वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे,
परदुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।
सकल लोक मां पहुंचे वन्दे निन्दा न करे केणी रे,
वाच काछ मन निर्मल राखे धन धन जननी तेणी रे।
परदुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे।
सकल लोक मां पहुंचे वन्दे निन्दा न करे केणी रे,
वाच काछ मन निर्मल राखे धन धन जननी तेणी रे।
ऐसा लगता है कि पंडित नेहरू के समवयस्क आचार्य नरेन्द्र देव की सोच शैली महत्वपूर्ण थी। उनकी मान्यता बन गयी थी कि हिन्दुस्तान को केवल वैष्णव नेतृत्व ही दिग्बोध कराने की क्षमता रखता है। जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से हिन्दुस्तान लौटे 1915 में आचार्य नरेन्द्र देव छब्बीस वर्षीय अध्ययनशील युवा थे। अवध की धरती में अनेक महापुरूष जन्मे हैं। उनकी पंगत के चमकीले तारे स्वभाव से शिक्षक आचार्य नरेन्द्र देव ने मत व्यक्त किया कि आसेतु हिमाचल पूर्व में अरूणाचल से पश्चिम में पंचनद तक सटीक नेतृत्व महात्मा गांधी ही देरहे हैं। भारत महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1915 से गांधी निर्वाण 1948 पर्यन्त बहुभाषायी बहुधर्मावलंबी तथा सांस्कृतिक विविधताओं वाले हिन्द को महात्मा गांधी के वैष्णव नेतृत्व ने ही अंग्रेजी राज से मुक्ति दिलायी। महात्मा गांधी की जो मान्यता हिन्द स्वराज - इंडियन ओपीनियन के जरिये अफ्रीका में बीसवीं शती के पहले दशक में अभिव्यक्त हुई तब हिन्द की आबादी आज के एक अरब तीस करोड़ हिन्दुस्तानियों के मुकाबले बहुत कम थी। आज तब के मुकाबले भारत की आबादी पांच गुना ज्यादा है। महात्मा ने हिन्द स्वराज में यूरप की औद्योगिक क्रांति को यूरप के लिये प्रतिकूल बताया। अनेकानेक यूरप के विद्वानों ने महात्मा गांधी की राय को सराहा। यह बात तो एक सौ आठ वर्ष पुरानी है पर महात्मा के निष्कर्ष आज एक सौ वर्ष पश्चात भी मशीन की बढ़त के मामले में शत प्रतिशत प्रासंगिक सामयिक हैं तथा गांधी विचार व गांधी चिंतन शैली ही मनुष्य को मशीन का दास बना देने वाली मनोवृत्ति क्या क्या नये नये रास्ते खोज कर मनुष्य को चौराहे पर लाकर पटक न डाले। डाक्टर जी. रामचंद्रन गांधी विचार के अंग्रेजी भाष्यकार थे रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विश्वभारती शांति निकेतन में अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता थे पर जब रामचंद्रन महात्मा गांधी के पास जाते उनसे हिन्दी में बतियाते थे। गांधी जी के मशीन निरोध पर डाक्टर रामचंद्रन ने अत्यंत उपादेय संवाद महात्मा के साथ स्थापित किया। डाक्टर रामचंद्रन महात्मा गांधी के उत्तरों को सुन कर प्रभावित हुए। उन्होंने महात्मा के विचारों को अंग्रेजी भाषा में सरल सुरूह तरीके से परिभाषित किया। महात्मा ने जो मंतव्य 1904 से 1918 चौदह वर्षों में हिन्द स्वराज के माध्यम से अभिव्यक्ति दी आज सौ वर्ष पश्चात हिन्द की हर व्यक्ति के दो हाथों को काम मुहैया करने वाली मनोभावना को यत्र तत्र दैत्याकार मशीनी प्रयोग से पुरूष और तकनालाजी आने वाले दस वर्षों में बेरोजगारी के महादैत्य का आकार ग्रहण करने ही वाली है। बहुत से विचारकों का मानना है कि तकनालाजी और मशीनी करण का यही क्रम अगर आने वाले दस वर्ष तक चलता रहा बेरोजगारी बढ़ती रही शहरी जीवन का आनंदोल्लास यों ही चलता रहा तो निरंतर बढ़ रही बेरोजगारी उस स्तर तक भी पहुंच सकती है