क्या है लक्ष्य?
हम हिंदुस्तानी त्रिशंकु बने रहना चाहते हैं या
त्रैशंकव सत्यवादी से प्रेरणा लेना?
हम हिंदुस्तानी त्रिशंकु बने रहना चाहते हैं या
त्रैशंकव सत्यवादी से प्रेरणा लेना?
गुजरात के पाटीदार, पटेल जाति के संपन्न व श्रीमंत समाज जो स्वयं को मर्यादा पुरूषोत्तम राजा राम के युगल पुत्र लवकुश का वंशधर मानता है, गुजरात के समाज तथा जाति समूहों का अग्रणी एवं सामाजिक दिग्दर्शक है। ऐसे पाटीदार समाज का भी मानना है कि उन्हें सरकारी नौकरी में आरक्षण चाहिये। हरियाणा के संपन्न जाट भी आरक्षण चाहते हैं। राजस्थान के गुज्जर भी मीणा जाति की तरह अपने लिये आदिम जातियों को मिलने वाली आरक्षण सुविधा के लिये तड़प रहे हैं। महाराष्ट्र का मराठा वर्ग भी वर्तमान में अपनी अनदेखी होती मान रहा है। नौजवानों को वांछित रोजगार का अभाव खल रहा है। हिन्द के सौ शहरों को स्मार्ट सिटी का दर्जा देकर हिन्दुस्तान की शहरी बसासत को सुनहरे सपने दिख रहे हैं। अनुसूचित जातियों व जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभार्जन तब तक व्यापक पैमाने पर था जब तक सरकारी अहलकारान की भर्ती खुल कर होती थी। आरक्षित श्रेणियोें के समूह अपनी पात्रतानुसार लाभान्वित भी होते रहते थे। संविधान की व्यवस्थाा के अनुसार आरक्षण पहली पारी में केवल दस वर्ष के लिये संकल्पित था। भारतीय दलित समाज ही स्वयंभू हितसाधिका बहन मायावती भाजपा पर ताना कस रही हैं कि वे आरक्षण खत्म करना चाहते हैं। आरक्षण का दायरा दिन दूना रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। नयी नयी मांगें सामने आरही हैं। केन्द्रीय सरकार द्वारा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर लागू कर दी हैं। सरकारी नौकरी में न्यूनतम वेतन अठारह हजार उससे ऊपर मंहगाई सहित दूसरे भत्ते आदि से पहली जनवरी 2016 के बाद सरकारी नौकरी में प्रवेश करने वाले ‘ग’ समूह का कार्मिक सब भत्तों को मिला कर तनख्वाह के तौर पर माहवारी अठाईस से तीस हजार रूपये अपने आशियाने पर ले जायेगा। इनफार्मेशन तकनालाजी विस्तार के साथ सरकारी दफ्तरों में मेज में लिखत पढ़त के काम में कमी आयी है। कागजी काम सरकारी दफ्तर में जितना घटाया जा सके घटाने का हर उपक्रम अपनी तीव्र गति में है। जिस रफ्तार से विस्तार की संकल्पना की जारही है उससे लगता है जिसे नौकरी पेशा लोग क्लास थ्री और क्लास फोर्थ कहते उन कार्मिकों की संख्या में भी निरंतर घटत होती ही रहने वाली है। एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि क्लास 2 व क्लास 1 के अफसरों को ही उत्तरदायित्त्व निर्वाह करना होगा। यदि कम्प्यूटर तकनालाजी से हर अफसर को पात्रता दी गयी तो एक दिन हिन्द की डेमोक्रेसी में क्लास 3 व क्लास 4 के केवल वे लोग रह जायेंगे जिन्हें रिकार्ड रखने तथा दौड़ने भागने की जिम्मेदारी सौंपी जायेगी। इसलिये बहन मायावती सहित बिहार के लौहपुरूष लालू प्रसाद यादव उत्तर प्रदेश के यादव खानदान के सर्वेसर्वा नेताजी मुलायम सिंह यादव सहित सभी राजनीतिक दलों के एकछत्र सुप्रीमो भूमिका निर्वाह करने वाले सभी राजनेता कारपोरेट सेक्टर सहित घरेलू नौकरों में भी आरक्षण की मांग करेंगे। गांव के मर्द औरतों को खादी की सूत ऊन रेशम कताई और हथकरघा बुनकरों के द्वारा उस तागे की बुनाई कर कत्ती व बुनकर को उसके अपने घर में ही मेहनताना देने का महात्मा गांधी का प्रयास आज खादी फैशन में परिवर्तित हो चुका है। कत्तिन को कताई का पारिश्रमिक गौण होगया है बुनकर को हथकरघा में बुनाई के लिये तागा ही नहीं मिल रहा है जैसे पावरलूम की पावरलूम का कपड़ा खादी भंडारों में खादी फैशन परिधानों के तौर पर जोरशोर