अर्जुन ने पूछा - श्रीकृष्ण ने कहा
निहत्य धार्तराष्ट्रन् नः कः प्रीतिस्यात् जनार्दनः।
पापमेवा श्रयेत् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः।।
दक्षेश अथवा सार्क नाम से पुकारा जारहा उन्नीस वर्षीय दक्षिण एशियायी राष्ट्र राज्यों का संगठन जो सन 2016 के नवंबर महीने की 9 और 10 तारीखों में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित था, कहीं वह सार्क का संपन्न न हो पाने वाला अंतिम सम्मेलन तो नहीं ? श्री लंका, बांग्ला देश, नैपाल, भूटान व अफगानिस्तान के पांच पांडव क्या भारत में भगवद्गीता का संदेश आतताइयों के लोप होने की संकल्पना तो नहीं कर रहे ? वेदव्यास ने जिन्हें महाभारत महाकाव्य जिसे हिन्द के लोग पांचवां वेद भी कहते हैं ज्योत्सर कुरूक्षेत्र में अठारह दिन चले धर्मयुद्ध के पहले दिन यह घटना हुई।। भारत के ये पांच पड़ोसी राष्ट्र राज्य आतताइयों का पोषण और उनका निर्यात करने वाले व्यापार में पाकिस्तान के वजीरे आजम मियां नवाज शरीफ तथा पाकिस्तान के सेना प्रमुख शरीफ दोनों राजनेेता और सैन्य अधिपति अपनी पिछली करतूतों को तिलांजलि देने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। हिन्द का नेतृत्व करने वाले नरेन्द्र दामोदरदास मोदी स्वयं को अर्जुन की प्रतिज्ञा ‘नमो नमो प्रतिज्ञे द्वै न दैन्यम् न पलायनम्’ का व्रत किये हुए हैं। आततायी तथा उग्रपंथी इस्लाम धर्मावलंबी अंगुलियों में गिने जा सकने वाले लोग जिहाद, आत्मघात के जरिये आतंक का फैलाव करने वाले लोग धरती के कई हिस्सों में फैले हुए हैं। उनका अगुआ तो पाकिस्तान लगता है। हिन्द के नेतृत्व ने ठान लिया है कि वह आतंक का नामनिशान मिटा कर ही सांस लेगा।
बीसवीं शताब्दी अथवा क्राइस्ट की दूसरी सहस्त्राब्दी के सहस्त्र वत्सरात्र के आखिरी तीसरे वर्ष 1997 में दक्षेश या सार्क का बीजारोपण हुआ था। उस समय हिन्द की राजनीतिक हालात भी डगमगा रहे थे। अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व उभर रहा था। कांग्रेस की बागडोर श्रीमती सोनिया गांधी के हाथ पहुंच चुकी थी। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी जो हिन्द की आजादी संघर्ष का मूल आधार थी 1967 से 1997 तक के तीस वर्ष विग्रह कारी थे। इसी अवधि में भारत की एक प्रधानमंत्री तथा एक पूर्व प्रधानमंत्री का निर्मम हत्या ने अहिंसा परमो धर्मः तथा सत्याग्रह और अहिंसा के मार्गदर्शक महात्मा गांधी की मर्यादाओं का पालन करने वाली राजनीतिक चेतना ने मुंह मोड़ लिया था। कांग्रेस में सामूहिक चिंतन तथा विचार विमर्श की वह परंपरा टूट चुकी थी जो पंडित नेहरू के जीवन काल तक कांग्रेस की चिंतन शैली का मुख्य आधार थी। पंडित नेहरू कांग्रेस के सर्वोच्च नेता थे पर वे सरदार वल्लभ भाई पटेल, डाक्टर राजेेन्द्र प्रसाद मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के मत की अवमानना नहीं कर पाते थे। पंडित नेहरू का मन था कि भारत के पहले राष्ट्रपति चक्रवर्ती राजगोपालाचारी हों जो 25 जनवरी 1950 तक भारत के गवर्नर जनरल थे। मौलाना आजाद, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन पंडित गोविन्द वल्लभ पंत मोरारजी देसाई द्वारका प्रसाद मिश्र वी.