स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ता केशा नखा नराः
प्रवास के क्लेश से बचने के उपाय खोजें ?
आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति श्लोकावली में कहा - स्थानभ्रष्ट पुरूष अपनी शोभा और गरिमा को टिकाऊ नहीं बना पाता। भारत की 2011 की जनगणना आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए यह पाया गया है कि हिन्द का हर तीसरा व्यक्ति प्रवासी या अंग्रेजी भाषा में जिसे माइग्रेन्ट कहा जाता है। रामायण में एक कथानक है श्रवण कुमार का। वह अपने मातापिता को तीर्थाटन के लिये ले गया था। अपने कंधे में तराजूनुमा बांस के दोनों तरफ माता व पिता को बैठा कर प्रवास करना उसका पुत्र स्वधर्म था। जब हिन्द में यात्रा के साधन नहीं थे तब भी सुदूर केरल के कालड़ी गांव के नंबूदिरी बदरीनाथ के रावल बनते थे। दक्षिण कर्णाटक के शैव मतावलंबी नैपाल के काठमांडौ स्थित पशुपतिनाथ के प्रधान पुजारी का कार्य संपन्न करते थे। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ व बदरीनाथ धामों की तीर्थाटन प्रक्रिया में हिन्द के हर हिस्से के लोग वृद्ध होने से पहले पैदल तीर्थाटन पर निकलते थे। तीर्थाटन का महत्वपूर्ण द्वार विदर्भ था जहां के शासक की उपाधि भीष्मक होती। नल दमयंती आख्यान तथा कृष्ण रूक्मिणी कथा विदर्भ के दक्षिणापथ तथा उत्तरापथ के संगम का स्थल है। महाभारत में यक्ष प्रश्न का उल्लेख यहां इसलिये किया जारहा है यक्ष के चार सवालों में एक महत्वपूर्ण सवाल कश्च मोदते ? तीन पहले सवाल जो यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछे थे - का च वार्ता ? किमाश्चर्यम् ? कः पंथा ? थे। युधिष्ठिर ने कश्च मोदते का उत्तर देते हुए यक्ष से कहा था - अनृणी चाप्रवासीश्च सः वास्चिर मोदते। जीव जगत में वह उड़ता हुआ पक्षी ही मोदमान है, आनंदित है जो न तो ऋणी है न ही प्रवासी है। हिन्दी में कहावत है - परदेश अथवा प्रवास में धन संपन्न सत्ता संपन्न राजा भी क्लेश भोगता है। सामान्य जन को प्रवास कठिनाई को सहना ही पड़ता है। भारत में जब रेल मोटर हवाई जहाज नहीं थे तब भी तीर्थयात्री, साधु संत तथा व्यापारी अपने अपने लक्ष्य से प्रवास करते ही थे। इन प्रवासियों को लोग तब साधु कहते थे जो बोली बोलते वह सधुक्कड़ी कही जाती थी। सधुक्कड़ी के बड़े साहित्यकार कबीर दास हैं। करीब दो सौ वर्ष पहले तक व्यापार, तीर्थाटन, देशाटन और साधुओं एवं फकीरों का निरंतर घूमते रहना उनकी शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता था। गांठ में टका हो या न हो इससे तीर्थाटन या देशाटन में फर्क नहीं पड़ता था। साधुओं, फकीरों तथा तीर्थाटन के लिये निकले लोगों को बिना गांठ खोले भोजन मिल जाता था। व्यापार के लिये निकले हुए व्यापारी बनिये भी साधु कहलाते थे उनका उद्देश्य व्यापार से धन कमाना था पर रहन सहन उनका भी वैसा ही था जैसा तीर्थाटन के लिये निकले लोगों का। इंडियन ऐक्सप्रेस ने 6 दिसंबर 2016 के सातवें पन्ने में खुलासा किया - Indian The Move – Census 2011 Data shows a 98 % inverse in Tamilnadu’s migrant population, 77% in Kerala, 69% of migrants are Women. महाराष्ट्र से 5.73 करोड़ उ.