क्यों न विधायक और सांसद बनने का हर इच्छुक व्यक्ति सबसे पहले अपनी मातृभाषा में कौटिल्य अर्थशास्त्र तथा शांतिपर्व के कथानकों को हृदयंगम करे तभी राजनीतिक क्रीड़ा मैदान में उतरे।
यद्यपि के की एन दारूवाला का इंडियन ऐक्सप्रेस सोमवार 10 अक्टूबर 2016 के अंक में प्रकाशित स्तंभ A coaching class for Politician के माध्यम से महाशय दारूवाला भाजपा को ही दिक्षित करते मालूम पड़ते हैं। वे राय देरहे हैं - Go slow on Nationalism. Don’t make us hang our heads in shame. All walks of life need a coach. A coaching class of politicians will be on the following lines. If you have nothing better to read, browse through in party manifesto, but never believe in it. Don’t drive out Pakistani actors each time. There is a bomb blast in our streets or an attack on Pathankot. Don’t waste your time changing names. Check you hoolingers.। महाशय दारूवाला ने भगवद्गीता की ‘किं कर्मम् किम् अकर्मेति कवयो पात्र मोहता’ का अनुसरण किया लगता है। अनुसरण अथवा निषेध के जिन तरीकों को उन्होंने खोजा उनमें उनका पहला विषय बताते हुए वे कहते हैं - तमिलनाडु की अम्मा अर्चना (जे. जयललिता) दिल्ली में दस जनपथ अर्चना परिक्रमा पंजाब में बादल अर्चना, बीजेपी में मोदी अर्चना। उन्होंने दूसरे निषेध का अहवाल देते हुए कहा नारों से प्रभावित न होइये इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ का नारा, सबका साथ सबका विकास संबंधी नरेन्द्र मोदी आह्वान उनके द्वारा गिनाये गये दसों निषेध प्रतिषेध की तात्कालिक प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति के बावजूद दारूवाला ने राजनीति करने वाले लोगों के लिये कोचिंग क्लास चलाने की जो बात कही वह राजनीतिक दलों के स्थायी सुप्रीमो अथवा पारिवारिक राजधर्म का निर्धारण करने वाले लोकनेताओं के लिये सटीक विवेक वाला रास्ता है। इससे पहले कि भारतीय राजनीति में घुसने के इच्छुक व्यक्ति को क्या क्या करना जरूरी है यह विचार किया जाये। इस भारत देश में जातिवाद को कदम कदम पर लांछित करने का रिवाज राजनीतिक आदर्श होगया है। इस देश के बहुसंख्यक समाज में मार्कण्डेय पुराण की गाथा सालाना शारदीय नवरात्रों (आश्विन शुक्ल पड़वा से महानवमी पर्यन्त नौ अहोरात्र) में व्रत रखे जाते हैं। वसंत ऋतु के आते ही चैत पड़वा जिसे मराठे गुड़िपड़वा कन्नड़ मलयाली तमिल तैलुगु भाषी युगादि या उगादि कहते हैं सिंध के सिंधी भाषी नानक पंथी उस दिन को चैती चांद तथा उत्तर भारत में प्राग्ज्योतिषपुर के पूर्व से पंजाब हरयाणा हिमाचल व राजस्थान एवं गुजरात में उस दिन को संवत्सर पड़वा कहा जाता है। वार्षिकी नवरात्र संवत्सार पड़वा से रामनौमी तक मनाये जाते हैं। मार्कण्डेय के देवी (पार्वती गिरिराज कन्या) तथा दानव महाबली शुंभ व उसके अनुज निशुंभ के दूत के बीच वार्तालाप हुआ। यह संवाद भारतीय पौराणिक इतिहास का महत्वपूर्ण स्तंभ है।शुंभ के दूत ने गिरिराज कन्या से हिमालय से निसृत सरयू तट के ऊपरी भाग में जो महादेव के कैलास पर्वत तथा पार्वती के मायके कार्तिकेय पुर का प्रचलित रास्ता था वहां दूत ने शुंभ का संदेश पार्वती को सुनाया। पार्वती ने कहा - यो माम् जयति संग्रामे यो मे दर्पम् व्यपोहति, यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति। देवी की आराधना करने वाले समूह ने देवी की विभूतियों का जिक्र करते हुए यह भी कहा - या देवी सर्व भूतेषु जाति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
जाति शब्द की मूल व्युत्पत्ति ज्ञाति से हुई है। ज्ञाति के मतलब होते हैं माता दादी परदादी, पिता दादा परदादा, नाना परनाना बूढ़े परनाना, नानी परनानी बूढ़ी परनानी जिसे आधुनिक दुनियां डी.एन.ए. कह कर पुकारती है वैसे जाति व्याख्या का मूलाधार समूची मनुष्य जाति, पशुओं की विभिन्न जातियां, पक्षी, जलचर, कृमि, कीट पतंग आदि जातियां हुआ करती हैं। मनुष्यों जाति व्यवस्था का आरोपण व्यवसाय प्रधान है। भगवद्गीता में योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन से कहा -
