Wednesday, 28 December 2016

क्या दीदी ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेसियों (तिनका घास) का ताजा अभियान मोदी हटाओ देश बचाओ का नया नारा दीदी को दिल्ली पहुंचायेगा ?
          दीदी ममता बनर्जी का ताजा नारा - अखिल भारत कांग्रेस कमेटी से छिटक कर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जननी का उत्तेजना फैलाने वाला मोदी हटाओ देश बचाओ वाला नारा बीसवीं शताब्दी के इंदिरा कांग्रेस की याद ताजा करा रहा है। सिंडीकेट और पुरानी कांग्रेस के नेता कहते थे इंदिरा हटाओ देश बचाओ। इंदिरा गांधी का नारा था - गरीबी हटाओ। गरीबी हटाने के नारे से ही इंदिरा जी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और संविधान निर्माताओं ने आजादी के वक्त और भारत का संविधान तैयार करने में लगभग पौने छः सौ रियासतों के राजा नवाबों को ‘प्रिवीपर्स’ उन राजकुलों ने भारत संघ में अपना विलय किया था। इंदिरा जी के पिता श्री पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने रियासतों के मालिकों को प्रिवीपर्स (पेंशन) देकर उनके सम्मान को बरकरार रखा बहुतों को राजप्रमुख गवर्नर भी नियुक्त किया गया पर इंदिरा जी ने अपने पिता द्वारा दिये गये आश्वासन का वचन भंग कर लोकतांत्रिक सरकार के बजाय 1971 से आगे 1976 तक किचन केबिनेट वाली सरकार चलाई। देश में आपातकाल भी लागू हुआ। 1969 से लेकर 1976 तक देश की जनता और शासकदल के इंदिरा प्रशंसकों ने इंदिरा हटाओ देश बचाओ अभियान को नेस्तनाबूद कर डाला। जब कांग्रेस की टूटन हुई वह अखिल भारतीय टूटन थी। उसमें पश्चिम बंग सहित भारत के सभी घटक राज्यों के कांग्रेसी दो खेमों में बंट गये थे। यह ब्लागर स्वयं इंदिरा गांधी की आपातकालीन राजनीति का समर्थक नहीं घोर विरोधी था। इंदिरा जी ने अपने विरोधियों को चुन चुन कर बन्दी बना डाला था। इंदिरा जी को कांग्रेस के टूटन के बाद भी अधिसंख्य कांग्रेसी लोगों का समर्थन था। तत्कालीन भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने भी इंदिरा जी का साथ दिया। इंदिरा गांधी को भारतीय राजनीतिक क्षितिज से उनके प्रारब्ध ने हराया उनके विरोधियों ने नहीं। पिछले सत्तर वर्षों में हिन्द को दो ही राजनीतिक हस्तियां मिलीं जिनका आत्मबल अत्यंत उत्कृष्ट रहा। यह ब्लागर पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी तथा फिरोज गांधी के व्यक्तित्त्वों को नजदीक से तटस्थता पूर्वक जानने का प्रयासी रहा है। स्तुति और निंदा से निरंतर परहेज करते हुए इस ब्लागर की मान्यता है कि पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी व फिरोज गांधी की अपनी अपनी विशिष्टतायें थीं। फिरोज के समर्थक नेहरू कालीन कांग्रेस के हाई कमान का हिस्सा माने जाने वाले पंडित पंत ने फिरोज की राजनीतिक कला को चमकीला नक्षत्र बनाया। फिरोज मद्यप थे पर पंडित पंत यह बात सुनने को ही तैयार नहीं थे कि फिरोज भयंकर शराबी है क्योंकि फिरोज जब कभी पंडित पंत के घर जाते तीन दिन से मद्यपान छोड़ कर ही पंडित पंत से मिलते। उनके रसोढ़े में पूर्णतः शाकाहारी बिना प्याज लहसुन वाला भोजन करते। फिरोज गांधी की राजनीतिक रणनीति भ्रष्टाचार को उखाड़ने में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि वाली विवेक शक्ति थी। फिरोज की अपनी राजनीतिक पहचान थी। उन्हें पंडित नेहरू के दामाद होने इंदिरा गांधी के पति होने से