स्वधर्मे निधनम श्रेयः पर धर्मो भयावहः
क्या धर्म और मजहब क्रमशः स्वधर्म और सामूहिक आस्था के संचय हैं ?
मजहब के नजरिये से पारसीक धर्म या मजहब प्रकृति के मूल तत्वों के नजदीक हैं। पारसीक धर्मावलंबियों ने हिन्दुस्तान को अपनाया जब फारस या परसिया में इस्लाम का उदय हुआ, पारसी या जिन्हें बहुत लोग ईरानी कहते हैं उन्हें हिन्दुस्तान अच्छा लगा। पारसीक मतावलंबियों की मात्रा संसार में अत्यंत न्यून है। जिस दुनियां में ख्रिस्ती धर्मावलंबी अढ़ाई अरब, इस्लाम मतावलंबी एक अरब साठ करोड़ हैं ये दोनों मजहब एक ईश्वर, एक पैगंबर, एक पुस्तक (धर्मशास्त्र की प्रतीक) आधारित हैं इन मजहबों को दुनियां सेमेटिक रिलीजन नाम देती है, हिन्द के उच्चतम न्यायालय सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर ने कहा - उनका मजहब (धर्म) और उनकी ईश्वरीय अवधारणा एकदम निजी और व्यक्तिपरक है श्री कृष्णार्जुन संवाद में कृष्ण ने अर्जुन के सवाल का जवाब देते हुए कहा - सवाल अर्जुन का यह था - व्यानि श्रेणेव वाक्येन बुद्धिम् मोहयसीव मे तदेकम् वद निश्चित्य येन श्रेयोऽस्माप्नुयाम् अर्जुन के सवाल ‘येन श्रेयोऽस्माप्नुयाम्’ प्रमुख है श्री कृष्ण ने कहा - स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मो भयावहः।
न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर का नाम ही महत्वपूर्ण है - स तीर्थ राजो जयति प्रयाग, वह हिन्द के जिस समाज से आते हैं उसमें धर्मपूर्णतः निजी धारणीयता है। धर्म की व्याख्या करती हुए कहा जाता है जिसे धारण किया जाय वही धर्म है। धर्म पूर्णतः व्यक्तिगत अवधारणा है, जिसे जनसामान्य मजहब कहते हैं वह सामूहिकता का प्रतीक है, यह सामूहिकता हिन्द में तीर्थस्नान, शिवालयों सहित सभी मंदिरों में सामूहिक आस्था अथवा जप यज्ञ जिसे सिख धर्मावलंबी जपुजी कहते हैं मसजिद में सामूहिक नमस्या (नमाज) हर रविवार को गिरजाघरों में प्रार्थना तथा हिन्द के लोगों का तिल और गाय के घी का हवन करना ये धर्म के सामूहिक स्वरूप हैं वस्तुतः हर व्यक्ति का स्वधर्म उसे स्वयं ही निश्चित करना होता है वह ईश्वरीय सत्ता को किस रूप में स्वीकार करता है यह व्यक्ति का पूर्णतः निजी प्रसंग है। न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर के स्वधर्म श्रेयस मानने वाले लोग जिन्हें मजहब या रिलीजन के घेरे में रखने वाले लोग हिन्दू कहते हैं, उसे मजहब या रिलीजन के बजाय स्वधर्म कहना ज्यादा उपयोगी है। प्रत्येक व्यक्ति मनुष्य - पुरूष और स्त्री का स्वधर्म अलग अलग जीविताशा है, व्यक्ति ने जिस समूह में जन्म लिया वहां उसे स्वधर्म के रूप में जिन जिन कर्तव्यों का निर्वाह करना होता है वे उसके स्वधर्म या स्वकर्तव्य हैं इसलिये भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने अपने स्वधर्म, अपनी ईश्वरीयता का जो मंतव्य प्रकट किया वह हिन्दुस्तानी परम्परा का प्रतीक है स्वजनों के बीच में ही व्यक्ति को जब वह पिता के संरक्षण में रहता है पुत्रधर्म, जब विवाहित हो जाता है पतिधर्म, जब उसकी संतान पैदा होती है पितृधर्म, यही पट्टी दारी व भाइयों के बीच भ्रातृधर्म, यदि नौकरी करता हो तो भृत्यधर्म, यदि नौकरों से काम लेता हो तो स्वामिधर्म अपने वयोवृद्ध मातापिता की सेवा करने केे लिये पुत्रधर्म, यदि स्त्री हो तो स्त्रीधर्म का निर्वाह करना कर्तव्यपथ है, कर्म भी मानसिक, कायिक तथा वाणी प्रधान होते हैं। खास प्रक्रिया, सोऽहम् तत्व का ज्ञान देहधारी के अपने हृदयस्थ जीवात्मा तथा दृष्टा का एक दूसरे से संबंध व्यक्ति के कर्मपथ का निर्धारण करता है, हिन्दुस्तान में धर्म के सामाजिक स्वरूप में रामचरित मानस का अखंड पाठ, अग्निहोत्रियों द्वारा यजमान के यज्ञ में हवन करना, सामूहिक रूप से आहुतियां होम मंडप में अर्पित करना कीर्तन करना, तथा सामूहिक जागरण तीर्थ में सामूहिक स्नान तथा सहभोज एवं दिवंगत जीवात्मा के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि प्रक्रिया में सामूहिकता, सोलह संस्कारों में सामाजिक साझेदारी ये व्यक्ति कर्म के सामूहिक स्तूप हैं। सांस्कृतिक भारतीय समाज में ‘वित्तशाठ्य’ अपनी संपन्नता का प्रदर्शन गर्हित दोष माना गया है, सबसे बड़ी बात तो यह है कि हिन्दुस्तानी पारम्परिकता का अटूट विश्वास है कि जो जन्मेगा वह मरेगा भी, जिसका आदि होता है उसका अंत भी होगा, यहां तक कि हिन्दुस्तानी समाज वेदों को अपौरूषेय मानता है पर साथ ही यह भी साफगोई करता है कि वेद व वैदिक ज्ञान भी तिरोहित हो सकता है कालांतर में पुनः वैदिक ज्ञान नई चेतना के साथ प्रवेश कर पाता है। वाल्मीकि और वेदव्यास ने रामराज्य और धर्मराज्य की कल्पना की, राजा रामचंद्र के राज्य को रामराज्य कहा कौंतेय युधिष्ठिर के राज्य को धर्मराज्य की संज्ञा दी, रामराज, धर्मराज्य तथा न्यायप्रिय राज व्यवस्थाा को सुराज कहा, इंडोलौजी के सृष्टि के कर्ता कश्यप दिति पुत्रों हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष को भारत का पहला दैत्यराज माना, जिसकी दैत्यधानी वर्तमान उत्तर प्रदेश के हरदोई नामक शहर में थी, तब हरदोई को हरिद्रोही कहा जाता था, महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने दस्युधर्मी राजाओं का उल्लेख करते हुए कहा - ‘दस्यवो रावणादयः’ रावण आदि दस्यु राजा थे इन दस्युओं में हिरण्यकश्यप और वेन का नाम भी गिना जाता रहा है। धर्मराज्य और राजधर्म के अनेक उदाहरण दिये जाते रहे हैं समय समय पर दस्युधर्मी राजा या दस्युधर्मी गणतंत्र प्रमुख भी सत्तानशीन हो जाते हैं इसी को हिन्द का आम आदमी करम गति टारे नाहिं टरी कहता है जो कर्म करोगे उसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा, तीन जनवरी 2017 को भारत के प्रधान न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्ति लेने वाले न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने अपने एक वक्तव्य में कहा - न्यायालय अथवा न्यायमूर्ति रामराज्य नहीं ला सकते, न्यायालय राज नहीं न्याय करता है न्याय तो याचना पर मिलता है भारतीय न्याय मीमांसा अत्यंत उच्च स्तर की है, प्राकृतिक न्याय, स्वाभाविक न्याय के समानांतर योगेश्वर वासुदेव कृष्ण ने अपने सुहृत सखा और भृत्य उद्धव को कहा - सर्वम् न्याप्यम् युक्तिमत्वात् विदुषाम् किं अशोभनम् न्याय क्या है ? कानून नियम अथवा परिपाटी की युक्तियुक्त व्याख्या कर अपनी वक्तृता के द्वारा अपने कथन को न्यायाधीश की स्वीकृति दिलाना ही न्याय पथ है। आज भारत के कानून के अद्वितीय व्याख्याताओं में अग्रणी कानून भाष्कर का स्थान युक्तिमत्ता के साथ अपने कानूनी विवेचन को शीर्ष स्तर पर पहुंचाने की युक्त श्री रामजेठमलानी जी में है। उनके सरीखे दूसरे कानूनविद भी हैं जो अपनी बात को पुष्ट करने के लिये प्रमाणों का ढेर लगा देते हैं तथा न्यायमूर्ति जो न्यायकर्ता हैं उन्हें अपनी वक्तृता तथा व्याख्या से प्रभावित कर न्यायालय का निर्णय अपने याची के पक्ष में प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। रामराज्य को राज्य करने वाला राजतंत्र को चलाने वाला व्यक्तित्त्व ही