हिन्द के पड़ोसी देश - पहला पड़ोसी जय श्री लंका?
हिन्द की 276 वाणियों भाषाओं और बोलियों में जहां राम तहं अवध निवासू के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास का रामचरित मानस और मुसलमान सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की कृति पद्मावत अवधी के दो महाकाव्य हैं। तुलसी का मत था कि उन्होंने राम गाथा स्वान्तः सुखाय लिपिबद्ध की। काशी का विद्वत् समाज तुलसी के इस कृत्य का नखशिख विरोधी था। रामकथा संस्कृत में ही रहे, भाषा में रामचरित काशी के तत्कालीन विद्वानों को स्वीकार्य नहीं था पर गोस्वामी तुलसीदास ने ठान ली थी कि येषाम् योगिनः रमन्ते सः रामः सैव दाशरथि रामः की रामकथा को वे जनभाषा में ही गायेंगे। काशी के लोगों की आम लोगोें की बोलचाल की भाषा अवधी नहीं भोजपुरी थी। आज भी काशी के मुहल्लों व गांवों में भोजपुरी ही बोली जाती है। तुलसी के महाकाव्य और जायसी के महाकाव्य में एक समानता भाषा के अलावा और थी वह श्री लंका, लंका भी सिंहल तुलसी ने रामचरित मानस के खलनायक दशग्रीव रावण - रावणो लोक रावणः - रावण का नाम सुनते ही लोग घबराते थे। मलिक मुहम्मद जायसी ने फारसी लिपि में अवधी भाषा का पद्मावत काव्य रचा। उनका कहना था जायस नगर धरम अस्थानू जहां जाय कवि कीन्ह बखानू। वे आगे कहते हैं - विधना के मारग हैं तेते सरग नखत तन रोआं जेते। प्रशांत झा की मातृभाषा मैथिली है उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स के लिये ‘India and its Neighbours’ चार खंडों का आलेख प्रस्तुत किया। उनका पहला स्तंभ श्री लंका अथवा सिंहल पर है चूंकि स्तंभ घटी हुई घटनाओं का मूल्यांकन है यदि प्रशांत झा महाशय ने India and the end of the Tigers में श्री लंका के सिंहली सेना द्वारा राजीव गांधी के 1991 में दिवंगत होने के अठारह वर्ष पश्चात जो नरसंहार हुआ तमिल बाघों एल टी टी ई के जुझारू लड़ाकुओं सहित तमिल भाषी जन सामान्य को जिस तरह से मौत के घाट उतारा गया, उस दुर्दान्त नरसंहार को प्रशांत झा महाशय ने बहुत ही हल्के तौर पर लिया। पंडित नेहरू जब इलाहाबाद में रहते उनका सीधा संवाद उर्दू कवि फिराक गोरखपुरी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राचार्य), हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन, सुमित्रानंदन पंत, हिन्दी कथाकार इलाचन्द्र जोशी, कविश्रेष्ठ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, कानपुर के बालकृष्ण शर्मा नवीन, प्रियप्रवास रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, भारत भारती रचनाकार मैथिली शरण गुप्त जो चिरगांव में रहते थे यद्यपि पंडित नेहरू सोचते अंग्रेजी में थे लिखते भी अंग्रेजी में थे पर उनका लोकसंपर्क इतना प्रभावकारी था कि अवध के गांव गांव के लोगों से पंडित नेहरू का संवाद चलता रहता था जिसकी बानगी Discovery of India में है। पंडित नेहरू रामधारी सिंह दिनकर की काव्य साधना के प्रशंसक थे। उन्होंने रामचरित मानस का गहरा अध्ययन कर अवध के गांव गांव के लोगों से रामचरित मानस का सजीव संवाद रखा।
इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या उनके ही राजकर्मी ने की। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने यदि डाक्टर राधाकृष्णन की तरह मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य को ही स्थानापन्न प्रधानमंत्री की शपथ संकल्प कर नवंबर 1984 में वर्तमान राष्ट्रपति जो तब इंदिरा मंत्रिमंडल के वरिष्ठ अनुभवी मंत्री थे उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी होती तो भी श्री लंका व भारत के ताल्लुकात बिगड़ते नहीं। राजीव गांधी पूरी तरह नौसिखिये थे उनका सलाहकार मंडल एकदम नौसिखिया था। उन्हें अगर साने गुरू जी की आंतर भारती का इल्म होता, अरूण सिंह, अरूण नेहरू और तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण चंद्र पंत से परामर्श करने के बजाय वे अपने गृहमंत्री पी.वी. नरसिंह राव से मशिविरा करते तो शायद भारत की छिछालेदार होने की नौबत नहीं आती। हो सकता है कि उनके नौसिखिये सलाहकारों ने तुलसी रामचरित मानस पढ़ी हो या रामचरित मानस का अखंड पाठ सुना हो पर जहां तक पद्मावत महाकाव्य के जरिये सिंहल को समझने की विधि थी उसका प्रयोग तत्कालीन प्रधानमंत्री उनके सलाहकार अरूण सिंह व अरूण नेहरू एवं रक्षामंत्री कृष्ण चंद्र पंत अवधी महाकाव्य पद्मावत से परिचित न रहे हों जिसके कारण श्री लंका भारत ताल्लुकात पटरी में नहीं बैठ पाये हैं। राजनीतिक, सामरिक तथा कूटनीतिक घटना तो घट गयी, वे लोग जिन्होंने अनुकूल या प्रतिकूल भूमिका निर्वाह किया अब वे भी दिवंगत हुए लगते हैं। उनमें एक ही व्यक्ति अरूण सिंह जीवित हो सकते हैं पर उन्होंने अपना रास्ता ही बदल डाला। पड़ोसियों की विवेचना कर अखबार की सुर्खियों में प्रस्तुतकर्ता प्रशांत झा ने भी अगर पद्मावत महाकाव्य पढ़ा होता हिन्द के पड़ोसियों के बारे में प्रकाश स्तंभ से परिवर्तित विवेचन हो सकता था पर विवेचनकर्ता को आंतर भारती के सहारा लिये बिना भारत के उत्तर और दक्षिण की भौगोलिक स्थिति भिन्नतायें हैं उनका सर्वांगीण विश्लेषण अंग्रेजी भाषा से संभव इसलिये नहीं है क्योंकि जिसे अंग्रेजी विद Dravidian Culture नाम से पुकारते हैं उसे सटीक समझने का प्रयत्न कबीर ने किया। उन्होंने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। मत्स्यगंधा सत्यवती-पराशर पुत्र कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने लिखा - भक्ति द्वारा अपना आत्मपरिचय देवर्षि नारद को वृन्दावन में देते हुए भक्ति कहती है - द्रविड़े साहम् समुत्पन्ना वृद्धिम् कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरं जीर्णताम् गताः। तात्पर्य यह है कि भक्ति का उद्भव द्रविड़ देश में, बचपन कर्णाटक में, प्रौढ़ता व अति प्रौढ़ता सहित पुष्टिमार्गी भक्ति महाराष्ट्र में हुई। गुजरात पहुंचने पर भक्ति बुढ़िया गयी। भक्ति ने नारद से कहा ’ इमौ मे शायितो पुत्रौ ज्ञान वैैराग्य नामानौ, कालयोगेन जर्जरौ। भक्ति के दो बेटे ज्ञान व वैराग्य हैं। जब तमिल तमिलनाडु से श्री लंका गये वहां उन्हें सिंहल लोगों से पाला पड़ा। उत्तर दक्षिण में जो विभेद है वह उत्कल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ से सम्राट अशोक द्वारा अपने पुत्र पुत्री को सिंहल, श्री लंका या सीलोन बौद्धायन पताका फहराने के लिये भेजा इसलिये यह महत्वपूर्ण बिन्दु लगता है कि सिंहल-तमिल विभेद भारत से ही श्री लंका गया है। एल टी टी ई सिंहल विभेद यदि राजीव गांधी राज से पहले या बाद में उठा होता तो संभावना इस बात की लगती है कि जिन लोगों ने पद्मावत पढ़ा है, रामचरित मानस पढ़ी है वे भी श्री लंका में हुए नरसंहार के कारक नहीं बनते। प्रशांत झा के मत में कांग्रेस नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार जिसकी भागीदार एल टी टी ई की नैतिक समर्थक द्रविड़ मुनेत्र कड़गम व उसके आजन्म नेता एम. करूणानिधि भी थे चुप्पी साध गये। तमिलों का नरसंहार होता रहा। इंदिरा गांधी के महान पारिवारिक कष्ट उनका तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र जो प्रधानमंत्री थे, इंदिरा जी की हत्या तो उनके प्रधानमंत्री रहते ही हुई राजीव गांधी की हत्या उनके सामान्य नागरिक के नाते तमिल आक्रोश का कारण था। वह दुर्घटना टल भी सकती थी यदि श्री लंका में भारतीय सेना भेज कर तमिल उग्रवादियों को संयमित करने का उपक्रम न किया गया होता। समझौता तो श्री लंकाई तत्कालीन राष्ट्रपति जे.