राजनीति दक्षता नहीं मिली उनके अपने राजनीतिक विवेक ने पंडित पंत के गृह मंत्रित्वकाल में 1955 से लेकर फिरोज गांधी के दिवंगत होने तक हिन्द की पार्लमेंट में फिरोज के बयान आकर्षक हुआ करते थे। फिरोज के पुत्र प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा पौत्र राहुल गांधी में वक्तृता का वह ओज नहीं है जो फिरोज गांधी में था। फिरोज गांधी कांग्रेस पार्टी के सांसद थे पर सरकार का हिस्सा नहीं थे। लोकसंग्रह की राजनीति करते थे। फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी दोनों ही स्वतंत्रता सेनानी थे बर्तानी जेल यात्री भी थे। इंदिरा जी ने आपातकाल में हजारों हजार लोगों को निरूद्ध कर जेल की सीकचों में रखा पर किसी भी वक्त यह नहीं कहा कि वे अमुक व्यक्ति को जेल भेज देंगी। स्वाधीन भारत के स्वाधीनोत्तर वर्षों में जन्मे वर्तमान में दो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल रस्सी बांध कर अथवा कालर पकड़ कर जेल की सैर कराना चाहते हैं। एक पूर्व मुख्यमंत्री ने राजा भद्री के पोते समाजवादी नेता राजा भइया को सीना तान कर कहा - राजा भइया की सही जगह जेल में है। यह बहुत बड़ा राजनीतिक फर्क हिन्द की राजनीति में आया है। जहां मुख्यमंत्री जो क्षेत्रीय क्षत्रप सुप्रीमो किस्म के स्वयंभू तरीके के आत्म नियुक्त सर्वे सर्वा हैं वे डंके की चोट पर कह रहे हैं। अपने विरोधियों को कालर पकड़ कर कमर में रस्सी बांध कर जेल की हवा खिलायेंगे। पश्चिम बंग की आत्ममुग्ध स्वनिर्मित सुप्रीमो क्षत्रप दीदी ममता बनर्जी का प्रभामंडल लगभग नवासी हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की 2011 की जनगणनानुसार सवा नौ करोड़ की आबादी तक सीमित है तथा भारत की लोक सभा में पश्चिम बंग के लोकसभा सदस्य संख्या 42 सामान्य 30 अ.जा 10 अजजा 2 राज्यसभा 16 तथा विधानसभा 294 में से आल इंडिया तृणमूत्र कांग्रेस की सुप्रीमो दीदी ममता बनर्जी में वह शक्ति संपात हो कि इंडियन नेशनल कांग्रेस को वे आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में उसी तरह बदल डालें जिस तरह श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1969 में इंडियन नेशनल कांग्रेस को इंदिरा कांग्रेस का बाना पहना कर दो बार भारत पर एकच्छत्र निष्कंटक राज किया। ऐसा प्रतीत होता है कि सुश्री ममता बनर्जी अखिल भारतीय नेतृत्व का जो दिवास्वप्न देख रही हैं वह नोटबंदी के विफल हो जाने के बावजूद भी उन्हें दिल्ली का राज्य नहीं दिला पायेगा। उसके अनेक हेतु हैं पहला आल इंडिया तृृणमूल कांग्रेस वर्तमान में पूर्णतः क्षेत्रीय एक व्यक्ति आधारित सप्रीमो शैली का राजनीतिक दल है, उनको दिल्लीश्वरी बनने से रोकने में इंडियन नेशनल कांग्रेस के उपाध्यक्ष्य राहुल गांधी दिल्ली के मुख्यमंत्री तथा आआपा के संयोजक अरविन्द केेजरीवाल तथा नोटबंदी के आकंठ विरोधी बहन मायावती तो तीन मुख्य दावेदार है जो दिल्लीश्वर बनना चाहते हैं। वे बिहार के मुख्यमंत्री बाबू नितीश कुमार को धोखेबाज कहने से भी परहेज नहीं करतीं। बिहार के लौहपुरूष ने कानून विशेषज्ञ रामजेठा मलानी को राज्यसभा भेजा ही इसलिये है कि अगर भाजपा टूट गई दोफाड़ या तीनफाड़ होगई लोकसभा में जननेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को 272 वाला लोकसभा सदस्य अपने अपने खेमे में नहीं रख पाये 272 जेठामलानी की मदद से लालू प्रसाद यादव भी भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। वे और मुलायम सिंह यादव भारत के पिछड़़ों की बड़ी जमात अहीर गोपग्वाल वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजनीतिक उधेड़बुन में सभी मोदी विरोधी एक भी होगये तो भी लालू यादव के मतानुसार यादवी संघर्ष इसलिये यह सोचना कि सभी मोदी विरोधी ममता दीदी की हिन्द सदारत स्वीकार कर लेंगे यह प्रसंग अत्यंत पेचीदा है। सवाल उठता है कि ममता दीदी के दिमाग में मोदी हटाओ बीजमंत्र उन्हें कितना फायदा पहुंचा सकता है। ममता दीदी बहन मायावती अरविन्द केजरीवाल राहुल गांधी के सुर में यदि उद्धव ठाकरे चंद्रबाबू नायडू भी खड़े होगये तथा ममता बनर्जी को कोई अदृश्य शक्ति की दिल्लीश्वरी बनने मे भले ही काम याब हो जाये खुले तौर पर तो यही दीखता है कि आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव तथा पश्चिम बंग के आगामी विधानसभा चुनाव में ममता दीदी की संख्या कम होने ही वाली है। वे भले ही सत्ता में पश्चिम वर्ग में बनीं रहें पर उनके लोकसभा व विधानसभा सदस्यों में इजाफा होने के बजाय कांग्रेस व वामदलों को दिखाउ व भाजपा को मुख्य विरोधी दल बनने से न तो ममता दीदी रोक पायेंगी न कांग्रेस या साम्यवादी दल ही भाजपा की बढ़त को रोक पायेंगे। सुश्री दीदी ममता बनर्जी को मिली विजय श्री ने इंडियन नेशनल कांग्रेस मार्क्सवादी कम्यूनिस्टों तथा अन्य वामपंथियों के समूह को ममता दीदी ने प्रभाहीन बना डाला पर सर आशुतोष मुखर्जी जो कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे कोलकाता से दिल्ली जाते समय त्रिवेणी में आते जाते स्नान अवश्य करते उनके यशस्वी पुत्र डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जो आजाद भारत के प्रथम नेहरू मंत्रिमंडल में सदस्य थे अपनी धाराप्रवाह हिन्दी भाषण शैली से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते रहते थे। मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद सोमनाथ चाटुर्ज्या के प्रातःस्मरणीय पिता निर्मल कुमार चाटुर्ज्या हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे। सोमनाथ चटर्जी जब स्पीकर हुए उन्हों हिन्दुत्ववादी तत्वों को भी उतनी ही महत्ता दी जितनी वे भारत के सेकुलरों को देते थे। बंगला देश में घट रही घटनायें हिन्दू मंदिरों को जलाना पश्चिम बंग की उस नागरिक समाज को प्रभावित करने वाला ही है वह ममता दीदी के बंगला देश से अवैध रूप में भारत में घुसे हैं। उनकी सही सही संख्या संभवतः ममता दीदी को मालूम हो मीडिया को मालूम नहीं। हर अवैध बंगला देशी प्रवासी नकली नोटों का धंधा भी करता है। ममता दीदी की ताकत ही भारत में सामान्य तौर पर पश्चिम बंग में विशेष तौर पर बंगला देशी लोगों को जो हुजूम है उसका समर्थन जब तक दीदी ममता करती रहेंगी वे दीदी का साथ देते रहेंगे। दीदी नोटबंदी मुहिम चलाती रहेंगी अगर बंगला देश के आगामी चुनाव में जब अवैध तरीके से पश्चिम बंग में घुसे बंगला देशी इस नतीजे पर पहुंच जायेंगे कि उनका हिन्द विरोधी अभियान लड़खड़ा रहा है, ममता दीदी को मिलने वाला समर्थन लुप्त हो जायेगा। कहीं ऐसा न हो कि ममता दीदी की क्रोधाग्नि में बंगला देश की चीन से नजदीकी और चीन का हिन्द महासागर में हिन्द के बजाय स्वयं पूर्व में बंगला देश तथा पश्चिम में चीन पाक आर्थिक गलियारा इकहरा गलियारा नहीं दुहरा गलियारा तथा कश्मीर घाटी के दो राजनीतिक कुनबों