Sunday, 13 November 2016

जंगलराज या गुंडाराज उत्तर प्रदेश के सिक्के का एक ही पहलू है ?
कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने भारत के दलितों की अपने आपको देवी, मसीही समझने वाली तथा स्वयं को देवी का अवतार मानने वाली बहन मायावती ने इकानामिक टाइम्स को दिये गये अपने साक्षात्कार में कहा - मेरी सरकार का रिकार्ड आपके सामने है। मैंने अपने शासन अवधि में कानून व्यवस्था को कड़ाई से नियंत्रण में रखा। कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम महाशय ने अपने निष्कर्ष में लिखा कि हिंसा अपराध उ.प्र. में ईस्वी सन 2003 में बिहार से कम थे। मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में जितने हिंस्र अपराध थे वही स्तर तब तक उ.प्र. का भी था। वे आगे कहते हैं 2003 से 2014 तक के ग्यारह वर्षों में उ.प्र. में अपराधों की बढ़त बसपा और सपा के शासन काल में भयावह खतरनाक स्तर तक पहुंच गयी। इस संबंध में अगर उ.प्र. की राजनीतिक वास्तविकता के निष्णात तथा तटस्थ विचारक यह मानते हैं कि उ.प्र. में दलित मतदाता जहां 21 प्रतिशत हैं तथा कथित सवर्ण समाज की राजपूत जाति का मतदाता उ.प्र. में 7.5 प्रतिशत है जो महाशया मायावती बहन का कानून व्यवस्था सुधार का पहला भुक्तभोगी है। उदाहरण समाजवादी पार्टी से जुड़े राजा भइया का है। विवेचकों का मत है कि उ.प्र. का 7.5 प्रतिशत राजपूत मतदाता बहन मायावती का नखशिख विरोधकर्ता है। यह राजपूत मत अन्य सवर्णों यथा वैश्य ब्राह्मण के अलावा ओबीसी में भी दखल रखता है। ओबीसी में कुर्मी लोध कुशवाहा आदि अनेक जातियां स्वयं को राजपूत मानती हैं। जब जब उ.प्र. में मुख्यमंत्री का पद दलित मसीहा मायावती ने संभाला सपा से जुड़े राजपूत नेताओं को अपना निशाना बनाया। जो डाटा श्री कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने प्रस्तुत किया है वे कहते हैं एक साफ साफ नजारा सामने आता है कि 2003 में उ.प्र. में बिहार से कम अपराध होते थे। 2003 से 2014 तक वे ग्यारह वर्षों में बसपा व सपा के राज में उ.प्र. में अपराध बिहार से 25 प्रतिशत ज्यादा थे जब कि आबादी यू.पी. की 20 करोड़ और बिहार की जनसंख्या केवल 10 करोड़ है। जिसके साफ साफ माने होते हैं कि उ.प्र. के हिंस्र अपराध जिनकी रपट लिखायी जाती है वह अथाह बढ़ी हुई है। अपराधों की सही सही जानकारी तो यमराज और चित्रगुप्त ही सही सही जानते होंगे। अगर ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया जाये तो यू.पी. के वर्तमान जंगलराज का मालिक तो वही राम है जो ‘सबहि नचावत राम गुसाईं नर नाचत मरकट की नाईं’। यह कहना है स्वान्तः सुखाय जनभाषा में रामकथा कहने वाले तुलसीदास का। भारत की सप्त मोक्ष दायिका तीर्थ में सन 2000 तक चार उ.प्र. में थे आज केवल अयोध्या मथुरा और काशी ऐसे महत्वपूर्ण स्थान हैं जिन्हें हिन्द के लोग मोक्षदायिका मानते हैं। 
