खादी इंडिया आजीविका दान ?
क्या मेक इन इंडिया के जरिये खादी इंडिया आजीविका दान कार्यक्रम गांधी-खादी को पुनर्स्थापित करेगा ?
डी.ए.वी.पी. का यह विज्ञापन कई हिन्दी अखबारों में छपा है।
खादी इंडिया एक आजीविका दान कार्यक्रम में जन सहयोेग चाहती है। इस अपीलनुमा विज्ञापन के हस्ताक्षर कर्त्ता महाशय सर्व श्री कलराज मिश्र केन्द्रीय केबिनेट मंत्री एम.एस.एम.ई., दो राज्यमंत्री महाशय हरी भाई पार्थी भाई चौधरी तथा गिरिराज सिंह और खादी ग्रामोद्योग आयोग जो अब सूक्ष्म लघु मध्यम उद्यम मंत्रालय भारत सरकार है। पूर्ववर्ती यू.पी.ए. सरकार के तत्कालीन एम.एस.एम.ई. मंत्री महोदय श्री महावीर प्रसाद ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डा. महेश शर्मा को बर्खास्त कर कानून द्वारा स्थापित स्वायत्त शासी खादी आयोग को लुप्त कर गांवों में रोजगार के अवसर मुहैया करने वाले संगठन के.वी.आई.सी. में नयी चमक दमक लाने के उद्देश्य से एक जांच आयोग भी बैठाया जिसकी संस्तुति के आधार पर जून 2006 में सुश्री कुमुदनी जोशी की अध्यक्षता में खादी ग्रामोद्योग आयोग का पुनर्गठन हुआ। जब तक खादी ग्रामोद्योग आयोग (A.I. K.V.I. Board सहित) 1953-54 से 2016 तक गुजराती भाषी वैकुंठ ल. मेहता, उ.न. ढेबर, घनश्याम दास ओझा, सुश्री जोशी तथा कांग्रेस शासित 2006 से 2014 पर्यन्त लगभग 20 महीने खादी आयोग जुड़ा रहा। जून 2006 के पश्चात नरेन्द्र मोदी सरकार के केन्द्र सरकार में अपना अस्तित्व प्रमाणित किया तथा अर्धमूर्च्छित खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष के रूप में श्री विनय कुमार सक्सेना को नियुक्त किया। गैर सरकारी सदस्यों में केवल अध्यक्ष ही पूर्णकालिक सदस्य है। गांधी की खादी पूरी तरह नौकरशाही की चेरी मान कर रह गयी। गांधी की खादी जो काते सो पहने वाले कठोर आत्म आदर्श ने हिन्द की आजादी के संग्राम का एक बहुत बड़ा निरायुध संग्राम का रास्ता प्रशस्त किया। यूरप के विद्वानों में टालस्टाय सरीखे मनीषी ने महात्मा गांधी के हिन्दू कहा। यूरप में हिन्दू अथवा हिन्दुत्व की पहली आहट टालस्टाय ने ही दी। यूरप के विद्वानों तथा मनीषी चिंतकों ने यह प्रतीति करायी कि यूरप की औद्योगिक क्रांति निरर्थक है। बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने हिन्द स्वराज में कहा है - वह यूरप को आने वाली दुनियां की बसासत के लिये आदर्श नहीं मानते। पार्लमेंटरी राज के बारे में मोहनदास करमचंद गांधी ने अत्यंत कठोर आलोचना का रास्ता अपनाते हुए ब्रिटिश पार्लमेंट को बेसुआ कहा। इंडियन ओपीनियन के साप्ताहिक संस्करणों को अंग्रेजी और यूरप की दूसरी महत्वपूर्ण भाषाओं में यूरप के विद्वान कराते और अधिसंख्य चिंतन पोखरों के निष्णात व्यक्ति बारिस्टर गांधी की राय के प्रशंसक थे और उनका मानक था कि हिन्द का हिन्दू मोहनदास करमचंद गांधी केवल हिन्द के लिये ही नहीं सोचता वरन् उसकी हिन्दू चिंतन शैली मानव मात्र के लिये हितकारी है। यूरप के लिये तो मोहनदास करमचंद गांधी के विचार औद्योगिक क्रांतिजन्य यूरोपीय समाज के लिये रामबाण औषध है। मोहनदास करमचंद गांधी अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज तथा अपने देश हिन्द वासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की भव्य कल्पना करते थे। खादी इंडिया सहयोग एक आजीविका दान कार्यक्रम - सूत सूत से बुनी आजीविका - सहयोग की भारत की राष्ट्रीय चेतना तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के मन की बात के संकल्प सिद्धि के लिये दानदाताओं से खादी इंडिया के चार श्रीमंत एक परिवार के भरण पोषण केेे लिये अनुरोध कर रहे हैं कि रू. 