क्या 1905 के बंगभंग से लेकर इंदिरा मुजीबुर्रहमान के 16 मई 1974 के करार पर्यन्त बंगभंग का नया अवतार बंगला देश भारत पड़ोसियों का चमकने वाला नक्षत्र है ?
प्रशांत झा का कथन - Point of debate creation of Bangla Desh is soon as Delhi’s most successful intervention but the relationship is now manned by continuous bilitent disputes.कि भारत के पूर्व में बंगला देश प्रकरण को हिन्द के पड़ोसियों का निर्णायक हिस्सा मानना इकतरफा सोच लगती है। बंगला देश प्रकरण को सही परिप्रेक्ष्य में हृदयंगम करने के लिये 1905 में लार्ड कर्जन द्वारा बंगभंग याने बंगाल के दो टुकड़े वाला प्रसंग भी देखना इसलिये जरूरी है कि आज हिन्द में दो घटक राज्य बांग्ला भाषी हैं। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में बंगभंग को बड़ी सूझबूझ से पेश किया। महात्मा गांधी ने जब इंडियन ओपीनियन के जरिये अपना मंतव्य प्रस्तुत किया उन्होंने स्वयं को वाणी का अधिपति माना तथा स्वराज चाहने वाले समूह को वाचक कहा। बीस अध्याय वाले हिन्द स्वराज का दूसरा अध्याय बंगभंग है। मोहनदास करमचंद गांधी ने संवाद को अधिपति और वाचक के रूप में प्रस्तुत किया। वे कहते हैं - बीज हमेशा हमें दिखायी नहीं देता, वह अपना काम जमीन के नीचे करता है और खुद ही मिट जाता है तब पेड़ जमीन के ऊपर देखने में आता है। कांग्रेस के बारे में ऐसा ही समझिये। जिसे आप सही जाग्रति मानते हैं वह तो बंगभग से हुई जिसके लिये हम लार्ड कर्जन के आभारी हैं। बंगभग के वक्त बंगालियों ने कर्जन साहब से बहुत प्रार्थना की लेकिन वे साहब अपनी सत्ता के मद में लापरवाह रहे। उन्होंने मान लिया कि हिन्दुस्तानी लोग सिर्फ बकवास ही करेंगे उनसे कुछ भी नहीं होगा। उन्होंने अपमानमयी भाषा का प्रयोग किया और जबर्दस्ती बंगाल के टुकड़े किये। हम यह मान सकते हैं कि उस दिन अंग्रेजी राज के भी टुकड़े हुए। बंगभंग से जो धक्का अंग्रेजी हुकूमत को लगा वैसा और किसी काम से नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि जो दूसरे गैर इंसाफ हुए वे बंगभंग से कुछ कम थे। नमक महसूल कुछ कम गैर इन्साफ नहीं है। ऐसा और तो हम आगे बहुत देखेंगे लेकिन बंगाल के टुकड़े करने का विरोध करने के लिये बंगाल के बहुतेरे नेता अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थे। अपनी सत्ता, अपनी ताकत को वे जानते थे इसलिये तुरंत आग भड़क उठी। अब वह बुझने वाली नहीं है और उसे बुझाने की जरूरत भी नहीं है। ये टुकड़े कायम नहीं रहेंगे बंगाल फिर एक हो जायेगा लेकिन अंग्रेजी जहाज में जो दरार पड़ी है वह हमेशा रहेगी ही। वह दिन ब दिन चौड़ी होती जायेगी। जागा हुआ हिन्द फिर सो जाये यह नामुमकिन है। बंगभंग को रद्द करने की मांग स्वराज की मांग के बराबर है। बंगाल के नेता यह बात खूब जानते हैं। अंग्रेजी हुकूमत भी यह बात समझती है इसलिये टुकड़े रद्द नहीं हुए। ज्यों ज्यों दिन बीतते जाते हैं त्यों त्यों प्रजा तैयार होती जाती है। प्रजा एक दिन में नहीं जगती उसे जगने में कई बरस लग जाते हैं। बंगभंग प्रकरण में हिन्द स्वराज में जब वह पुस्तक लिखी गयी महात्मा गांधी को लोग बारिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी के नाम से जानते थे। उनके वाचक जिसे हम प्रश्नकर्ता भी कह सकते हैं अधिपति से पूछा - कांग्रेस ने स्वराज की नींव डाली ? दूसरा सवाल था - बंगभंग के नतीजे आपने क्या देखे ? कोई जानने लायक नतीजा आपको सूझता है ? अधिपति ने अपने वाचक