मई 2002 से उ.प्र. में बसपा तथा सपा का एकछत्र राज है। सन 2017 में यह अवधि पंद्रह वर्ष जायेगी। आंकड़ा विवेचक ने केवल ग्यारह वर्षों का अहवाल पेश किया। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी का राज उ.प्र. में 1999 से 2002 तक था। उस अवधि में अपराधों की घटती 18 प्रतिशत तक पहुंची पर बसपा व सपा की सरकारें आते ही उ.प्र. में अपराधों की बढ़त सालाना सात प्रतिशत दर से बिहार से ज्यादा बढ़ती रही। सन 2014 में उ.प्र. के अपराधों का प्रतिशत बिहार से 25 प्रतिशत ज्यादा था। अगर दोनों राज्यों की जनसंख्या को भी विचार किया जाये तो उ.प्र. के ही अपराध जो थानों में दर्ज हुए केवल उन्हीं का संज्ञान लिया जाये तो उ.प्र. के अपराधों का संवर्धन 50 प्रतिशत तक पहुंचता है। इस जंगलराज का मूल कारण क्या है ? क्या यह हालत तब भी जब 1947 में भारत आजाद हुआ और जब भारत की राजनीतिक शक्ति का संपात् उ.प्र. से ही हुआ करता था। विद्वान समीक्षक ने केवल कानूनी पक्ष को ही अपने विवेचन का आधार माना है। उ.प्र. की जनसंख्या 2011 की जनगणनानुसार उन्नीस करोड़ से ज्यादा थी। उत्तराखंड गठन से तेरह जिले उ.प्र. से कम होगये। जिलों की संख्या भी 88 से घट कर 75 रह गयी। प्रतिवर्ग किलोमीटर आबादी का घनत्व 828 दशाब्दिक जनसंख्या बढ़त का प्रतिशत 20 है जिसके अनुसार 2021 की जनगणना में उ.प्र. की संभावित जनसंख्या 25 करोड़ हो सकती है। राजनीतिक वर्चस्व बहन मायावती का गुरूशिष्या विचार पोखर बहुजन समाज की अवधारणा का स्त्रोत पश्चिमी उ.प्र. के जाटव संकुल का संगठित रूप से बहन मायावती का स्वकीय राजधर्म का निर्धारण और अनुपालन है। दूसरी ओर नेता जी मुलायम सिंह यादव का राजपरिवार चक्रव्यूह है। दोनों समूह जनता के मत द्वारा चुने गये नेता को सत्ता सौंपने के बजाय 2007 से निरंतर एमएलसी मुख्यमंत्री द्वारा शासित होरहे हैं। यह अनुकरण दोनों ने कांग्रेस के श्री सोनिया गांधी का अनुसरण करते हुए किया है। दिल्ली के प्रत्यक्ष नेता के बजाय प्रतिनिधि प्रधानमंत्री द्वारा 2004 से 2014 तक राष्ट्र राज्य की सत्ता की बागडोर नेता के द्वारा हाथ में बनाये रखना यश मिला तो मुझे मिले अपयश या अपकीर्ति सहन करनी पड़े तो प्रतिनिधि प्रधानमंत्री उसे सहें भुगतें तथा अपमानित भी होना पड़े तो नेता तो यश पावें अपयश प्रतिनिधि प्रधानमंत्री सहें। संयोग है कि कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी उनके पुत्र राहुल गांधी का कार्यक्षेत्र ही उ.