आत्मविश्वास जगाना राष्ट्रीय जरूरत
मानवता हेतु पाक कब्जे वाले कश्मीर गिलगित व बालिस्टान वाला चीन पाक गलियारा भारत को रोकना ही होगा।
हिन्द और चीन में किसे कछुआ कहा जाये किसे खरगोश ? कछुवा और खरगोश की कहानी बताने वाले चीन के कारपोरेट वकील काल जेे का सोचना है - Indians are applying the Hare and Turtoise parable wrongly to India and China.। ऐसा वह व्यक्ति कह रहा है जो हिन्द की चिंतनधारा का जानकार ज्ञाता नहीं है। यह तो निश्चित प्रतीत होता है कि चीनी कारपोरेट वकील लाजेंग परम पावन चौदहवें दलाई लामा के ध्यान मार्ग के राही नहीं हैं। यदि वे वास्तविक रूप से बाइबिल की प्रेरक धर्मकथाओं के बदले महाभारत के शांति पर्व में मनुष्य मात्र के जीवन में जो घटनायें घटती हैं उन्हें करीने से समझने का प्रयास करते तो उन्हें हिन्द और चीन के ताल्लुकातों में हिन्द की त्रुटियां नजर नहीं आतीं। वे उसे हिन्द की आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का एक पन्ना मान कर आगे बढ़ते। उन्हें शायद वकील होने के बावजूद यह पता नहीं कि चीन के राष्ट्रवादी तत्व चीन का नया साल हर वर्ष माघी अमावस के अमांत पर्व में मनाते हैं। माघी अमावस को हिन्द के इलाहाबादी लोग जहां अमृत के लिये छीना झपटी में मौनी अमावस के अमांत पर्व में अमृत की बूंदें गिरी थीं उस पर्व को मंदारिन भाषी चीन का नया वर्ष का पहला दिन मानते हैं। माओ त्से दुंग की शासन प्रक्रिया को भारत को खरगोश समझने वाले काल जेंग की चिंतनधारा का यह ब्लागर विरोध नहीं करता, यह कारपोरेट वकील की अपनी राय है। अगर उन्हें यह पता होता कि उत्तर पूर्वी चीन के भू भाग में ही क्षीरसागर था जिसके मंथन से अमृत सहित चौदह रत्न निकले। महाविष्णु ने क्षीरसागर मंथन के लिये कच्छप अवतार लिया। कछुए के पीठ पर हिमालय के मंदराचल पर्वत मथने की स्थिति में रख कर नाग वासुकि को मथने की रस्सी के तौर पर उपयोग किया। खरगोश पानी में रहने वाला पशु नहीं पर कछुआ पानी और धरती दोनों जगह अपनी पीठ की ताकत का प्रदर्शन करता है। चीन के मानव समाज द्वारा मंदारिन वाङमय का प्रयोग होता है जब कि पशु चाहे जलचर हो या थलचर पशु नभचर नहीं होता। नभचर को पक्षी या द्विज कहा जाता है। सारी धरती में पशु-पक्षी, वनस्पति तथा औषध समानधर्मा होती है। मनुष्यों की तरह अलग अलग बोलियां नहीं बोला करते। चीन के कारपोरेट वकील काल जंग ने हिन्द की मर्यादा पुरूषोत्तम शिष्टता की प्रशंसा करते हुए लिखा -
India has withered under mediocre governance and slow-growth socialisteconomics , but never in its post-independence history has it been misgoverned like the catastrophe of Maoism.