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चातुवर्ण्य मया सृष्टम् गुण कर्म विभागशः, तस्य कर्ताहमपि माम् विरूध्यकर्ताहमव्यम्।
गुण कर्म विभाग ही चातुवर्ण्य का मूल हैै। ये चातुवर्ण्य यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे सिद्धांतानुसार भी प्रत्येक जीवात्मा के पिंड में विद्यमान हैं। मनुष्यों में उनका मुख ब्राह्मण है, हाथ क्षत्रिय है, उदर वैश्य तथा पैर शूद्र हैं। इन चारों के अपने अपने निरिश्वरि कर्म भी हैं। हर मनुष्य की पहचान का मुख्य कारक उसका चेहरा है इसलिये वर्ण व्यवस्था - आश्रम व्यवस्था में मनुष्य की मुख्य भूमिका उसके चेहरे से है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित उच्च शिक्षा केे कई स्तंभ महिषासुर अर्चना और बीफ महोत्सव मनाते हैं। यह उनकी स्वतंत्र चेतना है जो उन्हें सही लगता है वह करते हैं। महिषासुर वध प्रकरण पर संस्कृत वाङमय में देवासुर युद्ध, देवासुर संधि, क्षीरसागर मंथन, महाविष्णु द्वारा अमृत केवल देवताओं को पिलाने वाली पंक्तिभेदी रणनीति के संदर्भ में भारत में बहुत सी जातियां हैं जो महिषासुर अर्चना करती हैं। महिषासुर प्रकरण में भारत की मौर्य जाति का स्पष्ट उल्लेख मार्कण्डेय ऋषि और देवी भागवत का वाराह पुराण ने भी किया है। देवताओं और दैत्यों में ‘बद्धवैर’ ‘शत्रुग्रंथि’ का उल्लेख मिलता है इसलिये दलितों सहित यदि कई पिछड़े समाज यादवों, कुर्मियों, लोधों, रेड्डियों, जाधवों आदि जातियों के लोग महिषासुर वन्दना या महिषासुर अर्चना करना चाहते हैं उन्हें रोकने की जरूरत नहीं है। महिषासुर सेनानी तथा स्वयं महिषासुर सहित धूम्रलोचन, चंडमुंड, रक्तबीज वधों के समानांतर शुंभ निशुंभ वध का वर्तमान महिषासुर अर्चना बीफ महाभोज कार्यक्रम कहीं पुरूष स्त्री विभेद को गहरा न कर दे। महिलायें उग्र होकर महिषासुर पूजक दलितों सहित दूसरे उन पिछड़े वर्ग की जातियों जिनमें प्रतापी महाबली दानव श्रेष्ठ शुंभ ने अपनी सेना के बलशाली दैत्य दानवों यथा धौम्र, कालक, यौद्धव, मौर्य, कालकेय समूहों को ललकारा। इसलिये उन संपन्न तथा मैकोलाइट संस्कृति में फलेफूले अंग्रेजीदां भद्रलोक समूह में जो व्यक्ति या समूह स्वयं को दलित अथवा दलित साहित्य सेवी मान कर चलते हैं, संपन्नता तथा सत्ताधीश समाज का हिस्सा बन जाने के बाद ऐसे महानुभाव अपने आपको जबर्दस्ती दलित समझते हैं वे सांसारिक वास्तविकी में दलित नहीं हैं। जरूरत केवल इतनी है कि वे स्वेच्छानुसार करते रहें पर दूसरे पक्ष को भी समझने का प्रयास करें। के की एन दारूवाला महाशय के कोचिंग क्लास संदर्भ में यह सही लगता है कि अंग्रेजी भाषा के Polite, Polity, Politeness, Politics, Politician इन पांच शब्दों का हिन्दुस्तान में राजनीति करने वाले लोग आंतर भारती के जरिये सही सही समझने का प्रयास करें साथ ही अपनी वाणी को इतना संयत रखें कि जो बात उन्हें सुनने में कर्कश तथा कर्णकषाय लगती है वह वाणी सामने वाले से प्रयोग में न लायें। इसे भारतीय वाङमय ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्’ कहता है। वाणी ही राजनीति जिसे महात्मा गांधी ने अपनी जीवनचर्या में बहुत महत्व दिया अपनेे धुर विरोधी के साथ भी हमेशा सद्व्यवहार तथा सदाचार का मार्ग अपनाया। अहिंसा तथा सत्याग्रह को अपना राजनीतिक हथियार तय किया। महात्मा गांधी की इस अद्भुत राजनीतिक रणनीति के इकले व्याख्याकार संत विनोबा हैं जो 26 भाषाओं के मर्मज्ञ थे। वेदों की ऋचाओं को सस्वरगान करने के साथ साथ जिनका कुरआन शरीफ की आयतों का उच्चारण तथा लय सुन कर कुरआन शरीफ की आयतों के मर्मज्ञ भी दांतों तले अंगुली दबा कर कहते थे कि अल्लाह की समझ जितनी संत विनोबा भावे में विद्यमान है