को बताया - बंगभंग से अंग्रेजी जहाज में दरार पड़ी है वैसे ही हम में भी दरार या फूट पड़ी है। बड़ी घटनाओं के प्रभाव भी बड़े ही होते हैं। हमारे नेताओं में दो दल होगये नरम दल और गरम दल। कोई माडरेट को डरपोक पक्ष और ऐक्टिविस्ट को हिम्मत वाला पक्ष भी कहते हैं। सब अपने अपने खयालों के मुताबिक इन दो शब्दों का अर्थ करते हैं। यह सच है कि ये जो दल हुए हैं उनके बीच जहर भी पैदा हुआ है। एक दल दूसरे का भरोसा नहीं करता दोनों एक दूसरे को ताना मारते हैं। करीब करीब मारपीट भी होगयी। ये जो दो दल हुए हैं वे देश के लिये अच्छी निशानी नहीं है ऐेसा मुझे लगता है लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि ऐसे दल लंबे अरसे तक टिकेंगे नहीं। इस तरह कब तक ये दल रहेंगे यह तो नेताओं पर आधारित रहता है। 16 मई 1974 के दिन भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बंगला देश के प्रधान शेख मुजीबुर्रहमान के साथ इकरारनामे पर हस्ताक्षर किये। भारतीय प्रधानमंत्री के दल में बाबू जगजीवन राम सरदार स्वर्ण सिंह भारत के महत्वपूर्ण नेता थे। कूटनीति तथा विदेश नीति के मर्मज्ञ सरदार स्वर्ण सिंह पंडित नेहरू की केबिनेट में भी थे। चीन के प्रधानमंत्री चाउ ऐन लाई की पंडित नेहरू, पंडित पंत से उभयपक्षीय वार्ता के कर्णधार सरदार स्वर्ण सिंह ही थे। बंगला देश और हिन्दुस्तान के बीच विभाजनजन्य स्थिति मुस्लिम लीग द्वारा 1940 के लाहौर प्रस्ताव आधारित न होकर 1905 के बंगभंग पर आधारित थी। पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू निर्धारित हुई जब कि पाकिस्तान के किसी भी हिस्से में उर्दू बोली नहीं जाती थी केवल पंजाब व सीमा प्रांत में वहां के लोग बोलते पंजाबी थे पर खतो खिताबत उर्दू में करते थे। उर्दू के अखबार पंजाब में सिख, हिन्दू व मुसलमान तीनों कौमें पढ़ती थीं। उर्दू भाषा तो संयुक्त प्रांत आगरा, अवध तथा दिल्ली के शहरी मुसलमानों की भाषा थी। समूचे संयुक्त प्रांत में गांवों में रहने वाला मुसलमान हिन्दुओं की तरह ब्रज में ब्रज भाषा, अवध में अवधी, पूर्वी उत्तर प्रदेश में भोजपुरी तथा बुन्देलखंड में बुन्देली भाषा बोलते थे। इलाहाबाद, कानपुर, बनारस, लखनऊ, आगरा, बरेली, मेरठ, मुरादाबाद, गोरखपुर वगैरह बड़े शहरों में बस गये मुसलमान अपनी मादरे जबान उर्दू कहते थे। यह विचित्र उल्टी भाषायी गंगा केवल गंगा यमुना के बेसिन में ही बहती थी। मातृभूमि, मातृभाषा का एक दूसरे से अन्योन्य संबंध है। भाषा विज्ञान का मानना है कि भूमि के किसी एक खंड दो भाषाओं का अस्तित्व अप्राकृतिक है। हिन्दी उर्दू की वाक्य रचना तथा व्याकरण एक सा है। केवल लिपियां अलग अलग होने से कोई भाषा स्वतंत्र भाषा का स्तर नहीं पा सकती। दूसरा अंतर शब्दों की टकसाल से है। हिन्दी की शब्द टकसाल संस्कृत, प्राकृत व अर्धमागधी आदि तद्भव भाषाओं से है जबकि उर्दू की टकसाल फारसी है। यह भाषायी आपद् धर्म केवल भारत के उस हिस्से में साफ साफ नजर आता है जिसे वृहत्तर भारत की वाङमय में सोचने वाले लोग हिन्दी-हिन्दुस्तानी दखिनी और उर्दू के नाम से जानते हैं। गीर्वाक वाणी सरस्वती का उद्भव देवाधिदेव महादेव के ‘नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्’। शिवजी के डमरू से ध्वनियां निकलीं वही संसार की सभी भाषाओं का मूल स्त्रोत है। पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू पाकिस्तान में कहीं नहीं बोली जाती। पंजाब का मुसलमान पंजाबी बोलता है, सीमा प्रांत में पश्तो बोली जाती है, सिंध में सिंधी का बोलबाला है। केवल कराची शहर में उर्दू भाषी ज्यादा हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार तथा दिल्ली से प्रव्रजित सभी मुसलमान उर्दू भाषी हैं। प्रशांत झा ने सवाल किया है बलूचिस्तान क्यों बंगला देश नहीं ? उन्होंने 6 बिन्दु प्रस्तुत किये हैं। 