सी. राय यशवंत राव चह्वाण आदि कांग्रेस नेता डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाने के पक्षधर थे। पंडित नेहरू को अपनी पसंद के बजाय दल के बहुमत की पसंद को स्वीकार करना पड़ा। सन 1957 में पंडित नेहरू चाहते थे कि तत्कालीन उप राष्ट्रपति डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति चुने जायें पर मौलाना आजाद आदि नेता डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को ही राष्ट्रपति रखने के पक्षधर थे। यहां भी पंडित नेहरू को अपने साथियों की बात माननी पड़ी। ठीक दस वर्ष पश्चात जब पंडित नेहरू दिवंगत होगये हिन्द का सबकी सुध लेने वाला राजनीतिक विवेक भी तिरोहित होगया। यह राजनीतिक ऊहापोह पूरे तीस साल हिन्दुस्तान को नचाता रहा। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जब केन्द्र की साझा सरकार अस्तित्व में आयी राजनीतिक विवेक संवर्धन हुआ। साझा सरकार का नामकरण अंग्रेजी में National Democratic Alliance जिसे हिन्द भाषाओं में भारत के लोग राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन कहने लगे। लोकप्रिय जननेता अटल बिहारी वाजपेयी ने अनेक दलों से विचार विमर्श कर राजग की नींव डाली। सन 2004 में जब लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में अ.भा. कांग्रेस अग्रसर हुई कांग्रेस ने भी अटल बिहारी वाजपेयी वाला गुर अपनाया जब राजग के समानांतर यूपीए अस्तित्व में आई। इस संबंध में भगवद्गीता के कर्मयोग के तीसरे अध्याय का इक्कीसवां श्लोक एनडीए की यूपीए द्वारा अनुकरण शीलता का उद्बोध कराता है।
यद्यदा चरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरो जनः। स यत् प्रमाणम् कुरूति लोकः तुदनुवर्तते।।
यूपीए प्रथम ने अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अपनाया सूत्र गठबंधन की सरकार को चलाने का गुर अपनाया पर यूपीए की अगुआ कांग्रेस अध्यक्षा ने स्वयं सत्तासीन होने के बजाय राज्यसभा सदस्य डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रतिनिधि प्रधानमंत्री तय किया। उच्च सदन के सदस्य का प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री होना लोकतंत्र की मर्यादा नहीं मानी जा सकती। जो लोग डेमोक्रेसी अथवा लोकतंत्र लोकसत्ता की बात करते हैं पर राजनीतिक हाराकिरी के जरिये लोकतंत्र के फाटक से अन्दर प्रवेश करने के बजाय पिछले दरवाजे खिड़की या झरोखे से घुस कर राज करने का संकल्प लेते हैं उन्हें वे ही दोष अपनाने पड़ते हैं जिनसे डाक्टर मनमोहन सिंह सरीखे सज्जन टैक्नो-इकोनामीलाजिस्ट तथा हिन्दुस्तान के दलितों का स्वयं को एकमात्र मसीहा मानने वाली वामसेफ चिंतक कांशीराम शिष्या हिन्द के हर इंसान की आदरणीया बहन नेताजी मुलायम सिंह यादव नंदन अखिलेश यादव जिन्हें बुआ (पितृ भगिनी) का सम्मान देते हैं, उन्होंने तथा सैफई नंदन सुत अखिलेश यादव ने वही रास्ता लखनऊ में अख्तियार किया जो 2004 सन से 2014 तक अ.