Friday, 14 October 2016

कौन है भारत के उत्तर में हिन्द का असल पड़ोसी तिब्बत या चीन?
India and its Neighbours के तीसरे पायदान में प्रशांत झा ने China जिसे हिन्दुस्तानी लोग चीन नाम से पुकारते हैं उस राष्ट्र राज्य को पुकारा है जो दूसरे देशों की जमीन हथियाने में माहिर है। वे पूछते हैं - With Beijing does Delhi have a Tibet card ? Underlying Tension sections of the establishment have sought to leverage Tibet, but with a growth in Chinese power. India’s ability to play in card had diminished. प्रशांत झा चीन को भारत का तीसरा पड़ोसी मान कर चल रहे हैं पर चीन न तो जापान से पड़ोस धर्म निर्वाह करता है। तिब्बत उसका पड़ोसी राष्ट्र राज्य था उसे माओ त्से दुंग के पी.एल.ए. नेतृत्व ने निगल डाला। निगलते समय उसकी दशा सांप छछूंदर सी होगयी। चीन कह रहा है तिब्बत उसका अटोनोमस रीजन है ? आधुनिक संसार में राष्ट्र आम तौर पर मजहबी आधार पर नहीं यूरप के देशों की तरह सामान्य तथा भाषायी आधार पर ही राष्ट्र राज्य हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन, पुर्तगाल, इटली, तथा उत्तरी यूरप के स्कंेनडेनेवियन राष्ट्र भी भाषायी मूल वाले हैं। मध्य पूर्व के इस्लाम धर्मावलंबी राष्ट्र राज्य भी ज्यादातर भाषायी आधार वाले ही राष्ट्र राज्य हैं। आज की दुनियां में Modern World and Planet of Civilisation का कारक माना जाता है यूरप के उत्साही समाज ने जिन नये इलाकों अथवा महाद्वीपों की खोज की उनमें अमरीका उत्तर व दक्षिण दोनों हैं। अफ्रीका तो अरब से निकटवर्ती भूमंडल है अतएव अफ्रीका को यूरप की नयी खोज नहीं कहा जा सकता है। इतना मानना समीचीन होगा कि अफ्रीका के दक्षिण पश्चिमी बसासतों पर यूरप के उत्साही राष्ट्र राज्यों पर अधिकार पाने में जहां जिस यूरपीय देश को मौका मिला वह अफ्रीकी इलाकों पर झपट पड़ा। भारतीय वाङमय में हिन्दी व दूसरी भारतीय भाषाओं में China को चीन कहा जाता है पर भारतीय भाषाओं और वाङमय जननी संस्कृत उसकी सहेली प्राकृत, पालि भाषाओं में पुराचीन, पराचीन, अर्वाचीन शब्दों का प्रयोग हुआ है जबकि भारतीय वाङमय जिसे आज दुनियां चीन के अधिकार वाला आटोनोमस राज्य तिब्बत के नाम से पुकार रही उसका असल नाम त्रिविष्टप है। हिमालय के उत्तर तथा उत्तर पश्चिम में जो राष्ट्र राज्य हैं उनमें त्रिविष्टप के अलावा ऋषि देश (वर्तमान रूस) व शर्मणि (वर्तमान जर्मनी) ये दो देश ऐसे हैं जिनकी भाषाओं प्राचीन रसियन व प्राचीन जर्मन में पिचानब्बे प्रतिशत शब्द संस्कृत जन्य हैं। इन दोनों देशों की परंपरायें भी भारतीय परंपराओं वाली लगती हैं। त्रिविष्टप, शर्मणि, ऋषि देश तीनों का मूलाधार वर्तमान कैस्पियन सागर जिसे संस्कृत वाङमय कश्यप सागर कहता है वह यूरप का एशिया से जुड़ा हुआ इलाका है। कश्यप-अदिति संतान का कर्म क्षेत्र त्रिविष्टप और दिति-कश्यप संतान जिन्हें दैत्य कहा जाता है उनकी प्रथम दैत्यधानी भारत में गंगा तटवर्ती क्षेत्र हरदोई (पुरातन नाम हरिद्रोही) में थी। हिरण्यकश्यप हरिद्रोही का प्रथम दैत्यराज था। अदिति व दिति की एक बहन दनु भी थी। दनु संतानें ज्यादा घुमक्कड़ थी। उन्होंने अपनी कर्मभूमि ऋषि देश और शर्मणि सुनिश्चित किये। चीन के लोग लंबे अर्से से भारत के इलाहाबाद शहर में मनाई जाने वाली मौनी अमावस के अमांत पर्व को अपना नया साल व नये वर्ष का पहला दिन मानते हैं। 