India has withered under mediocre governance and slow-growth socialist
मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र के राज को हिन्दुस्तानी लोग राम राज कहते हैं। राम के हजारों वर्ष बाद उत्तर भारत में गंगा तट- हस्तिनापुर कुरू राजधानी थी। पांडव अजातशत्रु युधिष्ठिर ने पांडवों के किले के साथ साथ इंद्रप्रस्थ या शक्रप्रस्थ बसाया। शक्रप्रस्थ में राजसभा के निर्माण में योगेश्वर वासुदेव कृष्ण की सहमति से मय दानव ने खाण्डव वन दावानल से बचाने के बदले कौंतेय अर्जुन से कहा - पार्थ आपने मुझे जलने से बचाया है। मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ। पार्थ कौंतेय ने श्रीकृष्ण से पूछा - मय को क्या कहूँ ? श्रीकृष्ण ने मय से कहा - दानव शिरोमणि वास्तुकार राजा युधिष्ठिर के लिये ऐसे सभागृह की रचना करो जिसमें दर्शक चकरा जायें। युधिष्ठिर की राजसभा जिसमें राजसूय यज्ञ हुआ था उसका निर्माण मय वास्तुकार ने किया। भारतीय वाङमय में रामराज्य, युधिष्ठिर का धर्मराज्य, भर्तृहरि का सुशासन, विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, चाणक्य की कौटिलीय अर्थशास्त्र में राजधर्म का विवेचन, समुद्र गुप्त, राजा हर्ष, भोजराज की न्यायप्रियता तथा सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म प्रसारणार्थ अपने पुत्र पुत्री को सिंहल भेजना, इस्लामी सल्तनत में भी सम्राट अकबर का राजधर्म, हिन्द की राजधर्म शैली के उदाहरण हैं। भारतीय वाङमय राजधर्म के समानांतर दस्युधर्म का भी उल्लेख आता है। हिरण्यकश्यप, वेन तथा दशग्रीव रावण को दस्युधर्मी राजा माना जाता रहा है। सुराज और कुराज की व्याख्या भारतीय पौराणिक उपाख्यानों में वर्णित है।
Corporate Lawyer Kalxue in the 4th para his assessment, writes ‘India’s resurrected economic confidence has a tripartite basis. The newest leg is the latest GDP data showing Indian growth exceeding China, making India the fastest growing major economy in the world. The other legs of this foundation are from the Manmohan Singh era, when Indians were confident about overtaking China based on two often cited assumptions woven into the hare v's tortoise story.
खरगोश बनाम कछुआ ? कौन ज्यादा आत्मविश्वासी छिन्नसंशय है ? दुबक दुबक कर भगने वाला खरगोश या मजबूत पीठ वाला आधा जलचर आधा थलचर कछुआ। क्षीरसागर चीन के पूर्व भाग में ही था जहां क्षीरसागर मंथन में महाविष्णु के कच्छप अवतार में अमृत उपलब्धि के लिये कछुआ बनना मंजूर किया। हिन्द के लोग खरगोश और कछुआ दोनों पशुओं की सराहना करते हैं। दशविधा सृष्टि वर्णन करते हुए कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास भागवत महापुराण के तीसरे स्कंध के दसवें अध्याय में खरगोश के बारे में लिखते हैं -
श्व श्रगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशलाकौ सिंहः कपिः गजः कूर्मो (कछुआ) गोधाना मकरादयः।
खरगोश और कछुए की तुलना में भारत और चीन में किसे कछुआ माना जाये किसे कहा जाये वह खरगोश है। शायद कारपोरेट वकील की कल्पना मंदारिन वाङमय की प्रतीक है। लेखक चीन की वास्तविकता का उल्लेख करते हुए लिखते हैं -