भा. कांग्रेस की प्रभावशालीय अध्यक्षा स्वयं प्रधानमंत्री न बन कर प्रतिनिधि प्रधानमंत्री के जरिये राज करने का तरीका ईजाद कर चुकी थीं। उच्च सदन के सदस्य का दिल्ली की केन्द्र सरकार संकल्पित करना एक नजीर बन चुकी थी जिसकी नकल लखनऊ में भी सन 2007 से लगातार होती रही। राजनीति के पारखी व्यक्तित्त्व को यह तय करना ही पड़ेगा कि यदि वह लोक नेतृत्व का इच्छुक हैै उसे चुन कर लोकसभा या विधानसभा पहुंच कर ही सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने का प्रयास करना होगा। भारत का एक पड़ोसी तिब्बत है, तिब्बत हिन्द और चीन के बीच ठनििमत ैजंजम की भूमिका निर्वाह करता था। चीन भारत का सीधा पड़ोसी नहीं रहा पर जब माओ त्से दुंग ने तिब्बत पर आक्रमण किया उसे अपना हिस्सा बताया। कालांतर में सोच में फर्क आया व चीन कहने लगा Atonomus Region of Tibet इस सोच ने यह बात स्पष्ट कर दी कि चीन अपने अंतर्मन से तिब्बत को अपना नहीं मानता है। त्रुटि होना मानव की नियति है जो त्रुटि पंडित नेहरू से हुई उन्होंने उसे 1959 में सुधारा परम पावन दलाई लामा को भारत मेें राजनीतिक शरण देकर। हिमाचल के धर्मशाला में तिब्बत की चुनी हुई सरकार व संसद कार्यशील है। उन्हें जिस दिन भारत कूटनीतिक मान्यता देकर तिब्बत की प्रवासी (जो कि भारत के धर्मशाला में स्थित है) सरकार को मान्यता दे देगा भारतीय पड़ोसियों का सरताज तिब्बत हो जायेगा। बंगला देश और पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान, नैपाल, भूटान, श्री लंका, मालदीव ये पांच पांडव सरीखे देश भारत के निर्णय की प्रतीक्षा में हैं। बांग्ला देश व पाकिस्तान दो राष्ट्र भारत के जिगर के टुकड़े सरीखे हैं। इन्हें जब तिब्बत तथा म्यांमार का साथ मिलेगा हिन्द की पड़ोसी राष्ट्र संख्या नौ हो जायेगी।
उड़ी में हुई घटना के परिप्रेक्ष्य में आज हिन्द पड़ोसी राष्ट्रों में जो जागृति आयी है उसमें बंगला देश, नैपाल, भूटान अफगानिस्तान तथा श्री लंका के राष्ट्र राज्य मानसिकता में भारत के प्रति सहानुभूति की महाविभूति का उदय हुआ प्रतीत होता है। हिन्द के पड़ोसी राष्ट्र राज्यों से हिन्द का संपर्क उनकी अपनी भाषा के जरिये होगा तो वह स्थिति अत्यंत श्लाघ्य होगी। श्री लंका में दो मुख्य भाषायें हैं एक है सिंहली दूसरी तमिल, नैपाल में नैपाली, बंगला देश में बांगला, भूटान में भूटानी, अफगानिस्तान में पश्तो भारत के राष्ट्र राज्य का मौलिक कर्तव्य तथा स्वधर्म है कि वह अपने राष्ट्र राज्य में साने गुरू जी की आंतर भारती का विस्तार करे तथा हिन्द के पड़ोसी राष्ट्र राज्यों से पार्श्वभारती याने उन देशों की भाषा में संपर्क होगा तो भारत के पड़ोसियों का जो संगठन होगा उसका शक्ति संपात समूची दुनियां के लिये सबका साथ सबका विकास वाले मार्ग का अनुसरण कर भारत के जन जन के मन में हिन्द की हिन्दुस्तानियत को संवर्धित कर सकता है। नैपाल, भूटान श्री लंका, बांग्ला देश, अफगानिस्तान के समानांतर म्यांमार, तिब्बत, मालदीव तथा पाकिस्तान के जन जन के मन में हिन्द की