अब्दुला कुनबा और मुफ्ती कुनबा का कश्मीर की आजादी चाहने वाले हुर्रियत के प्रति बदला हुआ फारूख अब्दुल्ला का बयान और महबूबा मुफ्ती का अलगाव वादियों के परिजनों के प्रति मानवीय सहानुभूति को कई राजनीतिक विश्लेषक भारत विभाजनजन्य विभीषिका का सत्तर पचहत्तर वर्ष पश्चात नया उफान भी करार देरहे हैं। महबूबा मुफ्ती कहती हैं कि वैश्विक बाजार तकनालाजी के यत्र तत्र सर्वत्र अपने पांव पसारने के अभियान ने राष्ट्र राज्यों की भौगोलिक अथवा राजनीतिक सीमा को अर्थहीन बना डाला है। प्रकारान्तर से वे कह रही हैं कि समूची पृथ्वी वसुधैव कुटुम्बकम् के हिन्दुस्तानी पारंपरिक आदर्श को ओर मुड़ चुकी है। इतना सब होते हुए भी राष्ट्रवाद अथवा नस्लवाद भी अपना सिर ऊँचा उठा रहा है। 
          महाशय चेतन भगत आधुनिक हिन्दुस्तानियों के पसंदीदा अंग्रेजी लेखक हैं जिनकी स्वभाषा या मातृभाषा अंग्रेजी नहीं भारतीय भाषा है। उन्होंने अपने ताजा लेख The 3 New ‘1’ of Indian politics intension initiative and ideas Netas do not require anything more in a post truth environment. Chetan Bhagat in his 19 point definition concludes the true economic benefits of the demonitisation exercise will be limited, however, none of this reality in terms of the political impact on BJP and Prime Minister Narendra Modi for politically the move is a major hit.  
          भारत के 130 करोड़ वासियों में से मोटे अनुमानों के मुताबिक करीब करीब बारह फीसदी लोग रोमन लिपि व भारत के पूर्ववर्ती शासक अंग्रेजों की भाषा अंग्रेजी जो वस्तुतः एक व्यापारिक भाषा है उससे जुड़ने के कारण भारत के विशेष समाज मैकोलाइट अंग्रेजीदां भारतीय भद्रलोक पुंज हैं। इस अंग्रेजीदां भद्रलोक का विवेक अंग्रेजी भाषा के जरिये ही अभिव्यक्त होता है। यही समाज हिन्दुस्तान का संचालन कर रहा है। स्वातंत्र्योत्तर सत्तर वर्षों में जहां 1947 में लगभग एक प्रतिशत हिन्दुस्तानी याने ब्रिटिश भारत के अंग्रेजीदां भद्रलोक की ज्यादा संख्या बाम्बे प्रेसीडेंसी मद्रास प्रेसीडेंसी तथा बंगाल प्रेसीडेंसी में थी केवल कुछ खास लोग ही अंग्रेजी पढ़ना लिखना तथा अंग्रेजी में बोलना जानते थे। देश की जनसामान्य की भाषायें ब्रिटिश भारत में वह महत्ता नहीं पा सकीं जो सैकड़ों देशी रियासतों राजा व नवाब हिन्दुस्तानी भाषाओं के जरिये लोकशासन चलाते थे। पिछले सत्तर वर्षों में अंग्रेजी का वर्चस्व निरंतर बढ़ता रहा है। भारतीय भाषायें अंग्रेजी की चेरी बन कर रह गई हैं। लगभग सोलह करोड़ भारतीय आज अंग्रेजी की गिरफ्त में हैं। अंग्रेजी बोलना सिखाने वाले गुरूओं का मत है कि वे ज्यादा से ज्यादा नब्बे दिन में कम से कम 30 दिन में व्यक्ति को धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने में दक्ष बना देंगे।
          हिन्द में पिछले सत्तर वर्षों में पंडित और नेता इन दो शब्दों की शाब्दिक कीमत घट गई है। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में अर्जुन से कहा था - विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी, शुनि चैव श्वपाके च पंडितः समदर्शिनः। अर्थात पंडित वह है जो समदर्शी है किसी को वीआईपी और अन्य को मामूली आदमी मान कर परमात्मा की सृष्टि में हरेक को समदृष्टि से देखता है। पंडित शब्द अंग्रेजी कोषकारों ने भी अपना लिया है। कश्मीरी पंडितों को बीसवीं शती के अंतिम दशक में जो लोक शासन व्यवहार भुगतना पड़ा उससे पंडित समाज की पीड़ा अभिव्यक्त हुई। आज आप हिन्द के शहरों, गांवों, मुहल्लों में कहीं भी जाइये पंडित शब्द अवहेलना ग्रस्त है। उसी तरह पिछले सत्तर वर्षों में नेता शब्द भी अपनी कीमत खो चुका है। ये दोनों शब्द हिन्द की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण थे। समय बदला इन शब्दों ने अपनी ख्याति खो डाली। अपने महत्वपूर्ण स्तंभ में महाशय चेतन भगत अर्थशास्त्रियों तथा विशेषज्ञों के मत का निरूपण करते हैं और कहते हैं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों ने विमुद्रीकरण की मुहिम पर प्रश्नवाचक ? सवाल खड़ा करते हुए एक हजार और पांच सौ रूपयों के नोट जो पूरी करेंसी के 86 प्रतिशत थे उनको चलन से बाहर कर देना तर्कसंगत नहीं माना है। यद्यपि अंग्रेजीदां भारतीय भद्रलोक समूह महाशय चेतन भगत की अंग्रेजी अभिव्यक्ति के प्रशंसक हैं यह प्रतीति नहीं हो पाती है कि क्या चेतन भगत जो भारत के उस हिस्से से आते हैं जिसे कभी मगध कहा जाता था तथा पौराणिक भारत के इतिहास का जरासंध युग और उसके अढ़ाई हजार संवत्सरों के उपरांत चाण्क्य निर्मित मगध जो स्वयं गंगा तट पर दीप जला कर साहित्य सृजन करता था जिसने जरासंध युग के पंचायत राज प्रमुख गणतंत्रों के हजारों प्रमुखों (जिन्हें तब लोग राज या राष्ट्रपाल कहते थे) उन्हें राजगीर के कैदखाने में बंद करने आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के पक्षधर योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया और अपने सखा उद्धव को जरासंध निग्रह का कर्तव्य संपन्न करने को कहा। उद्धव ने श्रीकृष्ण से कहा - जरासंध महान वीर है उसे हराना या मारना दुष्कर है। उसका सामना केवल भीम कर सकता है पर इस कृत्य के लिये आपको छल प्रपंच कर भिखारी वामन के तौर पर जरासंध से युद्ध भिक्षा मांगनी होगी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गणतंत्र या लोकतंत्र के बदले राजतंत्र को वरीयता देकर चंद्रगुप्त मौर्य को पाटलिपुत्र में मगध के नरेश के रूप में राज्याभिषेक भारतीय इतिहास की अद्भुत घटना है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र डैमोक्रेसी या लोकतंत्र में भी काम का हो सकता है। आज हिन्द की राजनीतिक तथा आर्थिक जरूरत सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिये भारतीय भाषाओं के भक्तिकालीन साहित्य का पुनर्वाचन करना होगा। महाशय चेतन भगत सरीखे लोकप्रिय हिन्दुस्तानी अंग्रेजी या हिंग्लिश रचनाकर्ता समाज को यदि वह संस्कृत पढ़ा हो कम से कम एक दफा भर्तृहरि के नीतिशतक श्रंगारशतक तथा वैराग्यशतक का वाचन करे यदि संस्कृत भाषा का ज्ञान सीमित है तो चेतन भगत सरीखे अंग्रेेजीदां भद्रलोक पुरूषों या महिलाओं के गंगा यमुना के मैदान कौशल मालवा आदि जहां जहां गांव के लोग भरथरी गाते हैं वह श्रौत विधा है उसे कम से कम दो बार सुनें समझें तथा राजा भर्तृहरि का लोकसंग्रह कितना जबर्दस्त था इसका अनुशीलन करें। इसका तात्कालिक लाभ यह होगा कि हिन्द का अंग्रेजीदां भद्रलोक देहाती गीतों का मर्म समझ सकेगा। महाशय चेतन भगत भी दूसरे स्तंभकारों की तरह व्यवहार करने में अग्रणी होरहे हैं। हिन्दुस्तानी गांवों का लोकगीत लुप्त न हो जाये इसके लिये अंग्रेेजी स्तंभकारों को ही आगे आना होगा ताकि इस्लामी व अंग्रेजी सल्तनत काल खंड में हिन्द में जो