13,500/- का चेक केवीआईसी चरखा अकाउंट अथवा आर टी जी एस अकाउंट आई एस सी एसबीआई एन के पक्ष में भेजें। वे यह भी कहते हैं कि आपके द्वारा दिया गया दान इन्कम टैक्स एक्ट अनुच्छेद 80 जी के अंतर्गत कर मुक्त है। महात्मा गांधी ने भी खादी के लिये चंदा दान जन जन से मांगा। 24 सितंबर 1924 के दिन अपनी पचपनवीं वर्षगांठ आश्विन बदी द्वादशी श्राद्ध के दिन मनाते हुए उन्होंने कदमकुआं पटना में आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसिएशन गठित किया। उसका हिन्दुस्तानी नाम अखिल भारतीय चर्खा संघ रखा। इस चर्खा संघ के मुखिया स्वयं महात्मा गांधी थे। उनके अलावा चर्खा संघ के दूसरे स्तंभ मौलाना शौकत अली, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, सतीश चंद्र दास गुप्त, मगन लाल गांधी, चर्खा संघ के खजांची सेठ जमना लाल बजाज तथा सेक्रेटरियों में पंडित जवाहल लाल नेहरू, शंकर लाल बैंकर तथा शोएब कुरैशी निश्चित हुए थे। महात्मा गांधी ने खादी अभियान के लिये अपनी झोली में जनता जनार्दन से दान मांगा। उन्होंने 1933 में काशी के ईश्वरगंगी मुहल्ले में प्रोफेसर जे.बी. कृपलानी को तीन लाख चालीस हजार रूपये गांधी आश्रम के खादी काम के लिये देते समय कहा - प्रोफेसर यह रकम कत्तिन-बुनकर की अमानत है। इसका उपयोग करना आपका उत्तरदायित्त्व है। अमानत में खयानत को महात्मा अत्यंत असह्य वैयक्तिक अपराध की श्रेणी में गिनते थे। वह गांधी आश्रम जो जे.बी. कृपलानी के संचालकत्व में समूह के रूप में 20 नवंबर 1920 में शुरू हुआ पंडित नेहरू की अगुवाई में फरवरी 1929 में गांधी आश्रम मेरठ के नाम से कानून सम्मत संगठन बना। उसका विस्तार उ.प्र. म.प्र. पश्चिम बंग पंजाब दिल्ली जम्मू कश्मीर तथा उत्तराखंड सात राज्यों में फैला। उसकी भू संपदा का बाजार मूल्य आज तीस अरब रूपये से ज्यादा है। गांधी आश्रम मेरठ अपनी भू संपदा को बिल्डरों के हाथों के हवाले करने की फिराक में है। इन सात राज्यों में ही खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा 1953-54 से 1972 तक चरखों करघों के लिये जो धनराशि खर्च की गयी उसमें से तीन चौथाई चरखे करघे संस्थाओं और खादी ग्रामोद्योग आयोग के गोदामों में धूल चाट रहे हैं। खादी ग्रामोद्योग आयोग का वह तंत्र जो आयोग के प्रथम अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता ने खड़ा किया था तथा जो मूल अधिनियम LXI KVIC ACT 1956 में प्रविधित था वह 1956 के KVIC LXI ACT 1987 के संशोधन द्वारा लोकाधारित रखने के बजाय खादी ग्रामोद्योग आयोग के एकमात्र पूर्णकालिक अध्यक्ष दो पदाधिकारी सीईओ व फाइनांशियल एडवाइजर तीन व्यक्तियों द्वारा जैसा चाहें वैसा करें वाला संगठन बना डाला जिसका परिणाम यह हुआ कि 14 अक्टूबर 2004 को सत्ता में आने के महज पांच महीने पश्चात यूपीए सरकार ने तत्कालीन अध्यक्ष डा. महेश शर्मा को बर्खास्त कर खादी आयोग को लुप्त कर डाला।
इस ब्लागर को खादी इंडिया के चौखंभा श्रीमंतों के दानदाताओं से रू. 13500/- दान मांगने पर कोई ऐतराज नहीं। वे दान मांग रहे हैं अच्छा कर रहे हैं पर रू. 13500/- के दान प्राप्त कर उनकी सूत सूत से बुनी आजीविका के लिये सहयोग चाहने, सहयोग से मिली राशि का उपयोग किस तरह करने का संकल्प है ? सेप्टुगेरियन सूक्ष्म लघु मध्यम उद्यम केबिनेट मिनिस्टर महाशय उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के लोकप्रतिनिधि हैं। उनके अपने सांसद निर्वाचन क्षेत्र में घर घर में चर्खा कताई होती थी वे यह तो मालूम करें कि उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में 1953-54 से 1972-73 तक खादी ग्रामोद्योग आयोग ने गांधी आश्रम मेरठ अथवा उसकी विकेन्द्रित इकाई के मार्फत अंबर चर्खा, नया माडल अंबर चर्खा किन किन संस्थाओं के मार्फत कत्तिनों को सूत कताई के लिये वितरित किये। वे यह भी देखें कि उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के निर्वाचन क्षेत्र में कब कब कितने चर्खे बांटे गये ? आज वहां कतकरों की वास्तविक संख्या क्या है ? वे यह आंकड़़े अपने तरीके से भी ज्ञात कर सकते हैं तथा उ.प्र. खादी ग्रामोद्योग बोर्ड और खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई के उ.प्र. में स्थापित तंत्र के मार्फत भी ज्ञात कर सकते हैं। उनको अपने और प्रधानमंत्री जी के निर्वाचन क्षेत्र की सही सही चर्खा जानकारी हो जायेगी तो उनकी आंखें खुल जायेंगी।
महात्मा गांधी का खादी और गीता से अनन्य संबंध था। भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय को श्रद्धामय विभाग योग कहा जाता है। अमरीका के उद्भट राजनीतिक ज्ञाता तथा विद्वान नोबल पुरस्कार धारक हेनरी किसिंजर की ताजा पुस्तक World Order को यह ब्लागर विश्वायतन कहना ज्यादा उपयोगी मानता है। हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक में कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा - Hindu Classic भगवद्गीता का उद्धरण दिया है। वस्तुतः भगवद्गीता मानव हितकारी संवाद है। उसका मजहब से सीधा वास्ता नहीं है। सवा पांच हजार वर्ष पहले जब वह संवाद हुआ था तब मजहबी चिंतन के बजाय मानव हित चिंतन ज्यादा श्रेष्ठ था। ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके’ गीता संवाद की परिणति है। अंग्रेजी विद्वान इसे bondage of Karma कहते हैं। उसमें दान के बारे में कृष्णार्जुन संवाद में अर्जुन के सवाल - तेषाम् निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः का जवाब देते हुए श्री कृष्ण ने कहा - दातव्यम् इति यत् दानम् दीयतेऽनुप कारिणे देशे काले च पात्रे च तद् दानम् सात्विकं स्मृतम् अदेश काले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते असत्कृत भव ज्ञातम् तत्तामस उदाहृतम्।
लोक राजस्व से बजट पेटे जो चर्खे बांटे गये उनमें जो आज बंद पड़े हैं बिना उस प्रसंग को ध्यान में लिये दान प्रक्रिया का नया अभियान खादी इंडिया सहयोग पर मंत्री महोदय को पुनः विचार करना चाहिये। डाक्टर यशवीर सिंह खादी आयोग के अध्यक्ष तत्कालीन उद्योग मंत्री चौ. अजित सिंह द्वारा नियुक्त हुए। उनसे पहले श्री लक्ष्मी दास की नियुक्ति प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। राजीव गांधी सरकार के पतन के पश्चात राज वी.पी. सिंह की सरकार अस्तित्व में आयी। राज साहब प्रोफेसर राममूर्ति को खादी आयोग का प्रमुख बनाना चाहते थे पर उद्योग मंत्री ने अपना अधिकार मान कर दूसरे प्रोफेसर को यह काम सौंप डाला। तीस वर्ष खादी का ताना बाना वैकुंठ भाई की बुनियादी सोच के आधार पर चला जो 1987 में लुप्त होगया।
भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटर आबादी 2011 की जनगणनानुसार 1,23,63,44,551 परंतु ताजा अनुमानों के अनुसार 1 अरब तीस करोड़ से ज्यादा है, जरूरत का 29.8 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रही है। खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा आच्छादित भारतीय गांवों की संख्या आयोग के द्वितीय अध्यक्ष श्री उछंगराय नवलशंकर ढेबर के अनुसार सन 1972 में जब उन्होंने खादी ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष पद नौ वर्ष अध्यक्ष रहने के बाद छोड़ा उन्होंने कहा आयोग ने देश के एक लाख गांवों को आच्छादित कर लिया है। तीस वर्ष के पश्चात आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डाक्टर महेश शर्मा ने आच्छादित गांवों की संख्या 248000 बताई। एग्रो रूरल इंडस्ट्रीज मंत्रालय और लघु तथा मझोले उद्योग मंत्रालयों को जोड़ कर एम.एस.एम.ई. मंत्रालय यू.पी.ए. 1 शासन के दौरान अस्तित्व में आया। एग्रो रूरल इंडस्ट्रीज के ज्यादा उद्योगों को जो लघु उद्यम सीमा में नहीं आते थे उन्हें माइक्रो क्राफ्ट घेरे में लाकर लघु तथा मझोले उद्योगों के मंत्रालय का हिस्सा बना दिया गया। लघु तथा मझोले उद्योग कुटीर तथा गृह उद्योगों के मामले में समर्थ हैं। मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन का कथन है कि हिन्द के गांवों में एक मिलियन याने दस लाख से ज्यादा कारीगर रह रहे हैं। उन्होंने देहाती कारीगरों में सूत, ऊन, रेशम तथा 1977 से पालिएस्टर कताई करने वाले कारीगर, हथकरघा में बुनाई करने वाले कारीगर, कच्ची घानी पर घानी तेल निर्माण करने वाले तेली, चर्म शिल्पी चमड़े से जूता चप्पल तथा चमड़े के दूसरे परिधान बनाने वाले कारीगर, मौन पालक, रेशों का काम करने वाले, रस्सी बुनने वाले तथा टोकरी आदि बनाने वाले कारीगर, अनाज दाल प्रशोधन करने वाले कारीगर, हाथ बिनाई से स्वेटर पुलोवर आदि तैयार करने वाली व हाथ बिनाई करने वाली मां बहनें इन सभी कारीगरों को यदि खादी ग्रामोद्योग आयोग अथवा एम.एस.एम.ई. मंत्रालय ने आच्छादित न भी किया हो तो भी गरीबी रेखा से नीचे काम करने वाली जनसंख्या की गिनती उनतालीस करोड़ निकलती है। माननीय प्रधानमंत्री जी हिन्द की गरीबी रेखा अवधारणा को गरीबी निवारण का सबसे बड़ा रोड़ा माना जारहा है। कलराज मिश्र महाशय के नेतृत्व वाली चौमुखी ज्योत इंगित कर रही है कि हिन्द के देहातों में उनका आच्छादन दस लाख से ज्यादा रोजी चाहने वाले लोगों का हुआ है। विज्ञापन में मूलतः एक मिलियन याने दस लाख लोग लिखा है। मनोरमा इयर बुक 2016 के अनुसार 2011 की जनगणना मुताबिक हिन्द की कुल जनसंख्या 1,21,01,93,422 है जिसमें महिला जनसंख्या 58,64,69,174 है। गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोगों की संख्या 29.5 प्रतिशत है इसलिये यह मानना चाहिये कि गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रही हिन्द की महिला जनसंख्या सोलह करोड़ से ज्यादा ही है। अनुदार विश्लेषण भी हो तो भी कम से कम करोड़ महिलाओं को गरीबी निवारण के लिये वित्तीय सहारा चाहिये इसलिये एम.एस.एम.ई. मंत्रालय को देश की महिला श्रम शक्ति को राष्ट्रीय रोजगार परिप्रेक्ष्य में उपयोग करने के लिये एक ही रास्ता बचा है वह है गांधी की खादी के लिये सूत कातने वाली महिला श्रम शक्ति को सामर्थ्य देनी होगी। केन्द्र व राज्य सरकारों के कर्मचारी जो अपने कुटुंब की महिला श्रम शक्ति को राष्ट्रीय हित में संवर्धित करने के लिये रू. 13500/- का दान माहवारी बारह किश्तों में 1150/- रूपये माहवारी दर पर अपने सेवा नियोजन कर्ता के माध्यम से दान देने की वृत्ति को संवर्धित करना होगा। संपन्न तथा श्रीमंत समाज एकमुश्त रू. 13500/- दान दे सकता है किन्तु निरंतर महंगाई से त्रस्त समाज को भी अपना योगदान इस पुनीत कार्य में देने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ताकि चरखे पर सूती की कताई, ऊन की अथवा रेशम की कताई में आम आदमी भी अपना योगदान कर सके। अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने वाले राष्ट्रीय रोजगार संवर्धन यज्ञ में अपनी आहुति अर्पित कर सके। जिस तरह महात्मा गांधी ने खादी के लिये अपनी झोली हमेशा खुली रखी जो दान पाया वह खादी को दिया। वह क्रिया हमें भी अपनानी है। गरीबी संख्या वाल प्रसंग यक्ष प्रश्न की भांति घूर घूर कर देख रहा है। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय ने 2006 से 2014 तक जो उपलब्धि की है उसे प्रकाश में लाया जायेजिन दस लाख कारीगरों की कल्पना एम.एस.एम.ई. मंत्रालय कर रहा है उन कारीगरों को दानदाताओं द्वारा एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के माइक्रो सेक्टर का चर्खा व करघा या अन्य उपकरण मुहैया करने से पहले कृपापूर्वक प्रधानमंत्री जी के मन की बात घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों, ग्रामोद्योग मंत्रियों व राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्डों के सदरों से आमने सामने बात कराइये। खादी ग्रामोद्योग आयोग की जो भी वित्त पोषित राजदार सैकड़ों संस्थायें हैं उनमें जो संस्थायें आज भी जीवित हैं उनके अध्यक्ष मंत्रियों को आहूत कीजिये। उनसे मालूम कीजिये कि हर जिले में उनके वर्तमान काम का आकार क्या है ? कितने कत्तिन व चालू चर्खे हैं ? कितने बुनकर अपने अपने करघे में बुनाई कर रहे हैं ? शहरों व गांवों में हाथ बिनाई करने वाली दक्ष महिलाओं के बीच क्या खादी आयोग अथवा खादी बोर्ड की पहुंच है ? गुुजरात सहित समूचे उत्तर भारत में जाड़ों में हाथ से बुने ऊनी स्वेटर पुलोवर पहनना बहुत जरूरी है। स्कूलों की वर्दी में भी स्वेटर स्लीवलैस तथा फुल स्वेटर पहनाये जाते हैं। स्कूलों की वर्दियों के फुल स्वेटर तथा हाफ स्वेटर दक्ष हाथ बुनाई करने वाली महिलाओं की आमदनी का स्त्रोत हो सकता है। दान राशि की पावती, उसका उपयोग हाथ की उद्यमिता संवर्धन में लगाना श्रेयस्कर हैै। दाताओं से सहयोग की आराधना करने के साथ साथ 24 सितंबर 1924 से आज तक चर्खा, सूत, करघा में सूत बुनाई, हैंड निटिंग यार्न की कताई, हैंड निटिंग के जरिये उपयोक्ताओं को कैश्मीलोन के स्वेटर अथवा चाइनीज स्वेटर नहीं हिन्दुस्तानी स्वेटर पुलोवर जाड़ों में ऊनी दस्ताने, ऊनी मोजे तथा मंकी कैप उपलब्ध कराने से महिला श्रम शक्ति को निरंतर आमदनी का जरिया मुहैया कराया जा सकता है। उपकरण उपलब्ध कराने के लिये आप सहृदय दानदाताओं का ध्यानाकर्षण रू. 13500/- दान देने के लिये कर रहे हैं पर कार्यक्रम को सजीव तरीके से संचालित करने के लिये कतकर को सूत, ऊन, रेशम अथवा पोलियेस्टर-काटन स्लाइबर उपलब्ध कराने, कारीगर की मजदूरी दिलाने के लिये क्या वित्तीय प्रावधान संकल्पित किया गया है ? अगर माइक्रो स्माल मीडियम इन्टरप्राइवेट मिनिस्ट्री भारत के प्रधानमंत्री महोदय के संज्ञान में सही सही जमीनी हालात का रोडमैप रखें। खादी ग्रामोद्योग आयोग की 1964-65 तक की उपलब्धियों को मंत्रालय स्वयं समझे। खादी ग्रामोद्योग आयोग व पूर्ववर्ती अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता उनके साथी प्राणलाल सुन्दरजी कापड़िया भारत सरकार के ताड़गुड़ सलाहकार गजानन नाइक सहित रूर्बन सोसाइटी के चिंतन पोखर झबेर भाई पी. पटेल द्वारा इन्टेसिव एरिया डेवलपमेंट स्कीम को पुनर्जीवित करने के लिये प्रधानमंत्री जी का ध्यानाकर्षण करें। खादी की वर्तमान दशा को फिर पटरी में लाने के लिये संकल्प लें। दान लें उसका सदुपयोग करें। कहीं ऐसा न हो देश में फैले एन.जी.ओ. विदेशी मदद और भारत सरकार व राज्य सरकारों से मिलने वाले अनुदान सहायता आदि का सटीक उपयोग नहीं कर पारहे हैं। तीस्ता सीतलवाड का उदाहरण सामने है। इसलिये मेक इन इंडिया के संकल्प को शिव संकल्प बनाने के लिये पुरानी गलतियों को सुधारना गलतियों से हुई अव्यवस्था से सबक लेना अंत में पुनः यह प्रार्थना करना इस ब्लागर का स्वधर्म है कि एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के संयुक्त सचिव ए.आर.आई. जिन्हें पूर्व में संयुक्त सचिव के वी आई सी कहा जाता था वे हिन्द की खादी की सही सही रामकहानी प्रधानमंत्री जी के संज्ञान में लाकर उस बन्द रास्ते को फिर चालू करें जो हिन्द के गांवों के ग्रामोद्योग व खादी को इमानदारी से चलाने के लिये वैकुंठ ल. मेहता ने 1953 से 1963 तक लगातार दस वर्ष अहर्निश विकेन्द्रित अर्थांग के जरिये मुंबई में 1957 में भारतीय स्टेट बैंक की उपाध्यक्षता तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग की अध्यक्षता साथ साथ संपन्न की। महात्मा गांधी का वह संकल्प जो उन्होंने 1934 में व्यक्त किया था कि हर गांव में चरखा-करघा के समानांतर एक ग्राम उद्योग जरूर लगे तभी हिन्द के गांवों की आर्थिक रीढ़ सुदृढ़ होगी, उनका शिवसंकल्प था। ऊपर प्रस्तुत रू. 13500/- की सहयोग राशि कामना जारी करते हुए जो अपील की गयी है उनसे पुनः अनुरोध है कि अपनी अपील का स्वयं पुनर्वाचन करें, यह अपील केवल हिन्दी अखबारों में छपी है। अंग्रेजी अखबारों में या तो छपवाई नहीं गयी है या डी ए वी पी के विज्ञापन को उन्होंने नजरअन्दाज कर दिया हो, जो भी हो चर्खे करघे व दूसरे उपकरण जो पहले से ही धूल फांक रहे हैं क्या उन्हें फिर से चलाने का कोई शिव संकल्प माननीय कलराज मिश्र ले रहे हैं ? खादी के लिये सूत कताई हेतु प्रति लाभार्थी रू. 13500/- का दान मांगने का प्रसंग एम.एस.एम.ई. मंत्रालय को ऐसे दानदाताओं का भी सहयोग लेना चाहिये। जो एक किश्त में रू. 13500/- देना शक्य न समझते हों उन्हें तीन या चार किश्तों में दान देने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। सरकारी कर्मचारियों के वेतन हेतु सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होगयी हैं। जो सरकारी कर्मचारी अपनी पत्नी, बेटी, बहन, माता को उनके अतिरिक्त समय का सदुपयोग चर्खा कताई में करना व्यावहारिक मानते हैं उन्हें सही मार्गदर्शन देना भी मंत्रालय का उत्तरदायित्त्व है।
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- चलते चलते -
एक हजार व पांच सौ रूपये के पुराने नोट खादी भंडारों में भी लिये जायें।