1. हिन्द बलूचिस्तान कार्ड खेलना चाहता है। वे कहते हैं बलूचिस्तान बंगला देश नहीं है पर बलूचिस्तान पर बर्तानिया का ही पूरा अधिकार नहीं था। कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने कलात के. खान से विश्वासघात किया। बलूच कभी भी ब्रिटिश इंडिया के पूरे कब्जे में नहीं रहे केवल क्वेटा में ही बर्तानी सरकार का सिस्टम था जबकि पूर्व पाकिस्तान लाहौर मुस्लिम लीग के प्रस्ताव का भारीभरकम समूह था। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अखबार नवीसी खिलवाड़ अतार्किक है। 2. प्रशांत झा महाशय का यह कथन सही है कि हिन्द और पूर्ववर्ती पाक की साझी सीमा थी। बलूचिस्तान से भारत का कोई सीधा संबंध नहीें है। यह कौन कह रहा है कि भारत बलूचों को अपने से मिलायेगा। भारत केवल नैतिक समर्थन ही दे सकता है। 3. बलूचों की पीड़ा का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इजहार किया, विश्व समुदाय के सामने सच्चाई रखी पर रहना तो वैश्विक मर्यादागिरी के अंदर ही पड़ेगा।
यूरोप के भाषायी देशों व राष्ट्र राज्यों की तरह पाकिस्तान बनने के 22 वर्ष पश्चात ही सही पूर्वी बंगाल के लोगों को यह अहसास होगया कि पश्चिम पाकिस्तान के शासक बंगाली मुसलमानों पर उर्दू थोपना चाहते हैं । बहुसंख्यक बंगाली मुस्लिम उर्दू का थोपा जाना पसंद नहीं करते थे इसलिये उन्होंने आंदोलन की राह पकड़ी पर बंगाल में पाकिस्तानी सेना का साथ देने वालों की संख्या नगण्य नहीं एक अच्छी खासी जमात थी जिनके लिये मजहब भाषा से कहीं ज्यादा प्रेरक था। पूर्व पाकिस्तान के पहले लोकनेता जनाब सुहरावर्दी बांग्ला भाषी नहीं उर्दू भाषी थे। समूचे पाकिस्तान की जनसंख्या में बहुलता बंगाली मुसलमानों का बाहुल्य था। लोकतांत्रिक बहुमत होते हुए भी बंगाली मुसलमान संयुक्त पाकिस्तान का सदर अथवा प्रधानमंत्री होने का सपना नहीं संजो पाता था। पूर्वी पाकिस्तान ने अपना मजहबी नाता बिहार उ.प्र. दिल्ली से पाकिस्तान गये उर्दू भाषी मुसलमानों से तोड़ना ही था जिसे शेख मुजीबुर्रहमान ने अंजाम दिया। बंगला भाषी बंगाली मुसलमानों को भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भारतीय फौज की क्रियात्मक मदद तथा नैतिक समर्थन बहुत बड़ा संबल था। भारत के लोग जानते थे कि बंगाली मुसलमानों का भी एक अच्छी खासी जमात धार्मिक तौर पर हिन्दुओं और बौद्धों के लिये सहानुभूति रखने वाले समूह नहीं थे। 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद भी पूर्वी बंगाल के हिन्दू बौद्ध तथा आदिवासी समूह अपना घरबार छोड़ कर हिन्द नहीं गये। उनकी समस्यायें ज्यों की त्यों बनी रहीं। श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारत विभाजन की विद्रूप स्थिति हिन्दू मुस्लिम मानसिक विभाजन पर एक कारगर रोक बंगाल के मुसलमानों का पंजाबी-सिंधी तथा यू.पी. बिहार से पश्चिम पाकिस्तान गये हिन्दुस्तानी मुसलमानों के उस समूह को गहरा झटका लगाया जो यह मान कर चल रहा था कि मुसलमान हिन्दुस्तान पर राज करेगा। मुसलमान वामन बनिया प्रभुताई वाले हिन्दुस्तान में रहना पसंद नहीं करेगा। कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का यह भी सोचना था कि गंगा जमना के मैदान वाले उर्दू भाषी मुसलमान ने उनके द्विराष्ट्र सिद्धांत को कारगर सहयोग देकर हिन्द के वे मुसलमान जो पाकिस्तान बनने के पश्चात हिन्द में रह गये जिन्होंने पाकिस्तान को प्रयाण नहीं किया वे ही कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के तथा पाकिस्तान के मुसलमानों के एकमात्र सहायक हैं।