Chinese economic data have a poor global reputation too, but in recent years global experts have flagged not China’s official GDP numbers as fabricated, but sounded the alarm about a pending banking crisis due to the vast state directed lending necessary to achieve current GDP. While that points to flaws in China’s growth, the implication is that GDP is growing by the stated figures, but driven by a risky credit binge. ।
यही चीन का असंयमित खानपान वाला साख को स्थायित्व न दे पाने वाला रवैया है। इसका कारण चीन के शास्ता समाज का निरीश्वरवादी होना है। हिन्द में भी निरीश्वरवादी खाओ पिओ बम बजाओ अवधारणा के आचार्य चार्वाक महर्षि वशिष्ठ के समकालीन समवयस्क थे। उनका आप्त वाक्य - ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेत था। वशिष्ठ के पुत्र शक्ति (ऋषि पराशर के पिता तथा वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के दादा) की हत्या राजर्षि विश्वामित्र ने कर दी थी। शक्ति के पुत्र पराशर तब केवल पांच वर्ष के बालक थे इसलिये अपनी पत्नी अरून्धती के परामर्श से वशिष्ठ ने अपने प्यारे बेटे शक्ति का अंतिम व सोलहवां संस्कार स्वयं संपन्न किया। शक्ति की तेरहवीं के लिये उन्होंने न्यौते भेजे। अपने पुत्र को मारने वाले विश्वामित्र को भी न्यौता साथ में पुनर्जन्म व श्राद्ध में यकीन न करने वाले आचार्य चार्वाक को भी निमंत्रित किया। चार्वाक ने वशिष्ठ के निमंत्रण पत्र को लौटाते हुए लिखा जिस तरह बुझे हुए दिये की बाती तेला का उपभोग नहीं कर सकती मरे हुए आदमी को श्राद्ध का भोज नहीं पहुंच सकता। महर्षि वशिष्ठ ने निमंत्रण पत्र में ही फिर अनुरोध किया शक्ति की तेरहवीं तो निमित्त मात्र है भोजन तो आपने मैंने करना है। वशिष्ठ के इस तर्क से आचार्य चार्वाक सहमत बने थे। खुशी खुशी शक्ति की तेरहवीं के भोज में सम्मिलित हुए। यह है हिन्द की आम सहमति की रामकहानी। शक्ति की तेरहवीं वाली कहानी तो पौराणिक पुराख्यान है पर स्वामी दयानंद सरस्वती का तर्क तो सवा सौ साल पुराना है। हिन्द का हर मनुष्य चाहे वह हिन्दू हो, सिख हो, बौद्ध हो, जैन हो अथवा सेमेटिक मजहब मानने वाला इस्लाम धर्मावलंबी या ख्रिस्ती धर्मावलंबी ही क्यों न हो। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने अकाट्य तर्कों से विभिन्न धर्मावलंबियों के पाखंड का पर्दाफाश कर डाला। स्वामी जी ने वैदिक धर्म मानने वाले वैष्णव, शैव, शाक्त, गोरखपंथी, नानकपंथी, रैदासपंथी संप्रदायों के धर्मगुरूओं की अपनी अद्वितीय तार्किक क्षमता से वेद विरोधी हर हिन्दुस्तानी को निरूत्तर कर डाला। उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की पर मूर्तिपूजा को वेदसम्मत कभी नहीं माना। हिन्द में स्वामी विरजानंद के प्रिय शिष्य स्वामी दयानंद सरस्वती ने संसार के तमाम विविध धर्मावलंबियों के तार्किक मानववादी बनने का मार्ग दिखाया। स्तंभकार कारपोरेट वकील आगे कहते हैं -
China emerged from apocalypse with an unshakable understanding that leadership must bebrooked by a process and decisions draw from an aggregate of intraparty stakeholders/. At the epochal party meeting in December 1978 Deng Xiaoping was chosen as paramount leader of China – not a god but the head of a system - and began the process of “reform and opening up”, setting China running again at a maintainable pace. ।