लोकसाहित्य सामने आया उसे समझने की कोशिश की जाये। अवधी भाषा में दो महत्वपूर्ण ग्रंथ - तुलसी का रामचरित मानस लिपि नागरी भाषा अवधी तथा मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत महाकाव्य भाषा अवधी लिपि फारसी को सरसरी नजर से भी पढ़ा जाये तो भी हिन्द की जीवन शैली से आप अपना नाता जोड़ सकते हैं। चेतन भगत फरमाते हैं नोटबंदी के सही सही आर्थिक लाभ बहुत थोड़ी मात्रा में होने वाले हैं। उनका मत है कि नोटबंदी का राजनीतिक असर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर ज्यादा होगा। चेतन भगत सरीखे लोकप्रिय हिंग्लिश साहित्य निर्माता राजनीतिक व्याख्याकार का रूतबा अपनाना चाहते हैं। स्थितियां वहीं होती हैं जिनके लिये ममता दीदी छटपटा रही हैं। पश्चिम बंग के तिनका मूल कांग्रेसयों का आह््वान कर रही है बंग के तिनकामूलियों उठो जाग्रत होकर मोदी हटाने और देश संभवतः उनका मानसिक आशय बंगला देश के पश्चिम बंग में यत्र तत्र सर्वत्र फैले हुए आतंकमूर्तियों को जो फेक करेंसी धारक हैं उनका योगक्षेम देखना मात्र है। देश के वे लोग जो अनर्जित धन पर यकीन नहीं करते उन्हें ऊहापोह में पड़ने के बजाय यदि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की नोटबंदी मुहिम आज तुरंत नहीं आने वाले दस वर्षों में हिन्द का राजनैतिक और प्रशासनिक रोडमैप बदल कर अगर हिर हिन्दुस्तानी सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःख माप्नुयात् का रामराज की स्थितियां हिन्द में लाई जा सकीं कि नहीं हिन्द का सुप्रभात होगा। प्रधानमंत्री मोदी अगर सफल होगये उन्हें अपने प्रत्यक्ष शत्रुओं ममता माया केजरीवाल राहुल गांधी सहित अपने उग्रविरोधियों और भारत के कोने कोने में फैले अपने प्रच्छन्न विरोधियों के लिये भारत की राजधानी दिल्ली में निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय का अनुशीलन कर भारतीय जनता पार्टी के अंदर देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियों में अपने उग्र विरोधियों का स्वागत करते हुए भारत में रामराज्य की नींव को वहीं संबल देना चाहिये जो चक्रवर्ती राजा दशरथ के यशस्वी पुत्र दाशरथि राम ने साकेत सहित अयोध्या की गली गली मोहल्ले दर मोहल्ले घूम कर यह पता करना चाहा था कि राम के राज्य के प्रति जन आक्रोश क्या है ? जब राम ने सुना - कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने भागवत महापुराण के नवें स्कंध के ग्यारहवें अध्याय रामोपाख्यान में व्यक्त किया -
कदाचित् लोक जिज्ञासु गूढ़ो राज्यामलसितः चरन वाकोऽश्रगोद् रामो भार्याम् उद्देश्यकस्यचित् ना हम् विधामि त्वां दुष्टाम् असतीं परवश्यगाम स्त्रीलोभी विभ्रयात् सीतां रामो नाहम् भजे पुनः इति लोकात् बहुमुखाद् दुराराध्यदसंविदः पत्याभीतेन उनात्यक्ता प्राप्तः प्राचेतसाश्रमम्। 
योगवसिष्ठ में राम वसिष्ठ संवाद में कहा गया है कि राम ने वसिष्ठ से प्रार्थना की कि मुझे सीता सहित वन जाने की इजाजत दें। वसिष्ठ ने कहा - राम लोकमत तुम्हें ही राजा चाहता है मैं लोकमत के खिलाफ नहीं जा सकता हूँ। तुम्हें राज्याभिषेक करना ही होगा। राम ने वसिष्ठ से कहा - तब मुझे इजाजत दीजिये कि सीता का परित्याग करूँ। वसिष्ठ ने अरून्धति से पूछा अरून्धति ने सीता त्याग की अनुमति नहीं दी पर राम ने राजधर्म निभाया व लोकमत का आदर किया।
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