जब भीड़ कानून को अपना बंदी बना लेगी जिसे मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक रूल आफ मॉब कहता है। हिन्द में रामायण में वर्णित राजव्यवस्था को रामराज्य कह कर पुकारा गया। यह आदिकवि वाल्मीकि की रामकथा कल्पना की देन है। रामायण हिन्दुस्तानी कालचक्र प्रवर्तन के अनुसार त्रेतायुग के प्रारंभ में रचित हुआ। भारत का दूसरा महाकाव्य जय भारत - महाभारत कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की रचना है। इन दोनों महाकाव्यों के रचयिता ब्राह्मण नहीं अपने आपको निचली सीढ़ी में बैठा हुआ व्यक्ति मानते थे। वाल्मीकि आदिकवि का श्रेष्ठपद प्राप्त करने से पूर्व एक बहेलिया की जिन्दगी बिताने वाले व्यक्ति थे। वाल्मीकि को भारतीय वाङमय में प्राचेतस कहा। प्राचेतस वह व्यक्ति है जो अपनी चेतना के अभ्युदय से अपने युग के समाज को भी प्रभावित करता हैै। बहेलिया रत्नाकर का वाल्मीकि बनना तथा कालपी के मांझी दासराज के दौहित्र सत्यवती के पुत्र कृष्ण द्वैपायन का वेदों का संपादन करने के साथ साथ हिन्द के जनसामान्य के ज्ञानकोश संवर्धन के लिये पंचम वेद महाभारत की रचना अगर हम आज की दलित अवधारणा को धारण कर सोचें और विचारें तो यह बात साफ हो जाती है कि वाल्मीकि और कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास दोनों ही दलित थे। इसलिये पिछड़े हुए समाज को दलितों महादलितों को उपेक्षणीय नजर से देखना कालचक्र के साथ अनर्थकारी विश्वास भंग का कृत्य है। आचार्य नरेन्द्र देव की सोच श्रंखला को महात्मा गांधी के स्वदेश आगमन सन 1915 में हिन्दुस्तान की जो स्थिति थी जिसका ब्यौरा उन्होंने हिन्द स्वराज के 20 अध्यायों में पूरी पूरी सफाई के साथ दिया। महात्मा की हिन्द स्वराज वाली कल्पना का उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी संत विनोबा भावे व महात्मा के राजनीतिक उत्तराधिकार रखने वाले पंडित नेहरू ने कभी विरोध जाहिर नहीं किया पर महात्मा की कार्यशैली तथा जीवनचर्या के व्याख्याता गुजराती मराठी तथा हिन्दी में अपनी व्याख्या को सजीवता देने वाले काकासाहेब कालेलकर (दत्तात्रेय वामन कालेलकर) ने हिन्द स्वराज के प्रकाशन के ठीक पचास वर्ष बाद 1 अगस्त 1959 में कहा - हिन्द स्वराज में व्यक्त महात्मा गांधी की धारणा व्यावहारिक नहीं है। उसे न तो पंडित नेहरू स्वीकार करते हैं न विनोबा भावे अपने सर्वोदय कार्यक्रम में हिन्द स्वराज की वाणी का सही सही अनुसरण करते हैं। हिन्द स्वराज के बारे में महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरू प्रोफेसर गोखले का कहना था कि हिन्द स्वराज एक मूर्ख रचना है पर महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में एक शब्द भी बदलना स्वीकार नहीं किया न ही अपने राजनीतिक गुरू के कथन को ललकारा। यह भी महात्मा गांधी की सहनशक्ति आचार्य नरेन्द्र देव का मानना है कि वैष्णव विचारधारा ही महात्मा गांधी की शक्ति थी। उनका प्रिय भजन - वैष्णव जन तो तेने कहिअ जे पीर पराई जाणे रे, पराई पीड़ा को समझने व पीड़ा प्राप्त व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखना वैष्णव मत का पहला पाठ है। बड़ा विचित्र संयोग है कि हिन्द की आजादी के लिये भारत के गांव गांव घूमने वाला महापुरूष न तो सन्यासी था न ही उसने सांसारिक कर्तव्य छोड़े थे पर पर जब 1918 में महात्मा ने चंपारण और मुजफ्फरपुर के गांवों में देखा कि लोगों के पास लज्जा ढांकने के लिये भी कपड़ा नहीं है तो उन्होंने तय कर लिया कि वे कम से कम कपड़े पहनेंगे। महात्मा फकीर नहीं थे पर उन्हें देश की गरीबी ने फकीरी की ओर आकर्षित किया और लोगों को ओढ़ी हुई गरीबी की तरफ अग्रसर किया। महात्मा गांधी का सारा राजनैतिक उद्यममूलक विचार जो उन्होंने हिन्द स्वराज में व्यक्त किया वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कोचरब आश्रम निर्माण के समय 1915 में था।