चीन को सही संदर्भ में देखने उसके बारे में विचार करने की तात्कालिक जरूरत इसलिये भी है क्योंकि चीन ने माओ के नेतृत्व ने रास्ता अपने लिये अपनाया। वह दूसरों की जमीन हड़पना, स्थापित संस्कृति को उसके कल्पांत तक पहुंचाने का माओवादी तरीका था। कार्ल मार्क्स के जिस विचार श्रंखला को 1917 में लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की संरचना हुई उसकी जड़ों में पानी नहीं डाला गया जिससे लेनिन का संकल्प ढह गया। हिन्द से लोहा लेना चीन के लिये इतना आसान नहीं है। हिन्द से मजहबी इस्लामिक गणतंत्र के नाम पर हिन्द की भूमि के पंजाब, सीमा प्रांत सिंध तथा बलूचिस्तान में बर्तानी नीति फूट डालो राज करो के अनुसार हिन्द का बटवारा कर पाकिस्तान नाम दिया गया। पश्चिमी पाकिस्तान पिछले सत्तर साल से अस्तित्व में है। आतंक की भूमि बन गया। सिंध, पंजाब, सीमा प्रांत तो वस्तुतः हिन्द का महत्वपूर्ण हिस्सा था। भूमि वही भूमि में बहने वाली नदियां तथा पहाड़ भी वही हैं। Bharat that is India के संवैधानिक नाम से पुकारा जाने वाला हिन्द उसकी जमीन उसकी भाषायें पूर्ववत हैं। हिन्द तो भगवद्गीता के उस सिद्धांत का प्रवर्तक है जो अभिव्यक्त करता है कि ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके’। मनुष्य नर नारियों की जिन्दगी कर्म गति से जुड़ी हुई नाल है। वह कर्तव्य बोध की शक्ति प्रेरक है। दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा - भारत के प्रधानमंत्री ने आह्वान किया है आतंकवाद को समूल नष्ट किया जायेगा। चीन अगर शांति चाहता है तो उसे पाकिस्तान का - चीन पाक अंधियारा गलियारा जितनी जल्दी संभव हो उसे शक्तिहीन बना डाले। राष्ट्रसंघ में आतंककर्ता के संरक्षण के लिये वीटो वाली ताकत चीन को ही नुकसान देगी।
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Chinese economic data have a poor global reputation too, but in recent years global experts have flagged not China’s official GDP numbers as fabricated, but sounded the alarm about a pending banking crisis due to the vast state directed lending necessary to achieve current GDP. While that points to flaws in China’s growth, the implication is that GDP is growing by the stated figures, but driven by a risky credit binge. ।
यही चीन का असंयमित खानपान वाला साख को स्थायित्व न दे पाने वाला रवैया है। इसका कारण चीन के शास्ता समाज का निरीश्वरवादी होना है। हिन्द में भी निरीश्वरवादी खाओ पिओ बम बजाओ अवधारणा के आचार्य चार्वाक महर्षि वशिष्ठ के समकालीन समवयस्क थे। उनका आप्त वाक्य - ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेत था। वशिष्ठ के पुत्र शक्ति (ऋषि पराशर के पिता तथा वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के दादा) की हत्या राजर्षि विश्वामित्र ने कर दी थी। शक्ति के पुत्र पराशर तब केवल पांच वर्ष के बालक थे इसलिये अपनी पत्नी अरून्धती के परामर्श से वशिष्ठ ने अपने प्यारे बेटे शक्ति का अंतिम व सोलहवां संस्कार स्वयं संपन्न किया। शक्ति की तेरहवीं के लिये उन्होंने न्यौते भेजे। अपने पुत्र को मारने वाले विश्वामित्र को भी न्यौता साथ में पुनर्जन्म व श्राद्ध में यकीन न करने वाले आचार्य चार्वाक को भी निमंत्रित किया। चार्वाक ने वशिष्ठ के निमंत्रण पत्र को लौटाते हुए लिखा जिस तरह बुझे हुए दिये