अखंड भारत विशाल भारत वृहत्तर भारत आज के Bharat that is India के संविधानानुकूल आधुनिक भारत जिसमें भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण शिक्षादाता तक्षशिला विश्वविद्यालय था, अविभाजित भारत का वह भूभाग जिस सिंध नाम से जाना जाता है जहां सेंधवायन जैसे काशी से विद्यार्जित किये मनीषी ने सिंध में भारतीय संस्कृति का सेंधव स्तूप स्थापित किया पंचनद का वह भाग जिसे आज दुनियां के देश पाकिस्तान नाम से जानती है गुरू नानकदेव जी की जन्मस्थली ननकाना साहब जहां से ओंकार का नया स्वरूप अकाल तख्त साहब निर्मित करने का संकल्प सिद्ध हुआ। हिमालय का समूचा जलन्धर खंड जिसके समूचे पंचनद को सांस्कृतिक दीर्घता दी। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के पश्चात भारत व पाकिस्तान में जब कभी जहां कहीं मुठभेड़ें हुईं उनमें उड़ी की हृदयविदारक आतंक आक्रमण ने भारत उसके एक अरब तीस करोड़ से ज्यादा भारतीयों को झकझोर डाला और भारत तथा उसके निकटस्थ पड़ोसी राष्ट्र राज्यों में आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीतिकरण नीति का कौन सा गुर अपनाया जावे ? भारतीय नेतृत्व इस यक्ष प्रश्न से जूझ रहा है। सार्क संबोधन में पहचाने जाने वाले संगठन का उन्नीसवां सम्मेलन नवंबर 2016 में पाकिस्तान में संकल्पित था। भारत, भूटान, नैपाल, अफगानिस्तान सरीखे सार्क सदस्य देशों ने सम्मेलन स्थगित करनेे का मानस बनाया है। भारत के सामने अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत के पड़ोसियों को पंक्तिबद्ध करने के लिये क्या क्या हों ? इस क्रम में पहले किसे स्थान दिया जाये ? बंगला देश और पाकिस्तान हिन्द के अपने दिल के टुकड़े हैं। सेमेटिक मजहब की मान्यताओं के कारण पाकिस्तान और बंगला देश की भूमि भारतीय ऐतिहासिक संस्कार से अलग नहीं हो सकती। कोई कृत्रिम बटवारा चिरस्थायी नहीं होता इसलिये बंगला देश तथा पाकिस्तान के साथ पड़ोसी धर्म श्रीलंका, भूटान, नैपाल, मालदीव, म्यांमार तथा अफगानिस्तान व तिब्बत से भिन्न स्थिति का मसला है। कश्मीर प्रसंग कश्मीर का वह भाग जिसे पाकिस्तान आक्युपाइड कश्मीर कहा जाता है भारत पाक बंटवारे में पीओके पाकिस्तान का हिस्सा नहीं पर कश्मीर धरा जबर्दस्ती कब्जे वाली भूमि है। गिलगित तथा बाल्टिस्तान सहित पाकिस्तान द्वारा कब्जाये गये इलाकों तथा कायदे आजम द्वारा बलूचिस्तान के इलाके धोखाधड़ी से पाकिस्तान में मिलाने के प्रसंग को राष्ट्रसंघ को देखना ही चाहिये। भारत-पाक सिंधु-किशनगंगा जल संबंधी संधि भी पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को निर्यात करने का विश्व समुदाय को देखना ही पड़ेगा। इसलिये हिन्द के पड़ोसी राष्ट्रों की सार्क पंचायत का कायाकल्प अत्यंत अनिवार्य बिन्दु है। सार्क का उन्नीसवां सम्मेलन पाकिस्तान में प्रस्तावित था, सार्क अध्यक्ष नैपाल सहित भूटान, बंगला देश, अफगानिस्तान आदि सभी ने सार्क सम्मेलन रद्द करने की अनुशंसा ही की है।
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