प्र. से 5.9 करोड़ तमिलनाडु से 3.13 करोड़ पश्चिम बंग से 3.33 करोड़ आंध्र से 3.32 करोड़ प्रव्रजित जनसंख्या है। वहां आये वहां से गये लोगों का आंकड़ा अलग अलग नहीं। प्रवासियों का यह आंकड़ा तमिलनाडु में सन 2001 में 10.58 करोड़ था जो 2011 में 3.13 करोड़ होगया। मणिपुर व मेघालय अपेक्षाकृत आबादी के नजरिये से छोटे राज्य हैं पर केरल जम्मू कश्मीर असम कर्णाटक और आंध्र में प्रवासी संख्या में 2001 से 2011 में क्रमशः 77%, 55%, 52%, 51% और 42% बढ़ी। प्रवासियों की बढ़त के कारण रोजगार, व्यापार, शिक्षा, विवाह, पूरी गृहस्थी का प्रवास के मामलों में विवाह के कारण 21 प्रतिशत महिलायें प्रभावित हुईं। स्तंभकार जीशान शेख का मानना है कि दक्षिणापथ की तरफ प्रवासी रूख ज्यादा था। जनगणना के प्रवासी आंकड़े यह महसूस कराते हैं कि भारत के निवासियों में हर तीसरा व्यक्ति प्रवासी है। बीजू जनता दल के सांसद वैजयंत जय पांडा का आकलन है कि हिन्द का हर तीसरा व्यक्ति गरीबी की मार से त्रस्त है। संभवतः गरीबी भुखमरी बेरोजगारी के कारण भी लोग अपनी कदीमी घर छोड़ कर बाहर जाते हैं। स्तंभकार जीशान शेख की मान्यता है आर्थिक असमानता के कारण भी जीविका अथवा व्यापार के लिये प्रवासी निकलते हैैं। जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार स्तंभकार इस नतीजे पर पहुंचीं हैं कि तमिलनाडु और केरल जिनकी जनसंख्या क्रमशः 7,21,38,958 और 3,33,83,697 है। दोनों का क्षेत्रफल 1,30,058 वर्ग किलोमीटर व 38,853 वर्ग किलोमीटर है। इन दो राज्यों में प्रवासी जनसंख्या सबसे ज्यादा है। प्रवासी जनसंख्या भारत की पूरी जनसंख्या का 37.8: याने तिहाई से ज्यादा है। स्वराज के निर्देशक संपादक महाशय आर. जगन्नाथन ने जी.एस.टी. के संबंध में जो शंकायें व्यक्त की हैं उनकी सोच है कि बदलते हुए राजनीतिक पैमानों और तमिलनाडु के नौकरशाहों ने जन जन की अम्मा जयराम जयललिता के निधन के पश्चात मानसिक राहत महसूस की है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जिस उग्रता से नोटबंदी के खिलाफ भारत के प्रधानमंत्री को घेरना चाहते हैं तथा लंबे अर्से तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रभामंडल में रहे शरद यादव का यह कहना कि बीजेपी को राज करना तथा कांग्रेस को विरोध में बैठना नहीं आता। जदयू राज्य सभा सांसद शरद यादव कहते हैं अपने साक्षात्कार में विरोध पक्ष के तरीके को Natural कहते हैं और Warns Prime Minister against rushing in to things as it could lead to his ‘fall’. इस प्रसंग में विवेचनीय बिन्दु यह है कि शरद यादव जदयू बिहार अध्यक्ष म.प्र. के लिये क्षेत्रीय नेतृत्व अथवा सुप्रीमो शैली वाले नेता नहीं हैं। जब तक वे एन.डी.