खादी इंडिया के चतुर्मुखी कर्णधार महाशयों ने महात्मा गांधी की तरह खादी के लिये चंदा देने का आह्वान कर उदार मानस हिन्दुस्तानियों से रूपया 13,500/- खादी इंडिया के रोजगार संवर्धन केे लिये दान मांगा, अच्छा किया। उन्हें भारत के समृद्ध जन दान देकर खादी इंडिया की राह सवारें। भारत सरकार ने एक हजार व पांच सौ रूपयों के पुराने नोट बंदी का हुक्म आठ नवंबर 2016 को जारी किया। माइक्रो क्राफ्ट्स हिन्द की उद्यमिताओं में अत्यंत दुर्बल है। माइक्रो क्राफ्ट्स के अंतर्गत दिल्ली शहर में ही काटेज इंडस्ट्रीज इंपोरियम खादी ग्रामोद्योग भवन तथा विभिन्न राज्य सरकारों के दस्तकारी उत्पाद विपणन केन्द्र हैं। वित्त मंत्रालय तथा भारतीय रिजर्व बैंक ने 24 नवंबर तक एक हजार व पांच सौ के पुराने नोट रेल, बस, हवाई जहाज, पेट्रोल पंपों तथा अस्पतालों में चालू रख जनसामान्य को असुविधा से बचाने का तरीका निकाला है। सहकारी बैंकोें को दी गयी यह सहूलियत रिजर्व बैंक ने वापस ले ली क्योंकि सहकारी बैंकों का नियंत्रण करने वाले श्रीमंतों के अनर्जित धन रोक की नकेेल नहीं लग पारही है परंतु कतार में अंत में खड़े लोगों का योगक्षेम देखने के लिये एम.एस.एम.ई. केबिनेट मंत्री महाशय तथा उनके दो राज्य मंत्री महाशयों और गांधी की खादी सरकारी रहनुमा स्वायत्तशासी खादी ग्रामोद्योग आयोग के सदर विनय कुमार सक्सेना महाशय को भारतीय वित्त मंत्री अरूण जेटली महाशय तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से विनती करनी चाहिये कि दिल्ली के कॉटन इंडस्ट्रीज इंपोरियम खादी ग्रामोद्योग भवन कनाट प्लेस दिल्ली में तथा राज्य सरकारों के हस्तकला उत्पाद विपणन केन्द्रों सहित खादी ग्रामोद्योग आयोग संचालित खादी भवनों, राज्य सरकारों के खादी मंत्रालयों के आधीन खादी भवनों खादी भंडारों व खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा पोषित खादी संगठनों के खादी भवनों व भंडारों को भी एक हजार व पांच सौ के पुराने नोट खरीददारों से स्वीकार किये जाने चाहिये भले ही नोटबंदी किये गये नोटों की मात्रा रूपये दस हजार तक ही सीमित क्यों न हो। इससे एम.एस.एम.ई. मंत्रालय का कारोबार रूकने व एकदम बंद होने से बच जायेगा। गैर कानूनी हुए एक हजार व पांच सौ के पुराने नोट केवल उन्हीं मार्केटिंग सेन्टरों में स्वीकार हों जिनका मुनाफा व्यक्ति को नहीं समूह को मिलता है। हथकरघा व कुटीर उद्यमिता विपणन करने वाले सरकारी नियंत्रण वाले विपणन केन्द्रों को पुराने नोट जिन्हें 8 नवंबर 16 से अवैध किया गया है उन्हें स्वीकार करने व बदले में बिक्री किये माल उन्हें दिये जाने का संकल्प लेने से मेक इन इंडिया कार्यक्रम को राहत मिलेगी। खादी इंडिया के कर्णधारों को वित्त मंत्री महाशय व प्रधानमंत्री जी से बतिया कर एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के व्यापारिक कार्यक्रम को बंद होने से बचाने का उपाय करना ही चाहिये। सेप्टुगेरियन महाशय कलराज मिश्र उनके सहयोगी राज्य मंत्री महानुभाव तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग के सदर विनय कुमार सक्सेना महाशय को वित्त मंत्री एवं प्रधानमंत्री जी के संज्ञान में यह विकल्प लाना चाहिये तथा एक हजार व पांच सौ के पुराने नोटों को एम.एस.एम.ई. विपणन केन्द्रों में रेलवे, बस, हवाई जहाज, आदि उपक्रमों के साथ जोड़ा जाना चाहिये ताकि मेक इन इंडिया कार्यक्रम को बचाया जा सके और समाज के दुर्बल वर्ग को राहत का रास्ता प्रशस्त हो सके। ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

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