हिन्दुस्तानियत को उभार देना आज के भारतीय नेतृत्व का युग धर्म है। अगर सार्क लुप्त होने की ओर बढ़े तो हिन्द के नेतृत्व को पड़ोसी राष्ट्र राज्यों के प्रमुखों से उनके दिल की बात उनके व्यापक हित की चर्चा कर नैपाल, भूटान, बांग्ला देश, श्री लंका, मालदीव तथा अफगानिस्तान किन अंदरूनी विग्रहों से त्रस्त हैं हर पड़ोसी मर्यादाओं के अंदर रह कर अपना विकास संकल्पित कर पड़ोसियों का भावी संगठन नयी दुनियां की नयी जरूरतों को ध्यान में रख कर सार्क का विकल्प खड़ा करने का शिवसंकल्प ले।
विश्व संगठन यू.एन.ओ. संयुक्त राज्य अमरीका के प्रमुख शहर न्यूयार्क में गतिशील है। हिन्द ने तिब्बत की प्रवासी सरकार को हिमाचल प्रदेश में अपना कार्य संपन्न करने की इजाजत दी है। हिमालय ही ऐसा क्षेत्र है जहां से हिन्द के सभी पड़ोसी भी प्रेरणा ले सकते हैं। नैपाल, भूटान, तिब्बत तथा अफगानिस्तान हिमालय से जुड़े क्षेत्र हैं इतर देशों में म्यांमार बांग्ला देश श्री लंका मालदीव तथा पाकिस्तान गिने जा सकते हैं। बांगला देश तथा श्री लंका अपने मंतव्य खोज चुके हैं पाकिस्तान राष्ट्र राज्य के रूप में किंकर्तव्यविमूढ़ लग रहा है। भारत के लोगों को पाकिस्तान के पंजाबी भाषी, सिंध के सिंधी भाषी, सीमा प्रांत के पश्तो भाषी लोकसमूहों से गहरी सहानुभूति है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा बिहार से जो भारतीय उर्दू भाषी मुसलमान भारत से पाकिस्तान के कराची शहर पहुंचे उनकी कामना भी उर्दू प्रदेश निर्माण की प्रतीत होती है। कराची का उर्दू भाषी भारत से प्रव्रजित मुसलमान वहां अपने को अकेला समझ रहा है। उनकी मनोभावनाओं का भी हृदयस्पर्शी विश्लेषण समय की मांग है। इसलिये भारत के विदेश मंत्रालय को पड़ोसी देशों का संवर्ग, जर्मनी तथा रूस सरीखे देशों का संघ उन देशों की भावनाओं - जर्मन तथा रसियन में संस्कृत वाङमय की क्या भूमिका है ? इसे हृदयंगम करने की ऐतिहासिक आवश्यकता है। भारत को इंग्लैंड सहित उन देशों से जिनकी राजभाषा व लोकभाषा अंग्रेजी है अंग्रेजी में ही पत्र व्यवहार हो। विदेश मंत्रालय फ्रेंच जर्मन स्पेनी पुर्तगाली इटैलियन डच सहित उत्तर यूरप की भाषाओं का संबंधित देशों के साथ पत्राचार का माध्यम बनाने के बारे में गंभीरता से सोच मंदारिन मलय अरबी हिब्रू भाषाओं सहित विश्व के सभी राष्ट्रों की संगति उनकी राष्ट्रभाषा के जरिये हो तभी भारतीय विदेश नीति अपना स्वतंत्र हिन्द का महत्व स्वयं आंक सकती है तथा विश्व के वैश्विक समाज को भारत की इंडोलाजी के जरिये वैकल्पिक भाषायी ऊर्जा का आह्वान करना होगा क्योंकि माता (जननी) मातृभूमि तथा मातृभाषा का एक दूसरे से जमीनी संबंध है। अंग्रेजी भाषा की वरीयता को यूरप के ही भाषायी राष्ट्र राज्य नहीं स्वीकारते। फ्रांस के लोग अपनी भाषा फ्रेेंच, जर्मनी के लोग जर्मन, स्पेन के लोग स्पेनी, इटली के लोग इटैलियन भाषाओं के प्रभुत्व को कमतर मानने के लिये तैयार नहीं। आज दुनियां जिस अमरीकन अंग्रेजी को कम्प्यूटर साइंस की वाहक तथा रोमन लिपि के 26 अल्फाबेट को ही मूल मंत्र मानती है ज्योंही