राष्ट्रीय चीन के शास्ता च्यांग काई शेक जब पेइचिंग तथा मुख्य चीनी जमीन के दूसरे महत्वपूर्ण स्थानों को छोड़ ताइवान चले गये चीन ने पी.एल.ए. के मांधाता माओ त्से दुंग ने चीनी नववर्ष का पहला दिन माघी अमावस या मौनी अमावस को न मनाने का निश्चय किया। चीन के लिये रूस की नकल कर ग्रेग्रेरियन कैलेंडर की जनवरी माह का पहला दिन को ही माओवादी चीन का राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित किया। चीन में डुगडुगी पिटवाई गयी जो कोई राष्ट्रीय चीनी कैलेंडर के नये वर्ष का नया दिन भारत में मनाई जाने वाली मौनी अमावस को मनायेगा उसे दण्डित भी किया जा सकता है। 1949 से चालू यह चीनी हुक्मनामा चीन के लोगों ने 8 फरवरी 2016 के दिन समूची चीनी जनता ने अपना नया साल तथा नये साल का पहला दिन मनाया। चीन के वर्तमान शासकों में वह ओज नहीं था जिसका उपयोग माओ करते थे। चीन के मौजूदा नेता ने कहा - लोगों को 8 फरवरी 2016 को अमान्त वाल नववर्ष पर्व मनाने दो पर सरकार ग्रेग्रेरियन कैलेंडर ही मानेगी। सिंगापुर, ताइवान व हांगकांग के चीनी लोग चीनी नये साल का पहला दिन प्रतिवर्ष भारत के इलाहाबाद में मनाई जाने वाली अमावस जिसे इलाहाबादी लोग मौनी अमावस कहते हैं उसके अमांत पर्व में मनाई जाती है। राष्ट्रीय चीन और मंदारिन भाषी चीन के लोगों की कल्पना है कि हिन्द में क्षीरसागर का जो गुणगान होता है वह क्षीरसागर चीन के पूर्ववर्ती इलाके में था जहां समुद्र मंथन हुआ। क्षीरसागर से 14 रत्न निकले जिनमें मुख्य रत्न अमृत था। देवता व दैत्यों में अमृत के लिये छीना झपटी हुई जिससे प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में अमृत बूंदें गिरीं। जहां जहां अमृत बूंदें गिरीं उन जगहों पर कुंभ मेला लगता है तथा हर बारहवें वर्ष मकर संक्रांति से लेकर वसंत पंचमी तक मनाया जाता है। पूरा माघ मेला इलाहाबाद में मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी से मकरार्क के पूरे महीने माघ-स्नान मनाया जाता है। माघ-नहान का अंतिम पर्व माघी पूनम तथा माघ नहान का महत्वपूर्ण समय मौनी अमावस का अमांत पर्व है। चूंकि राष्ट्रवादी चीन अमांत पर्व (माघी अमावस जिसे इलाहाबाद में मौनी अमावस कहा जाता है।) को सांस्कृतिक चीन का महत्वपूर्ण मुहूर्त्त मानता है वह जाग्रति सन 2016 में फिर उदित होगयी है इसलिये सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय मानसिकता वाले मंदारिन भाषी चीनी समाज का बहुमत जिस दिन यह घोषणा कर दे कि सांस्कृतिक चीन अपने राष्ट्रीय कैलेंडर को ही महत्ता देगा ग्रेग्रेरियन कैलेंडर को नहीं। भारत सहित दुनियां उन देशों को सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चीनी मानसिकता का विश्लेषण समय की मांग है।
अब चीन के द्वारा तिब्बत के धर्मगुरू परम पावन चौदहवें दलाई लामा के बारे में Recarnation Theory पर विचार किया जाये। चीन की बीजिंग स्थित सरकार ने 2007 में एक कानून Recarnation Procedure of Dalai Lama पर विधिक प्रावधान कर परम पावन दलाई लामा के उत्तराधिकारी का निर्धारण अधिकार पेइचिंग की निरीश्वरवादी सरकार को दिया है। चीन की सरकार तथा निरीश्वरवादी चीनी शास्ता दबी जबान से यह स्वीकारते हैं कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी उनके लिये टेढ़ी खीर होगी। स्तंभकार प्रशांत झा ॅींज ंजिमत क्ंसंप स्ंउंघ्  के यक्ष प्रश्न पर What after Dalai Lama?   के यक्ष प्रश्न पर 1 Issue may devide the Tibetan community and generate geopolitical tension. 2. The Dalai Lama himself has been ambiguous suggesting that there may be no one after him or that his reincarnation will be born in free country which rules out present day Tibet under China. 3. China will not keep quiet and is learned to pick A Dalai Lama. Tibetan community may not accept etc.                        