आर. पटवर्धने व भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच हुआ था पर जब भीषण नरसंहार हुआ वे दोनों परिदृश्य में नहीं थे। तमिल नरसंहार को हुए भी सात वर्ष बीत गये हैं। एल टी टी ई के उग्रता अवरोध के भारतीय हित साधन वाले तरीके भी हो सकते थे। यदि भारत से श्री लंका गये दो समुदाय उत्तर भारत के अंग बंग कलिंग मिथिला भोजपुर मगध और चमराज्य से जो बौद्ध धर्म की पताका फहराने श्री लंका गये उनकी भाषा सिंहली संस्कृत, प्राकृत, पालि अनुगामिनी भाषा है। तमिलनाडु से जो तमिल श्री लंका गये उनके भक्ति के तमिल गीतों का असर था। परम राष्ट्रवादी साने गुरू जी ने जो संस्कृति बोध भारत को दिया उसे उन्होंने आंतर भारती कहा। तमिल सिंहल वैमनस्य का तिरोभाव तभी हो सकता है जब हिन्दुस्तान की मौजूदा सरकार यह विचार करे कि नौसिखिये प्रधानमंत्री राजीव गांधी से तमिल सिंहल समस्या निदान में कहां त्रुटि हुई ? यदि प्रधानमंत्री राजीव गांधी व तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण चंद्र पंत ने मलिक मोहम्मद जायसी रचित पद्मावत तथा गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस पूरा न सही लंका संबंधी परिच्छेद मननपूर्वक पढ़ा होता या भाषायी विद्वानों से रामचरित मानस व पद्मावत की मानवोचित आध्यात्मिक उपलब्धियों पर मनन चिंतन भी किया होता तो 2009 में हुए भीषण तमिल नरसंहार को रोका भी जा सकता था। जो नहीं हो पाया उसके लिये सोचना अरण्य रोदन ही है। अखिल भारत कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी शासन के पांच वर्षों की उपलब्धियों तथा बोफोर्स तोप प्रकरण सहित एल टी टी ई के संबंध में श्री लंकाई राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने से जो वार्ता हुई भारत सरकार ने जो निर्णय लिया उसका भी बारीकी से अध्ययन करने की जरूरत है। राजीव गांधी की उपलब्धियों के बारेे में श्रीमती सोनिया गांधी से पहले विस्तार से चर्चा हो 1984 में हुए भीषण रक्तपात में भारतीय सिख समुदाय के लोगों ने जो कष्ट उठाये हिंसा भड़की उन सब बिन्दुओं पर आधिकारिक व प्रामाणिक प्रस्तुतिकरण की भी जरूरत है। चूंकि राजीव गांधी ने आत्मबलिदान दिया इसलिये उनके वैयक्तिक सद्गुण उजागर करने के साथ साथ नौसिखिया होने के कारण उनसे क्या क्या त्रुटियां हुईं ? उद्देश्य दलीय राजनीति न होकर व्यापक स्तर में सुशासन कैसे संभव है ? राजीव गांधी की बेवा होने के नाते श्रीमती सोनिया गांधी का भावनात्मक लगाव तथा हिन्दुस्तानी तरीके से सोचें तो उसे पातिव्रत्य कहा जा सकता है। श्रीमती सोनिया गांधी स्वयं भी विश्व स्तर की नेता इसलिये ही हुईं कि वे श्री राहुल गांधी की पत्नी श्रीमती इंदिरा गांधी की पुत्रवधू थीं। वे पिछले पच्चीस वर्ष से बिखू व्याधि ग्रस्त हैं। आज के भारत की राजनीतिक जरूरत यह है कि पंडित नेहरू की पुत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा नेहरू गांधी तथा इंदिरा पुत्र श्री राहुल गांधी ने अपने जीवन की आहुति राष्ट्र यज्ञ वेदी पर दी। इसलिये वर्ष 2017 में जब भारत के लोग प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी की जन्म