ध्वन्यालोक की ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ मानसिकता संवर्धित होगी वाणी की वर्ण संकरता अपने चरम उत्कर्ष की सीमा लांघने की मुस्तैदी दिखायेगी। संकर भाषा मनुष्य समाज में मन की मत्त, उन्मत्त, प्रमत्त स्थितियां बढ़ायेगी आज मनुष्यों में पागलपन नियंत्रित सीमा में है भाषायी वर्ण संकरता मानसिक रोगों को बढ़ाने का ही काम करेगी इसलिये हिन्दुस्तान में जहां वाणी विलास नटराज के महातांडव ‘नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्’ चौदह ध्वनियों से उच्चारित इक्यावन अक्षर सृष्टि का पुनर्वाचन किया जाये। हिन्द की वाणियां, हिन्द की लिपियों में जो लिखा जाता है वही उच्चारित भी होता है इसलिये कम्प्यूटर के लिये हिन्द की लिपियों रोमन लिपि से ज्यादा कारगर और सटीक परिणाम देने वाली शब्द शक्ति है। राजधर्म संबंधी परिवर्तन शनैः शनैः हो उसकी गति शनि ग्रह की तरह अत्यंत मंद रहे मंदी का अनुसरण ही आकस्मिक परिवर्तन जन्य त्रासदी रोक सकता है। इसलिये भारत के पड़ोसी राष्ट्र राज्यों सामूहिकता को दक्षेश या सार्क के वर्तमान स्वरूप का कायाकल्प कर उसे पड़ोसी राष्ट्र राज्यों की सहभागिता का माध्यम पड़ोसी राष्ट्र राज्यों की स्वभाषाओं में विचारों का आदान प्रदान पड़ोसी राष्ट्र राज्य धर्म की पहली सीढ़ी है। इसलिये पाकिस्तान से भारत के पिछले सत्तर वर्षों के पड़ोसी राष्ट्र राज्य के विग्रह धर्म तथा कहना कुछ करना कुछ और डेमोक्रेसी को सेना द्वारा अपना बंदी बनाया जाना ऐसे दुस्तर्क मार्ग हैं जिन्हें ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के सन्मार्ग में लाने के लिये विद्यमान तौर तरीके बदल रहे हैं। पाकिस्तान दौत्य धर्म ओर दौत्य कर्म की गहन चेतना को हृदयंगम नहीं कर सका है जबकि हिन्द में दौत्य कर्म का पहला उदाहरण कश्यप-दनु नंदन शुंभ और निशुंभ ने दुर्गा के पास अपना दूत भेज कर कहलाया - मुझसे या मेरे अनुज निशुंभ से विवाह कर लो। देवी ने दूत से कहा - सही कह रहे हो शुंभ व उसका भाई निशुंभ दोनों महाबली हैं पर क्या करूँ बचपन में मैंने एक प्रतिज्ञा कर ली कि शादी उसीसे करूँगी जो मुझसे बलवान हो। मुझे युद्ध में हरा दे, स्वयं विजयी हो जाये। दूत जाओ अपने स्वामी दैत्येश्वर शुंभ को मेरा संदेशा पहुंचा दो - यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति। हिन्दुस्तान की आधारशिला ही पुरूष और स्त्री की समानता, सम बुद्धि तथा सम चेतना है जो ऋषि मार्कण्डेय ने मार्कण्डेय पुराण की पुण्यगाथा बतायी है। इसलिये पड़ोसी राष्ट्र राज्य संगठन को नयी ऊँचाई व नये आदर्श का स्तूप निर्माण करना आज हिन्द की पहली जरूरत है। पार्श्व भारती क्या करे ? कैसे हिन्द के पड़ोसी राष्ट्र राज्य उन्नति, उत्कर्ष व उन्नयन के मार्ग के हिन्द के हमराही बनें ? हिन्द के प्रगतिशील दूरन्देश प्रत्युपन्नमति नेतृत्व के मार्ग दर्शन में इस वैदिक छन्द के लाभग्राही हों -
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभागभवेत्।
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