ए. के प्रवक्ता थे उनकी पूछ थी। जदयू ने जब भाजपा या एनडीए से नाता तोड़ लिया शरद यादव कुछ समय के लिये जदयू अध्यक्ष रहे पर जहां तक राजनीतिक प्रमुख तथा दल के अग्रणी नेतृत्व का सवाल है शरद यादव बिहार की राजनीति के लिये वैसे ही बाहरी व्यक्ति थे जिस तरह बिहार निर्वाचन में नितीश कुमार ने प्रधानमंत्री को बिहारी बनाम बाहरी का तमगा जड़ डाला। अंततोगत्वा बिहारी बनाम बाहरी का नारा अपने आप प्रभावी होगया। जिस जोश खरोश से शरद यादव नोटबंदी या विमुद्रीकरण को कोस रहे हैं उनका यह कहना कि भाजपा शासन करना नहीं जानती वे स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में एनडीए के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। मूलतः समाजवादी पृष्ठभूमि होने के कारण अ.भा. कांग्रेस के आलोचक भी रहे हैं। उनका यह कहना कि कांग्रेस को विरोध पक्ष में बैठना नहीं आता यह प्रकारांतर से प्रतीति कराता है कि वे अपने अंतर्मन से यह सोचते हैं कि हिन्द में शासन करने की कला केवल कांग्रेस ही जानती है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोआ, उत्तराखंड और हिमाचल में जब चुनाव होंगे इन राज्यों में दोनों राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस कहां रहती है ? क्योंकि लोकतंत्र में लोकमत ही महत्वपूर्ण होता है। उदाहरण अमरीकी नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का है। उन्होंने श्वेत मतदाताओं का मन जीत लिया। सत्ता में दस्तक दे दी। देखिये अमरीका सहित दुनियां के विभिन्न राष्ट्र राज्यों में क्या असर पड़ता है अमरीकी पेंतालीसवें राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप की श्वेत नस्ल बंदी की नुमाइन्दगी का ? ईश्वर डोनाल्ड ट्रंप को सद्बुद्धि प्रदान करे। वे 20 जनवरी 2017 के दिन अमरीकी राष्ट्रपति पद की ह्वाइट हाउस वाशिंगटन में शपथ ग्रहण करेंगे। नक्षत्र स्वाति है, तिथि कृष्ण अष्टमी उनके शपथ ग्रहण पर्यन्त कृष्ण नवमी रिक्ता तिथि होगी जिसे पश्चिम के विद्वत समाज द्वारा Climate Change कहा जाता है वह भारतीय संदर्भ में मीमांसित होने वाला वैश्विक राजबिन्दु है।
नोटबंदी के संबंध में नोटबंदी के पक्ष में ऐसे अनेक बिन्दु हैं जो नोटबंदी से दीर्घकालीन वित्तीय सुधार तथा वर्तमान में अनर्जित धन ने जो महत्ता पा ली है उसे धराशायी करने में राजनीतिक विवेक आवश्यक है। करेंसी का 86 प्रतिशत भाग पांच सौ व हजार रूपये के नोटों का है। गैरकानूनी किस्म से निर्मित किये गये अरबों रूपये के नोट भी बाजार में हैं। आतंकवादियों सहित आर्थिक आततायी देसी या विदेशी नागरिक अनर्जित तथा कानून जिसे ब्लैक मनी कहता है उसकी कितनी मात्रा है इसके अलग अलग आकलन हैं। उत्तर प्रदेश पंजाब सहित जिन राज्यों में वर्ष 2017 की पहली तिमाही में विधानसभा चुनाव होने जारहे हैं। वहां की राजनीतिक पार्टियां अपने हित संवर्धन के लिये किसी भी स्तर तक जाकर नोटबंदीजन्य अव्यवस्थाओं से लाभान्वित होना चाहेंगी। 