प्र. का रायबरेली - सुल्तानपुर का क्षेत्र है जबकि रायबरेली से ही फिरोज गांधी ने अपनी अद्भुत राजनीतिक यात्रा शुरू की। फिरोज गांधी के निधन के पश्चात 1959 से आगे रायबरेली को श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपना निर्वाचन क्षेत्र तय किया। उ.प्र. इस तरह तीन राजनीतिक हस्तियों का कार्यक्षेत्र रहने के साथ साथ भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की साहित्य - अखबारी कार्यभूमि के अलावा अवध उनकी राजनीतिक कर्मभूमि भी रहा है। हिन्दी भाषी भाषण कर्ताओं में बाबू जयप्रकाश नारायण तथा डा. राममनोहर लोहिया को सुनने के लिये लोग पंक्तिबद्ध रहते थे। अटल बिहारी वाजपेयी के हिन्दी भाषण से प्रफुल्लित मन होने वालों में स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू भी थे। इंदिरा जी के गुरू रहे विश्वभारती अध्यापक डाक्टर जी. रामचंद्रन का कहना था कि हिन्दी भाषा को सही सही समझना हो तो इलाहाबाद व बनारस चलिये हिन्दी लेखकों कवियों नाट्यकारों तथा भाषा विशेषज्ञों की संगत में गंगा स्नान कीजिये। आज दुनियां में भाषायी नजरिये से मंदारिन अंग्रेजी व अरबी के बाद हिन्दी हिन्दुस्तानी उर्दू का स्थान आता है। डाक्टर रामचंद्रन गांधी साहित्य के अंग्रेजी व्याख्याता थे पर जब उन्हें महात्मा के श्री चरणों में निवेदन करना होता वे हिन्दी में महात्मा से सवाल करते। रामचंद्रन-महात्मा संवाद मशीन क्यों जरूरी नहीं है ? डाक्टर रामंचद्रन के प्रश्नों का महात्मा गांधी ने हृदयस्पर्शी विश्लेषण किया। अगर आप गहराई में जायें असल हिन्दुस्तान तो यू.पी. ही है। पंजाब के रहने वाले अपने आपको पंजाबी हरियाणा वाले हरियाणवी राजस्थान वाले राजपूत या बनिया वामन गुजरात वाले गुजराती महाराष्ट्र वाले मराठी कर्णाटक वाले कन्नड़ी केरल वाले मलयाली तमिलनाडु वाले तमिल आंध्रप्रदेश वाले तैलुगु उड़ीसा वाले उड़िया छत्तीसगढ़ वाले छत्तीस गढ़ी मध्य भारत वाले मालवी-महाकौशली बिहार वाले बिहारी बंगाल वाले बंगाली असम वाले असमी कहलाते हैं। भारत के सूबों में यू.पी. ही ऐसा है जो हिन्दुस्तान कहलाता है। पिछले चौदह वर्षों से यह यू.पी. मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र की तरह चौदह वर्षी वनवास बिता रहा है। यह उस इलाके का राजनीतिक वनवास है जहां राजा राम राज करते थे। वीर सेनानी लड़ता था पर वह समूह जो राज नहीं करता था बुद्धिजीवी था। वे लोग नैमिषारण्य में हजारों की संख्या में एकत्रित होकर बहस मुबाहसा करते थे। विवेक को बढ़ाने वाला तर्क प्रस्तुत करते थे। जो लोग ईश्वरी शक्ति पर विश्वास नहीं करते थे जिनका कहना था - ऋण करके भी घी पियो वे सभी आज यहां से नदारत कैसे होगये ? 