करेगा, भले ही आज के डैमोक्रेसी के जमाने में राजसत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है फिर भी अपनी योग्यता तथा प्रत्युपन्न मति के प्रभाव से शासन करने वाला व्यक्ति रामराज्य की स्थितियों को उत्पन्न कर सकता है। न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर ने अद्वितीय बात कही - न्यायकर्ता न्यायमूर्ति तो विशेषज्ञ वकील के तर्कों के आधार पर जो बिन्दु उन्हें सटीक लगते हैं उनको आधार मानते हुए अपना फैसला देता है। न्यायमूर्ति शासन नहीं करता वह तो याची की प्रार्थना पर अनुकूल या प्रतिकूल निर्णय देकर कर्तव्यनिष्ठा का प्रदर्शन करता हैै, तुलसीदास ने वेदव्यास के इस शब्द सर्वम् न्याय्यम् युक्ति मत्वाय् विदुषाम् किं अशोभनम् को अवधी में अपने रामचरित मानस में कहा - समरथ को नहिं दोस गुसाईं।
राजधर्म का यथातथ्य निरूपण आचार्य चाणक्य ने अपने कौटिलीय अर्थशास्त्र में किया है। किसी कुशासन को किस प्रकार निष्क्रिय किया जा सकता है चाणक्य की नीति, उनके विभिन्न सूत्र तथा कौटिलीय अर्थशास्त्र में गणतंत्र तथा उस युग में भारत में गांव गांव के पंचायती राज, पंचायती राज के महानुभावों द्वारा एक दूसरे से उद्दीप्त शत्रु भावना ने मगध नरेश जरासंध के गणतंत्र प्रमुखों की लोकहित प्रतिकूलता के प्रति आकर्षित होने से गणप्रमुखों को राजनीतिक कैदियों के रूप में राजगीर में एक बहुत बड़ी बन्दीगृह में निरूद्ध कर डाला था। आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के परम पारंगत वासुदेव श्रीकृष्ण ने अपने सखा उद्धव से कहा - उद्धव तुम में देवगुरू बृहस्पति सरीखा ज्ञान स्त्रोत है तुम बताओ जरासंध सरीखे महान योद्धा जिसकी युद्ध कौशलता ने मुझे रणछोड़ बना कर द्वारका जाने के लिये प्रेरित किया उस महाबली जरासंध जिसने समूचे भारत के पंचायती प्रमुखों को अपना बंदी बना कर राजगीर के कारागार में बंद कर दिया है उसे किस तरह फतह किया जाये उद्धव ने योगेश्वर वासुदेव कृष्ण से कहा - कृष्ण जरासंध का वध सरल नहीं है, जरासंध केवल भीम से हार सकता है पर जरासंध से आपको युद्ध की भीख मांगनी पड़ेगी श्रीकृष्ण को बात जंच गई उन्होंने भीम अर्जुन और स्वयं को ब्राह्मण के वेष में भिक्षार्थी के रूप में राजगीर में मगध नरेश के राजप्रासाद में प्रवेश किया और युद्ध भिक्षा मांगी, वीर जरासंध ने भिक्षा देना स्वीकार करते हुए कृष्ण से कहा - रणछोड़ कृष्ण तुम और अर्जुन योद्धा नहीं हो, जरासंध भीम को वीर योद्धा मानता है भीम से मैं गदा युद्ध कर सकता हूँ। राजनीतिज्ञ कृष्ण का उद्देश्य हजारों गण प्रमुख जो जरासंध के कारागार में रखे गये थे उन्हें मुक्त करने का रास्ता निकाला, जरासंध की राजकरण शैली का गहन अध्ययन मगध राज्य व राजाश्रयी सत्ता को स्थापित करने के लिये चाणक्य ने यह सुनिश्चित किया कि गणतंत्र शैली के बजाय राजतंत्र शैली को अपना कर ही वे नंद वंश का विनाश कर लोकोपकारी राजसत्ता का श्रीगणेश चंद्रगुप्त मौर्य को राज्याभिषेक संपन्न कर भारत में राजसत्ता को नया निखार देंगे जिस तरह अगले वर्ष के पहले महीने की तीन तारीख जनवरी को हिन्द के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सेवानिवृत्त होरहे हैं उन्होंने धर्म और रामराज्य के बारे में बेदाग टिप्पणी कर स्वधर्म का निर्वाह किया है, यह जरूरी नहीं कि उनके उत्तराधिकारी नये चीफ जस्टिस भी उनके विचार का अनुमान करेंगे यही ध्वन्यालोक की भिन्न रूचिर्हि लोके - संसार में अलग अलग लोगों की अलग अलग रूचियां होती हैैं। इसलिये वर्तमान काल