न रहे इसके लिये भारत की पुरानी सदावर्त शैली और अनाथालय यतीमखाने रैनबसेरे झुग्गी झोपड़ी के बदले प्रत्येक झुग्गी झोपड़ी के रहने वाले परिवार को मकान उपलब्ध कराने स्लमों में रहने वाले चीथड़े चुनने वाले भीख मांगने वाले लोगों के योगक्षेम का भारत के अनुकूल मानवीय दृष्टिकोण वाला समाज कल्याण नहीं समाज में अंबुद समान मानवीय व्यवहार का संतुलन रखने वाले नये प्रशासकीय तंत्र को भी निर्मित किये जाने का संकल्प लिया जाये। केवल कानूनों से ही कोई राष्ट्र सक्षम नहीं हो सकता।
सर्वे भवन्तु सुखिनः का गुरू मंत्र अपनाना समय की पुकार है।
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