से चल रहा है। खादी ग्रामोद्योग भवन नयी दिल्ली सहित भारत भर के खादी भंडार खादी इंडिया के जरिये कन्साइनमेंट बेसिस पर खादी कपड़ा और खादी परिधान खुले बाजार के व्यवसाइयों से लेरहे हैं। खादी ग्रामोद्योग आयोग का वह स्वरूप एकदम बेपरदा होगया है जिसकी कल्पना वैकुंठ ललूभाई मेहता सरीखे विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा तथा सहकारिता आंदोलन के पक्षधर विशेषज्ञ ने गांव गांव में ग्रामीण उद्योगों की सहकारी समितियां संगठित कर ग्रामोद्योगों का जाल सारे भारत में फैलाया था। आज तमिलनाडु को छोड़ कर किसी भी राज्य में ग्रामोद्योग नहीं चल रहे। खेतीबाड़ी की पश्चात खादी और ग्रामोद्योग परिवार की आमदनी बढ़ाने में बहुत बड़े मददगार थे। जमाना बदल चुका दस्तकार व कारीगर बेसहारा हो चुका रोजगार संवर्धन का बहुत बड़ा जरिया पी.पी.पी. मोड का ग्रास बन गया। ऐसा लग रहा है महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ तक खादी जनसामान्य का पहिरावा न रह कर फैशन शोरूमों में अत्यंत मंहगे दामों में बिकने वाले परिधान मात्र रह जायेंगे। खादी ग्रामोद्योग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष महाशय विनय कुमार सक्सेना खादी चर्खों को संग्रहालय अथवा म्यूजियम का ऐतिहासिक दर्शनीय प्रतीक बनाने पर तुले हुए हैं।
वैचारिक हर्षोन्माद के संपादकीय स्तंभ में टाइम्स आफ इंडिया का महाशय राजीव कुमार सीनियर फैलो सेंटर फार पालिसी रिसर्च नयी दिल्ली ने आगाह करते हुए स्तंभ का शीर्षक Beware the Sag is showing इंगित करते हुए लिखा How to turn arroud drooping investment and job numbers, before social unrest strikes. उन्होंने ने सात चेतावनियां इंगित की हैं। स्तंभकार की पहली चेतावनी रिहायशी आवास समय बद्ध योजना तैयार करना है। राष्ट्र कवि बालकृष्ण शर्मा का प्रिय गीत - अनिकेत था वे कहते थे, विस्मृति आ अवसाद घेर ले नीखेते बस चुप कर दे। बेघर लोगों को घर मुहैया करने का उपक्रम समय की पाबंदी चाहता है। ऐसी मेहनत की अपेक्षा रखता है जिसे लास ऐंजेल्स के मेयर ने अपनी दैनिक कार्यविधि का हिस्सा बना लिया। बेघरों को मकान मुहैया करने के उपक्रम में वे जुट गये, चाहे तो दक्षिण कैलिफोर्निया के बेघर लोगों को मकान दिलाने संबंधी पोस्ट पढ़ लें। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 2022 तक हर बेघर को मकान मिले। भारत के नगर विकास मंत्री घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा नगर विकास मंत्रियों तथा ग्राम विकास मंत्रियों एवं भारत केे तमाम शहरों के नगर प्रमुखों का पहला कदम बेघर को मकान दिलाना। स्तंभकार की दूसरी चेतावनी केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी से संबंध रखती है। सिलेसिलाये परिधानों, भारत की खादी सूती खादी के हाथ कते करघा बुने कपड़ों का निर्यात करने का जिम्मा फिर खादी ग्रामोद्योग आयोग को सौंपा जाये। संपन्न तथा आधुनिक विकसित विश्व के देशों में ‘चर्म रोगों’ तथा अनेक संक्रामक व्याधियों की रोकथाम के लिये अमरीका सहित दुनियां के विकसित देशों के डाक्टर चरखे पर कते सूत से हथकरघा पर बुने कपड़ा पहनने की सलाह देते हैं इसलिये दम तोड़ते हुए हथकरघा व खादी वस्त्र निर्माण कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने के लिये सूती हथकरर्घा बुना कपड़ा और परिधानों का निर्यात सुनिश्चित करना, विकसित देशों के दैनंदिन उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं में प्रत्येक मार्ट या माल में चीनी उत्पाद पहले दीखता है। स्मृति इरानी को चाहिये कि हैंडलूम व खादी के परिधान संगठित रूप से निर्यात