पूरे सौ वर्ष पश्चात हिन्दुस्तान में दूसरा वैष्णव गुजराती भाषी नेतृत्व उभरा है नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के रूप में। उनके राजनीतिक विरोधी राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल के साथ नरेन्द्र मोदी का पीढ़ी अंतराल है। ये दोनों राजनीतिकर्ता विशुद्ध स्वहितकारी राजनीतिक रास्ता अपनाते हैं जबकि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्त्व में वैष्णव उदारता तथा दरिद्र नारायण के प्रति वह सम्मोहन है जो स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी में था। साथ ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्मवाद चिंतन और पंगत के आखिरी गरीब के लिये उसके दोनों हाथों को काम दिला कर उसका योगक्षेम वहन करने का जो संकल्प था उसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय शताब्दी वर्ष में मानवता को निखारने का अवसर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने दिया है। गांधी इस विचार के नहीं थे कि अगर व्यक्ति काम करने योग्य है उसे काम दिया जाये। मुफ्तखोरी न करायी जाये। महात्मा गांधी से वार्धा में एक बार उनके मानसपुत्र तथा गांधी के खजांची जमनालाल बजाज ने कहा - बापू इतना कमा लिया है कि सात पीढ़ी तक का इंतजाम है। महात्मा हंस कर बोले - जमनालाल, सेगांव से जो सड़क पूर्व की तरफ जाती है उसमें दो मील दूरी पर एक बुढ़िया रहती है। जाओ जाकर उसे एक सेर आटा दे आओ। महात्मा जी की आज्ञा जमनालाल टाल नहीं सकते थे। वे आटा लेकर बुढ़िया के पास गये बोेले - माई यह आटा ले लो। बुढ़िया ने कहा - सेठ आज के लिये आटा मेरे पास है मुझे नहीं चाहिये। कल की कल देखूंगी। आप सरीखा दयालु सेठ अपने आप आटा दे जायेगा। एक सेर नहीं आधा सेर से कम आटा चाहिये। सेठ जमनालाल बजाज महात्मा के पास वापस गये और उनसे कहा - बुढ़िया तो आटा लेने से ही इन्कार कर रही है। महात्मा ने जमनालाल बजाज को बुढ़िया के मार्फत सबक सिखाया। ऐसा सबक कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो सिखाता है पर हमारे आज के आर्थिक विशेषज्ञों को अभी यह जानना बाकी है कि करूणा तथा सहानुभूमि के बिना कोई समाज जिन्दा नहीं रह सकता। जब महात्मा गांधी ने हिन्द का नेतृत्व संभाला तब देश की आबादी पचीस करोड़ से कम थी। 1931 की जनगणना के मुताबिक आबादी तीस करोड़ थी। आज आबादी एक सौ तीस करोड़ है। गांधी तीस करोड़ लोगों में से केवल दो तिहाई लोगों याने बीस करोड़ लोगों के चालीस करोड़ हाथों को रोजगार मुहैया कराने का संकल्प लिये हुए थे पर आज के भारत के नेतृत्व नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को 130 करोड़ भारतीयों का योगक्षेम देखना है। नौकरियां कम होरही हैं लोक शंका है कि सन 2024 तक नौकरियों का और टोटा हो जायेगा। जब सब कुछ मशीन ने ही करना है आदमी और औरत क्या करेंगे ? उन्हें कैसे काम दिया जाये ?