की बाती तेला का उपभोग नहीं कर सकती मरे हुए आदमी को श्राद्ध का भोज नहीं पहुंच सकता। महर्षि वशिष्ठ ने निमंत्रण पत्र में ही फिर अनुरोध किया शक्ति की तेरहवीं तो निमित्त मात्र है भोजन तो आपने मैंने करना है। वशिष्ठ के इस तर्क से आचार्य चार्वाक सहमत बने थे। खुशी खुशी शक्ति की तेरहवीं के भोज में सम्मिलित हुए। यह है हिन्द की आम सहमति की रामकहानी। शक्ति की तेरहवीं वाली कहानी तो पौराणिक पुराख्यान है पर स्वामी दयानंद सरस्वती का तर्क तो सवा सौ साल पुराना है। हिन्द का हर मनुष्य चाहे वह हिन्दू हो, सिख हो, बौद्ध हो, जैन हो अथवा सेमेटिक मजहब मानने वाला इस्लाम धर्मावलंबी या ख्रिस्ती धर्मावलंबी ही क्यों न हो। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने अकाट्य तर्कों से विभिन्न धर्मावलंबियों के पाखंड का पर्दाफाश कर डाला। स्वामी जी ने वैदिक धर्म मानने वाले वैष्णव, शैव, शाक्त, गोरखपंथी, नानकपंथी, रैदासपंथी संप्रदायों के धर्मगुरूओं की अपनी अद्वितीय तार्किक क्षमता से वेद विरोधी हर हिन्दुस्तानी को निरूत्तर कर डाला। उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की पर मूर्तिपूजा को वेदसम्मत कभी नहीं माना। हिन्द में स्वामी विरजानंद के प्रिय शिष्य स्वामी दयानंद सरस्वती ने संसार के तमाम विविध धर्मावलंबियों के तार्किक मानववादी बनने का मार्ग दिखाया। स्तंभकार कारपोरेट वकील आगे कहते हैं -
China emerged from apocalypse with an unshakable understanding that leadership must be
चीन को सही संदर्भ में देखने उसके बारे में विचार करने की तात्कालिक जरूरत इसलिये भी है क्योंकि चीन ने माओ के नेतृत्व ने रास्ता अपने लिये अपनाया। वह दूसरों की जमीन हड़पना, स्थापित संस्कृति को उसके कल्पांत तक पहुंचाने का माओवादी तरीका था। कार्ल मार्क्स के जिस विचार श्रंखला को 1917 में लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की संरचना हुई उसकी जड़ों में पानी नहीं डाला गया जिससे लेनिन का संकल्प ढह गया। हिन्द से लोहा लेना चीन के लिये इतना आसान नहीं है। हिन्द से मजहबी इस्लामिक गणतंत्र के नाम पर हिन्द की भूमि के पंजाब, सीमा प्रांत सिंध तथा बलूचिस्तान में बर्तानी नीति फूट डालो राज करो के अनुसार हिन्द का बटवारा कर पाकिस्तान नाम दिया गया। पश्चिमी पाकिस्तान पिछले सत्तर साल से अस्तित्व में है। आतंक की भूमि बन गया। सिंध, पंजाब, सीमा प्रांत तो वस्तुतः हिन्द का महत्वपूर्ण हिस्सा था। भूमि वही भूमि में बहने वाली नदियां तथा पहाड़ भी वही हैं। Bharat that is India के संवैधानिक नाम से पुकारा जाने वाला हिन्द उसकी जमीन उसकी भाषायें पूर्ववत हैं। हिन्द तो भगवद्गीता के उस सिद्धांत का प्रवर्तक है जो अभिव्यक्त करता है कि ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके’। मनुष्य नर नारियों की जिन्दगी कर्म गति से जुड़ी हुई नाल है। वह कर्तव्य बोध की शक्ति प्रेरक है। दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा - भारत के प्रधानमंत्री ने आह्वान किया है आतंकवाद को समूल नष्ट किया जायेगा। चीन अगर शांति चाहता है तो उसे पाकिस्तान का - चीन पाक अंधियारा गलियारा जितनी जल्दी संभव हो उसे शक्तिहीन बना डाले। राष्ट्रसंघ में आतंककर्ता के संरक्षण के लिये वीटो वाली ताकत चीन को ही नुकसान देगी।
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