4 दिसंबर 2016 के इंडियन ऐक्सप्रेस ने कैनरा बैंक के सीनियर मैनेजर धीरज कुमार आगरा के निकट की किसी ग्रामीण शाखा के संदर्भ में कहा - शाखा में केवल 5 कर्मी हैं जिनमें पियोन व गार्ड भी हैं। नाराज ग्राहक उन्हें मार भी सकते हैं। पुलिस असहाय है, इंटरनेट सुषुप्तावस्था में है इसलिये 1000 व 500 रूपये के नोटों में से जो नोट चलन में ज्यादा हैं उन्हें 31 दिसंबर 2016 के बजाय 31 जनवरी 2017 तक बैंकों में जमा करने के अलावा बाजार में भी जहां जहां केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार के विभागीय उपक्रम हैं पांच सौ रूपये के पुराने नोटों को स्वीकार किया जाये और सरकार केवल एक हजार रूपये के नोटबंदी को सख्ती से अपनाये। इस प्रकार की व्यवस्था के संकल्प से लोगों को राहत मिल सकेगी। नये नोटों की पहुंच, नकली नये नोटों का बाजार में पहले पहुंच जाना तथा जो राज्य सरकारें नोटबंदी को राष्ट्रीय हित का हेतु मानती हैं उनका सहयोग जितना उपलब्ध हो उतना अच्छा। पश्चिम बंग व दिल्ली के मुख्यमंत्री नोटबंदी के बारे में जो कह रहे हैं उसको फिलहाल भारत सरकार को नजरअंदाज करना चाहिये और मनी लांड्रिंग सहित जाली नोटों का जो धंधा दिल्ली कोलकाता में अबाध गति से चल रहा है उस पर तीखी नजर रखना समय की पुकार है। बैंक और बैंकों के एटीएम अगर निर्धारित सीमा तक नये नोटों विशेषकर 500 रूपये के नये नोट विज्ञापित मात्रा चौबीस हजार रूपये तक ग्राहकों को उपलब्ध होना कम से कम आने वाले पंद्रह दिनों में शुरू हो जाता है समानांतर पांच सौ रूपयों के पुराने प्रतिबंधित नोट हर सरकारी उपक्रम में स्वीकारे जाते रहें तो अनर्जित धन के दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।
2011 की जनगणना मुताबिक जो प्रवासी स्थितियां सामने आई हैं 2021 की जनगणना में भारत की आबादी डेढ़ अरब से ज्यादा होगी उसी अनुपात में गरीबी बेरोजगारी का भी ग्राफ ऊपर बढ़ेगा इसलिये प्रधानमंत्री जी के पास केवल गांधी आर्थिकी रास्ता ही बचा हुआ है जो देश के तीस करोड़ परिवारों का योगक्षेम संवारने में अकेला मार्ग है जिसका अनुसरण युगधर्म है। इसलिये परिवार की आमदनी बढ़ाने में महिला श्रम शक्ति अकूत मददगार हो सकती है। महाशय कलराज मिश्र और उनके दो राज्यमंत्री तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना महाशय ने अपील जारी की है, 13,500 का चंदा देने की देश की महिला श्रम शक्ति को मजबूत करने के लिये केवल गांधी का चरखा, हथकरघा पर चरखा कते सूत की बुनाई, ऊन बुनाई रेशम बुनाई के जरिये हथकरघा बुनकरों को कती कतकर के समानांतर रोजाना पारिश्रमिक उपलब्ध करा कर भारत ही नहीं यू.एस.ए. तथा यूरप के देशों में हाथ कते करघा बुने सूती कपड़ों की मांग की आपूर्ति का जिम्मा कपड़ा मंत्रालय उसी तरह ले जिस तरह चीन ने विश्व के परिधान बाजार में अपने लिये महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया है। भारत में भी चीन निर्मित सस्ते कपड़े तथा परिधान उपलब्ध हैं। भारत के कपड़ा मंत्रालय को उन देशों का जहां विशुद्ध सूती कपड़े की मांग है चर्खे में काते सूत और करघे में बुने कपड़े के परिधानों का निर्यात संकल्पित करना चाहिये। एमएसएमई एक्ट के तहत जो खादी मार्का खादी परिधान का संकल्प मंत्रालय ने लिया है उसके पुनरीक्षण की तत्काल जरूरत है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के हथकरघा व खादी कपड़े का जो संकल्प लिया था वह 1963-64 के पश्चात ठप होगया। नये नये प्रयोगों ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के उद्यमिता आह्वान पर 1987 में पहुंच कर एक रोक सी लग गयी। 1987 से 2016 तक के पिछले उन्नीस वर्षों में खादी ने अपनी पहचान तक खो डाली। अगर गांवों शहरों के गरीब लोगों में बेरोजगारी को कम करना है तो गांधी की खादी ही एक ऐसा रास्ता है जो सीमित खर्चे में प्रत्येक परिवार की आमदनी बढ़ाने का संकल्प लेकर कृतकृत्य हुआ जा सकता है। Migration अथवा आजीविका के लिये प्रवासी बनना देश के हर तीसरे आदमी का अपने परंपरागत घर से बाहर जाना तीन व्यक्तियों मेें से एक व्यक्ति का दरिद्र या गरीब होना इन दो चुनौतियों का सामना केवल गांधी का चर्खा और हथकरघा बुनकर का करघा ही सामना कर सकते हैं। चर्खा और करघा पर रोजगार का गांधी मार्ग ही गांवों और शहरों से पलायन रोकने में मददगार हो सकता है। पलायन का वर्तमान और हिन्द के उन शहरों के लिये Law of Mob. की राष्ट्रीय पीड़ा का उभार भी कर सकता है इसलिये सरकार जिन 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाना चाह रही है उनमें महिला श्रम शक्ति का चर्खे पर कताई और ऊनी तागे की हाथ बिनाई पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है। रोजगार शनैः शनैः धरती की तरफ है जिसे लोग स्वरोजगार कहते हैं उसके रास्ते में भी अनेक रूकावटें हैं। सरकारी नौकरी में न्यूनतम मौलिक वेतन अठारह हजार रूपये जो महंगाई व दूसरे भत्तों सहित अठारह हजार का ड्यौढ़ा सताईस हजार से भी बढ़ जाता है सरकारी अफसरों का अधिकतम वेतन अढ़ाई लाख से तीन लाख तक राजा (सरकार व सरकारी कर्मचारी) तथा जनता के बीच एक चौड़ी आर्थिक खाई का निर्माण कर चुका है। गुजरात के संपन्न पटेलों, हरयाणा के संपन्न जाट अपने लिये सरकारी नौकरी में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। ज्यों ज्यों सरकारी अहलकारों की तनखाह बढ़ रही है उनका अनर्जित धन इच्छा भी समानांतर बढ़ रही है। लोगों में एक धारणा घर कर गयी है कि सरकारी नौकरी कामधेनु गाय सरीखी मददगार है। माइग्रेशन का ग्राफ निरंतर बढ़त की ओर होने के कारण कानून और व्यवस्था के तौर तरीकों में भी सुधार की जरूरत है। इसलिये माइग्रेशन की न्यूनतम व अधिकतम सीमा का निर्धारण भारत की पार्लमेंट को करना ही होगा। इसलिये माइग्रेशन पर शांतचित्त होकर विचार करना चाहिये। भारत के सामने यक्ष प्रश्न का मोदते ? कौन खुश है ? आनंदित है करजदार अगर वह इस्लाम धर्मावलंबी है वह मानता है कर्ज से डूबा इन्सान हज का लाभ नहीं पाता। भारत का परंपरागत धर्मावलंबी मानता है कि काशी विश्वनाथ में दशाश्वमेघ घाट की बावन सीढ़ियों वाला स्नानी ऋण से छुटकारा नहीें दे सकता। इसलिये खुश रहना हो तो कर्ज अदा करो। उस उडते हुए पंछी की तरह रहो जो हवा में उड़ता है न ऋणी है न प्रवासी। भारत के संदर्भ में माइग्रेशन या प्रवासी हो वह रोजगार के कारण हो विवाह के कारण हो आर्थिक बेरहमी के कारण समाज में