उत्तर प्रदेश के बुआ भतीजा राज के पौंने दस वर्ष उ.प्र. से ही प्रच्छन्न केन्द्रीय सत्ताधीश रहीं कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमती सोनिया गांधी ने सन 2004 से 2014 तक उच्च सदन के सदस्य डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्रित्व बक्शीश के तौर पर मुहैया कराया पर संजय बारू के अनुभवों को यदि राजनीतिक रणनीति मीमांसा से परखा जाय तो यह एक नयी राजनीतिक शैली थी। डेमोक्रेसी या लोकतंत्र की मौलिक अर्हता ही यह है कि लोकसभा का नेता या विधानसभा का नेता जनता द्वारा चुना गया हो यदि सत्ता यह सूत्र उच्च सदन के नेता को सौंपा गया या नेता ने स्वयं ही उच्च सदन का सदस्य रह कर ही शासन करना अपनी नियति मान ली तो डेमोक्रेसी या लोकतंत्र का लंगड़ा होकर चलना अत्यंत स्वाभाविक है। दिल्ली के तख्त पर डा. मनमोहन सिंह को बैठा कर अध्यक्षा कांग्रेस ने हुक्म तो खुद दिये पर हुक्म उलट जाने का दोष स्वीकार करने से सदैव इन्कार किया। 
जंगलराज एक परूष राजनीतिक लोकोक्ति है। इंडियन स्कूल आफ बिजनेस के ऐसोसियेट प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम की राय है कि उ.प्र. में जंगलराज व्याप्त है। आज तो उ.प्र. में जंगल, जंगली जानवर तथा जंगलों में रह कर तपश्चर्या करने वाले साधु महात्मा भी नगरों की तरफ नजरें गड़ाये हैं। उन्हें भी इकलापन पसन्द नहीं है। उन्हें अभाव की जिन्दगी बिताने से परहेज है पर इस हिन्दुस्तान में साधु महात्मा होने का मतलब अपनी जरूरतें कम से कम कर अपने लिये मोक्ष या अध्यात्म मार्ग तथा दीन दुनियां दोनों से सरोकार रखने वाले साधु महात्मा परोपकारी होते थे। समय परिवर्तनशील है, समय ने जलवायु में भी उग्र परिवर्तन कर दिया है । तथाकथित जंगलराज की व्याख्या करने वाले लोग जंगलराज में अपनी समिधा पर विचार करने के बजाय ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ दूसरों को नसीहत देते हैं। स्वयं अपने कृत्य को वैसे ही अनदेखा करते हैं जिस तरह दिये तले अंधेरा दीपशिखा प्रकाश देती है पर स्वयं गहन अंधेरे में रहने को अभिशप्त है। भारत के अखबार नवीस समूह के अग्रगण्य चिंतकों ने बिहार में लालू प्रसाद यादव तथा उनकी धर्मचारिणी पत्नी राबड़ी देवी के पंद्रह वर्ष के शासन को जंगलराज कहा वह महानुभाव नितीश कुमार जी भी लालू राबड़ी राज को जंगलराज कहते थे। सुनील मोदी तो बिहार की राजनीतिक अखाड़े के पहलवान थे, बाबू नितीश कुमार की वैशाखी भी रखते हैं। दरअसल में महागठबंधन संकल्पना में वास्तविक लौह नेतृत्व तो लालू प्रसाद यादव का या राजनीतिक हाराकिरी ने चुनाव का चेहरा नितीश कुमार को मान कर अपनी चुनावी यात्रा प्रारंभ की। बाबू नितीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बाहरी संज्ञा दी स्वयं वे बिहारी थे। वास्तव में बिहार में भारत के अन्य राज्यों के राजनीति कर्ताओं में जार्ज फर्नांडीस मधुलिमये का नाम अग्रणी व्यक्तियों में था। तब राजनीति में बिहारी बनाम बाहरी का सवाल उठता ही नहीं था। नितीश कुमार महाशय ने संभवतः बिहारी बनाम बाहरी उद्घोष अपने सलाहकार प्रशांत कुमार से उधार लेकर गर्वोक्तिपूर्वक उसकी घोषणा की। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में बाबू नितीश कुमार अपनी साख की गणना करते हैं। बिल्ली के भाग से छींका छटक जाये शायद तब एच.डी. देवगौड़ा की तरह बाबू नितीश कुमार की लाटरी खुल जाये अन्यथा दावेदारों की आधा दर्जन मनीषिी कल्पना कम से कम तब तक नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पचहत्तर वर्ष के नहीं हो जाते स्वयं को राजनीतिक सन्यास की गुफा में प्रवेश नहीं कर लेते बहन मायावती सहित प्रधानमंत्री पद की ओर टकटकी लगाये सभी महानुभाव टकटकी ही लगाये रहेंगे। तब तक प्रधानमंत्री पद के प्रौढ़ दावेदार राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल भी आने वाले दस वर्ष में राजनीतिक समझबूझ को समझने लग जायेंगे। राजनीतिक ज्ञान शलाका हाथ लगने के बावजूद क्या ये दोनों नौजवान प्रधानमंत्री बन सकेंगे क्या ? यह यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब खोजना सरल नहीं है। 
बसपा सुप्रीमो बहन मायावती समाजवादी पार्टी के राज को गुंडा राज कहने में गुरेज नहीं करतीं। कांग्रेस के महानुभाव कहते हैं ‘सत्ताईस साल उ.प्र. बेहाल’ उनके इस नारे के पीछे उ.प्र. में कांग्रेस का सन 1967 से लगातार होता रहा ह्रास है। पश्चिमी उ.प्र. के महत्वपूर्ण लोक नेताओं में अलीगढ़ के श्री कृपा दत्त पालीवाल अलीगढ़ के ही चन्द्रभानु गुप्त जिन्होंने अपनी कर्मभूमि लखनऊ तथा जिसे लोग हिन्दुस्तान कहते हैं उसके मुंहफट नेता थे। मेरठ के चौधरी चरण सिंह बिजनौर के हरिजन नेता चौधरी गिरधारी लाल देहरादून के महावीर त्यागी मुजफ्फरनगर के जैन सहारनपुर के ठाकुर फूल सिंह बुलंदशहर के बनारसी दास मेरठ के अन्य प्रभावी गैर जाट नेता कैलाश प्रकाश तथा बरेली के कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता सेठ दामोदर स्वरूप का अपने अपने इलाकों की जनता का पूर्ण विश्वास था। महावीर त्यागी पंडित मोतीलाल नेहरू और पंडित नेहरू की माता स्वरूप रानी के प्रिय व विश्वासभाजन को उन्हें उ.प्र. के तत्कालीन कांग्रेस नेता पंडित पंत को 1935-36 में कहा - महावीर कांग्रेस ने चुनाव लड़ना है। तालुकेदारों से चंदा लो। महावीर तालुकेदारों से बातचीत कर कांग्रेस के लिये 20 हजार और अपनी पत्नी को यू.पी. असेंबली का चुनाव लड़ने के लिये तीन हजार चंदा पाया। चंदा दाता तालुकेदार पंडित नेहरू के खास परिचित थे। उन्होंने पंडित नेहरू को शिकायती पत्र लिख दिया। स्वराज भवन में बैठक में पंडित नेहरू ने महावीर त्यागी को कहा - बैठक से बाहर चले जाओ। महावीर त्यागी सीधे माता जी के पास पहुंचे। उन्होंने मां स्वरूप रानी से कहा - मां अगर आज पंडित मोतीलाल नेहरू जिन्दा होते मुझे यह अपमान नहीं सहना पड़ता। महावीर त्यागी ने पंडित नेहरू को यह नहीं कहा कि वे तालुकेदार से चंदा पंडित पंत के आदेश के अनुसार लाये थे। माता स्वरूप रानी ने अपने इकलौते बेटे जवाहरलाल से कहा - महावीर तुम्हारे पिता जी व मेरा विश्वस्त है। पंडित नेहरू ने महावीर त्यागी को फिर बैठक में बुलाया। पंडित नेहरू को पंडित पंत ने कहा - जवाहरलाल महावीर त्यागी ने मेरे कहने पर चंदा मांगा। उसका कोई कसूर नहीं। उस चंदे की कहानी के बाद सन 1937 के असेंबली चुनाव हुए जिसमें कांग्रेस के एमएलए संख्या लीग एमएलए से बहुत ज्यादा थी। रफी अहमद किदवई संयुक्त प्रांत आगरा अवध के ऐसे नेता थे जिन्हें मजहब के गलियारे में नहीं माना जा सकता। संयुक्त प्रांत के नेताओं में आचार्य नरेन्द्र देव तथा राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन का महत्वपूर्ण स्थान था। जयप्रकाश नारायण तथा डाक्टर राममनोहर लोहिया बीसवीं शती के उत्पाद थे जबकि ऊपर गिनाये नेता सन 1900 से पूर्व धरती में अवतरित हुए। पंडित नेहरू के निधन के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे उन्हें लंबी अवधि नहीं मिली निधन होगया। कांग्रेस और सरकार की बागडोर श्रीमती इंदिरा गांधी के हाथ आगयी। यही कांग्रेस ही नहीं राजनीतिक मर्यादाओं का विघटन शुरू हुआ। 1967 में जब विधानसभा के चुनाव हुए नेताजी मुलायम सिंह यादव इटावा के जसवंत नगर से विधायक चुने गये। चौधरी चरण सिंह जब पंत मंत्रिमंडल के सदस्य थे उनके समर्थक विधायक संख्या 100 थी पर जब चौधरी साहब 1967 में चंद्रभानु गुप्त की 18 दिन चली सरकार के खिलाफ खड़े हुए उनके साथ उनके अलावा केवल सोलह विधायक थे। उ.प्र. के राजनैतिक सामाजिकता के दो महत्वपूर्ण स्तंभ चौधरी चरण सिंह और नेताजी मुलायम सिंह हैं। इन दोनों नेताओं ने हेमवती नंदन बहुगुणा की राजनीतिक शैली का प्रयोग कर उ.प्र. के मुस्लिम समाज को अपनी ओर मोड़ा परंतु राजनीतिक भरे जातीय राजनीति के ऊपर ही निर्भर रखी। इसलिये उ.प्र. में आगामी वर्ष 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में समाज के मुख्य तत्वों का झुकाव या आकर्षण जनता परिवार की तथाकथित एकता पर आधारित होगा या सत्ता के दावेदारों में कांग्रेस तथा बिहार में संपन्न महागठबंधन शैली की एकता क्या सफलतादायक होगी ? बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का एकच्छत्र दखल है पर उ.प्र. में नेताजी मुलायम सिंह यादव के राजपरिवार को सत्ता की धुरी का किनारा बनाने में गुंडाराज व्याख्यायित करने वाली मायावती राजनीति दर्शन जिसे बसपा सुप्रीमो ने मुस्लिम-दलित युति का स्त्रोत मात्र है। उ.प्र. में विभिन्न वोट बैंक कारकों में तथाकथित सवर्णों में साढ़े सात प्रतिशत राजपूत वोट तथा  पूर्वांचल के ब्राह्मण तथा ठाकुर राज नेतृत्व को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। नेताजी मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाले जनता परिवार का एकीकरण क्या कांग्रेस बसपा तथा केन्द्र में सत्तासीन भाजपा का मिल कर सामना करने की स्थिति में हैं। यदि कांग्रेस व जनता दल 5 महागठबंधन में शरीक भी होगये हैं तो क्या कुलदीप नायर की सम्मति के अनुसार क्या ये सभी मिल कर बसपा और भाजपा को चारों खाने चित्त बैठायेंगे। बसपा और सपा उ.प्र. के ऐसे राजनीतिक खिलाड़ी हैं जो एक दूसरे से पूर्णतया पृथक हैं। अपराध का जो स्तर आज है उसे देखते हुए 2017 केे विधानसभा चुनाव में चौतरफा चुनाव संघर्ष अवश्यंभावी लगता है। जनता अगर जाग गयी तो बढ़ते हुए अपराध रोकना उसकी पहली मांग भी हो सकती है। राहुल गांधी तथा उनके सलाहकार पी.