शताब्दी 17 नवंबर 2017 को मनायेंगे आगामी 17 नवंबर 2016 से प्रियदर्शिनी इंदिरा नेहरू गांधी जन्म शताब्दी समारोह के बारे में मौजूदा सरकार को विवेकपूर्वक सोचना चाहिये ताकि शासक दल तथा अखिल भारतीय स्तर पर मुख्य विरोधी इल जिसकी घटक राज्य सरकारें हिमाचल, उत्तराखंड, कर्णाटक, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय में हैं तथा बिहार में महागठबंधन के एक दल के रूप में कांग्रेस गठबंधन सरकार का हिस्सा है। इंदिरा गांधी की महत्वपूर्ण उपलब्धि सिक्किम को भारत का घटक राज्य बनाना तथा पाकिस्तान का विघटन व बंगला देश का उदय सहित इंदिरा गांधी व्यक्तित्त्व व कृतित्व उनके द्वारा घोषित आपातकाल, आपातकाल में जो ज्यादतियां हुई थीं आपातकाल का उज्वल पक्ष इन सभी विषयों पर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी मंत्रिमंडल के ऐसे सदस्य जिनका संपर्क सोनिया गांधी से हो मधुर वैयक्तिक संबंध हों प्रियदर्शिनी इंदिरा नेहरू गांधी तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र राजीव गांधी के बलिदान तथा उपलब्धियों को प्रस्तुत करने के संबंध में संवाद स्थापित किया जाना चाहिये। यह दौत्य कर्म कहलाता भाषा की प्रवणता व्यक्तित्त्व की विशिष्टतायें मद्दे नजर रखते हुए शासक दल और मुख्य अ.भा. प्रतिपक्षी दल (यद्यपि तृणमूल कांग्रेस तथा ए.आई.डी.एम.के. के सदस्य लोकसभा में कांग्रेस से ज्यादा हैं, ये दोनों दल क्षेत्रीय तथा एक ही राज्य तक सीमित हैं इसलिये इन्हें अ.भा. दल नहीं कहा जा सकता) के नाते कांग्रेस अध्यक्षा से सरकार का संवाद श्रीमती इंदिरा गांधी जन्म शताब्दी, इंदिरा व राजीव आत्मबलिदान को दलीय नहीं राष्ट्रीय महत्व का विषय माना जाये। उस पर दल निरपेक्ष्य राष्ट्र सापेक्ष्य संकल्प लिया जाये। दूसरी ओर पहला पड़ोसी श्री लंका में राजीव गांधी शासनकाल में जो निर्णय लिये गये रामचरित मानस तथा पद्मावत अवधी भाषा में रचित इन दोनों महाकाव्यों का लंका से वास्ता रहा है इसलिये भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पड़ोसी देशों के बारे में आज जो दिलचस्प हलचल हिन्दुस्तान में है उड़ी में हुई पाशविक घटनाक्रम ने जो दिल दहलाने वाले हालातें पैदा की हैं 70 वर्ष पहले तक हिन्द का हिस्सा रहा भूक्षेत्र जिसे भारत के राष्ट्रगान में पंजाब-सिंध द्वय से संबोधित किया गया है भावनात्मक दृष्टि से पंजाब और सिंध दोनों भारत के देशस्थ समाज हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो आह्वान किया है पाकिस्तान की वजह से सार्क के अस्तित्व को ही सर्पदंश होगया है। कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान को नैपाल, भूटान, बांग्ला देश, अफगानिस्तान आदि भारत के पड़ोसी देश भी शंका से देखने लग गये हैं। इसलिये तात्कालिक जरूरत यह मालूम होती है कि विदेश मंत्रालय में श्री लंका पड़ोसी राष्ट्र रामचरित मानस तथा पद्मावत महाकाव्यों की आंतरिक अध्यात्म शक्ति का विश्लेषण करने के लिये आंतर भारती विद्या अपनाये वाल्मीकि, कंबन, तुलसी रामकथाओं के अलावा भारत की नारी शक्ति तथा महाकाव्य पद्मावत की रानी पद्मिनी संबंधी आख्यानों पर विवेकशील मंथन का मार्ग अपनाये।पाकिस्तान ने आतंकवाद का रास्ता अपना कर भारत के सुषुप्त सिंह को जगा दिया है। भारत जाग गया है संभवतः इस नये जागरण का पहला असर सार्क पर पड़े। भारत शेष पड़ोसी देश पाकिस्तान को धता बता कर कहें आतंक फैलाने का यह क्रम भारत के पड़ोसी देशों को स्वीकार्य नहीं है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment