Thursday, 29 December 2016

क्या बंगाली नेशनलिज्म ममता दीदी का भी अभिप्रेत है ?
या बंगाली नेशनलिज्म ने केवल बंगाली मुसलमानों को ही जगाया है ?
          इंडियन एक्सप्रेस केे जरिये सुशांत सिंह ने बंगला देश अभ्युदय के संक्षिप्त इतिहास में बंगाली नेशनलिज्म का उल्लेख किया है। उन्होंने सांगोपांग बंगला भाषी राष्ट्रीयता के कवच का मूल स्त्रोत 1905 का बंगभंग जिसे महात्मा गांधी ने हिन्द की राष्ट्रीय एकता भावना का मूल स्त्रोत अपने हिन्द स्वराज में व्यक्त किया। उन्होंने लार्ड कर्जन के बंगभंग हुक्म का विवेचन हिन्द राष्ट्रीयता के संवर्धन के नाते अपनी पहली पुस्तक के बीस अध्यायों में बंगभंग को एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया। पाकिस्तान नेशनल असेंबली के सदस्य धीरेन्द्र नाथ दत्त ने 25 फरवरी 1948 के दिन बंगाली भाषा को अंग्रेजी और उर्दू के समानांतर पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा (नेशनल लिंग्वाफ्रांका) का दर्जा दिया जाये। उनके इस प्रस्ताव को गवर्नर जनरल कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना तथा प्रधानमंत्री लियाकत अली खां ने अस्वीकार कर दिया। देखने और परखने की बात है कि दत्ता के अलावा कितने गैर मुस्लिम पूर्वी बंगाल से पाकिस्तान नेशनल असेंबली में सदस्य थे ? क्योंकि देश का बटवारा भाषा नहीं मजहब कौम के नाम पर हुआ था। 20 जून 1947 याने पार्टिशन आफ इंडिया क्रियान्वयन से सतावन दिन पहले बंगाल असेंबली ने इंडिया से छिटक जाने का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया। उस समय बंगाल असेंबली में सदस्य संख्या क्या थी ? कितने विधायक इस्लाम धर्मावलंबी थे ? कितने अपने आपको हिन्दू कहते मानते थे ? धीरेन्द्र नाथ दत्ता की तरह कितने गैर मुसलमान सदस्यों में से पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली बंगाल से कितने लोग थे ? बंगाल असेंबली के कितने गैर मुस्लिम सदस्यों ने 20 जून 1947 के समय हिन्दुस्तान से नाता तोड़ने का रास्ता अपनाया ? भारत विभाजन के फलस्वरूप पश्चिम पंजाब सीमाप्रांत में हिन्दू सिख जनसंख्या नगण्य होगई पर पूर्वी बंगाल व पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं ने जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी का आदि कवि वाल्मीकि का सिद्धांत अपनाया, वे पूर्वी पाकिस्तान में ही बने रहे। अगर धीरेन्द्र नाथ के प्रस्ताव को कायदे आजम जिन्ना और लियाकत अली खां ने स्वीकार कर लिया होता तो शायद बंगला देश का जन्म भी नहीं होता और बंगाली नेशनलिज्म पूरे वेग से प्रभावी हो जाता और इस्लामिक रिपब्लिक आफ पाकिस्तान पर बंगाली नेशनलिज्म हावी रहता क्योंकि बंगला भाषियों की संख्या पाक नेशनल असंेबली में भी ज्यादा होती। इस्लाम एक मजहब है जो एकेश्वर वादी एक प्रोफेट तथा एक धर्मशास्त्र पुस्तक पर आधारित है जबकि बंगाल सहित समूचे हिन्दुस्तान में लोग जिन्हें हिन्दू कहते हैं वह मजहब की परिभाषा में मजहबी चौखट में खरा नहीें उतरता। बंगाल में ही शाक्त, शैव, वैष्णव संप्रदायों के अलावा चैतन्य महाप्रभु परमहंस रामकृष्ण के यशस्वी शिष्य स्वामी विवेकानंद वन्दे