हो ताकि दुनियां के हर देश में गांधी की खादी और हथकरर्घा बुना कपड़ा तथा खादी परिधान सेहत से जोड़ कर देखे जायें। तीसरी चेतावनी में राजीव कुमार कहते हैं भारतीय रिजर्व बैंक भी मददगार हो सकता है। परिधान निर्यात के काम में रूपये की लुढ़कन की फिक्र किये बिना उन लोगों की सिफारिश नकार देना जो ‘मजबूत रूपया’ वाला वातावरण निर्मित करने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं तीसरी चेतावनी है। आगे चौथी चेतावनी देते हुए वे कहते हैं समुद्र तीर आर्थिक गलियारा निर्माण जिसे नीति आयोग ने सराहा है। विगत शताब्दी के नौवें दशक (1980-1989) के मध्य इंदिरा हत्या के बाद उद्यमिता स्थिति में भी अचानक बदलाव आया। लोकसभा में तीन चौथाई बहुमत के बावजूद राजीव गांधी सरकार नौसिखियापन के कारण अनेकानेक बहुविध बाधाग्रस्त होगयी और देश की उद्यमिता पिछड़ गयी। चीन की नकल करो पर चीन ने उद्यमिता संवर्धन का जो तरीका अपनाया है उसे गांधी चिल्ला चिल्ला कर 1934 से लगातार कह रहे थे। हर गांव में चर्खा करघा उद्यमिता के समानांतर एक ग्रामोद्योग को लगाना, महात्मा गांधी की राय सरकार ने पूरी पूरी नहीं मानी आधे अधूरे मन से कपड़ा उद्योग को खादी व हथकरघा को अपनाया पर उसे गति नहीं दी। चीन ने गांधी विचार को अपने तरीके से अपनाया और आज दुनियां के हर बाजार में चीन निर्मित उत्पाद उपलब्ध हैं। अपने सातवें सूत्र में महाशय राजीव कुमार Start Up India, Stand Up India अरविन्द पनगरिया की अध्यक्षता वाले नीति आयोग का अनुश्रवण जरूरी मानते हैं। वास्तविकता यह है कि उपलब्ध डाटा संबंधी हिन्दुस्तानी दावों में यथार्थता अथवा सच्चाई अपंग होगयी है। सप्त सूत्री सप्तपदी में श्री राजीव कुमार महसूस करते हैं लोक राजस्व व्यय ने जो विनिवेश राशि वर्ष 2015-16 में उपलब्ध थी उसे वर्तमान वित्त वर्ष 2016-17 में भी बरकरार रखना जरूरी था पर क्या ऐसी वित्तीय स्थितियां बरकरार हैं। संभवतः इस प्रसंग पर जो कमेटी मामले पर विचार करती है उसकी सिफारिशें जब उजागर होंगी राजस्व घाटे की मात्रा यथासंभव कम से कम हो। वित्तीय नीति का वास्तविक सुप्रभाव हो सकता है विनिवेश का चक्र चलता रहे ताकि विभिन्न प्रकार के रोजगारों को श्रंखलाबद्ध करने में सरकार की सामर्थ्य पर अंगुली न उठाई जा सके। राजीव कुमार महाशय ने अपने निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जीडीपी संबंधी संशय को भी उजागर किया। जीडीपी आंकड़ों से जो पेचीदगियां सामने उलझनें पैदा कर रही हैं तथा वित्तीय हालातें चारों तरफ ठीक हैं ऐसा आभास भी कदम ढीले करता है क्योंकि देश में गांव से लेकर संसद तक जो आंकड़े बयान किये जारहे हैं उनमें 1971 से लेकर 1997 तक के वर्षों की भ्रामक आंकड़ाबाजी की भी भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। वैश्विक स्तर के अर्थ विशेषज्ञ भी हमारे आंकड़ों पर पूरा पूरा यकीन करने की मानसिक स्थिति में नहीं हैं। इसलिये इस ब्लागर की राय तो अलग से अभिव्यक्त होगी महाशय राजीव कुमार भी यह मानते हैं उन्हें पूरा पूरा यकीन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भारत की सही आर्थिक हालात वाली दास्तान से बखूबी अवगत हैं तथा भलीभांति समझते हैं कि रोजगार सृजन तथा बेगारों को रोजी रोटी मुहैया करने वाला आर्थिकी चिंतन ही रा.ज.