प्रतिष्ठा न पाने से क्षुभित होकर रोजगार या व्यापार की खोज में घर से बाहर निकलने में हो प्रवास आर्थिक लाभ उपयोग स्वतंत्रता के साथ साथ अपनी धरती से नाता टूटने के कारण सांस्कृतिक आघात भी पहुंचाता है। आज माइग्रेशन ऐसी विधा बन गयी है जिससे छुटकारा पाना संभव नहीं है। अमरीका के नव निर्वाचित पेंतालीसवें राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप ने एच आई बी वीसा पर अंकुश लगाने का संकल्प व्यक्त किया है जिससे विश्व के उन देशों के कम्प्यूटर प्रयोगकर्ताओं पर वीजा समाप्ति का असर पड़ सकता है। अभी राष्ट्रपति का आसन ग्रहण करने में एक महीने से ज्यादा समय है दुनियां की राजनीति में आने वाले एक महीने में अगर सांघातिक परिवर्तन हुए ट्रंप अपनी नीति व निर्देश पर पुनः विचार करने के लिये बाध्य हो सकते हैं। इसलिये 2016 ईसवी समाप्ति का इंतजार कीजिये ट्रंप का मानसिक ऊँट किस करवट बैठता है देखते रहिये।
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नोटबंदी के संबंध में नोटबंदी के पक्ष में ऐसे अनेक बिन्दु हैं जो नोटबंदी से दीर्घकालीन वित्तीय सुधार तथा वर्तमान में अनर्जित धन ने जो महत्ता पा ली है उसे धराशायी करने में राजनीतिक विवेक आवश्यक है। करेंसी का 86 प्रतिशत भाग पांच सौ व हजार रूपये के नोटों का है। गैरकानूनी किस्म से निर्मित किये गये अरबों रूपये के नोट भी बाजार में हैं। आतंकवादियों सहित आर्थिक आततायी देसी या विदेशी नागरिक अनर्जित तथा कानून जिसे ब्लैक मनी कहता है उसकी कितनी मात्रा है इसके अलग अलग आकलन हैं। उत्तर प्रदेश पंजाब सहित जिन राज्यों में वर्ष 2017 की पहली तिमाही में विधानसभा चुनाव होने जारहे हैं। वहां की राजनीतिक पार्टियां अपने हित संवर्धन के लिये किसी भी स्तर तक जाकर नोटबंदीजन्य अव्यवस्थाओं से लाभान्वित होना चाहेंगी। 4 दिसंबर 2016 के इंडियन ऐक्सप्रेस ने कैनरा बैंक के सीनियर मैनेजर धीरज कुमार आगरा के निकट की किसी ग्रामीण शाखा के संदर्भ में कहा - शाखा में केवल 5 कर्मी हैं जिनमें पियोन व गार्ड भी हैं। नाराज ग्राहक उन्हें मार भी सकते हैं। पुलिस असहाय है, इंटरनेट सुषुप्तावस्था में है इसलिये 1000 व 500 रूपये के नोटों में से जो नोट चलन में ज्यादा हैं उन्हें 31 दिसंबर 2016 के बजाय 31 जनवरी 2017 तक बैंकों में जमा करने के अलावा बाजार में भी जहां जहां केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार के विभागीय उपक्रम हैं पांच सौ रूपये के पुराने नोटों को स्वीकार किया जाये और सरकार केवल एक हजार रूपये के नोटबंदी को सख्ती से अपनाये। इस प्रकार की व्यवस्था के संकल्प से लोगों को राहत मिल सकेगी। नये नोटों की पहुंच, नकली नये नोटों का बाजार में पहले पहुंच जाना तथा जो राज्य सरकारें नोटबंदी को राष्ट्रीय हित का हेतु मानती हैं उनका सहयोग जितना उपलब्ध हो उतना अच्छा। पश्चिम बंग व दिल्ली के मुख्यमंत्री नोटबंदी के बारे में जो कह रहे हैं उसको फिलहाल भारत सरकार को नजरअंदाज करना चाहिये और मनी लांड्रिंग सहित जाली नोटों का जो धंधा दिल्ली