मातरम् रचयिता ईश्वर चंद्र विद्यासागर रवीन्द्रनाथ टैगोर योगी अरविन्द घोष लाहिड़ी महाशय वे लोग जिनका आस्थामूलक लगाव अयोध्या काशी मथुरा वृन्दावन तथा मध्यवर्ती मानस खंड व केदार खंड वाला हिमालय गंगोत्री से गंगा सागर तक सदबहार नीरा गंगा की स्तुतिगान करने वाले नवद्वीप वासी बंगालियों तथा प्रवासी बंगालियों के हृदयाकाश में उड़ीसा के पुरी स्थित सुभद्रा बलराम व कृष्ण की भक्ति विवेकानंद के विश्वधर्म संसद में सनातन वेदांत का अद्वैत जिसे आदि शंकर ने हिन्द की दशों दिशाओं में व्यापकता दिलाई अद्वैत के समानांतर द्वैताद्वैत विशिष्ट द्वैत भारत में यत्र तत्र सर्वत्र प्रस्फुटित हुए पर इन सभी इतर अद्वैत पथ ने वह महत्ता हासिल नहीं कर सकी जिसका उद्भव आदि शंकर ने किया था। इसलिये बंगाली नेशनलिज्म भारत विभाजन के वक्त विधानसभा के अधिसंख्य सदस्यों द्वारा भारत से टूटने का संकल्प ले लिया पर डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद बंगाल के नेताओं में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ऐसे धर्मभीरू नेता थे जिन्हें महात्मा गांधी की हिन्दू मुस्लिम एकता अथवा हिन्दू मुस्लिम सामंजस्य के प्रबल समर्थक मौलाना आजाद ही थे। उन्होंने बड़ी बारीकी से डाक्टर बलिराम केशव हेडगेवार द्वारा विजया दशमी 1925 को स्थापित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का मानवीय विश्लेषण एक उदारमना हिन्दुस्तानी के तौर पर किया और सदैव यही कहा कि डाक्टर हेडगेवार द्वारा स्थापित संगठन अंततः हिन्दुस्तानी मुसलमानों का योगक्षेम देखने वाला संगठन साबित होगा। बंगभंग किया जाना हिन्दुस्तान की हिन्दू मुस्लिम सहअस्तित्व में एक स्थायी दीवार खड़ी करने का बर्तानी राज का समाज को बांट कर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दो निष्कंटक राज करते रहो। सात जुलाई 1947 के दिन सिलहट में जो जनमत संग्रह जिसे अंग्रेजी में रेफरेंडम कहा जाता है वह संपन्न हुआ। उस जनमत संग्रह में बंगाल के कितने मुसलमान सम्मिलित थे ? कितने स्थानीय हिन्दुओं ने पाकिस्तान संरचना का समर्थन किया ? सुशांत सिंह 45 वर्ष पहले बंगला देश का निर्माण का संक्षिप्त इतिवृत देते हुए कहते हैं - Birth of Bangladesh बंगाली नेशनलिज्म या बंगाली राष्ट्रवाद के अग्रेचर केवल मुसलमान ही नहीं जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ मानने वाले कई बंगाली हिन्दू की बंगाली राष्ट्रवाद के प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न समर्थक थे। बटवारा होने पर उन्होंने अपनी प्यारी जन्मभूमि न छोड़ने का संकल्प लिया तब बंगाल की आबादी में इस्लाम धर्मावलंबी संख्या बल में हिन्दुओं से ज्यादा थे। अगर कायदे आजम जिन्ना और लियाकत अली खां ने पाकिस्तान की सरकारी भाषा सूची में उर्दू और अंग्रेजी के साथ साथ बंगला को भी स्वीकार कर लिया होता और डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद व बंगाल के राष्ट्रवादी हिन्दू समाज ने धैर्य और विवेक से बंगाल के बंटवारे पर अपनी प्रतिक्रिया न जताई होती तो यह संभव था कि बंगाली राष्ट्रवाद पूर्वी भारत के बंगला भाषी क्षेत्रों को आज के