बीजू जनता दल के प्रौढ़ सांसद वैजयंत जयपंडा की कल्पना है कि जनहित की नयी सोच का रास्ता अपनाया जाये। वे कहते हैं दशकों की आर्थिक समृद्धि तथा जनहित लोक योजनाओं के बावजूद तीन में से एक भारतीय गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहा है याने वर्तमान के 130 करोड़ जनसंख्या वाले हिन्द में उनकी गणनानुसार 44 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैंं। महात्मा गांधी और उनके आध्यात्मिक व राजनीतिक उत्तराधिकारी संत विनोबा भावे और पंडित नेहरू गरीबी रेखा विचार श्रंखला के समर्थक नहीं थे। गरीबी रेखा सोच तो श्रीमती इंदिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ अभियान की उपज है। आज गरीबी रेखा निर्धारण हुए चार दशक से ज्यादा समय होगया है। गरीब को वे लोग जो गरीबी रेखा आकलन व निर्धारण करते हैं मनुष्य मानने के लिये तैयार नहीं हैं। जिन लोगों के पास अकूत संपत्ति है उनमें करूणा नहीं है। वे चाहे कारपोरेट सेक्टर से जुड़े हों चाहे धन्नासेठ हों राजनीतिक सत्तानशीन हों अथवा नौकरशाह हों पिछले सत्तर वर्षों में सिस्टम फेलियर अपने चरम पर पहुंच चुका है। नौकरशाह तथा राजनीतिक लोकप्रतिनिधि यह मान कर चल रहे हैं कि वे मालिक हैं और देश का सामान्य जन उनका कृपापात्र मात्र है। सातवें वेतन आयोग ने सरकारी क्षेत्र का न्यूनतम वेतन अठारह हजार रूपये माहवारी तय किया है। महंगाई और दूसरे छुटपुट सुविधाओं सहित सरकार की नौकरशाही का अंतिम व्यक्ति पहली जनवरी 2016 के पश्चात माहवारी रूपये 27,000/- अपने घर ले जायेगा जबकि गांवों व शहरों में झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला व्यक्ति रोजाना बीस रूपये भी अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये खर्च करने की स्थिति में नहीं है। अगर परिवार की जनसंख्या केवल पांच भी मानी जाये गरीब आदमी और सुविधा प्राप्त आदमी की रोजाना आमदनी अथवा रोजाना क्रयशक्ति में एक और नौ का अनुपात है। यह स्थिति सबसे निचले स्तर पर है। सरकार में बैठा हुआ नौकरशाह माहवारी अढ़ाई लाख दूसरे भत्तोें सहित लगभग तीन लाख रूपये पाता है। ठीक है वह सरकार को टैक्स भी देरहा है पर उसके घर के प्रत्येक व्यक्ति की आमदनी या क्रयशक्ति पंगत में खड़े आखिरी व्यक्ति से दो हजार गुना ज्यादा है। वैजयंत जयपंडा सांसद हैं उनका कहना है दुनियां के कुछ देश यूनिवर्सल बेसिक इन्कम सिद्धांत के तहत बिना काम किये दाम देने का उपक्रम कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि हम यू.बी.आई. अवधारणा से सहमत हों या असहमत उसकी अनदेखी नहीं कर सकते। न्यूनतम आर्थिक सहायता याने बिना हाथपैर हिलाये मुफ्तखोरी सिखाना फिनलैंड सरीखे देश जहां की आबादी लगभग 55 लाख करेंसी यूरो है। देश का क्षेत्रफल तीन लाख अढ़तीस हजार वर्ग किलोमीटर है, दुनियां के संपन्नतम देशों में है। वह यूनिवर्सल बेसिक इन्कम पेटे मेहनत किये बिना तनख्वाह दे सकता है। कैलिफोर्निया का उदाहरण पंडा महाशय ने दिया है दक्षिण कैलिफोर्निया के लास ऐंजेल्स और उस नगर की काउंटियों में गरीबी, रिहायश राहित्य पर इस ब्लागर ने पूर्व में लिखा है। पूरे संयुक्त राज्य अमरीका की आबादी लगभग बत्तीस करोड़ तथा उस अमीर देश में भी 15.1 प्रतिशत याने हर छटा आदमी गरीबी रेखा से नीचे रह रहा है। पंडा महाशय सिलीकान वैली व कैलिफोर्निया में जिस योजना का उल्लेख कर रहे हैं यह ब्लागर प्रतिवर्ष छः माह दक्षिण कैलिफोर्निया में ही रहा करता है। उन्होंने स्विट्जरलैंड की बात की वहां की आबादी अस्सी लाख तथा क्षेत्रफल 41,293 वर्ग किलोमीटर है। साढे़ सात प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। गरीबी रेखा का मापदण्ड अलग अलग देशोें में अलग अलग है। जहां तक हिन्दुस्तान का सवाल है यह मुल्क आबादी के नजरिये से आज दुनियां का दूसरा मुल्क है जनसंख्या विशेषज्ञों की राय है कि 2050 तक भारत की आबादी चीन से ज्यादा हो जायेगी।