मुख्य सवाल तिब्बती संस्कृति के पुरोधाओं का चिंतन पोखर है। अगर निरीश्वरवादी चीनी शासकों की पकड़ राष्ट्रवादी तथा सांस्कृतिक चीन व मंदारिन वाङमय में होरही नवीन जाग्रतियों को रोकने की शक्ति नहीं जुड़ा पाती और चीन के निरीश्वरवादी शास्ता धीरे धीरे सिकुड़ते रहे तो सतसठ वर्ष पहले माओ त्से दुंग ने सोवियत रूस के तत्कालीन पुरोधा स्टालिन के तौर तरीकों पर जो अभियान चलाया वह मंद पड़ता जारहा है। चीनी शासकों की पकड़ ढीली होने का पहला उदाहरण हांगकांग है। ताइवान और सिंगापुर चीनी शासकों के कब्जे में नहीं है। हांगकांग और चीन की मुख्य भूमि ही यह तय करेंगे कि क्या आने वाले समय में ताइवान तथा सिंगापुर की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता मजबूत होकर चीन की मुख्य भूमि से माओवाद को भगा न दे। पंडित नेहरू ने सन 1959 में तिब्बत के धर्मगुरू तथा शासक (भारत में आज भी यह मान्यता है कि राजा या जो वंशानुगत हो अथवा लोकमत द्वारा चुना हुआ हो) महाविष्णु का अवतार है। जब सन 1931 में मैसूर के हिन्दू राजा जय चामराज वाडियार व उनकी रानी शिवानी कैलास मानसरोवर यात्रा में आये कुमांऊँ के हर गांव के लोग हिन्दू राजा के दर्शन करने मीलों पैदल चल कर अल्मोड़ा से लिपुलेख तक पंक्तिबद्ध खड़े थे। राजा चाहे वंशानुगत हो, पंचायत द्वारा चुना हुआ लोकनेता हो उसे हिन्दुस्तानी चेतना परमपिता परमात्मा का अंश मानती है। 
स्तंभकार ने लिखा क्या भारत का तिब्बत कार्ड है ? दलाई लामा पिछले सतावन वर्ष से भारत में शरण लिये हैं। उनकी सरकार को भारत ने धर्मशाला हिमाचल से भारत में एक लाख से ज्यादा तिब्बती तथा दुनियां के शेष देशों में जो तिब्बती रह रहे हैं उनकी सरकार को काम करने का मौका दिया। पहल हिन्द के हाथ है वह जिस दिन धर्मशाला में निरंतर चल रही तिब्बत सरकार को कूटनीतिक मान्यता देने का संकल्प भारत सरकार ले लेगी तिब्बत की सरकार का रूतबा स्वयं बढ़ जायेगा। चीन यह स्वीकार करता है कि तिब्बत एक आटोनोमस रीजन है। तिब्बत सांस्कृतिक, मजहबी एवं भाषायी दृष्टि से चीन से संबंधित नहीं है। अनादि काल से 1949 तक तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र रहा यदि सांस्कृतिक तथा आस्था के क्षेत्र में तिब्बत जहां के लोग परम पावन दलाई लामा के अवतरण को स्थापित परंपरा मानते हैं तथा वर्तमान दलाई लामा को चौदहवें दलाई लामा मानते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दुस्तान के हिमालयी इलाके की भांति तिब्बत के लामा लोग अवतरण वाद पुनर्जन्म के सिंद्धांत पर आधारित है। आदि शंकर ने भगवान गौतम बुद्ध को महाविष्णु का नवां अवतार स्थापित कर दिया। बौद्धावतार की महिमा तथा चीन का साम्यवादी शासन तंत्र Reincarnation Theory संबंधी जो बहस चलाये हुए है तिब्बत से सटे हुए इलाकों उत्तराखंड के मानस खंड व केदार खंड जलंधर खंड तथा कश्मीर खंड में गांव गांव में जगरिया भगरिया डंगरियों की एक विशाल पंक्ति है। स्वामी विवेकानंद जब अल्मोड़ा से कैलास मानसरोवर के रास्ते जारहे थे वर्तमान पिथौरागढ़ जनपद में पूर्वी रामगंगा के तटवर्ती गांव कमतोली में होरहे जागर तथा डंगरिया में देव शक्तियों को स्वामी जी ने अनुभूत किया। जगरिया व भगरिया जागर करते जारहे थे। डंगरिया में देव शक्ति उद्भूत हुई वह प्रश्नकर्ताओं के जवाब देरहा था, अंगारे खाते जारहा था पर मुंह तथा हाथ जल नहीं रहे थे। डंगरिया लोगों के सरोकारों का सटीक उत्तर देरहा था। स्वामी विवेकानंद को कमतोली के डंगरिया के कथाव ने अनुभूति करायी कि ईश्वर का सजीव अस्तित्व है। उन्हें ईश्वरानुभूति कोलकाता के कालीबाड़ी और अल्मोड़ा के काकड़ीघाट में कोसी तट पर हुई। स्वामी जी की ईश्वर अनुभूति की इन घटनाओं का विवरण सिस्टर निवेदिता ने किया है। अब तिब्बत कार्ड पर विचार करें। प्रशांत झा कहते हैं तिब्बत कार्ड संबंधी हिन्द की हालतें मंद और धीमी पड़ गयी हैं। उनकी यह सोच वास्तविकता से परे है। तिब्बत भूटान व नैपाल हिमालय के उत्तर व हिमालय के गर्भ में ऐसे क्षेत्र जहां तिब्बत और हिन्द की पड़ोस धर्मिता उत्कर्ष की ओर जाने ही वाली है। प्रशांत झा कहते हैं कि बर्तानी सरकार तिब्बत में चीन के प्रभुत्व अथवा सुजेनेरिटी चीन की सार्वभौमता की पक्षधर थी परंतु Seven Years in Tibet के लेखक हेनरिच हर्र का कहना है कि बर्तानिया के रेजिडेन्ट जो ल्हासा में तैनात थे उनका स्पष्ट मत था कि तिब्बत व भूटान की स्वतंत्रता तिब्बती व भूटानी संस्कृति की संरक्षा के समानांतर भारत के लिये भी लाभदायक है। स्तंभ में तिब्बत के सवाल को उलझन वाला बना डाला है। वे सरदार पटेल के नवंबर 1950 में पंडित नेहरू को लिखे पत्र का हवाला भी देते हैं। कहते हैं कि तिब्बत में चीन ने 1950 में आक्रमण किया। डाक्टर राममनोहर लोहिया की यह मान्यता थी कि तिब्बत का मानसरोवर कैलास क्षेत्र भारत का हिस्सा था। तिब्बती लामा भी उनकी मान्यता को इन्कार नहीं करते थे। पंडत नेहरू को जब शांतिलाल त्रिवेदी ने अस्कोट जिला पिथौरागढ़ के किसानों की दयनीय दशा का ब्यौरा गांव गांव एवं घर घर जाकर तैयार कर भेजा। पंडित नेहरू ने नेशनल हेरल्ड अखबार में 1936 में अस्कोट के खायकरों की दास्तान भेजी थी, प्रकाशित कर कालांतर में अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में चौकोट से अस्कोट तक के भाग में कुमांऊँ के किसानों की रामकहानी लिखी थी। 1949-50 में जो राजनीतिक भूल पंडित नेहरू से हुई उसे उन्होंने 1959 में दलाई लामा को एक लाख तिब्बतियों सहित जो शरण दी तथा आज भी लाखों तिब्बती हिन्द में उसी शान शौकत में रहते हैं जो उन्हें अपने देश तिब्बत में उपलब्ध थी। उनकी लोकप्रिय सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला कस्बे के निकट कार्यशील है। इस सरकार को मान्यता देना भारत की पहली राजनीतिक जरूरत है। यद्यपि स्तंभकार प्रशांत झा ने तिब्बत कार्ड की सामाजिक उपयोगिता का सवाल खड़ा किया है पर तिब्बत एक सांस्कृतिक राष्ट्र तो है ही। तिब्बत की आजादी चीन ने जबर्दस्ती छीन ली। राष्ट्र संघ तथा विश्व के मानवाधिकार समर्थक राष्ट्र राज्यों को तिब्बत को स्वतंत्र तिब्बत के लिये नैतिक समर्थन देना चाहिये ताकि भारत में धर्मशाला में पिछले 2 वर्ष से कार्यशील लांबसोंग की सरकार यह हिम्मत कर सके कि ल्हासा उसकी धैर्यधानी है। ल्हासा में पहुंच कर तिब्बती मूल के लोग पुनः तिब्बत में जाकर हिमालय के गर्भ में उस मार्ग का अनुसरण करें जिसे भीष्माचार्य ने ध्यान पथ कहा है। बौद्ध मत का हीनयान हो या महायान दो आस्था शैलियों का मुख्य तत्व ध्यान है। भीष्माचार्य ने युधिष्ठिर के सवाल - को धर्मः सर्वधर्माणाम् भवतः परमो मतः का तार्किक जवाब देते हुए भीष्माचार्य ने राजा युधिष्ठिर को कहा - ध्यायन् स्तुवन् नमस्यश्च यजमान। पहला धर्म ध्यान धर्म है जिसे बौद्ध धर्मावलंबी ध्यान योग के द्वारा आत्मसात करते हैं। आज की हमारी दुनियां में ध्यान धर्म का पहला स्तूप परम पावन चौदहवें दलाई लामा हैं जिन्हें तिब्बत में चीन के भयावह कष्टप्रद आक्रमण के कारण भारत में शरण लेनी पड़ी। भारत दलाई लामा और अन्य बौद्ध धर्मावलंबियों का मूलाधार है क्योंकि भारत में ही कपिलवस्तु में गौतम बुद्ध जन्मे। उन्हें बोध या ज्ञान बुद्ध गया में हुआ। उन्होंने ज्ञान मार्ग का पहला स्तूप सारनाथ-काशी में संपन्न किया। धर्म के चार स्तरों में सर्वश्रेष्ठ स्तर ध्यान धर्म का दूसरा प्रार्थना धर्म-स्तुति जिसे गिरजाघरों में दुनियां भर के ख्रिस्ती धर्मावलंबी ईश वन्दना करते हैं। धर्म का तीसरा रूप नमस्या है जिसके बारेे में सगर के पुत्रों ने सागर की रचना की। और्वोपदिष्ट योग से और्वोपदिष्ट मार्ग का निर्धारण हठासन में बैठ कर निराकार परमात्मा की नमस्या पूर्वक आराधना थी। धर्म का चौथा पाया जलवायु परिवर्तन जन्य वायु प्रदूषण जल प्रदूषण तथा वनस्पति एवं औषधि प्रदूषण को नया मार्ग सिखाना है वह मार्ग हव्यवाह मार्ग कहा जाता है। उड़ी प्रकरण के पश्चात हिन्द के सामने अपने पड़ोसियों से एक नया संवाद कायम करना जरूरी होगया है। पाकिस्तान व बंगला देश 1947 से पहले हिन्द के ही हिस्से थे, बंगाल ने भारत की आजादी से 42 वर्ष पूर्व बंगभंग का दुर्दान्त कष्ट सहा था इसलिये बंगला देश तथा पाकिस्तान से कारगर संवाद स्थापित करने से पहले उनसे आतंकवाद पर चर्चा करना जरूरी है। भारत के निकटस्थ पड़ोसी राष्ट्रों में श्रीलंका, नैपाल एक श्रेणी वाले स्तूप हैं। भूटान और तिब्बत का महत्व हिमालय से जुड़ा है साथ ही ये दोनों देश ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के प्रतीक हैं। अफगानिस्तान जिसका भारतीय वाङमयी नाम उपगंधर्व स्थान है गांधार सौवली गांधारी का राजा धृतराष्ट्र से आत्मिक समन्वय है। यद्यपि अफगान लोग इस्लाम धर्मावलंबी हैं पर गंधर्व संस्कृति उन्हें हिन्द के नजदीक लाती है क्योंकि हिन्द का मजहबी प्रतीक विनोबा भावे ने यह कह कर किया - 
श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापिहि। 
भागवत शास्त्र में श्रद्धा - दूसरे सभी धर्मशास्त्रों के लिये समादरपूर्वक सम्मान यही भारत की मजहबी लक्ष्मण रेखा है। 
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