बंगला देश के बजाय कोलकाता - नवद्वीप सहित वर्तमान पश्चिमी बंग भी दुनियां का बंगला भाषी राष्ट्र कहलाने का दावा कर सकता था। हिन्दू जीवन शैली ने बंगाली राष्ट्रवाद की यथार्थ बनाने के बजाय पूर्वी पाकिस्तान को बंगला देश में तब्दील कर डाला। ममता दीदी का मोदी हटाओ देश बचाओ का नारा क्या इस बात का प्रतीक नहीं है कि देश नहीं बंगला देश बचाओ। ममता दीदी बंगला राष्ट्रवाद की इक्कीसवीं शती की नवमूर्ति हैं। बंगाल असेंबली ने 20 जून 1947 को जो सांगोपांग बंगाल का हिन्दुस्तान से नात तोड़ फैसला किया वह जनाब सुहरावर्दी की प्रीमियर शिप में संपन्न हुआ। यदि तब सुहरावर्दी बंगाल के प्रीमियर न होकर कोई बंगला भाषी ही चाहे वह हिन्दू होता या मुसलमान होता बंगाल का प्रीमियर होता तो बंगला राष्ट्रवाद मुठ्ठी भर हिन्दुस्तान परस्त हिन्दुओं को बंगाल का हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बटवारे में बजाय पश्चिम बंग के कोलकाता सहित हिन्द का हिस्सा रहने के बजाय पूरा बंगाल पाकिस्तान होता। ममता दीदी ने जब कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और कहा तृणमूल कांग्रेस अखिल भारतीय राजनीतिक मंच है यद्यपि वास्तविकतायें वे केवल पश्चिम बंगाल तक ही सीमित हैं। उनका नया नारा मोदी हटाओ देश बचाओ वास्तव में बंगला देश बचाओ ज्यादा है। इंदिरा गांधी ने बंगाली मुसलमानों को पाकिस्तान के चंगुल से बाहर निकाला। उन्हें पाकिस्तान से आजादी दिलाई पर बंगाली राष्ट्रवाद ने मुजीबुर्रहमान व उनके सरीखे बंगालवादी मुसलमानों के अलावा जो मुजीबुर्रहमान विरोधी खेमा था वह निष्क्रिय व कमजोर नहीं हुआ। आज जो बंगला देश की नियति है वह पाकिस्तान की तरह ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग महाशय की ओर झुका है। चीन को भारत के खिलाफ हिन्द महासागर में कब्जा बंगाल की खाड़ी व अरब सागर के जरिये करना है बंगला देश और पाकिस्तान को चीन ने घेर रखा है इस मुहिम से ममता दीदी अनजान बनी हुई हैं। उनका नवोदित बंगाली राष्ट्रवाद उन्हें दिल्लीश्वरी बनाने के बजाये कहीं ढाकेश्वरी न बना दे। सुशांत सिंह ने बंगला देश अभ्युदय का जो संक्षिप्त इतिहास अन्वेषण किया है उसकी उपलब्धि बंगाली राष्ट्रवाद है। अगर उन्होंने बंगभंग से जोड़ कर बंगाली राष्ट्रवाद की नींव तक जाने का प्रयास किया होता बंगला देश अभ्युदय को केवल भारत पाक वैमनस्य का हेतु न मान कर हिन्द के संकल्प को स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के इस उद्घोष के साथ जोड़ कर देखा होता तो जो ऐतिहासिक यथार्थतायें उन्होंने War that still defines India Pak rlations में अपने निष्कर्ष में हिन्दुस्तानी राष्ट्रवाद को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकते थे। यह सही है कि भाषा जोड़ने का काम करती है तोड़ने का नहीं बंगला हिन्दुस्तान की हिन्दीतर तीन भाषाओं - बांगला, तमिल, मराठी में महत्वपूर्ण भाषा होने के साथ साथ बर्तानी राज के बंगाल प्रेसीडेंसी जिसके अंदर बंगाल के अलावा वर्तमान झारखंड बिहार उड़ीसा असम मणिपुर आदि द्वारा पूर्वी भारत बंगाल प्रेसीडेंसी कहलाता था। वहां भाषायें भी अनेक थीं पर प्राबल्य केवल बंगला भाषा का था। इसलिये स्वतंत्र भारत में जब कभी भारत सरकार यह सोचे कि साने गुरू जी की आंतर भारती ही भारतीय संघ के भाषायी विभेद का निर्णायक मार्ग प्रशस्त कर सकती है। सभी भारतीय भाषाओं को बराबरी का दर्जा मिले और आंतर भारती विश्वकोश का उसी तरह निर्माण हो जिस तरह ब्रिटेन द्वारा इनसाइक्लोपीडिया आफ ब्रिटानिका की संरचना हुई है। अभी तो ममता दीदी हिन्दी पढ़ना शुरू करना चाहती हैं ताकि वे डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के स्तर की हिन्दी भाषण कला में पारंगति पाकर काशी इलाहाबाद लखनऊ मथुरा आगरा मेरठ दिल्ली में खड़ी बोली हिन्दी में भाषण देकर अपने श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। यह मुहूर्त तो शायद 2019 में नहीं आ सकता 2024 में जब लोकसभा के चुनाव हों ममता दीदी बंगाली राष्ट्रवाद से उठ कर हिन्द-राष्ट्रवाद का पल्लू पकड़ सकें। उन्हें दिल्लीश्वरी बनने का सौभाग्य 2024 में नहीं 2029 में भी मिल जाये पर एक ही शर्त है कि उन्हें तृणमूल से एआईसीसी की शरणागत तो होना ही पड़ेगा। जहां हिन्दुस्तान की दिल्ली की सत्ता के दावेदार राहुल गांधी से उनकी टक्कर अवश्यम्भावी लगती है। जो हो अगले बारह चौदह वर्ष तक ममता दीदी को कोलकाता की ही गलियों में अपना तृणमूल कोरस चलाना होगा। मोदी सदाचारी हैं भीष्म प्रतिज्ञा वाले हैं लगता है ममता दीदी का मोदी विरोध आने वाले तीन महीनों में ही टांयटांय फिस्स होने वाला है।
          भारत सरकार को चाहिये कि बंगाल के तत्कालीन प्रीमियर जनाब सुहरावर्दी ने 20 जून 1947 को जो प्रस्ताव बंगाल असेंबली से पास कराया उस समय मुस्लिम लीग सहित बंगाल असेंबली में कितने मुसलमान एमएलए थे ? कितने हिन्दू/बौद्ध या ट्राइब एमएलए थे। उनमें से कितने गैर मुस्लिम एमएलए लोगों ने प्रीमियर सुहरावर्दी के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। उस प्रस्ताव की शब्दावली क्या थी ? पाक नेशनल असेंबली में दत्ता केे अलावा कौन कौन गैर मुस्लिम एमएलए थे ? बंगाल के बटवारे में डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सहित तत्कालीन बंगाल के इंडियन नेशनल कांग्रेस के कौन कौन सांसद या एमएलए जिन्होंने सुहरावर्दी के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। इन सब बातों पर प्रकाश डालने पर बंगाली राष्ट्रवाद (बंगाली मुस्लिम राष्ट्रवाद) का चेहरा साफ साफ सामने आ सकता है। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद की पिछले सत्तर वर्षों की घटनाओं का यथातथ्य निरूपण करने के लिये भारत सरकार एक आयोग गठित कर सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान उनके भाई डाक्टर खान सहित जिन मुसलमान नेताओं ने पश्चिम पाकिस्तान में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना का विरोध किया उनका पूरा खुलासा भारत सरकार को तैयार कर भारतीय उपमहाद्वीप जिस कवीन्द्र रवीन्द्र विशाल भारत कहते थे उसका बंगभंग से स्वातंत्र्योत्तर 70 वर्षों तक का यथातथ्य निरूपण भी आने वाली पीढ़ियों के संज्ञान हेतु प्रस्तुत की जानी चाहिये।
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