के. प्रशांत कुमार कांग्रेस की गाड़ी कहां तक खींच पाते हैं यह भी देखने लायक मजा है। शीला दीक्षित जन्मना उ.प्र. को ब्राह्मण समाज से नहीं आतीं वे मूलतः पंजाब की खत्री समाज की कन्या हैं। उनका विवाह पंडित नेहरू के विश्वासपात्र उन्नाव के ब्राह्मण नेता उमाशंकर दीक्षित केे पुत्र के साथ होने से वे दीक्षिता ब्राह्मणी होगयीं। उ.प्र. के ब्राह्मण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिये कांग्रेसाध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने श्रीमती शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मेदवार कांग्रेस पार्टी की ओर से घोषित किया है। उ.प्र. के ब्राह्मण मतदाता अत्यंत जागरूक हैं वह प्रख्यात सतीश चंद्र मिश्रा द्वारा बसपा के उम्मेदवारों को भी अपना मत दे सकते हैं। कलराज मिश्रा सहित बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं को भी अनुग्रहीत कर सकते हैं। पारिवारिक कलह के बावजूद मुलायम सिंह यादव एवं उनके पुत्र अखिलेश यादव को भी ब्राह्मण मतदाता मत दे सकते हैं। इसलिये उ.प्र. का ब्राह्मण मतदाता उस पार्टी को सफलता दिलायेगा जो उनकी नजरों में सरकार बनाने लायक विधायक संख्या अर्जित कर सके। बहुत बड़ा दारोमदार उ.प्र. के यादवेतर पिछड़ी जातियों के मतदान प्रतिशत पर निर्भर करता है। यह निर्विवाद है कि उ.प्र. का 7.5 प्रतिशत राजपूत मत अमर सिंह की वजह से कुछ बहुत झुकाव सपा की तरफ रख सकता है पर 7.5 प्रतिशत राजपूत मत के साथ करीब करीब इतर 7.5 प्रतिशत इतर राजपूत याने 15 प्रतिशत ठोस मत बसपा के विरोध में ही जाना है। अगर राज्य का समूचा दलित मत एकमुश्त बसपा सुप्रीमो की झोली में गया प्रदेश में वे 19 प्रतिशत मुस्लिम मत को भी अपना मत मानती हैं। उन्होंने 2007 में लखनऊ में अपनी बहुमत वाली सरकार मात्र 30 प्रतिशत मत प्राप्त कर गठित की। उनको और नेताजी मुलायम सिंह यादव के गुंडाराज बनाम जंगलराज की युति 2014 की भांति भारतीय जनता पार्टी के मजबूत नेतृत्व को उ.प्र. की राजसत्ता सौंप सकती है। देखते रहिये उ.प्र. के मतदाताओं का बहुमत मोदी-माया-मुलायम किस नेतृत्व को अनुग्रहीत करता है। पिछले पंद्रह वर्षों से निरंतर बढ़ रहे अपराध ग्राफ को सन 2003 के स्तर में लाने के लिये कौन राजनीतिक दल कृतकृत्य होता है। 
क्या बिहार का बिहारी बनाम बाहरी महागठबंधन सुशासन देरहा है ? या बिहार के गोप नेता महाशय लालू प्रसाद यादव का यह कथन कि यादव कृष्ण के जमाने सवा पांच हजार वर्ष से आपस में लड़ते आरहे हैं। क्या यही यादवी संघर्ष फिर होगा ? अपराधियों की बाछें न खिलें इसके लिये उ.प्र. के करोड़ों मतदाताओं को सोच समझ कर ही अपना मत देना होगा। क्या उ.प्र. के मतदाता गुंडाराज-जंगलराज के विकल्प के लिये तैयार हैं ?
कृष्ण ने अर्जुन से कहा था - कर्मण्येवाऽधिकारस्ते। सुविचारित मतदान ही उ.प्र. जिसके लिये कांग्रेस का नारा - सत्ताईस साल कांग्रेस बेहाल, क्या कांग्रेस का 1969 में टूटना उ.प्र. की बहाली का मूल कारण नहीं है ? सोचिये विचारिये परख कर अपराध न करने वाले उम्मीदवार को ही मत देने का मन बनाइये। उत्तर प्रदेश ही हिन्दुस्तान है इसे बचाने आगे आइये। 
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