कोलकाता में अबाध गति से चल रहा है उस पर तीखी नजर रखना समय की पुकार है। बैंक और बैंकों के एटीएम अगर निर्धारित सीमा तक नये नोटों विशेषकर 500 रूपये के नये नोट विज्ञापित मात्रा चौबीस हजार रूपये तक ग्राहकों को उपलब्ध होना कम से कम आने वाले पंद्रह दिनों में शुरू हो जाता है समानांतर पांच सौ रूपयों के पुराने प्रतिबंधित नोट हर सरकारी उपक्रम में स्वीकारे जाते रहें तो अनर्जित धन के दुष्प्रभावों को रोका जा सकता है।
2011 की जनगणना मुताबिक जो प्रवासी स्थितियां सामने आई हैं 2021 की जनगणना में भारत की आबादी डेढ़ अरब से ज्यादा होगी उसी अनुपात में गरीबी बेरोजगारी का भी ग्राफ ऊपर बढ़ेगा इसलिये प्रधानमंत्री जी के पास केवल गांधी आर्थिकी रास्ता ही बचा हुआ है जो देश के तीस करोड़ परिवारों का योगक्षेम संवारने में अकेला मार्ग है जिसका अनुसरण युगधर्म है। इसलिये परिवार की आमदनी बढ़ाने में महिला श्रम शक्ति अकूत मददगार हो सकती है। महाशय कलराज मिश्र और उनके दो राज्यमंत्री तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार सक्सेना महाशय ने अपील जारी की है, 13,500 का चंदा देने की देश की महिला श्रम शक्ति को मजबूत करने के लिये केवल गांधी का चरखा, हथकरघा पर चरखा कते सूत की बुनाई, ऊन बुनाई रेशम बुनाई के जरिये हथकरघा बुनकरों को कती कतकर के समानांतर रोजाना पारिश्रमिक उपलब्ध करा कर भारत ही नहीं यू.एस.ए. तथा यूरप के देशों में हाथ कते करघा बुने सूती कपड़ों की मांग की आपूर्ति का जिम्मा कपड़ा मंत्रालय उसी तरह ले जिस तरह चीन ने विश्व के परिधान बाजार में अपने लिये महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया है। भारत में भी चीन निर्मित सस्ते कपड़े तथा परिधान उपलब्ध हैं। भारत के कपड़ा मंत्रालय को उन देशों का जहां विशुद्ध सूती कपड़े की मांग है चर्खे में काते सूत और करघे में बुने कपड़े के परिधानों का निर्यात संकल्पित करना चाहिये। एमएसएमई एक्ट के तहत जो खादी मार्का खादी परिधान का संकल्प मंत्रालय ने लिया है उसके पुनरीक्षण की तत्काल जरूरत है। प्रथम पंचवर्षीय योजना के हथकरघा व खादी कपड़े का जो संकल्प लिया था वह 1963-64 के पश्चात ठप होगया। नये नये प्रयोगों ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के उद्यमिता आह्वान पर 1987 में पहुंच कर एक रोक सी लग गयी। 1987 से 2016 तक के पिछले उन्नीस वर्षों में खादी ने अपनी पहचान तक खो डाली। अगर गांवों शहरों के गरीब लोगों में बेरोजगारी को कम करना है तो गांधी की खादी ही एक ऐसा रास्ता है जो सीमित खर्चे में प्रत्येक परिवार की आमदनी बढ़ाने का संकल्प लेकर कृतकृत्य हुआ जा सकता है। Migration अथवा आजीविका के लिये प्रवासी बनना देश के हर तीसरे आदमी का अपने परंपरागत घर से बाहर जाना तीन व्यक्तियों मेें से एक व्यक्ति का दरिद्र या गरीब होना इन दो चुनौतियों का सामना केवल गांधी का चर्खा और हथकरघा बुनकर का करघा ही सामना कर सकते हैं। चर्खा और करघा पर रोजगार का गांधी मार्ग ही गांवों और शहरों से पलायन रोकने में मददगार हो