ग. के भविष्य का निर्णायक बिन्दु होगा। राजीव कुमार महाशय ने अपने स्तंभ के पहले उद्गार में ही कहा - HN to run drooping investment and Joc number before social unrest strikes.। उन्होंने हिन्द की मौजूदा रोजगार स्थिति को त्रिशंकु करार दिया है। लड़ाई थी महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र में वशिष्ठ तत्कालीन मानवीय ऋषि मुनियों में अग्रणी थे। विश्वमित्र का बल अपरिमित था। वे आधुनिक युग के विज्ञानियों की तरह सृष्टि में नये स्त्रोत निर्मित कर चुके थे। राजा त्रिशंकु ने अपने कुल पुरोहित राजगुरू महर्षि वशिष्ठ से सदेह स्वर्ग पहुंचने में महर्षि के तपोबल का आशीर्वाद चाहा। महर्षि वशिष्ठ मर्यादा रक्षक थे उन्होंने त्रिशंकु को मना कर दिया। त्रिशंकु महाप्रतापी राजर्षि विश्वामित्र के पास गये। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को आश्वस्त किया पर अपने आश्वासन को संपूर्त नहीं कर पाये। त्रिशंकु बीच में लटक गये। भारतीय वाङमय त्रिशंकु लटकने का पर्याय होगया पर त्रैशंक हरिश्चन्द्र ने अपने पिता की दयनीय स्थिति का वरण किया तथा सत्य और अहिंसा का मार्ग अपना कर हिन्द में सत्य, सत्याग्रह की नयी जोत जला डाली। स्वयं कष्ट सहे अपनी रानी को दुःखी जीवन बिताते हुए देखा। स्वयं को काशी के डोम को बेच कर स्वप्न में विश्वामित्र को किये गये वादे की दक्षिणा दी। महात्मा गांधी कहते हैं उनके जीवन पर सबसे ज्यादा प्रभाव सत्यहि सत्य हरिश्चन्द्र नाटक का है।
वैचारिक हर्षोन्माद के संपादकीय स्तंभ में टाइम्स आफ इंडिया का महाशय राजीव कुमार सीनियर फैलो सेंटर फार पालिसी रिसर्च नयी दिल्ली ने आगाह करते हुए स्तंभ का शीर्षक Beware the Sag is showing इंगित करते हुए लिखा How to turn arroud drooping investment and job numbers, before social unrest strikes. उन्होंने ने सात चेतावनियां इंगित की हैं। स्तंभकार की पहली चेतावनी रिहायशी आवास समय बद्ध योजना तैयार करना है। राष्ट्र कवि बालकृष्ण शर्मा का प्रिय गीत - अनिकेत था वे कहते थे, विस्मृति आ अवसाद घेर ले नीखेते बस चुप कर दे। बेघर लोगों को घर मुहैया करने का उपक्रम समय की पाबंदी चाहता है। ऐसी मेहनत की अपेक्षा रखता है जिसे लास ऐंजेल्स के मेयर ने अपनी दैनिक कार्यविधि का हिस्सा बना लिया। बेघरों को मकान मुहैया करने के उपक्रम में वे जुट गये, चाहे तो दक्षिण कैलिफोर्निया के बेघर लोगों को मकान दिलाने संबंधी पोस्ट पढ़ लें। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 2022 तक हर बेघर को मकान मिले। भारत के नगर विकास मंत्री घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा नगर विकास मंत्रियों तथा ग्राम विकास मंत्रियों एवं भारत केे तमाम शहरों के नगर प्रमुखों का पहला कदम बेघर को मकान दिलाना। स्तंभकार की दूसरी चेतावनी केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी से संबंध रखती है। सिलेसिलाये परिधानों, भारत की खादी सूती खादी के हाथ कते करघा बुने कपड़ों का निर्यात करने का जिम्मा फिर खादी ग्रामोद्योग आयोग को सौंपा जाये। संपन्न तथा आधुनिक विकसित विश्व के देशों में ‘चर्म रोगों’ तथा अनेक संक्रामक व्याधियों की रोकथाम के लिये अमरीका सहित दुनियां के विकसित देशों के डाक्टर चरखे पर कते सूत से हथकरघा पर बुने कपड़ा पहनने की सलाह देते हैं इसलिये दम तोड़ते हुए हथकरघा व खादी वस्त्र निर्माण कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने के लिये सूती हथकरर्घा बुना कपड़ा और परिधानों का निर्यात सुनिश्चित करना, विकसित देशों के दैनंदिन उपयोग की उपभोक्ता वस्तुओं में प्रत्येक मार्ट या माल में चीनी उत्पाद पहले दीखता है। स्मृति इरानी को चाहिये कि हैंडलूम व खादी के परिधान संगठित रूप से निर्यात हो ताकि दुनियां के हर देश में गांधी की खादी और हथकरर्घा बुना कपड़ा तथा खादी परिधान सेहत से जोड़ कर देखे जायें। तीसरी चेतावनी में राजीव कुमार कहते हैं भारतीय रिजर्व बैंक भी मददगार हो सकता है। परिधान निर्यात के काम में रूपये की लुढ़कन की फिक्र किये बिना उन लोगों की सिफारिश नकार देना जो ‘मजबूत रूपया’ वाला वातावरण निर्मित करने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं तीसरी चेतावनी है। आगे चौथी चेतावनी देते हुए वे कहते हैं समुद्र तीर आर्थिक गलियारा निर्माण जिसे नीति आयोग ने सराहा है। विगत शताब्दी के नौवें दशक (1980-1989) के मध्य इंदिरा हत्या के बाद उद्यमिता स्थिति में भी अचानक बदलाव आया। लोकसभा में तीन चौथाई बहुमत के बावजूद राजीव गांधी सरकार नौसिखियापन के कारण अनेकानेक बहुविध बाधाग्रस्त होगयी और देश की उद्यमिता पिछड़ गयी। चीन की नकल करो पर चीन ने उद्यमिता संवर्धन का जो तरीका अपनाया है उसे गांधी चिल्ला चिल्ला कर 1934 से लगातार कह रहे थे। हर गांव में चर्खा करघा उद्यमिता के समानांतर एक ग्रामोद्योग को लगाना, महात्मा गांधी की राय सरकार ने पूरी पूरी नहीं मानी आधे अधूरे मन से कपड़ा उद्योग को खादी व हथकरघा को अपनाया पर उसे गति नहीं दी। चीन ने गांधी विचार को अपने तरीके से अपनाया और आज दुनियां के हर बाजार में चीन निर्मित उत्पाद उपलब्ध हैं। अपने सातवें सूत्र में महाशय राजीव कुमार Start Up India, Stand Up India अरविन्द पनगरिया की अध्यक्षता वाले नीति आयोग का अनुश्रवण जरूरी मानते हैं। वास्तविकता यह है कि उपलब्ध डाटा संबंधी हिन्दुस्तानी दावों में यथार्थता अथवा सच्चाई अपंग होगयी है। सप्त सूत्री सप्तपदी में श्री राजीव कुमार महसूस करते हैं लोक राजस्व व्यय ने जो विनिवेश राशि वर्ष 2015-16 में उपलब्ध थी उसे वर्तमान वित्त वर्ष 2016-17 में भी बरकरार रखना जरूरी था पर क्या ऐसी वित्तीय स्थितियां बरकरार हैं। संभवतः इस प्रसंग पर जो कमेटी मामले पर विचार करती है उसकी सिफारिशें जब उजागर होंगी राजस्व घाटे की मात्रा यथासंभव कम से कम हो। वित्तीय नीति का वास्तविक सुप्रभाव हो सकता है विनिवेश का चक्र चलता रहे ताकि विभिन्न प्रकार के रोजगारों को श्रंखलाबद्ध करने में सरकार की सामर्थ्य पर अंगुली न उठाई जा सके। राजीव कुमार महाशय ने अपने निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जीडीपी संबंधी संशय को भी उजागर किया। जीडीपी आंकड़ों से जो पेचीदगियां सामने उलझनें पैदा कर रही हैं तथा वित्तीय हालातें चारों तरफ ठीक हैं ऐसा आभास भी कदम ढीले करता है क्योंकि देश में गांव से लेकर संसद तक जो आंकड़े बयान किये जारहे हैं उनमें 1971 से लेकर 1997 तक के वर्षों की भ्रामक आंकड़ाबाजी की भी भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता। वैश्विक स्तर के अर्थ विशेषज्ञ भी हमारे आंकड़ों पर पूरा पूरा यकीन करने की मानसिक स्थिति में नहीं हैं। इसलिये इस ब्लागर की राय तो अलग से अभिव्यक्त होगी महाशय राजीव कुमार भी यह मानते हैं उन्हें पूरा पूरा यकीन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भारत की सही आर्थिक हालात वाली दास्तान से बखूबी अवगत हैं तथा भलीभांति समझते हैं कि रोजगार सृजन तथा बेगारों को रोजी रोटी मुहैया करने वाला आर्थिकी चिंतन ही रा.ज.ग. के भविष्य का निर्णायक बिन्दु होगा। राजीव कुमार महाशय ने अपने स्तंभ के पहले उद्गार में ही कहा - HN to run drooping investment and Joc number before social unrest strikes.। उन्होंने हिन्द की मौजूदा रोजगार स्थिति को त्रिशंकु करार दिया है। लड़ाई थी महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र में वशिष्ठ तत्कालीन मानवीय ऋषि मुनियों में अग्रणी थे। विश्वमित्र का बल अपरिमित था। वे आधुनिक युग के विज्ञानियों की तरह सृष्टि में नये स्त्रोत निर्मित कर चुके थे। राजा त्रिशंकु ने अपने कुल पुरोहित राजगुरू महर्षि वशिष्ठ से सदेह स्वर्ग पहुंचने में महर्षि के तपोबल का आशीर्वाद चाहा। महर्षि वशिष्ठ मर्यादा रक्षक थे उन्होंने त्रिशंकु को मना कर दिया। त्रिशंकु महाप्रतापी राजर्षि विश्वामित्र के पास गये। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को आश्वस्त किया पर अपने आश्वासन को संपूर्त नहीं कर पाये। त्रिशंकु बीच में लटक गये। भारतीय वाङमय त्रिशंकु लटकने का पर्याय होगया पर त्रैशंक हरिश्चन्द्र ने अपने पिता की दयनीय स्थिति का वरण किया तथा सत्य और अहिंसा का मार्ग अपना कर हिन्द में सत्य, सत्याग्रह की नयी जोत जला डाली। स्वयं कष्ट सहे अपनी रानी को दुःखी जीवन बिताते हुए देखा। स्वयं को काशी के डोम को बेच कर स्वप्न में विश्वामित्र को किये गये वादे की दक्षिणा दी। महात्मा गांधी कहते हैं उनके जीवन पर सबसे ज्यादा प्रभाव सत्यहि सत्य हरिश्चन्द्र नाटक का है।
राजीव कुमार का कहना है कि लुढ़क रहे विनिवेश और रोजगारों को बढ़ाने कैसे तालमेल बैठाया जाय। उन्होंने जो संशय बताया है उसके बारे में बहुत से चिंतक लोग पहले कह चुके हैं कि Rule of Mob.से कैसे बचा जाये। भारत कश्मीर घाटी के नौजवानों की पत्थरबाजी पत्थरफेंक कह अव्यवस्था फैलाने के समानांतर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर घाटी के इलाकों में जिस तरह आतंक कारियों का पोषण होरहा है वह सामने आगया है। ताजा उदाहरण नेताजी मुलायम सिंह के पारिवारिक राज में भीषण विग्रह की उत्पत्ति का है। वामसेफ जनक महाशय कांशीराम बगैर हल्लागुल्ला किये अपना रास्ता तय करते थे। उन्होंने अपनी वामसेफ मुहिम और बहुजन समाज अवधारणा को पुख्ता किया। यह तो दलित उत्थान का इतिहास ही स्पष्ट करेगा कि दलित चेतना का सूत्रपात क्या बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर संपन्न कर चुके थे। उनकी अपनी मातृभाषा मराठी थी पर उनका अंग्रेजी पर जबर्दस्त वर्चस्व था जिसे ब्रिटिश राज के राजनीति विशारद वाइसराई लोग भांप चुके थे। वे सुशिक्षित तथा बड़ौदा के महाराज गायकवाड़ द्वारा संवर्धित हुए थे। उनके जमाने में भारत में अंग्रेजी राज था। राज की गरिमा ने जहां हिन्द के मुख्य अल्पसंख्या वाले मुस्लिम नेतृत्व को पृथक मुस्लिम राष्ट्र के लिये भड़काया वहीं बाबा साहेब अंबेडकर को पृथक तत्कालीन अछूत अब जिन्हें दलित संज्ञा दी गयी है Separate Land for Untouchables के लिये प्रोत्साहित किया पर भारतीय विचार पोखर के गहन ज्ञाता बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर ने राज की सलाह वहीं तक अपनाई जो हिन्द के तत्कालीन अस्पृश्य समाज के सामूहिक हित में थी। वे ईसाई या मुसलमान बन कर दलित अस्तित्व को मटियामेट करने के पक्षधर नहीं थे, महात्मा गांधी से सैद्धांतिक तथा वैचारिक मतभेद के अलावा महात्मा व बाबा साहेब में पीढ़़ी अंतराल भी था। बाबा साहेब महात्मा गांधी से 22 वर्ष छोटे थे जब कि कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना महात्मा से केवल सात वर्ष छोटे थे। दोनों की ही मातृभाषा गुजराती थी तथा दोनों ही वकालत के पेशे में आये। उनके पूर्वज क्रमशः महात्मा के पूर्वज गुजराती वैष्णव व्यापारी थे और कायदे आजम के पूर्वज इस्लाम धर्म के शिया पंथ वाले व्यापारी थे। हिन्दुस्तान की आजादी वाले बीसवीं शती के पूर्वार्ध में 1901 से 1947 तक प्रथम दोनों महात्मा व कायदे आजम सक्रिय थे। बाबा साहेब की की यशो पताका वितान बीसवीं शती के तीसरे दशक अंतिम तीन वर्षों से शुरू हुआ। इस प्रकार बाबा साहेब केवल सताईस वर्ष तक अपनी मुहिम वाली जीवन यात्रा के सफल यात्री रहे। कांशीराम चूंकि हिन्दी भाषी हिमाचल की पृष्ठभूमि से सरकारी नौकरी करते हुए अपना अभियान चलाते रहे, इन्हें स्वातंत्र्योत्तर भारत का जब इतिहास सही परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक ईमानदारी सहित लिखा जायेगा गुरू शिष्या प्रयोजन के दो स्तूप सुदूर दक्षिण में एम.जी. रामचंद्रन जयललिता गुरू शिष्या वत्सलता तथा उत्तर में गुरू कांशीराम शिष्या मायावती गुरू शिष्या वत्सलता हिन्द की नारी शक्ति का नूतन शक्ति संपात संपन्न कर सकती हैं। कैसे निर्बाध स्वरोजगार की गंगा गोमुख से गंगा सागर तक ? भागीरथी नदी हिन्द की जीवन रेखा है। जल संसाधन मंत्रालय गंगा प्रवाह की सदानीरा शुद्ध तोया जल प्रदूषण वायु प्रदूषण तथा गंगा तटवर्ती शहरों व गांवों के मल मूत्र प्रदूषण से गंगा को मुक्त रखने का प्रयास राजीव गांधी के जमाने से निरंतर चल रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री गंगा प्रवाह के लिये कृत संकल्प हैं। उनके मंत्रिमंडल की जल संसाधन मंत्री महोदया साध्वी उमा भारती सन्यास योगिनी हैं। उन्होंने गंगा सागर गोमुख गंगा यात्रा संकल्प लिया है। पहली जरूरत केवल इतनी है कि गंगा प्रवाह निरंतर सदानीरा रहे तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शिव संकल्प शासनकर्ता राजनीतिक दल उनकी शताब्दी वर्ष में स्वामी विवेकानंद तथा महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण की सुध लेने के मंगलायन विचार से जोड़ कर उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद पंक्ति में आखिर में खड़े दरिद्र व्यक्ति की सुध करूणा मार्ग से लें। सरकारी डंडा जिन्हें भक्त प्रह्लाद ने ‘राजकिंकर’ कहा वे उतने ही निठुर हुआ करते हैं जितने यम किंकर। रामराज्य सरीखा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का आत्मभाव जाग्रत करने के लिये राजतंत्र के समानांतर करूणा तंत्र भी जाग्रत करना होगा। गोमुख-गंगा सागर तक गंगा की जल धार वेगवती व प्रवाहमान हो उसके समानांतर घर घर में रोजगार की धारा को वेगवती बनाना होगा तभी रूल आफ मॉब का सामना किया जा सकता है। महात्मा गांधी ने जो बातें सन 1924 के जनवरी महीने बेलगाम में कहीं अपनी 56वीं चर्खा जयंती भरतीय पंचांगनुमा महात्मा गांधी स्वयं अपना जन्मदिन आश्विन कृष्ण द्वादशी (कनागतों के द्वादशी श्राद्ध दिवस) को मनाया करते थे। उन्होंने कदमकुआं पटना में आश्विन कृष्ण द्वादशी शक संवत 1846 विक्रम संवत 1971 तदनुसार ग्रेग्रेरियन कैलेंडर की 24 सितंबर 1924 चर्खा संघ स्थापित किया। इस चर्खा संघ का अंग्रेजी नाम आई.एस.ए. (इंडियन स्पिनर्स ऐसोसिएशन) था। हिन्दुस्तानी सूत मिल मालिकों का भी इंडियन स्पिनर्स ऐसोसिएशन था जो आज भी जिन्दा है और मौका मिलने पर हथकरघा और गांधी की खादी को कोसता रहता है। जब गुलजारी लाल नंदा अनुसूया बेन मजूर महाजन के कर्णधार थे मिल मालिक गांधी के खद्दर की इज्जत करते और ज्यादातर मिल मालिक खद्दर पहनने वाले थे। उदाहरण तेरापंथी जैन कपड़ा मिल मालिक प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया का है जो कपड़ा मिलों उत्पादों के समानांतर भारतीय टेक्सटाइल कमेटी के सम्मानित सदस्य हुआ करते और हथकरघा के हैंडलूम कपड़े व खादी कपड़े की वकालत करते रहते। वे दस वर्ष वैकुंठ ल. मेहता की अध्यक्षता वाले खादी ग्रामोद्योग आयोग स्वायत्त संगठन के सदस्य सचिव रहे। आज टेक्सटाइल कमेटी तथा भारतीय कपड़ा मंत्रालय में हैंडलूम व खद्दर का रहनुमा कोई नहीं रह गया है। प्रधानमंत्री मेक इन इंडिया, इंडिया स्टार्ट अप, इंडिया स्टेंड अप मुहिमों के जरिये कपड़ा मंत्रालय में नयी जान फूंक रहे