काठमांडू-तराई तालमेल
नेपाल के प्रधानमंत्री की राजनीति-रणनीति की पहली जरूरत।
नेपाल के प्रधानमंत्री की राजनीति-रणनीति की पहली जरूरत।
हिन्द के पड़ोसी राष्ट्र राज्य समूह में प्रशांत झा महाशय ने 20 सितंबर 2016 के हिन्दुस्तान टाइम्स के Spot Light स्तंभ में A balancing act between Kathmandu and Tarai के समानांतर ChinaCard का भी पंचसूत्री अहवाल दिया। प्रशांत झा महाशय संभवतः तमिल-सिंहल विभेद को आंतर भारती नजरिये से देखने के बजाय केंब्रिज के विद्वत् समाज के दृष्टिकोण से देख रहे थे। हिन्द के पहले दक्षिणी या दकिनी पड़़ोसी श्रीलंका की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का पूर्वाकलन करते वाल्मीकि, तुलसी, कंबन ने लंका संबंधी चित्रण में कौन सी लाक्षणिक व्यंजनायें अपने अपने काव्यों में व्यक्त की। मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत महाकाव्य की नायिका पद्मिनी थी। सिंहल तथा हिन्द के पारस्परिक तालुकों में क्या भूमिका थी यह शायद उनके संज्ञान में नहीं था। जहां तक मधेसी (मधेश के रहने वाले भारतीय आर्य नस्ल के मैथिली, वज्जिका, भोजपुरी, अंगिका तथा अर्धमागधी बोलने वाले लोग) के ही प्रशांत झा भी हैं। ऐतिहासिक विडंबना है कि प्रशांत झा हिन्दुस्तानी है और मधेस के अन्य मूल नागरिक काठमांडू (गुर्खा) राज के अंतर्गत गुर्खों के आगे दुबके रहते दीखते हैं। पूर्व में अरूणाचल प्रदेश के पूर्व में वर्मा से सटे इलाके में उत्तर से दक्षिण को बहने वाली नदियों में एकदम पूर्व में इरावती तथा सुदूर पश्चिम में वितस्ता है। हिमालय के मध्यवर्गी क्षेत्र को मानस खंड कहा जाता है जो मानसरोवर से संबंधित प्रतीत होता है। वाल्मीकि ने सुंदरकांड में राक्षसियों द्वारा जनकनंदिनी सीता को कहा कि रावण प्रजापति है। प्रजापतियों में रावण चौथे स्थान पर राक्षसियों ने सीता को बताया। मूलतः ब्रह्म उनके पुत्र पुलस्त्य पौत्र विश्रवा प्रपौत्र दशग्रीव रावण को उन्होंने प्रजापति पंक्ति में चौथे स्थान पर रखा। दशग्रीव रावण महादेव का अनन्य भक्त था। नित्य शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ कर आदिदेव महादेव भक्ति रत था पर रावण को मानसरोवर के राजहंस के नीर क्षीर विवेक स्वीकार्य नहीं था इसलिये रावण ने कैलासपति शंकर साधना के लिये स्नानार्थ नये सरोवर राकसताल का निर्माण किया। आज भी शिव उपासक जब मानसरोवर जाते हैं स्नान करते हैं। कुछ लोग जो दशग्रीव रावण भक्ति मार्ग के अनुयायी हैं वे राकसताल स्नान भी करते हैं। जीवनधारियों में नागों के पश्चात सागर, पर्वत, सरितायें, इनके अनुक्रम के मनुष्य (मनुते इति मनुष्यः), यक्ष, राक्षस (राक्षस वे हैं जो अपनी सुरक्षा करनेे में स्वसमर्थ हैं), पिशाच, सुपर्ण (पक्षी), जीवमात्र पशु, वनस्पति औषध वृक्ष उनकी गणना होती है। हिमालय में मानस खंड, केदार खंड, जलन्धर खंड तथा कश्मीर खंड ये चार भाग हैं। इनमें केदार खंड से लेकर कश्मीर खंड तक का क्षेत्र निर्धारण सुनियोजित है पर मानस खंड मानसरोवर तथा कूर्मांचल से पूर्व में कहां तक है यह एक यक्ष प्रश्न है। प्रशांत झा लिखते हैं संस्कृत में काठमांडू को काष्ठ मंडप तथा नैपाली में काठमांडौ कहा जाता हैै। नैपाल के पश्चिम में भारत के उत्तराखंड राज्य का कुमांऊँ क्षेत्र है। इसे कूर्मांचल का मानस खंड नाम से भी जाना जाता है। यहां के लोगों की भाषा कुमैयां या कुमांऊँनी कहलाती है। कुमांऊँनी भाषा में भाबर तराई के