में कालेजियम और भारत सरकार के कानून मंत्रालय में जो दृष्टिभेद है, एमओपी पर दोनों पक्षों के अपने अपने विचार हैं जिनमें वैचारिक संघर्ष के कारण निर्णय नहीं हो पारहा है यही कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके का प्रत्यक्ष उदाहरण है प्रत्येक व्यक्ति स्वधर्म के समानांतर स्वकर्म फल भोक्त भी है केवल पारब्रह्म परमात्मा को कर्म करने के बावजूद कर्मफल मुक्ति का स्वाद - सुख या दुःख के रूप में नहीं भोगना पड़ता यही ईश्वर और उसकी प्रतिकृति मानव में फर्क है, ईश्वर को अपने तथा अपनी सृष्टि के हर प्राणी का भूत वर्तमान व भविष्य पता है पर मानव विस्मृति के तालाब में लहरेें लेता रहता है उसे अपने पूर्वजन्म की याद नहीं यदि याद होती तो शायद स्थितियां बदल जातीं ‘विस्मृति आ अवसाद घेर ले नीरवते बस चुप करदे’ इस गीत को स्वातंत्र्यवीर बालकृष्ण शर्मा नवीन गुनगुनाते, यह गीत उन्हीें की रचना थी, पंडित नेहरू, बालकृष्ण शर्मा नवीन के काव्य से प्रभावित थे, नीरवते बस चुप करदे सुनना उन्हें बहुत पसंद था।
ज्ञातव्य है कि सोवियत संघ के बिखराव ने रूस की मजहबी और सांस्कृतिक विशेषता ने पिछले पच्चीस वर्षों की अनेकानेक उठापटक के बावजूद पुतिन केे नेतृत्व में रूस जिसे भारतीय वाङमय ऋषि देश मानता है, दुनियां की वैश्विक राजनीति में अंगद का पांव रख दिया है। जिस संयुक्त राज्य अमरीका ने मात्र 157 साल पहले दासप्रथा मुक्ति अमरीकी नागरिकों में बराबरी का उद्घोष कर महामानव अब्राहम लिंकन ने मानवीय आदर्श का निखार किया स्वयं आत्मबलिदान कर हजारों हजार लोगों को सिविल वार में जीवन गंवाना पड़ा नस्लभेद का डंका नवनिर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति का पद जनवरी 2017 में ग्रहण करने वाले महाशय डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीकी मतदाताओं में नस्लभेद को पुनर्जाग्रत कर डाला, ट्रंप जिस तेजी से अपनी राह सुरूह करने में लगे हैं उससे प्रतीत होता है कि नया विश्वायतन सुनिश्चित करने में ट्रंप को अमरीकी श्वेत समुदाय ने जो हरी झंडी दिखाई है. दुनियां के वामपंथी चिंतक यह मानते हैं कि ट्रंप - पुतिन - मोदी की त्रिपुटी दक्षिणपंथी राजनीति का चरम है, अमरीका के समृद्धतम व्यापारी रहे डोनाल्ड ट्रंप ने घोषित किया है कि वे अब व्यापार में न लौट कर अमरीका को उसका वह शीर्ष स्थान पर बैठायेंगे जिससे विश्व में संयुक्त राज्य अमरीका अपनी पूर्व प्रतिष्ठा को पुनः प्रतिष्ठित कर सके, Climate Change पर पेरिस में संपन्न वैश्विक सम्मेलन के निर्णयों से संभवतः महाशय डोनाल्ड ट्रंप हाथ खींच लें पर भारतीय वाङमय के अनुसार मेष संक्रांति और तुला संक्रांति को दिन रात बराबर होते हैं आज जैसी स्थिति है उसके मुताबिक अगली मेष संक्रांति 21 मार्च 2017 को होनी चाहिये। ट्रंप - पुतिन - मोदी की त्रिमूर्ति को विचार करना चाहिये कि मेष संक्रांति निर्धारण के साथ साथ जलवायु परिवर्तन के प्रसंग को कालचक्र प्रवर्तन से जोड़ कर देखा जाये। सूर्य का उत्तरायण होना बजाय 14 जनवरी 2017 के 22 दिसंबर 2016 को सुनिश्चित किया जाये। हिन्द के राष्ट्रीय पंचांग का जो स्वरूप आचार्य नरेन्द्र देव ने पंडित नेहरू को सुझाया भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री घटक राज्य मुख्यमंत्रियों तथा भारत के विभिन्न पंचांग निर्माताओं से परामर्श कर राष्ट्रीय पंचांग को नया निखार दें। पंचांग सुधार आंतर भारती का महत्वपूर्ण बिन्दु है।
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