सकता है। पलायन का वर्तमान और हिन्द के उन शहरों के लिये Law of Mob. की राष्ट्रीय पीड़ा का उभार भी कर सकता है इसलिये सरकार जिन 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाना चाह रही है उनमें महिला श्रम शक्ति का चर्खे पर कताई और ऊनी तागे की हाथ बिनाई पर ज्यादा जोर देने की जरूरत है। रोजगार शनैः शनैः धरती की तरफ है जिसे लोग स्वरोजगार कहते हैं उसके रास्ते में भी अनेक रूकावटें हैं। सरकारी नौकरी में न्यूनतम मौलिक वेतन अठारह हजार रूपये जो महंगाई व दूसरे भत्तों सहित अठारह हजार का ड्यौढ़ा सताईस हजार से भी बढ़ जाता है सरकारी अफसरों का अधिकतम वेतन अढ़ाई लाख से तीन लाख तक राजा (सरकार व सरकारी कर्मचारी) तथा जनता के बीच एक चौड़ी आर्थिक खाई का निर्माण कर चुका है। गुजरात के संपन्न पटेलों, हरयाणा के संपन्न जाट अपने लिये सरकारी नौकरी में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। ज्यों ज्यों सरकारी अहलकारों की तनखाह बढ़ रही है उनका अनर्जित धन इच्छा भी समानांतर बढ़ रही है। लोगों में एक धारणा घर कर गयी है कि सरकारी नौकरी कामधेनु गाय सरीखी मददगार है। माइग्रेशन का ग्राफ निरंतर बढ़त की ओर होने के कारण कानून और व्यवस्था के तौर तरीकों में भी सुधार की जरूरत है। इसलिये माइग्रेशन की न्यूनतम व अधिकतम सीमा का निर्धारण भारत की पार्लमेंट को करना ही होगा। इसलिये माइग्रेशन पर शांतचित्त होकर विचार करना चाहिये। भारत के सामने यक्ष प्रश्न का मोदते ? कौन खुश है ? आनंदित है करजदार अगर वह इस्लाम धर्मावलंबी है वह मानता है कर्ज से डूबा इन्सान हज का लाभ नहीं पाता। भारत का परंपरागत धर्मावलंबी मानता है कि काशी विश्वनाथ में दशाश्वमेघ घाट की बावन सीढ़ियों वाला स्नानी ऋण से छुटकारा नहीें दे सकता। इसलिये खुश रहना हो तो कर्ज अदा करो। उस उडते हुए पंछी की तरह रहो जो हवा में उड़ता है न ऋणी है न प्रवासी। भारत के संदर्भ में माइग्रेशन या प्रवासी हो वह रोजगार के कारण हो विवाह के कारण हो आर्थिक बेरहमी के कारण समाज में प्रतिष्ठा न पाने से क्षुभित होकर रोजगार या व्यापार की खोज में घर से बाहर निकलने में हो प्रवास आर्थिक लाभ उपयोग स्वतंत्रता के साथ साथ अपनी धरती से नाता टूटने के कारण सांस्कृतिक आघात भी पहुंचाता है। आज माइग्रेशन ऐसी विधा बन गयी है जिससे छुटकारा पाना संभव नहीं है। अमरीका के नव निर्वाचित पेंतालीसवें राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप ने एच आई बी वीसा पर अंकुश लगाने का संकल्प व्यक्त किया है जिससे विश्व के उन देशों के कम्प्यूटर प्रयोगकर्ताओं पर वीजा समाप्ति का असर पड़ सकता है। अभी राष्ट्रपति का आसन ग्रहण करने में एक महीने से ज्यादा समय है दुनियां की राजनीति में आने वाले एक महीने में अगर सांघातिक परिवर्तन हुए ट्रंप अपनी नीति व निर्देश पर पुनः विचार करने के लिये बाध्य हो सकते हैं। इसलिये 2016 ईसवी समाप्ति का इंतजार कीजिये ट्रंप का मानसिक ऊँट किस करवट बैठता है देखते रहिये।
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