नौकरियों का घटाटोप भारत को बहुत महंगा पड़ सकता है। यहां नौकरियों में आरक्षण भी है। सरकारी नौकरियां धीरे धीरे इतनी कम होरही हैं कि कारपोरेट सेक्टर तथा असंगठित नौकरियों के क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग जोर पकड़ सकती है। यदि कारपोरेट सेक्टर और असंगठित क्षेत्र याने घरेलू नौकरियों में भी आरक्षण शुरू होगया जिसकी संभावना ज्यादा लगती है उस हालात में गांधी की खादी ही एकमात्र ऐसा जरिया है जिससे परिवारों की आमदनी लगातार बनाये रखना संभव है। अमरीका सरीखे विकसित देशों में हाथ कते हाथ बुने सूती कपड़ों की मांग बढ़ रही है जिसे केवल हिन्दुस्तान ही मुहैया कर सकता है। चीन का परिधान व्यवसाय अभी अमरीका ही नहीं हिन्द में भी छाया हुआ है पर चीन की तकनीक महात्मा गांधी की तकनीक का अनुसरण नहीं करती। इसलिये आने वाले जमाने में अगर हिन्दुस्तान के शास्ता गांधी मार्ग का ही अनुसरण करें घर घर में चर्खा तथा हर दसवें घर में हथकरघा पर बुनाई हो सरकार मिल कताई तथा मिल में कपड़ा बुनाई यथावत चलने रहने दे परंतु 1960-61 से पावरलूम का कपड़ा चलन में आया है। उस पर केन्द्र सरकार का कपड़ा मंत्रालय तथा मंत्रिमंडल गहराई से विचार करे। मजूर महाजन संकल्प के पुरोधा रहे गुलजारी लाल नंदा तथा अनुसूया बेन ने अहमदाबाद के मिल मालिकों में जो जागृति पैदा की वह पुनर्जीवित हो यह आज के युग की पुकार है। नौकरियों के क्षेत्र में मशीनीकरण के कारण जो रिक्तता पैदा हुई है उसे भरने का काम केवल गांधी की खादी, पूर्णतया सूती खादी के वस्त्र, ऊनी खादी की कतान चर्खे पर तथा हैंड निटिंग यार्न तैयार कर स्वेटर, पुलोवर, टोपी, दस्ताने, मोजे तथा बच्चों के ऊनी परिधान तैयार करने के काम में लगी महिला श्रम शक्ति को हाथ बुनाई क्षेत्र में प्राथमिकता देना आज की जरूरत है। इसलिये हिन्द के 44 करोड़ लोग जो गरीबी रेखा से नीचे बसर कर रहे हैं उनका योगक्षेम वहन करने के लिये भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को नोटबंदी के साथ साथ सूती खादी, ऊनी खादी तथा रेशमी खादी के कतकर बुनकरों को निरंतर रोजगार मिलता रहे इसके लिये कपड़ा मंत्रालय तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग के बीच ऐसा करारनामा होना ही चाहिये कि दुनियां के हर देश में गांधी की खादी पहुंचे और नौकरियों के उड़नछू होने के बाद भी भारत अपनी हाथों को काम देने वाली गांधी आर्थिकी थिअरी को फिर अपनाये और गांधी की खादी के मार्फत एक अहिंसक दुनियां का संकल्प ले।
यूनिवर्सल बेसिक इन्कम श्रीमंत संपन्न राष्ट्र राज्यों का वैसा उपक्रम है जैसा भारतीय वाङमय आंतर भारती काव्य में राजा भोज द्वारा आशु कविता पाठी कवियों को समस्या पूर्ति संबंधी प्रसंगों में उनके गीत व काव्य के लिये प्रभूत दक्षिणा दी जाती थी पर दक्षिणा पाने वाला व्यक्ति यह संस्कार पालता था कि उसे दक्षिणा मिली है उसके आधे हिस्से पर उन लोगों का पात्राधिकार है जो धनहीन हैं। भारतीय वाङमय दक्षिणा को ज्ञान संकल्प भी मानता है। यूनिवर्सल बेसिक इन्कम का सिद्धांत वहां तो कारगर हो सकता है जहां एक सौ लोगों में सोलहवां हिस्सा याने करीब 6 लोग निष्किंचन हों यदि निष्किंचन जनसंख्या वैजयंत जय पंडा महाशय की धारणा के मुताबिक तीन व्यक्तियों में एक व्यक्ति निष्किंचन हो, दरिद्र हो। हिन्दुस्तान सरीखे 130 करोड़ आबादी वाले राष्ट्र राज्य के लिये यूनिवर्सल बेसिक इन्कम की अवधारणा कामयाब कैसे हो पायेगी ? भारत के 44 करोड़ गरीब लोगों के लिये तो उनके दोनों हाथों को काम दिला कर उन्हें आजीविका का मार्ग प्रशस्त करने वाला महात्मा गांधी का चर्खा कातो, कते सूत को हथकरघा में बुनो। गांधी ने यह नुस्खा सौ वर्ष पहले अपनाया। यह नुस्खा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1915 में जब महात्मा अफ्रीका से हिन्दुस्तान आये। यहां उन्होंने वैष्णवों व जैनियों की आर्थिक सहायता से कोचरब आश्रम स्थापित किया तथा दूधा भाई हरिजन परिवार को कोचरब आश्रम का हिस्सा बना कर अपने स्वधर्म - ग्यारह व्रतों में से महत्वपूर्ण व्रत अस्पृश्यता निवारण को सबसे महत्वपूर्ण व्रत माना। आज सौ वर्ष पश्चात भी मुल्क में वही सभी समस्यायें ज्यों की त्यों मुंह बाये खड़ी हैं जिनका सामना महात्मा गांधी ने अपनी स्थितप्रज्ञता वाले विवेक से संपन्न किया। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी महात्मा गांधी के पश्चात दूसरे हिन्दुस्तानी हैं जिनका स्वधर्म परोपकाराय पुण्याय प्रधान है। उनका कोई भी निजी स्वार्थ नहीं समूची जिन्दगी भारत राष्ट्र राज्य केे एक सौ तीस करोड़ वासियों के योगक्षेम के लिये समर्पित है। महात्मा के पश्चात दूसरे गुजराती भाषी वैष्णव हैं जिनका स्वाभाविक स्वधर्म ‘पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे, वाच काछ मन निर्मल राखे धन धन जननी तेणी रे’। पिछले चौदह सालों से हिन्द के परछिद्रान्वेषी विद्वान निरंतर कोशिश में हैं कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की वैयक्तिक कमजोरियों को खोजें, तिल का ताड़ भी बनायें पर छिद्रान्वेषी विद्वत समाज को जो स्वयं को सर्वज्ञ तथागत बुद्ध मानते हैं न तो गुजरात में ही मोदी को घेर पाये दिल्ली में पिछले अढ़ाई वर्षाें से निरंतर खोजबीन करने के बाद भी उन्हें वैयक्तिक दोष उघाड़ कर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को घेरने का मौका नहीं मिल पाया है यही वैष्णव जन की विशेषता है जो भारत को नयापन देती है। सुनते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका की महत्वपूर्ण पत्रिका टाइम्स वर्ष 2016 का शीर्ष विश्वायतन पुरूष नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को घोषित करने का संकल्प ले चुका है। यह सम्मान केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का ही नहीं हिन्दुस्तानियत का भी सम्मान है। पश्चिम के विद्वान जिस दिन इंडोलाजी का यथातथ्य विश्लेषण कर मैक्समूलर की तरह ऋग्वेद का सांगोपांग प्रकाशन करा लेंगे मैक्समूलर जर्मन थे। संयुक्त राज्य अमरीका के 45वें राष्ट्रपति भी जर्मन हैं। इंडोलाजी के अनुसार जर्मनी भारतीय शर्मणी तथा रूस ऋषि देश है। भारत के नरेन्द्र दामोदरदास मोदी संयुक्त राज्य अमरीका के जर्मन मूल के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा ऋषि देश के वर्तमान राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन नूतन विश्वायतन स्थापित कर सकते हैं। यह त्रिमूर्ति चाइना के शी जिनपिंग को माओ बनने से रोक सकेगी।
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