अद्वितीय है क्योंकि नित्य विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने वाले विनोबा पर एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंगों का प्रभाव था। महाराष्ट्र के विद्वत्जन संत विनोबा भावे को संत ज्ञानेश्वर का अवतार मानते थे। संत विनोबा का मजहबी तकिया कलाम अगर सही तरीके से समझना हो महात्मा गांधी का सर्वधर्म समभाव अनुभूत करना हो तो श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कंध के तीसरे अध्याय के छब्बीसवें श्लोक का पूर्वार्ध जिसकी व्याख्या संत विनोबा ने बड़ी ही अर्थभरी दृष्टि से की वह यों है - श्रद्धा भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र क्वापि हि। भागवत शास्त्र में श्रद्धा के समानांतर संसार भर की दूसरी शास्त्र शैलियों के Secularism का सर्वोच्च शिखर इसलिये उस हर इन्सान को जो पालिटिक्स में प्रवेश करना चाहता है उसके लिये भारत की शुक्र नीति विदुर नीति चाणक्य नीति भर्तृहरि के नीति शतक के नीति श्रंगार तथा वैराग्य शतक के साथ साथ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के पौने छः सौ सूत्र तथा छः हजार श्लोकों को अपनी मातृभाषा के जरिये समझना जरूरी है। महाभारत का शांति पर्व राजनीति का चिंतन पोखर है। आज भारत का हर आदमी या औरत जो राजनीति में घुसना चाहता है वह तभी कृतकृत्य हो पायेगा जब अंग्रेजी भाषा के उपरोक्त पांच शब्दों की व्युत्पत्ति अपनी मातृभाषा में समझने की कोशिश करेगा। के की एन दारूवाला महाशय ने अपने निषेध प्रतिषेध में तानाकशी की है। एक दूसरे पर ताने कसने से राजनैतिक विग्रह वैयक्तिक दुश्मनी की शक्ल ले लेगा इसलिये पालिटिक्स करने वाले व्यक्ति को पहले शिष्टाचार विनम्रता से अपने आपको संवर्धित करना जरूरी है। जिस तरह अभिनेता अभिनय करता है अपने दर्शकों श्रोताओं को मनोहर लगता है उसी तरह राजनेता भी वही सफल राजनीतिज्ञ हो सकता है जो जनसामान्य की विचार नाड़ी भांपने में अपना विवेक लगाता हो। महाशय दारूवाला की कोचिंग क्लास वाली थिअरी में जबर्दस्त क्षमता है। राजनीति पाठशाला में पहल पार्टी सुप्रीमो क्षत्रप तथा भारतीय गणराज्य के घटक राज्यों में शासन करने वाले मुख्यमंत्रियों को अपने अपने घटक राज्य की भाषा में राजनीतिक पारंगति वाले समूचे साहित्य को सटीक तरीके से प्रस्तुत करने से ही सटीक राजनीतिक विवेक वर्धन होगा। केन्द्रस्थ सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री एवं भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्रियों संबंधित राज्य के भाजपा अध्यक्षों को मिलजुल कर अपने राजनीतिक दल के अलावा इतर राजनीतिक दलों व्यक्तियों क्षत्रपों की कार्यविधि शैलियों का बारीक अध्ययन कर अपने सांसदों विधायकों को अनिंदक राजनीतिक साहित्य उपलब्ध करने के समानांतर प्रत्येक जन प्रतिनिधि के हाथ में उसकी मातृभाषा में कौटिलीय अर्थशास्त्र की पुस्तक देनी चाहिये तभी जन प्रतिनिधि को क्या करना चाहिये क्या न कहने से परहेज करना सीखना चाहिये। अपने निर्वाचन क्षेत्र के चप्पे चप्पे की जानकारी रखने वाला जन प्रतिनिधि ही सच्चा राष्ट्र सेवी होने की भीष्म प्रतिज्ञा संपन्न कर सकता है। अपने जिन परिजनों को राजनीतिक चौसर के खेल में उतारना चाहता है पहले उनका सटीक सामाजिक प्रशिक्षण भी संपन्न करे। हर विधायक और सांसद अपना ज्ञानकोश समृद्ध करने के लिये पहले शिष्टाचार का पालन करे उसकी भाषा में शालीनता का पुट हो वह कबीर के इस कथन का अनुसरण करने का मन बनाये -
कबिरा खड़ा बजार में लिये लुकाठी हाथ, जो घर छोड़े आपनो चलो हमारे साथ।
आपको अगर चाणक्य की राजनीति करनी हो तो - ‘सर्वे भवन्तु कुशलिनः सर्वे भवन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत’ का उद्घोष करते हुए मानव सेवा का व्रत लें।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
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