हैं। खेतीबाड़ी के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार दाता वस्त्र उद्योग है। वस्त्र मंत्रालय की परिधान निर्यात योजना को गांव गांव सूत का लेवाली मातृशक्ति तथा मुल्क के लाखों लाख जुलाहों, कोरियों, तांतियों तथा हाथ बुनाई करने वाली महिला श्रम शक्ति को उसका वाजिब हक देकर ही रोजगार के गांधी संकल्प को कारगर किया जा सकता है। प्रधानमंत्री महोदय रोजगार के आयाम विस्तृत करने के पक्षधर हैं पर उन्होंने जो नया खादी ग्रामोद्योग आयोग गठित किया है वह गांधी के चर्खे को हिन्दुस्तान का हेरिटेज बनाना चाहता है। उन्होंने एक विशालकाय चर्खे का नमूना इंदिरा गांधी हवाई अड्डे के निकासी द्वार के पार्श्व में स्थापित किया है ताकि प्रत्येक वायुयान यात्री पर गांधी के चर्खे की याद ताजी हो जाये। वे कनाट सर्कस में भी विशालकाय स्टील डंडे वाला चर्खा स्थापित करने का संकल्प ले चुके हैं। वे देश में यत्र तत्र जहां जहां भी जिस किस्म के चर्खों पर सूत ऊन रेशम की कताई होती है उन सबका म्यूजियम बनाने का संकल्प लिये हैं। हिन्दुस्तान में रोजगार की जो हालत 100 वर्ष पहले थी वह आज भी उसी स्तर पर है। तब आबादी करीब 30 करोड़ से कुछ ऊपर थी आज देश की आबादी एक अरब पैंतीस करोड़ के करीब है। विश्व के प्रतिष्ठित अर्थज्ञों ने भारती की Below Poverty Line को निरर्थक प्रमाणित किया है। संपन्नता बढ़ रही है और धनकुबेर भी बढ़ते जारहे हैं वहीं गरीबी भुखमरी आश्रयहीनता याने रहने को मकान का न होना दोनों हाथों को काम न मिलने से बेरोजगारी बढ़ रही है। इस बेरोजगारी को थामने में केवल गांधी का चर्खा (सोलर ऊर्जा चर्खा सहित) सभी प्रकार के चर्खों से कताई हथकरर्घों पर कपड़ा बुनाई निंटिंग यार्न की हाथ बुनाई ऐसे काम हैं जो कतकर महिलाओं तथा बुनकर परिवार को स्थायी रोजगार दे सकते हैं। महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप गठित सूत कताई को लागू कर उसे इम्प्लायमेंट गारंटी से जोड़ कर महिला चर्खा कताई समूह व बुनकरों के समूह को पुनः पुनरूत्साहित किया जाना आवश्यक लगता है। प्रधानमंत्री जी राज्यों के मुख्यमंत्रियों राज्यों के लघु उद्योग मंत्रियों राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्डों, खादी आयोग तथा एम एस एम ई मंत्रालय के शीर्षस्थ अधिकारियों को आमंत्रित कर गांवों में ग्रामोद्योगों तथा चर्खे पर ऊन सूत तथा रेशम कताई के जरिये किस गांव में कितने लोगों को पारिश्रमिक मिल रहा है उनसे यह डाटा भी मांगिये। एम एस एम ई मंत्रालय से माइक्रो क्राफ्ट याने खादी व ग्रामीण उद्योगों को एम एस एम ई मंत्रालय का बंदी मत बनाइये। लघु तथा मझोले उद्योगों के बाड़े में माइक्रो क्राफ्ट वाले छोटे छोटे पर्दे मत्स्य न्याय के पीड़ित हो जायेंगे पुनर्विचार कीजिये। वैकुंठ ल. मेहता ने इजरायल शैली से गांवों के उद्यमों को Rurban Society की शक्ल देने का प्रयास लगातार दस वर्ष किया। कालांतर में वह प्रयास तिरस्कृत होगया। बड़े रोजगार मझोले रोजगार तथा लघु रोजगार के साथ साथ जिन हाथ के उद्यमों को आज माइक्रो क्राफ्ट कहा जाता है वे माइक्रो क्राफ्ट ही शहरों में बढ़ते हुए रूल ऑफ मॉब में रूकावट ला सकते हैं। इसलिये खादी को याने सूत कताई तथा हथकरघा बुनाई को 100 दिन के रोजगार गारंटी स्कीम से जोड़ कर उजड़ रही खादी को पुनर्जीवन देने की सुध ली जाये। सत्य हरिश्चन्द्र को लोग त्रैशंकव भी कहते हैं। सत्याग्रह अहिंसा का मार्ग ही भारत के उत्कर्ष का राही बना सकता है। संकटों से घबराना नहीं अपनी मर्यादा से हट कर चलना नहीं यही त्रैशंकव मार्ग है।
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