लोगों की भाषा को मनेसी कहा जाता है जब कि नैपाल की तराई को लोग मधेश तथा वहां की लोकभाषा को मधेशी कहते हैं। जिस तरह मानस खंड व केदार खंड के मध्य स्थित बदरीनाथ का रावल या प्रधान पुजारी नंबूदिरी ब्राह्मण केरल के कालड़ी गांव के पार्श्ववर्ती ब्राह्मणों के गांवों में बसे नंबूदिरी ब्राह्मण गढ़वाल जाकर उनी गांव में बस गये और उनियाल कहलाने लगे। उसी तरह काठमांडौ के पशुपतिनाथ धाम के रावल या पुजारी कर्णाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के शैव ब्राह्मण ही होते आये हैं तथा पशुपति के समानांतर वनस्पति व औषध क्षेत्र में रूद्राक्ष, भद्राक्ष के वृक्ष काठमांडौ से पूर्ववर्ती पहाड़ी पठारों में ज्यादा मात्रा में होते हैं। रूद्राक्ष एक चमत्कारी औषध तंत्रवेत्ता वृक्ष फल है। इसलिये नैपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री भारतीय प्रधानमंत्री के संपर्क से नैपाल में जो राष्ट्रोपयोगी प्रबंधन चाहते हैं वह ऐसा ही उदय है जिस तरह गौतम बुद्ध के जमाने में अंगुलिमाल सरीखे व्यक्ति भी सन्मार्ग के राही होगये। प्रचंड ने अपनी राह चीन की कम्यूनिस्ट शैली पर तय की पर अब वे इस नतीजे पर पहुंचे गये लगते हैं कि नैपाल का राष्ट्रीय हित हिन्द से जुड़ा हुआ है। नैपाली ब्राह्मणों के बारे में एक केरल निवासी मौनपाल ने इस ब्लागर को एक नैपाली कहावत सुनायी - कुमांईं को गुमांईं छेत्री को जाल, परधान को लेखा औरन को काल। इस ब्लागर ने मौनपाल से पूछा - और बात तो समझ में आगयी पर ‘कुमांईं’ शब्द के क्या मतलब हैं। उन्होंने कहा - नैपाल में ब्राह्मण को कुमांईं कहते हैं क्योंकि भारत के हर हिस्से से ब्राह्मण लोग बदरी-केदार कैलास मानसरोवर यात्रा करके ही नैपाल गये। इस व्याख्या की इस अद्भुत शैली सिक्किम की राजधानी गंगटोक से अठारह मील पश्चिम में कृष्ण वल्लभ भगत के घर में निर्मित गोबर गैस प्लांट का मुआयना करने यह ब्लागर गया। तकनीकी अधिकारी बाबू कृष्णनंद सिंह ने इस ब्लागर को बतलाया कि कृष्ण वल्लभ भगत हिन्दी में बात नहीं करते वे हिन्दी जानते हैं पर बात नैपाली या अंग्रेजी में ही करना चाहते हैं। यह ब्लागर जब उनके घर गया वहा का पूरा माहौल कुमइयां ब्राह्मणों के घरों सरीखा था। इस ब्लागर का नाम सुन कर कृष्ण वल्लभ भगत ने कुमइयां भाषा में इस ब्लागर को बताया कि उनके पूर्वज नैनीताल जिले के भवाली में रहते थे। वहीं से बाराही गुमदेश होते हुए काली पार डोटी आये डोटी से बढ़ते बढ़ते सिक्किम तक पहुंच गये। कुमांऊँ ठेकेदारी करने के कारण कृष्ण वल्लभ भगत अच्छी हिन्दी जानते थे पर अपनी भाषा नैपाली को प्राथमिकता देना उनका स्वधर्म था। उनका हिन्दी विरोध वैसा ही था जिस तरह भारत के कई राज्यों में जहां की राजभाषायें बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी, कोंकणी, गुजराती, पंजाबी व उर्दू भाषायें हैं उन्हें भी हिन्दी का भय सताता रहता है। हिन्दी दुनियां के भाषायी नक्शे में चौथी भाषा है जिसके बोलने वाले व समझने वाले लोगों की संख्या मंदारिन, अंग्रेजी, अरबी के पश्चात चौथे पायदान में है। नैपाल के मधेसी जनसंख्या के लिहाज से गुर्खों या मंगोल नस्ल के नैपालियों से ज्यादा है। नैपाल के शाही खानदान तथा नैपाल के ब्राह्मण कुछ हद तक बनिया लोग जिन्हें नैपाली में प्रधान कहा जाता है वे मंगोल नस्ल के न होकर आर्य नस्ल वाले हैं। जब कोई राष्ट्र राज्य एकछत्र राज्याधिकारी सार्वभौम राजा के बजाय लोकतंत्र डैमोक्रेसी को अपनाता है जिन लोगों की जनसंख्या ज्यादा होती है। राज पर उनका ही कब्जा होता है पर नैपाल के पर्वतीय क्षेत्र के मंगोल नस्ल के गुर्खे अपना प्रभुत्व चाहते हैं उन्होंने जो नया संविधान बनाया उससे मधेसी नाखुश हैं। उनका मानना है कि मंगोल नस्ली गुर्खा उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं यही नैपाल के संविधान के प्रावधानों से झलकता भी है। भारत के प्रधानमंत्री ने नैपाल को चेताया कि मधेसी समाज को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिये। लगता है प्रधानमंत्री प्रचंड भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा नैपाल के भूचाल से हुए नुकसान की भरपायी करने में जितने उदार थे उस उदारता ने प्रचंड महाशय को गद्गद किया। काठमांडौ और काशी दोनों काशी विश्वनाथ नंदीश्वर के क्षेत्र है हिन्द के साथ सुमधुर संबंध रहने पर ही नैपाल समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। यह प्रचंड महाशय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के निष्कपट व्यवहार से सीख लिया है। संभवतः प्रचंड यह समझ गये हैं कि अंततोगत्वा चीन भी राष्ट्रीयता के आधार पर ताइवान की ओर ही झुकने वाला है। चीन के जनसामान्य ने चीन का नया वर्ष, नये वर्ष का पहला दिन इस वर्ष मौनी अमावस 8 फरवरी 2016 के दिन उत्साह से मनाया था। निरीश्वरवादी चीनी शास्ता समाज ने चीनी नये साल का पहला दिन जब 8 फरवरी 2016 को उत्साहपूर्वक मनाया उससे प्रचंड भी प्रभावित हुए लगते हैं। भारत से नजदीकी रख कर ही नैपाल विश्व का प्रभावी हिमालयी राष्ट्र बन सकता है। एक तात्कालिक सवाल गोरखा या गुर्खा गोरखे पर उठता है। संस्कृत वाङमय में गुर्खा या गोरखा शब्द की व्युत्पत्ति गोरक्षक से है। गुरू गोरखनाथ का नाथ पंथ हिन्दुस्तान का गोरखपुर जो नैपाल की सीमा से काफी नजदीक है उसको संस्कृत वाङमय में गोरक्षपुरः कहा जाता है। गुरू गोरखनाथ के अनुयायी नाथ पंथी उत्तर प्रदेश की तराई की तरह बिहार की तराई तथा नैपाल के मधेस में भी हैं। राणा प्रताप के वंशधर थारू कुमांऊँ की तराई के अलावा उत्तर प्रदेश के बहराइच खीरी बलरामपुर जिलों में भी फैले हैं। इनकी एक अच्छी खासी संख्या उ.प्र. की सीमा से सटे हुए नैपाल की तराई वाले हिस्से में बसे हैं। मधेसियों के अलावा नैपाल के संविधान में मधेसियों की उपेक्षा के साथ साथ थारू लोगों की भी उपेक्षा हुई है। नैपाल का शाही खानदान जब तक वहां राजतंत्र-राजकुल विद्यमान था वे सभी आर्य नस्ल वाले राजा थे उनके विवाह संबंध भारत के राजा राजघराने से ही हुआ करते थे। इसलिये नैपाल ने जब लोकतंत्र या डैमोक्रेसी का वरण किया डैमोक्रेसी तो संख्याबल पर आधारित होती है इसलिये मंगोल नस्ल के गुरखों ने बहुसंख्यक आर्य नस्ल के मधेसियों, थारूओं नैपाल में बसे सभी ब्राह्मणों तथा राजपूत परिवार जो नैपाल में बस गये उन सभी की मिलीजुली संख्याबल दो तिहाई है। गुरखा याने मंगोल नस्ल वाले चपटी नाक के गुरखों की संख्या नैपाल में पूरी जनसंख्या का तीसरा हिस्सा है इसलिये नैपाल के संविधान में मधेसियों व थारू आंदोलन तथा मंगोल नस्ल के गुरखों के समानांतर मधेसी आर्य नस्ल के लोगों सहित उन सभी लोगों को संवैधानिक समान नागरिकता अधिकार की मांग, जिसे भारत ने ही उन समाजों को नैतिक समर्थन दिया चाइना कार्ड खेलने वाले लोगों को यह समझना चाहिये था कि नैपाल में जातीय या नस्लीय आधार पर बहुसंख्यक वे लोग हैं जो आर्य नस्ल वाले हैं। उनकी उपेक्षा मंहगी पड़ सकती है परंतु साम्यवाद के घेरे में घिरे कुछ लोग यह वास्तविकता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे जब कि नैपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री प्रचंड को यह प्रतीति होगयी कि केवल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही नैपाल के सच्चे हितू हैं। हिमालयी नैपाल में मूलतः नैपाली गुर्खे, नेवाली तथा डोटी के डोटयाली तीन सांस्कृतिक भाग हैं। डोटी वाला इलाका लंबे अर्से तक कुमांऊँ के सीराकोट के राज्य का हिस्सा रहा है। डोटी के लोगों को डोटियाल कहा जाता है इन पर कुमांऊँ की संस्कृति व कुमांऊँ की भाषा कुमइयां का प्रभाव हैै। यद्यपि नैपाली गुर्खों ने सन 1790 से सन 1815 तक लगभग पच्चीस वर्ष कुमांऊँ में गुर्खाली राज जिसे आज भी कुमांऊँ के लोग गोरख्योल या गोरबछ्योल कहते हैं कुमांऊँ में गुर्खा राज की पीड़ा का ऐतिहासिक दर्द आज भी महसूस होता रहता है। गुर्खा राज से मुक्ति पाने के लिये ही कुमांऊँ के दो राजनीति विशारद रूद्र दत्त जोशी और हर्ष देव जोशी ने इलाहाबाद मेें स्थित ब्रिटिश रेजिडेंट को कुमांऊँ, कुमांऊँ के प्रवेश द्वार काठगोदाम से मात्र सात मील ऊँचाई पर स्थित नैनीताल दिखाया। कंपनी बहादुर तथा ब्रिटिश राजकुल को पूर्व में दार्जिलिंग मध्य में नैनीताल तथा पश्चिम में शिमला अनुकूल लगे। पहल नैनीताल से हुई। बर्तानी फौज की मदद से गुर्खों को 1815 में हरा दिया तथा 1816 में सिगौली की संधि हुई जिसमें कंपनी बहादुर के साथ साथ कुमांऊँ के चंद राजाओं के राजनीतिक रणनीतिक मूलक अस्तित्व को हर्ष देव जोशी रूद्र दत्त ओली ने अपनी राजनीतिक महारत से कुमांऊँ को गुर्खा चंगुल से छुड़ाया Balancing Act between Kathmandu and Terai (Madhesi) यह संतुलन स्थापित करने का भान सबसे कारगर तरीके से नैपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री प्रचंड महाशय को दिव्यबोध के तरीके से हुआ। जहां तक कम्यूनिस्ट चीन का सवाल है नैपाल की सीधे चीन से कोई सीमा नहीं चीन जिसे Atonomus Region of Tibbet कहता है वह वस्तुतः मजहब व भाषा दोनों दृष्टियों से चीन का हिस्सा नहीं है। तिब्बत का सांस्कृतिक भाषायी एवं आस्था मूलकता हिन्द व नैपाल सरीखी है। तिब्बती जन जो भारत में रह रहे हैं उनकी संख्या एक लाख से ज्यादा है उन्हें भारत के शहर गांव पराये नहीं लगते इसलिये प्रचंड महाशय को नैपाल के उत्कर्ष के लिये तिब्बत प्रकरण पर भारत सहित उन सभी देशों की राय जाननी चाहिये जो स्वतंत्र तिब्बत राष्ट्र राज्य के नैतिक समर्थक हैं। निरीश्वरवादी चीनी शास्ता यह तो मान चुके हैं कि वे परम पावन दलाई लामा के ऐतिहासिक अस्तित्व को नकारने की स्थिति में नहीं हैं, उन्हें चौदहवें दलाई लामा के दिवंगत होने तक पंद्रहवें दलाई लामा की तलाश में चीन की भूमिका सुनिश्चित करने का बुखार चढ़ा है। स्वतंत्र तथा हीनयान मार्गी बौद्ध धर्मावलंबी तिब्बत नैपाल के लिये भी राजनीतिक पोषक तत्व हैं इसलिये चाइना कार्ड वाले प्रसंग पर नई नैपाल सरकार का दृष्टिकोण राष्ट्र हित वाला हो यह सुनिश्चित करना प्रचंड महाशय की पहली प्राथमिकता होगी। श्री लंका और नैपाल विशाल भारतीय राष्ट्रीयता के दो महत्वपूर्ण घर हैं। श्री लंका में तमिल, नैपाल में मधेसी और थारूओं का व्यापक योगक्षेम भारत की पड़ोसी नीति का मुख्य स्तंभ है।
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